‘प्रगतिशील काव्यधारा में दलित स्त्री’ बजरंग बिहारी तिवारी का सुदीर्घ आलेख है जिसके 7 भाग लिखे जा चुके हैं और आगे के हिस्सों पर काम जारी है। कथादेश में छप चुके ये भाग क्रमशः, किंचित संशोधन-परिवर्द्धन के साथ नया पथ के पाठकों के लिए प्रस्तुत किए जा रहे हैं। भाग 1 आप पढ़ चुके हैं। भाग 2 प्रस्तुत है।

प्रॅलिटेरियट (Proletariat) के लिए ‘सर्वहारा’ शब्द का इस्तेमाल करने के संबंध में साम्यवादी पार्टी में, उससे सम्बद्ध बुद्धिजीवियों में क्या कोई बहस हुई थी; मुझे इसकी जानकारी नहीं है। यह अवश्य कह सकता हूँ कि प्रगतिवादी कवियों में ‘सर्वहारा’ शब्द का चलन शुरू में नहीं है। वे इसके लिए ‘दलित’ शब्द का प्रयोग करते प्रतीत होते हैं। दुर्गादत्त त्रिपाठी के पूर्वोद्धृत गीत ‘विजय ध्वजा फहरा दे विजये’ (‘मनोरमा’, अक्टूबर 1925) में ‘अछूत’, ‘अस्पृश्य’ और ‘दलित’ तीनों शब्दों का इस्तेमाल हुआ है। छुआछूत बरतने वाले समाज को वे ‘अछूत’ और ‘हिंसक’ कहते हैं, ‘अस्पृश्यों’ के विजय की कामना करते हैं, और अंततः ‘दलितों’ के आधिपत्य की इच्छा ज़ाहिर करते हैं। दूसरे शब्दों में इसी को सर्वहारा का अधिनायकत्व या तानाशाही कहा जाता है। स्वामी अछूतानन्द हरिहर (1879-1933) के प्रथम काव्यसंग्रह ‘आदिवंश का डंका’ (1914, अनुमानित)19 की एक कविता में ‘दलित’ शब्द का जैसा व्यवहार हुआ है, उससे लगता है कि अभी तक यह शब्द सभी तरह के उत्पीड़ितों के लिए व्यवहार में लाया जा रहा है-
खुदी में आकर तुम्हीं ने इनको शहर बदर भी करा दिए हैं।
ये ऊँचेपन के गुरूर कब तक तुम्हारे दिल में भरे रहेंगे?
… … …
दलित प्रवंचित अछूत जिस दिन तमाम हिलमिल के एक होंगे।
मनुस्मृति के अमानुषी ये विधान तब क्या धरे रहेंगे?
स्पष्ट है कि स्वामी अछूतानन्द दलित को प्रवंचित और अछूत के समतुल्य मान रहे हैं। प्रगतिवादी कविता में ‘दलित’ उन अछूतों, प्रवंचितों, श्रमिकों को माना गया जो जाग्रत हैं और यथास्थिति से बाहर आने का मन बना चुके हैं। जिनमें यह आत्मसजगता, यह चेतना नहीं आई है वे ‘पददलित’ हैं। तमाम पददलितों, शोषितों को उबारने का काम ‘प्रॅलिटेरियट’ = दलित = सर्वहारा करेंगे। उन्होंने ही सोवियत संघ का निर्माण किया है। यह देश ‘नव संस्कृति का अग्रदूत’ है। दुनिया भर के दलित जुड़ते जा रहे हैं। इनकी एका ही इन्हें अजेय बनाएगी-
नव संस्कृति के अग्रदूत हे पद दलितों की आस।
एक तुम्हारी गति पर अटकी मानवता की साँस।
पर अजेय है आज तुम्हारी पहले से भी शक्ति,
जिसमें मिली विश्व भर के दलितों की चिर अनुरक्ति।20
प्रगतिवादी कवि शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ (1915 – 2002) मास्को को संसार भर के प्रॅलिटेरियट अर्थात् दलितों की तीर्थभूमि मानते हैं। यह संभव हुआ उनके संगठित होने से। जब तक वे एक हैं उनकी तूती बोलेगी-
यह दलितों की तीर्थभूमि है, युग का प्रबल तकाज़ा,
सर्वप्रथम साम्राज्यवाद का, निकला यहीं जनाज़ा।
यहाँ संगठित जनजीवन की, बोला करती तूती,
जिसने युग की बर्बरता को दे दी आज चुनौती।21
इस समय (1950) तक प्रगतिवादी कविता में ‘सर्वहारा’ पदबंध का व्यवहार दिखाई पड़ने लगा है। निरंकारदेव सेवक (1919-1994) की ‘नया समाज’ के सितंबर, 1949 अंक में प्रकाशित ‘अंगार का स्वर’ कविता की ये पंक्तियाँ देखिए- “विश्व पर अधिकार सत्ता का नहीं, श्रम का;/ व्यर्थ है लेना जगत में नाम संयम का। … सर्वहारा वर्ग के संसार का स्वर हूँ,/ मैं अभावों के अमर अधिकार का स्वर हूँ।22 हिंदी कविता इस समय सर्वाधिक वैश्विक है। उसकी निगाह दुनिया भर के घटनाक्रमों पर है। वह जानती है कि वर्चस्व की जड़ें जागतिक (ग्लोबल) हैं। एक देश के पीड़ितों की मुक्ति शेष देशों के पीड़ितों से काट कर नहीं देखी जा सकती। ‘साम्य प्रभा’ फैलाने में लगे कवि देवीदत्त मिश्र की प्राथमिकता देश को विदेशी शासन से आज़ाद देखने की है और उसके बाद वे पूरे संसार में जनतंत्र देखना चाहते हैं। वे चाहते हैं कि सत्ता किसी के पास रहे ही नहीं; यही परिवर्तन का लक्ष्य है, यही ‘साम्य प्रभा’ है- जगती तल से एकतंत्र शासन का हो अवसान।/ साम्य भाव से रहें सभी, राजा या रंक किसान।।/ सत्ता की शान मिटाओ। परिवर्तन स्वागत आओ।।23
‘दलित’ शब्द की यात्रा को उसके वांछित गंतव्य तक पहुँचाया दलित पैंथर ने। मुंबई के सिद्धार्थ नगर में जून 1972 में गठित दलित पैंथर का जुड़ाव एक तरफ़ संयुक्त राज्य अमेरिका के ब्लैक पैंथर से था तो दूसरी तरफ़ यहाँ साहित्य में सवर्ण वर्चस्व को चुनौती देने वाले ‘लिटिल मैगज़ीन मूवमेंट’ से। दलित पैंथर का नेतृत्व ब्लैक पैंथर के आक्रामक लेखन, सामुदायिक सेवा और राजनीतिक संघर्ष से प्रेरित-प्रभावित था।24 ब्लैक पैंथर का निर्माण साम्यवाद की तरफ़ झुकाव रखने वाले शिक्षित युवकों ने किया था। उन्होंने साम्यवादी घोषणापत्र की तर्ज़ पर ब्लैक पैंथर का घोषणापत्र जारी किया था। दलित पैंथर में भी साम्य रुझान वाले युवा नेतृत्वकर्ता टीम में थे। पैंथर के गठन के अगले वर्ष नामदेव ढसाल की अगुआई में उन्होंने मराठी में अपना घोषणापत्र निकाला। उपलब्ध साक्ष्य बताते हैं कि घोषणापत्र के लेखन में क्रांतिकारी वाम के कुछ सदस्यों का सहयोग था।25 इसमें पहली बार ‘दलित’ शब्द का स्वरूप स्पष्ट किया गया और उसकी परिधि चिह्नित की गई। घोषणापत्र में शोषण की मार्क्सवादी समझ और सांस्कृतिक दमन की आंबेडकरी दृष्टि का साझापन है। इसमें ‘दलित’ अवधारणा के दायरे में आने वालों की शिनाख्त की गई है- “अनुसूचित जाति और जनजाति के सदस्य, नवबौद्ध, श्रमिक जन, भूमिहीन ग़रीब किसान, स्त्रियाँ और वे सभी लोग आते हैं जिनका राजनीतिक, आर्थिक और धार्मिक शोषण हो रहा है।” कहने की ज़रूरत नहीं कि मैनिफेस्टो में प्रॅलिटेरियट के पर्याय के रूप में दलित शब्द का प्रयोग हुआ है। सर्वहारा और दलित के समीकरण की यह परंपरा हिंदी दलित कविता तक चली आई हैं। उदाहरण के लिए रजनी तिलक की कविता ‘मजदूर है इस देश का दलित’ का यह अंश देखा जा सकता है26–
हर कष्ट में मुस्कराता तेरा चेहरा
जैसे भट्ठी में तपता सुर्ख लोहा
दलित! तुम हो इस देश के मज़दूर
गर्मियों में लहू टपकता, बन पसीना तुम्हारा
सर्दियों में अर्धवस्त्र, ठंड से बेहाल बेचारा
दलित! तुम हो इस देश के सर्वहारा।
यह स्वीकार करना होगा कि हिंदी प्रगतिशील लेखन में पितृसत्ता का प्रश्न बहुत बाद में शामिल हुआ। स्वयं स्त्री रचनाकार ही इस विचारधारा में अत्यल्प थीं। उर्दू अदब में बेशक उल्लेखनीय प्रोग्रेसिव स्त्री स्वर हैं।27 यशपाल के द्वारा संपादित ‘विप्लव’ में कभी-कभार छपने वाली सुमित्रा कुमारी सिन्हा की कविताएँ प्रगतिशील भावभूमि पर हैं यद्यपि उन्हें प्रगतिवादी रचनाकार नहीं माना जाता।28 यह कहना ठीक रहेगा कि इस विचारधारा के रचनाकारों का स्त्री पुरुष समता में इनका यक़ीन था और उन्होंने गाहे-बगाहे स्त्री-पीड़ा को दर्ज किया है। नरेन्द्र शर्मा (1913 – 1989) ने अपने तीसरे संग्रह ‘प्रभात फेरी’ (1938) के एक गीत में लिखा29–
बहुत बज चुकी जर्जर वीणा, बहुत प्रेम का गान हुआ,
बहुत हो चुका रास रंग, कवि, बहुत दिनों मधुपान हुआ।
यहाँ बिलखते बाल देख लो, और निरक्षर युवक कुमार,
वंचित व्यथित युवतियाँ देखो, कुम्हलाती कलियाँ सुकुमार।
जब स्त्री प्रश्न ही प्राथमिकता में न हों तब दलित स्त्री प्रश्न पर ध्यान कैसे जाएगा! प्रगतिवादी काव्यधारा में दलित स्त्री का पहला स्पष्ट उल्लेख केदारनाथ अग्रवाल की कविता में मिलता है। 1918 से प्रगतिवाद की शुरुआत मानने पर क़रीब तीन दशक होते-होते 1947 में केदार जी का पहला काव्य संग्रह ‘युग की गंगा’ प्रकाशित हुआ। इसमें ‘रनिया’ शीर्षक कविता है। यह कविता उन्होंने कब लिखी, इसकी ठीक-ठीक सूचना मुझे नहीं मिली। केदार जी के अध्येताओं के अनुसार यह ’47 से पहले की कविता है। देश आज़ाद होने (15 अगस्त, 1947) से पहले ‘युग की गंगा’ का प्रकाशन हो चुका था।30 शमशेरबहादुर सिंह लिखित ‘परिचय’ के साथ ‘गुलमेहंदी’ का प्रकाशन 1978 में हुआ। इसमें केदार जी की पहले छपे ‘युग की गंगा’ प्रभृति पाँच संग्रहों की कविताएं शामिल हैं। डॉ. रामविलास शर्मा ने केदारनाथ अग्रवाल की कविताओं का एक संग्रह ‘श्रम का सूरज’ के नाम से 1986 में संपादित किया। इसमें उन्होंने ‘रनिया’ कविता को भी रखा है। ‘रनिया’ प्रबल आशावाद की कविता है। यह ‘बाइनरी’ में लिखी गई है। बाइनरी दलित स्त्री बनाम सवर्ण पुरुष है। दोनों एक देश के निवासी हैं लेकिन उनके वर्ग अलग-अलग हैं। यह अति अमीर, अति ग़रीब वाला अलगाव इतना गहरा है कि उसमें उनका ‘एक देश’ का होना, ‘देस बहन’, ‘देस बन्धु’ छिप जाता है। दिखती हैं दोनों की अलग-अलग जीवन स्थितियाँ। रनिया श्रमिक है, घास काटने में कुशल है। उसके हाथ में हँसिया है जबकि वाचक के हाथ में रुपया है। वह छलिया है, सुख-सौदागर है। श्रम करने वाली को पेट भर भोजन कभी नहीं मिलता। अब तक हर पीढ़ी की दलित स्त्री का जीवन ऐसा ही रहा है। यह सिलसिला जन्म-जन्मांतर से चलता आ रहा है। वह चिरकुट पहनती आ रही है, इधर रेशमी वस्त्र हैं। रनिया बदलाव चाहती है। तत्काल और सम्पूर्ण बदलाव। वाचक यथास्थिति का हामी है। वह कोई परिवर्तन नहीं चाहता। साम्प्रतिक स्थिति यह है हिंदुस्तान रनिया के पक्ष में हो गया है। यह संसार रनिया के माफ़िक बदल रहा है-
रनिया मेरी देस बहन है/ अति गरीब है – अति गरीब है!
मैं रनिया का देसबन्धु हूँ,/ अति अमीर हूँ – अति अमीर हूँ!!
रनिया के कर में हँसिया है,/ घास काटने में कुशला है।
मेरे हाथों में रुपिया है/ मैं सुख-सौदागर छलिया हूँ!!
रनिया अब तक जन्मान्तर से/ ज्यों की त्यों पूरी भूखी है!
मैं जन्मान्तर से वैसा ही/ ज्यों का त्यों पूरा खाता हूँ!!
रनिया बिलकुल वही-वही है/ चिरकुट ही चिरकुट पहने है।
मैं भी बिलकुल वही-वही हूँ/ रेशम ही रेशम पहने हूँ।।
रनिया मेरी दुखी बहन है/ वह निदाघ में मुरझ रही है।
मैं रनिया का सुखी बन्धु हूँ/ चिर वसंत में विहँस रहा हूँ।।
मैं और रनिया एक देश की/ एक भूमि की, एक कुञ्ज की।
एक रंग की, एक रूप की। रोटी हँसती दो कलियाँ हैं ।।
रनिया कहती है जग बदले/ जल्दी बदले, जल्दी बदले।
मैं कहता हूँ कभी न बदले। कभी न बदले – कभी न बदले।।
किंतु आज मेरे विरोध में/ पूरा हिन्दुस्तान खड़ा है।
अब रनिया के दिन आए हैं/ जग उसके माफ़िक बदला है।।
बाइनरी में लिखी कविता अक्सर सपाट हो जाया करती है लेकिन इस कविता की बाइनरी में उदात्तता है। यह युगांत की कामना से परिपूर्ण कविता है। केदार जी यहाँ यह अपवादस्वरूप लिखी गई कविता नहीं है। स्त्री-व्यथा और जात्यंत से जुड़े सरोकार उनके सम्पूर्ण रचना-संसार में विन्यस्त हैं। ‘श्रम का सूरज’ संग्रह में इस कविता के तत्काल बाद ‘जनवादी सरकार’ कविता रखी गई है।31 रनिया के माफ़िक संसार तभी बदलेगा जब जनवादी शासनतंत्र होगा। केदारनाथ अग्रवाल और उनके समानधर्मा रचनाकारों, विचारकों को ऐसा लग रहा था कि सोवियत रूस की तरह यहाँ भी जनता का शासन होगा। आज़ादी के ठीक साल भर पहले लिखी कविता ‘एका का बल’ (5.8.1946) में केदार जी ने पूरी मजदूरी की माँग को लेकर अड़े दलितों के दृढ़, संघर्षशील रवैये का चित्रण किया है। गाँव का जमींदार अन्यायी है। वह काम तो पूरे करवाता है लेकिन मजूरी बहुत कम देता है। पूरा मेहनताना माँगने पर कहता है, “बस इतना लो,/ काम करो या गाँव छोड़ दो।” दलित इस शोषण के लिए तैयार नहीं। वे संगठित हो गए हैं- “डंका बजा गाँव के भीतर,/ सब चमार हो गए इकठ्ठा/ एक उठा बोला दहाड़कर :/ हम पचास हैं,/ मगर हाथ सौ फ़ौलादी हैं।/ सौ हाथों के एका का बल बहुत बड़ा है।” गाँव के लिए यह नई बात है। जमींदार के लिए बड़े धक्के जैसी! दलितों की जागृति उसके लिए गहरा शोक है- “हाथ उठाए/ फन फैलाये,/ सब जन गरजे।/ फैले फन की फुफकारों से/ जमींदार की लक्ष्मी रोई!!”32
नदी की उदासी महसूस करने वाले कवि ने घर की चारदीवारी में बंद स्त्री की घुटन को बड़ी शिद्दत से उकेरा है। वे उस सामंती पुरुष की पहचान करते हैं जिसके लिए स्त्री की उपयोगिता वारिस पैदा करने तक महदूद है। अपने लेखन के बिलकुल शुरुआती दिनों में केदार जी ने ‘पति की टेक’ कविता लिखी थी। 27 मार्च 1933 को लिखी यह कविता उनके दूसरे संग्रह ‘जो शिलाएँ तोड़ते हैं’ में शामिल है- “सुन ले मेरी ब्याही औरत! / ऊपर से नीचे तक पूरा/ अंगुल-अंगुल इस देही का/ मेरा ही बस मेरा ही है! / घर के भीतर बेंड़ी बेंड़ी / केवल दर्पण में मुँह देखे;/ लंबे से घूंघट को खींचे/ केवल चूड़ी की धुन सुन ले/ खाना ले ले कपड़ा ले ले;/ आने जाने दे यह साँसें/ पूरी कर दे पापी इच्छा/ दर्जन बच्चे पैदा कर तू”33। स्त्री का यह संताप केदार जी के यहाँ बार-बार मुखरित होता रहा है। दस जनवरी 1980 को लिखी इस कविता में वे स्त्री की बाड़ेबंदी चित्रित करते हुए उस ‘कंडीशनिंग’ का संकेत देते हैं जो इस ढाँचे को महफ़ूज़ रखता आया है- “घर की घुटन में पड़ी औरतें/ जिंदगी काटती हैं/ मर्द की मुहब्बत में मिला,/ काल का काला नमक चाटती हैं/ जीती ज़रूर हैं/ जीना नहीं जानती;/ मात खातीं मात देना नहीं जानती हैं।“34 भीतर और बाहर हर जगह ठोकर खाने वाली दलित स्त्री की अथाह पीड़ा को कवि बूझता है लेकिन उसे ठीक-ठीक व्यक्त कर पाने में स्वयं को समर्थ नहीं पाता। ‘बोले बोल अबोल’ संग्रह की पहली कविता देखिए-
वह/ समाज में/ न्याय न पाकर,/
अन्यायों की चोट दबाकर,/ भरी देह का/
नेह सुखाकर,/ खाकर ठोकर- रोम दुखाकर,/
अपने सपने धूल बनाकर/ कर से कर पर की मजदूरी/
पग से/ हर, पल-पल की दूरी;/
जीवन जीती है/ अनचाहा,/ दुख-दारिद पीती अनथाहा।”35
महाकवि भवभूति पर विचार करते हुए केदार जी के अभिन्न मित्र आलोचक डॉ. रामविलास शर्मा ने लिखा है कि रामराज्य में दुःख ही दुःख है।36 इसमें शंबूक की हत्या होती है और सीता का निष्कासन। कवि (केदारनाथ अग्रवाल) ने इसके आगे जाकर अवधी के एक सोहर गीत37 से संदर्भ लेते हुए लिखा कि सिर्फ़ हत्या नहीं होगी, उसकी खाल से ढोलक मढ़ाई जाएगी और ग़रीब की चमड़ी से संगीत निकाला जाएगा-
आग लगे इस राम-राज में
ढोलक मढ़ती है अमीर की
चमड़ी बजती है गरीब की
खून बहा है राम राज में38
केदार जी उस स्त्री को सुंदर पाते हैं जो पढ़ती है, शब्दार्थ में उलझती है। शायद यह उलझाव ही उसे सुलझाव की ओर ले जाएगा। पितृसत्ता की गिरफ़्त से बचने का एक उपाय संचित ज्ञान हासिल करने में छिपा है-
किताब पढ़ती है एक औरत/ किताब पर/
झुके-झुके/ शब्दार्थ पकड़ती है औरत/ और/
गिरफ़्त में आई औरत/ मुझे बहुत सुंदर लगती है39
जाति और पितृसत्ता के प्रश्न पर नागार्जुन (1911-1998) मुखर हैं। इतिहास में स्वर्णयुग देखने वालों से वे पूछते हैं कि स्वर्ण युग वाले आज भीख क्यों मांगते हैं, “क्यों तुमने कोटि कोटि जनों को ‘अछूत’ बना रखा है?”40 एक अन्य कविता ‘कब होगी इनकी दीवाली’ में वे बताते हैं कि अपने हक़ के लिए बोलने वाले दलित नक्सली बताकर जेल में डाल दिए जाते हैं। बरसों-बरस इनकी सुनवाई नहीं होती, जमानत नहीं मिलती है- “पता चला वे सात जने थे,/ जाने कब से यहाँ पड़े थे/ सातों के सातों ‘नक्सल’ थे/ अपने हक़ के लिए लड़े थे!/ सातों के सातों चमार थे/ अति दरिद्र थे भूमिहीन थे/ करते थे मेहनत मजदूरी/ मालिक लोगों के अधीन थे/ भूमिहरण बर्दाश्त कर गए/ चुप्पी साधी मारपीट पर/ गुस्सा तब भड़का, बहुओं की/ इज्ज़त जब लूटी घसीट कर।”41
नागार्जुन ने अपने समय की चर्चित दलित स्त्रियों को कविता का विषय बनाया है। उन्होंने व्यक्तिवाचक नामों के साथ ये कविताएँ लिखी हैं। ‘फूलन देवी’ शीर्षक कविता में वे उन्हें परम साहसी चित्रित करते हैं। वे फूलन को जनमानस की मिथक-विश्वासी चेतना से जोड़ते हुए ‘दुर्गामाता की बेटी’ बताते हैं और इस तरह उनके इन कृत्यों को औचित्य प्रदान करते हैं- “सौ सौ डाके डाले उसने/ एक-एक की नाक तराशी/ एक-एक की कुतर गई है कान/ दसियों की तो आँखें फोड़ी…/फूलन देवी दुर्गामाता की बेटी है/ कौन सामना का सकता है!”42 इसी कविता के समापन अंश में नागार्जुन बताते हैं कि उन्होंने फूलन देवी को मैनपुरी जिले के एक गाँव में देखा था। उन्हें अब फूलन देवी स्वयं ‘सिंहवाहिनी’ प्रतीत होती हैं- “कारतूसों की मालाओं से हमने उसको पहचाना था/ मैनपुरी के गाँव में/ ठाकुर के घर डटी हुई थी फूलनदेवी/ लगता था, हाँ, लगता था सिंहवाहिनी/ प्रकट हुई है/ मैनपुरी के गाँव में।” यह कविता प्रचलित महिषासुर मिथक में नया अर्थ भरती है। दलितों के खलीकरण का जो अभ्यास इस समाज को कराया गया है उसे नागार्जुन पलटने-बदलने का प्रयास करते हैं। फूलन पर लिखी उनकी दूसरी आख्यानपरक कविता किंचित लंबी है। यह सांसद फूलन देवी की संवेदनशीलता दर्शाने के लिए रची गई लगती है। फूलन देवी ग्वालियर सेंट्रल जेल में बंद अपने साथियों से मिलने इटावा से शताब्दी एक्सप्रेस द्वारा ड्राइवर को मनाकर उसके साथ इंजन वाले केबिन में बैठकर ग्वालियर गई हैं। नियम विरुद्ध होने का हवाला देकर जेलर ने मिलने की अनुमति देने में असमर्थता जताई तो वे जेल के दरवाजे पर ही सत्याग्रह करने बैठ गईं। केन्द्र सरकार के आश्वासन के साथ कि उन्हें दस मिनट में मिलने दिया जाएगा, यह वाकया संपन्न होता है और कविता पूर्ण होती है।43 दूसरी नेत्री जिन पर नागार्जुन ने लिखा, सुश्री मायावती हैं। यह कविता उन्होंने 10 जुलाई 1997 को लिखी। इसका उद्देश्य भी प्रोटेगनिस्ट की छवि सुधारना और उन्हें लोकस्वीकृति दिलाना प्रतीत होता है। इस कविता में मायावती को ‘दलितेन्द्र’ का शिष्य कहा गया है।44 नागार्जुन यायावर थे, ‘यात्री’ थे लेकिन उनकी काव्य-दृष्टि में अनाम संघर्षशील दलित स्त्रियाँ लगभग नहीं आई हैं। अपवाद के लिए उनकी ‘गोठबिछनी’ कविता है। अपनी मातृभाषा मैथिली में उन्होंने यह कविता रची थी। 1949 में प्रकाशित काव्य संग्रह ‘चित्रा’ में यह संकलित है। इसका दूसरा संस्करण 1967 में ‘पत्रहीन नग्न गाछ’ नाम से प्रकाशित हुआ। गोठबिछनी का अर्थ है उपले बीनने वाली। यह लड़की जंगल में घूम-घूमकर सूखा गोबर या गोठ बीनती है। पैबंद लगी पचहत्थी साड़ी में जामुनी रंग वाली इस बालिका के बाल रूखे हैं। चेहरा चेचक के दागों से भरा है जैसे चिड़िया ने घोसला बना रखा हो-
बैसाखी धूप माघ का पाला/ तेरे लिए सब एक जैसे
दीन बालिके विस्मित हूँ मैं/ कितना कठिन है तेरा जीवन,
जरा रुक जा, सुन, कहती जा/ अपना नाम, कहाँ रहती है
बित्ते भर की है फिर किसलिए/ इतने कष्ट और दुःख सहती है।45
संदर्भ
19. ‘स्वामी अछूतानन्दजी ‘हरिहर’ और हिन्दी नवजागरण’ (प्र.सं. 2011), कँवल भारती, स्वराज प्रकाशन, नई दिल्ली, देखें, सातवाँ अध्याय ‘स्वामी जी का कविता-कर्म’.
20. ‘प्रगतिवादी काव्य-साहित्य’ (1971), डॉ. कृष्णलाल ‘हंस’, मध्यप्रदेश हिन्दी ग्रन्थ अकादमी, भोपाल, पृ. 224. शिवमंगल सिंह सुमन की ‘सोवियत रूस के प्रति’ शीर्षक यह कविता उनके संग्रह ‘प्रलय सृजन’ (प्रकाशन वर्ष 1950, पृ. 4-5) में संग्रहीत है।
21. वही, पृ. 223.
22. वही, पृ. 243. निरंकारदेव सेवक को बाद में बालगीतकार के रूप में जाना गया।
23. देवीदत्त मिश्र की यह कविता गणेशशंकर विद्यार्थी द्वारा कानपुर से संपादित-प्रकाशित ‘प्रभा’ के जनवरी 1921 अंक में छपी थी। देखें, ‘हिन्दी काव्य में मार्क्सवादी चेतना’, (प्र.सं. 1974), जनेश्वर वर्मा, ग्रन्थम, रामबाग, कानपुर, पृ. 241.
24. ‘पॉलिटिकल थिओलॉजी : टेक्स्ट एंड प्रैक्टिस इन अ दलित पैंथर कम्युनिटी’, जेनेट ए.. कंटुरसी, ‘द जर्नल ऑफ़ एशियन स्टडीज’, वॉल्यूम – 52, नं. 2, मई 1993, पृ. 320 – 339, jstor से 2 जुलाई 2025 को डाउनलोड किया।
25. ‘वाद से संवाद : दलित अस्मिता विमर्श’ (2025), बजरंग बिहारी तिवारी, सेतु प्रकाशन, नोएडा, पृ. 54 और 70. कॉ. विलास सोनवणे से इंटरव्यू। यह बात विस्मृत नहीं करनी चाहिए कि पैंथर के मैनिफेस्टो का राजा ढाले ग्रुप ने विरोध किया था। यह ग्रुप पैंथर को शुद्ध (बौद्ध) धम्मवादी स्वरूप में रखने का आग्रही था।
26. ‘पदचाप’ (2008), रजनी तिलक, निधि बुक्स, महेंद्रू, पटना, पृ. 38.
27. ‘इतिहास में स्त्री’ (2012), सुमन राजे, भारतीय ज्ञानपीठ, लोदी रोड, नई दिल्ली. विशेष रूप से इस किताब का सातवाँ अध्याय ‘महिला-लेखन की हिंदी-उर्दू साझी संघर्ष-कथा’ पठनीय है।
28. ‘विप्लव’ के जनवरी 1939 अंक में प्रकाशित सुमित्रा कुमारी सिन्हा की ‘शाप’ शीर्षक कविता की ये पंक्तियाँ द्रष्टव्य हैं- “आज हमारी भूखी दुनिया सोते से है जाग उठी। प्राणों की यह प्यास तुम्हारे, हित अब बन कर आग उठी।” ‘हिंदी काव्य में मार्क्सवादी चेतना’, पृ. 385.
29. ‘हिंदी काव्य में मार्क्सवादी चेतना’, पृ. 321.
30. ‘केदारनाथ अग्रवाल : प्रतिनिधि कविताएं’ (प्र.सं. 2011), जन्मशती के अवसर पर प्रकाशित, संपादक- द्वारिकाप्रसाद चारुमित्र, शाहाबुद्दीन, पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस (प्रा.) लि. रानी झाँसी रोड, नई दिल्ली, पृ.35-36.
31. ‘श्रम का सूरज : केदारनाथ अग्रवाल की कविताएँ’ (प्र.सं. 1986), संपादन : डॉ. रामविलास शर्मा, परिमल प्रकाशन, अल्लापुर, इलाहाबाद, पृ. 59-60.
32. ‘कहें केदार खरी-खरी’ (प्र.सं. 1983), संकलन-संपादन अशोक तिवारी, परिमल प्रकाशन, इलाहाबाद, पृ. 21-22.
33. ‘प्रतिनिधि कविताएँ’, पृ. 28.
34. ‘आत्मगंध’ (प्र. सं. 1988), केदारनाथ अग्रवाल, परिमल प्रकाशन, इलाहाबाद, पृ.158.
35. ‘बोले बोल अबोल’ (प्र.सं. 1985), केदारनाथ अग्रवाल, परिमल प्रकाशन, इलाहाबाद, पृ. 19. दी गई सूचना के अनुसार केदार जी ने यह कविता पाँच अप्रैल,1963 को लिखी थी।
36. ‘परंपरा का मूल्यांकन’ (चौथी आवृत्ति, 2004) डॉ. रामविलास शर्मा, राजकमल प्रकाशन प्रा.लि., नई दिल्ली। संदर्भित वाक्य है- “राम जिस व्यवस्था की रक्षा करते हैं, उससे सीता, राजा जनक, माता कौसल्या और स्वयं राम, सभी कष्ट पाते हैं।” पृ. 30.
37. ‘ग्राम-साहित्य’ पहला भाग (पहला संस्करण जनवरी 1951), सम्पादक – रामनरेश त्रिपाठी, प्रकाशक- हिन्दी मन्दिर, प्रयाग, संदर्भित सोहर का मुखड़ा और प्रासंगिक पंक्ति है- “छापक पेड़ छिउलिया तौ पतवन गहबर… जाहु हरिनी घर अपने खलरिया नाहीं देबइ हो। हरिनी ! खलरी क खंजड़ी मिढ़उबइ त राम मोरे खेलिहइँ हो।।” पृ. 125-6.
38. ‘प्रतिनिधि कविताएँ, पृ. 52.
39. ‘जामुन जल तुम : केदारनाथ अग्रवाल की प्रेम-संस्पर्शी कविताएँ’ (प्र.सं. 1984), संकलन- डॉ. अशोक त्रिपाठी, परिमल प्रकाशन, इलाहाबाद, पृ. 147.
40. ‘नागार्जुन रचनावली’ भाग-2 (प्र.सं. 2003), सं. शोभाकांत, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, पृ. 105.
41. वही, पृ. 159-162.
42. वही, पृ. 238.
43. वही, पृ. 456-61. 8 अगस्त 1996 को यह कविता लिखी गई। इस समय फूलन देवी सांसद थीं।
44. वही, पृ. 465.
45. ‘नागार्जुन रचनावली’ भाग-3 (प्र.सं. 2003), सं. शोभाकांत, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, पृ. 131.






