प्रगतिशील काव्यधारा में दलित स्त्री (3) / बजरंग बिहारी तिवारी


‘प्रगतिशील काव्यधारा में दलित स्त्री’ बजरंग बिहारी तिवारी का सुदीर्घ आलेख है जिसके 7 भाग लिखे जा चुके हैं और आगे के हिस्सों पर काम जारी है। कथादेश में छप चुके ये भाग क्रमशः, किंचित संशोधन-परिवर्द्धन के साथ नया पथ के पाठकों के लिए प्रस्तुत किए जा रहे हैं। भाग 1 और 2 आप पढ़ चुके हैं। भाग 3 प्रस्तुत है।

आधुनिक साहित्य में दलित स्त्री का प्रथम उल्लेखनीय संदर्भ भारतेन्दु हरिश्चंद्र (1850-1885) के यहाँ मिलता है। अपनी नाटिका ‘प्रेमजोगिनी’ के प्रथम अंक के दूसरे गर्भांक में वे एक पात्र (परदेसी) के द्वारा बनारस की वास्तविकता का एक पक्ष प्रस्तुत करते हैं। इस धर्मनगरी की गलियाँ मैले से भरी हैं जिसमें कूड़ा-करकट सड़ रहा है। ऐसी बदबू उगलती नारकीय गली में लगे नल से दलित स्त्रियाँ पानी भरती हैं- “मैली गली भरी कतवारन सड़ी चमारिन पासी। नीचे नल से बदबू उगले मनो नरक चौरासी।।” निराला (1896-1961) ने ‘तोड़ती पत्थर’ कविता में श्रमिका की हाड़तोड़ मेहनत चित्रित करने के साथ उसकी निरुपायता को भी पेश किया लेकिन कविता का समापन उस मजदूरनी की दृढ़ता से किया। सियारामशरण गुप्त (1895-1963) की कविता ‘नर किंवा पशु’ में एक दलित स्त्री की दुरावस्था का वर्णन है। उस स्त्री का पति उसे रुग्णावस्था में घर छोड़कर काम ढूँढने जाता है। रात में लौटता है और देखता है कि वह तो मौत के मुँह में समा चुकी है-

 

रोया नहीं, नहीं वह विलपा, आँखें भी थीं रूखी,

अच्छा हुआ, बची वह मरकर, अब न रहेगी भूखी।

जीवित थी तब दे न सका कुछ, दिया एक बस अनशन,

आज चिता पर भी न दे सका, उसे यथोचित ईंधन।46

 

कवि से विप्लव-गायन की आशा करने वाले बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ (1897-1960) ने खेत निराती हुई युवती के श्रम, सौंदर्य और प्रेम भावना का बड़ा मोहक आख्यान ‘ओ हिरणी की आँखों वाली’ नामक गीत में रचा है। जिस युवक ने उससे नेह-बंधन किया है वह ढोर चराने का काम करता है। नायिका-दीपित खेत से गुज़रते युवक (चरवाहे) की आँखों में बनते चित्र को कवि ने इस तरह रखा है-

 

खुरपी हाथ, डहडहे लोचन,/ वह मटमैला चीर हरा-सा,

कुछ गंभीर और कुछ चंचल/ वह मुख-मंडल पीर भरा-सा;

यह कौमार्य स्वरूप सलोना,/ आया आँखों के आगे जब,

तब खिंचाव इक हुआ हृदय में/ औ’ लोचन भर आये डबडब।47

 

रांगेय राघव (1923-1962) की कविता ‘कंजरिया’ में कंजर जाति की स्त्री का जीवन यथार्थ मौज़ूद है। यह स्त्री लोगों का मनबहलाव करके अपने परिवार की आजीविका चलाती है। इसका अपना कुपोषित जीवन अभावों के बीच संघर्षरत है-

 

ग़ा रही कंजरिया झूम झूम

बैठे गालों में स्वर बहता, गंदे तन से झरना चलता

ऊँचा लहंगा ओछी अंगिया, जिससे आधा उर निकल रहा

ओढ़नी तनिक, बोरला बड़ा, कर-पग में पीतल के गहने

बिछिया और ताली बजा बजा, वह गाती है सुख दुख पहने

गा रही बिचारी घूम घूम।48

 

व्यवस्था भले ही कितनी मजबूत क्यों न हो, बदलेगी; केदारनाथ अग्रवाल की तरह रांगेय राघव को भी यह भरोसा है। ‘और लोहा’ कविता में वे लिखते हैं- “स्फोट!/ आज यह फ़ौलाद/ का-सा अमर साहस/ शक्ति हममें भर रहा है,/ विश्व में चलता प्रभंजन/ अग्नि धधका चल रहा है,/ है हमें विश्वास/ विजयी हम रहेंगे, हम रहेंगे! / ये उमस के मेघ आगे/ एक दिन जीवन भरेंगे।”49 इसी कविता में वे आगे लिखते हैं कि साम्य और आज़ादी का ध्वज उठाए जनसेना मजदूरों और किसानों को मिलों और खेतों में उनका हिस्सा दिलवाएगी। गद्दारों का मुँह तोड़ेगी और “युग-युगों की दलित नारी” को मुक्त करेगी।50 रांगेय राघव की ‘हरिजन’ शीर्षक कविता में तीन दलित भाई-बहनों- पन्ना, सरबतिया, शंकर की कहानी कही गई है। कवि ने इन्हें अपने सूनेपन का साथी कहा है। झाडू लगाने वाले ये दोनों बच्चे पन्ना, शंकर (‘मेरे भंगी की आत्मा वे/ कोमल मांसल से दो बच्चे’) ईमानदार, परम संकोची और परिश्रमी हैं। उनकी बहन सरबतिया उनके साथ आती है- ‘उसकी आँखें हैं बड़ी-बड़ी/ मोती झलमल करते जिनमें।’ इस वात्सल्य भरे चित्रण के बाद कवि समाज की जातिवादी दृष्टि पर टिप्पणी करता है- “ये भी तो मानव ही हैं सब/ इनको कमीन कहता समाज/ इनकी नस्लों को घृणा दिए/ करवाता उनसे अगन काज।” ‘अगन काज’ अनगिनत कार्य है और आग में कुदाने जैसा प्राणलेवा कार्य भी है। कविता के अंत में रांगेय राघव दलित समाज की वस्तुस्थिति प्रस्तुत करते हैं। शताब्दियों से सवर्णों की घृणा से घिरे, अधिकारवंचित दलित वर्ग से स्वत्व का बोध विलुप्त हो चला है-

 

आत्माभिमान है कहीं नहीं/ निष्प्राण चेतना का विकास

जो है उसमें ही सिकुड़ फैल/ ये निभा रहे जीवन-विषाद।51

 

इस कविता पर मुल्कराज आनंद के उपन्यास ‘अछूत’ की छाया देखी जा सकती है। यह उपन्यास 1935 में छपा था। उपन्यास का नायक बक्खा किशोर उम्र का है। उससे छोटी सोहनी है। फिर रक्खा है। ये तीनों भाई-बहन सफ़ाई का काम करते हैं। फौजियों के संडास साफ करने का जिम्मा बक्खा का है। सब उसे नाम से नहीं, जातिनाम (‘ओए भंगी की औलाद’) से बुलाते हैं। किशोर उम्र में प्रवेश कर रही सोहनी पर मंदिर के पुजारी की कुदृष्टि है। एक अन्य ‘द्विज’ लछमन भी इसी कुचेष्टा में लगा हुआ है। रांगेय राघव की कविता में अभी दलितों में चेतना नहीं आई है लेकिन उपन्यास के नायक में आक्रोश पैदा हो चुका है- “जलती लपटों में उसे एक प्रकार का अपनापन लग रहा था। इससे उसे एक प्रकार की शक्ति प्राप्त होती लग रही थी, कुछ नष्ट कर डालने की शक्ति। उसे लगा कि उसके भीतर कुछ त्याग करने की भावना भरती जा रही है, मानो जलन अथवा विध्वंस उसके लिए एक प्रकार की सभ्यता हो।”52 बक्खा के सामने मुक्ति के तीन विकल्प हैं- ईसाई धर्म, गाँधी मार्ग और साम्यवाद। ऊहापोह से निकलने में एक साम्यवादी कवि के ये विचार उसकी मदद करते हैं- “हमें जाति को अवश्य नष्ट कर देना चाहिए। हमें जन्म की असमानताओं को नष्ट कर डालना चाहिए और अपरिवर्तनीय व्यवसायों को सबके लिए अधिकारों की समानता… और अवसरों को मान्यता देनी चाहिए। …जब भंगी अपना व्यवसाय कर लेंगे, वे अधिक देर तक अछूत नहीं रहेंगे। ऐसा वे जल्दी कर सकते हैं, इसके लिए हमें सबसे पहले मशीनों को अपनाना होगा।”53 ‘प्रोग्रेसिव राइटर्स एसोसिएशन’ के संस्थापकों में से एक रहे मुल्कराज आनंद की यह समझ प्रगतिवाद की आम राय मानी जा सकती है। इस उद्धरण से साम्यवादी विचारधारा की प्राथमिकताएँ समझी जा सकती हैं।

 

इसी (‘राह के दीपक’) काव्य-संग्रह में रांगेय राघव ने ‘सभ्यों’ और ‘धनाड्यों’ से पूछा है- ‘‘मैं आज सभ्यता के पुतले/ धन-दीवानों से पूछ रहा-/ यह क्या सूहर ही बना दिया/ हरिजन के बच्चों को तुमने?”54 ‘सूहर’ शूकर के अर्थ में प्रयुक्त है। बच्चों में अगर जातिवादी भावना न भरी जाए तो वे सहज, संवेदनशील और स्वस्थ रूप में विकसित होंगे। ऐसा ही एक संवेदनशील बालक रांगेय राघव की ‘मजदूर’ नाम की कविता में है। बालक अपनी माँ से मजदूरों के बारे में जिज्ञासा करता है। इसी क्रम में वह बताता है- “मुझे स्कूल में मिलता नित ही/ एक मनोहर बालक है/ भंगी है सबका अछूत है/ यह दुख उसको सांसत है।”55 इस सांसत से तमाम बालक-बालिकाओं को बचाना है तो जाग्रत और संगठित जनता के साथ जुड़ना होगा-

 

और/ वह दिन आ गया है

बिगुल जनता का बजा है,

साम्य औ’ आजादियों का

फहरता झंडा उठा है।56

 

यह वही आशावाद है जो इस दौर के अधिकांश प्रगतिवादी रचनाकारों में नज़र आता है। केदारनाथ अग्रवाल की पूर्वोद्धृत ‘रनिया’ शीर्षक कविता के समापन में यह आशावाद बहुत मुखर है- “अब रनिया के दिन आए हैं/ जग उसके माफ़िक बदला है।” यह बदलाव कितना हुआ, बदलाव करने वाली विचारधारा को किस तरह घेरा, कुचला और अलग-थलग किया गया, यह अलग से विचार का विषय है। बदलाव की विफलता पर ध्यान दिलाते हुए वरिष्ठ दलित स्त्री रचनाकार कावेरी (जन्म 1951) ने इसी वर्ष (2025 में) प्रकाशित अपने काव्य-संग्रह ‘मेरे पिता की समाधि’ में शामिल ‘रनिया’ नाम से ही लिखी अपनी आख्यानमूलक कविता में रनिया की दुरावस्था का चित्र खींचा है57– “जन्मते ही नाम रखाया/ रनिया, माँ की रनिया/ माँ की सूखी छाती से/ चिपकी मिमियाती/ चमड़ी को निचोड़ती/ माँ बिलबिला उठती/ अपना पेट खाली है/ तो बेटी को दूध कहाँ से दूँ/ दो महीने बाद/ माड़ सुड़कने लगी रनिया”। कुपोषण की शिकार बालिका रनिया की आँखें कौड़ी जैसी, पेट हँड़िया जैसा, टांगें सूखी लकड़ी जैसी थी। लंबे समय तक वह चल नहीं पाती थी। माँ उसे उठाए खेत-खलिहान का सारा काम करतीं। बाप की दिहाड़ी का पता नहीं लेकिन शराब उसे हर दिन चाहिए। घरेलू हिंसा की शिकार उसकी माँ निबाहती रही। पता न चला कि रनिया कब किशोरी हुई, कब उसकी बारात आई- “दस-पाँच लोग आकर/ रनिया को ले गए/ गाँव के लोग/ दबे स्वर में फुसफुसाते/ गऊ को कसाई के खूँटे बाँध दी है/ परंतु रनिया (ने) कभी/ उफ़ तक नहीं की”। रनिया के लिए जैसा मायका वैसा ससुराल। वहाँ दिहाड़ी पर जाना और यहाँ भी दिहाड़ी पर खटना। वहाँ पिता को रोज़ शराब चाहिए था यहाँ पति को ताड़ीखाने जाने की लत। मजूरी का एक हिस्सा इसी पर खर्च होता। जिस दिन दिहाड़ी न होती उस दिन पेट में रोटी-चटनी न जाती- “ऊपर से शराबी पति की/ मार-पीट”। 1946 और 2025 के इस अंतराल में रनिया की जिंदगी में क्या बदलाव आया ? दलित स्त्री के लिए समय जैसे ठहर गया हो। इस स्थिति को स्वयं केदारनाथ अग्रवाल ने भाँप लिया था। भारत की आज़ादी के साढ़े तीन दशक बाद प्रकाशित अपने काव्य-संग्रह ‘बोले बोल अबोल’ (1985) में दलित स्त्री की जीवन स्थिति को इन पूर्वोद्धृत शब्दों में रखा था- “जीवन जीती है/ अनचाहा,/ दुख-दारिद पीती अनथाहा।” कावेरी यथास्थिति के दुहरे रूप को रखती हुईं ‘रनिया’ कविता का समापन इन पंक्तियों से करती हैं-

 

मंदिर के पास से

गुजरती रनिया

देखती है पंडा का

थुलथुल पेट

बैठे-बैठे इसकी पत्नी, छानती है पुआ।58

 

गजानन माधव मुक्तिबोध (1917-1964) की कविता में आई दलित स्त्री की छवि उन दलित आत्मकथाओं में दर्ज़ माँओं से मिलती है जो अपनी संतान को पढ़ाने-लिखाने और उन्हें एक बेहतर भविष्य देने के लिए रात-दिन खटती हैं, उफ़ तक नहीं करती हैं। ‘मुझे याद आते हैं’ कविता की यह स्त्री आश्वस्त-सी है कि उसकी मेहनत क़ामयाब होगी लेकिन कवि शंकालु है। वह व्यवस्था की जड़ता और क्रूरता से परिचित है। उसे सारी थकान लिए मजदूरी पर जाती गर्भवती स्त्री की आशा ‘धोखेभरी’ लगती है। कविता में ‘धोखेभरी’ शब्द-युग्म को कोष्ठक में प्रश्नवाचक चिह्न के साथ रखा गया है। इशारा साफ़ है कि कवि उस स्त्री की उम्मीद और मेहनत को व्यर्थ नहीं मानता। फिर भी, उसके चित्त में मौज़ूद आशंका उभर आती है। सिस्टम से सवाल करते कवि की आँखों के कोने कड़वे आँसुओं से भरते तो हैं लेकिन वे उस मिठास का स्पर्श भी करते हैं जो संघर्ष और सपने से मिलकर बनी है-

 

आँखों में तैरता है चित्र एक

उर में संभाले दर्द/ गर्भवती नारी का

कि जो पानी भरती है वज़नदार घड़ों से

कपड़ों को धोती है भाड़-भाड़,

घर के काम, बाहर के काम सब करती है

अपनी सारी थकान के बावज़ूद।

मजदूरी करती है,/ घर की गिरस्ती के लिए ही

पुत्रों के भविष्य के लिए सब।

उसके पीले अवसाद भरे कृश मुख पर

जाने किस (धोखे भरी?) आशा की दृढ़ता है

करती वह इतना काम/ क्यों किस आशा पर?

प्रश्न पूछता हूँ मैं;

आँखों के कोनों पर उत्तर के प्रारंभिक

कडुए से आँसू ये मिठास छू ही लेते हैं59

 

आसन्न-प्रसवा दलित स्त्री का एक चित्र मुक्तिबोध की ‘उस दिन’ कविता के प्रथम भाग में मिलता है। देवकी नामक यह स्त्री कोयला खदान में मजदूरनी है। वह काम पर है, खुदाई कर रही है जब उसके पेट में प्रसव पीड़ा उठती है। यह स्त्री एक तरफ तो निराला रचित ‘तोड़ती पत्थर’ का स्मरण कराती है और दूसरी तरफ इस्मत चुगताई की ‘छुईमुई’ कहानी की। कहानी में एक मजदूरनी चलती ट्रेन में बिना किसी की सहायता के बच्चे को जन्म देती है। यह देखकर अलीगढ़ के एक ख़ानदानी परिवार से ताल्लुक रखने वाली नैरेटर की फूल-सी रक्षित दहशतज़दा भाभी का हमल (गर्भ) गिर जाता है।60 मुक्तिबोध की कविता में चित्रित स्त्री में अपार जीवट है। वह ‘दिल के ख़ून में रंगकर’ नए ‘इस्पात’ को ‘उपेक्षित काल-पीड़ित सत्य के घर में’ जन्म दे रही है-

 

सुना तुमने !!

अँधेरी कोयले की खान की काली

बहुत ही तंग, नीची-छत व पेचीदा

गली की भीत पर, तीखी कुदाली मार

खिसकाकर बड़े से स्याह पत्थर

देवकी ज्योंही बढ़ी आगे

अचानक पेट के भीतर,

नुकीली चीरती-सी छटपटाहट और…

पुत्रोत्पत्ति!!61

 

‘उदासी से भरे गुमसुम उजाले में’ ‘स्याह भीतों से घिरी’ देवकी अनायास ही कंस द्वारा कारागार में बंदी कृष्ण की माँ देवकी का स्मरण करा जाती है। मुक्तिबोध की एक अन्य कविता ‘चुप न बैठ कि बोल दे’ में कश्मीर की ‘दारिद्र्य के चिथरों बिंधी’ बालिका का उल्लेख आता है। मेरे लिए इस कविता का अर्थ तब खुलता-सा प्रतीत हुआ जब मैंने पत्रकार भाषा सिंह की पुस्तक ‘अदृश्य भारत’ से इसे जोड़कर देखा। भाषा सिंह अपने शोधकार्य हेतु सर्वेक्षण के लिए 2010 में कश्मीर गई थीं। यहाँ वे सफाईकर्मी समुदाय के लोगों से मिलीं। इन्हें यहाँ मोची, शेख और वातल कहा जाता है। बेहद ग़रीबी में जीते इस समुदाय के सामने शुष्क शौचालयों की सफ़ाई के अतिरिक्त दूसरा विकल्प नहीं था। भाषा सिंह के अनुसार ये इसे अपनी नियति मान चुके थे। अपने अनुभव को शब्दबद्ध करती भाषा लिखती हैं- “भयानक गन्ध और गन्दगी… उबकाई को मुश्किल से रोका…। उफ़्फ़, …इसे इस्तेमाल करना इतना यातनादायक है तो साफ करना कितना नारकीय होता होगा! कोई इंसान यह काम कैसे कर सकता है और क्यों हमारी पूरी व्यवस्था इस बर्बर जातिगत चलन को जारी रखे हुए है…”62 मुक्तिबोध की कविता में चित्रित बालिका कुछ ऐसे दिख रही है मानो संध्या को किसी ‘काले कसाई’ ने जकड़ रखा हो। कसाई को काला कहना अनुप्रास के मोह से अधिक कवि की अनवधानता है, संस्कारों की उपस्थिति है। कविता को उल्लेख्य अंश देखें-

 

यों हाय ! चलती जा रही

कश्मीर की भोली गुलाबी बालिका

दारिद्र्य के चिथरों-बिंधी

निज विवशताओं की अमानव यंत्र-गति

से जा रही हो

ज्यों शराबी आततायी भू-स्वामी के हरम

…     …     …

कश्मीर की भोली गुलाबी बालिका

अपनी बिकी-सी ज़िंदगी के द्वार पर

किंचित ठिठक

पीछे छुटे पथ-दृश्य पर

पल भर मुरक

फिर लुप्त हो जाती सदा के ही लिए

निज करुण मुख-आकार दिखला एक पल

त्यों प्रात जाती है समा

कठोराकार शोषण के पहल !63

 

‘अदृश्य भारत’ के पहले अध्याय ‘कश्मीर : धधकता स्वर्ग, बजबजाता नरक’ में उद्धृत ‘टच पाजिन’ (सफ़ाई का काम) करने वाली स्त्रियाँ मुनीरा, हाज़रा, रफ़ीका, अल्ताफ़ बानो, सारा आदि की आपबीती जीवन की कठोरता के नमूने पेश करती हैं और मुक्तिबोधीय दृष्टि की ताईद करती हैं।64

 

यह बात ग़ौरतलब है कि शमशेर बहादुर सिंह (1911-1993) के काव्य-संसार में दलित जीवन के संदर्भ नगण्य हैं। वे प्रेम की विविध मोहक छवियाँ (शेड्स) उकेरते हैं लेकिन जातिवाद का कोई संज्ञान नहीं लेते। रज़िया सज्जाद ज़हीर पर शमशेर की महत्त्वपूर्ण कविता है लेकिन उन्होंने दलित स्त्री को अपनी कविता का विषय नहीं बनाया है। दलित स्त्री की ऐसी ही अनुपस्थिति मुझे दुष्यंत कुमार के रचना-जगत में दिखी। यह अवश्य है कि शमशेर ने दहेज समस्या पर कविता लिखी है जिस पर उनके समकालीनों का ध्यान प्रायः नहीं गया है। राजरानी नामक युवती को केन्द्र में रखकर लिखी गई उनकी कविता में दहेज हत्या का ज्वलंत प्रश्न उठाया गया है।65

 

त्रिलोचन (1917-2007) का जनता से गाढ़ा परिचय है। व्यक्तिवाचक नामों के साथ लिखी उनकी कविताएँ उनके रचना-जगत को विशिष्ट बनाती हैं। उनका काव्य-प्रतिमान है- “दौड़-दौड़कर असमय समय न आगे आए,/ वह कविता क्या जो कोने में बैठ लजाए।”66 अपनी काव्य-प्रेरणा पर चर्चा करते हुए त्रिलोचन ने लिखा है-

 

मेरी कविता कल मुसहर के यहाँ गई थी/ मैं भी उसके साथ गया था जो कुछ देखा

लिखा हुआ है मेरे मन में जब घर लौटा/ तब मुझसे नाराज़ हुए जो बड़े लोग थे

उनकी वह नाराज़ी मैं चुपचाप पी गया/ वे समझे मैं समझदार हूँ इसी राह से

चला करूँगा जिस पर सब चलते आए हैं/ पर मुझको उसकी कुटिया ने और बुलाया67

 

आत्मपरक शैली में लिखी इस कविता के शेष हिस्से में त्रिलोचन बताते हैं कि कुटिया में रहने वाले मुसहर का नाम टीहुर था। उम्र अस्सी साल थी। काया जर्जर थी। टीहुर की वाणी में उनका सारा अनुभव समाया था- “जाड़ा बरसा घाम खा चुकी थी वह वाणी”। उस वाणी को कवि ने अपने कानों पिया, आत्मसात किया। बड़ी ईमानदारी से कवि स्वीकार करता है कि अगली बार मुसहर के घर वह ‘दबे पाँव’ गया। शायद ‘बड़े लोगों’ की नाराज़ी से बचने के लिए, अपने ‘विपथन’ पर बुजुर्गों की नसीहतें सुनना टालने के लिए। ‘उस जनपद का कवि हूँ’ संग्रह में त्रिलोचन ने एक बूढ़ी दलित स्त्री की मृत्यु का पूर्वापर क्रम में चित्र खींचा है। बुढ़िया अब मात्र हड्डियों का ढाँचा थी। उसकी मड़ई ऊसर पर थी। पीछे चरागाह था। चरवाहे बुढ़िया को चिढ़ाते थे। वह भी उन्हें चुन-चुनकर गालियाँ देती थी। बुढ़िया का नाम सुकनी था। वह सिला/सीला बीनकर और कुटौनी-पिसौनी करके अपना पेट भरती थी। उसके एक-एक कर छः बेटे हुए। सब मरते गए। वह अकेली बची। उसकी मौत पर अंतिम संस्कार हेतु लकड़ी, टिकठी मुहैया कराने कोई आगे नहीं आया। गाँव के दलितों (‘चमारों’) ने उसे अंधे कुएँ में फेंका। महीनों बाद कवि ने सुना कि बुढ़िया की लाश कुएँ में जस की तस पड़ी है। कवि ने जाकर देखा और इसे सच पाया-

 

सुना कि बुढ़िया है अब तक जैसी की तैसी

पड़ी कुएँ में। जाकर आँखों देखा। हीनों

की दुर्दशा दिखाई दी। कल्पना न वैसी

मुझको थी कि गीध, कौवे भी पास न आए

सड़ी गली भी नहीं, पड़ी थी लाश भी खुली

उसी खाट पर जिस पर दम तोड़ा था। पाए

टिकठी, कहाँ भाग था उसका। कब हिली डुली

निर्विकारता शव की कहीं देख यदि पाते

धर्म धुरंधर तो संतों का संत बनाते।68

 

जातिवादी समाज की निष्ठुरता और धर्मधुरंधरों की धूर्तता को एक साथ सामने लाती यह कविदृष्टि हीनावस्था के आर्थिक आयाम की तरफ़ भी ध्यान ले जाती है। लोक में व्याप्त सद्भाव और सहयोगी भाव की कलई ऐसे ही अवसरों पर खुलती है। चमत्कार का प्रयोग सुकनी के जीवन की त्रासदी को विडंबनापूर्ण बना देता है। चमत्कार है महीनों तक खुले में पड़ी लाश का अविकृत दिखना! अपने छः-छः बच्चों की मौत देखने वाली सुकनी मृत्यु के इतने समय बाद भी निर्विकार है तो यह आश्चर्य नहीं। आश्चर्य इस पर भी नहीं कि जो धर्मध्वजी जीवित बुढ़िया सुकनी की सहायता के लिए कभी आगे नहीं आते हैं वे उसकी मौत को अपना धंधा चमकाने में इस्तेमाल करने हेतु तत्पर रहते हैं।

 

त्रिलोचन की एक कविता में सब्जी बेचने वाली बुढ़िया है। हाट में वह किसी ग्राहक से सारी सब्जियाँ खरीदने की चिरौरी कर रही है। बुढ़िया की निरुपायता और उदग्र उतावली उस ग्राहक पर भले कोई असर न डाल पाए, कवि को छू जाती है-

 

मुझको मालूम नहीं/ वह बुढ़िया कौन है

और कहाँ रहती है/ उसके आगे पीछे

कोई और है कि नहीं/ लेकिन उसकी बातें

जो कानों पड़ीं/ उनको अनसुना/ कर नहीं पाया मैं।69

 

त्रिलोचन ने स्त्री की निरुपायता और चुप्पी के अतिरिक्त उसकी हाज़िरजवाबी को भी बखूबी रखा है। काले-काले अच्छर न चीन्हने वाली सुंदर ग्वाले की मुखर बेटी चंपा चरवाही करती है और पढ़ते हुए कवि को निरुत्तर कर देती है-

 

चंपा बोली : तुम कितने झूठे हो, देखा,

हाय राम, तुम पढ़ लिखकर इतने झूठे हो

मैं तो ब्याह कभी न करूँगी

और कहीं जो ब्याह हो गया

तो मैं अपने बालम को/ संग-साथ रखूँगी

कलकत्ते मैं कभी न जाने दूँगी

कलकत्ते पर बजर गिरे।70

 

त्रिलोचन की आख्यानमूलक कविताओं में ‘नगई महरा’ की प्रमुखता से गिनती होती है। जाति से कहार नगई ने भड़भूजे का काम किया, रस्सी बुनी, कवि से रामायण बंचवाया। अपना गाँव छोड़कर चिरानीपट्टी आ बसे नगई अब भगत हैं। उनकी पत्नी जिन्हें गाँव वाले महरिन कहते हैं, पिछले रिश्ते से उनकी सास थीं। वे फुर्तीली थीं। कार्यकुशल थीं। वाक्पटु थीं। और, सबसे उल्लेखनीय बात कि वे ‘उदास नहीं दिखती थीं’। इससे लोगों को बातें बनाने का मौका मिलता था। पानी भरने आई महरिन से वाचक की बुआ ने जो कहा उसका उन्हें वैसा ही जवाब मिला-

 

…महरिनिया/ तू दामाद के घर/ क्यों बैठ गई

महरिन का जवाब पहले से तैयार लगा

बुआ, अपनी ओर ही निगाह करो

दूसरों की बूझने से अपना ही बूझना/ कहीं अच्छा होता है

और वह इज्ज़त बचाती हुई/ घर में चली गई

छूछा ज़ोर लेकर बाहर निकली/ बिलकुल चुप

बुआ भी चुप ही रही

उसके इनारे की ओर चले जाने पर

आप ही आप कहा/ कौन नीच जात के मुँह लगे।71

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संदर्भ 
  1. ‘कवि भारती’ (2010 वि., प्रथमावृत्ति), संपादक- सुमित्रानंदन पंत, बालकृष्ण राव और डॉ. नगेन्द्र, साहित्य सदन, चिरगाँव, झाँसी. पृ. 321.
  2. वही, पृ. 312-314.
  3. ‘हिन्दी की प्रगतिशील कविता’ (प्र. सं. 1971), डॉ. रणजीत, हिन्दी साहित्य संसार, प्रगतिशील प्रकाशन, दिल्ली, पृ. 173.
  4. ‘रांगेय राघव ग्रंथावली’ खंड-9 (द्वि.सं. 1984), सं. डॉ. सुलोचना रांगेय राघव, राजपाल एंड सन्ज, कश्मीरी गेट, दिल्ली, पृ. 26.
  5. वही, पृ. 30. यह कविता 1946 में प्रकाशित ‘पिघलते पत्थर’ संग्रह से है।
  6. वही, पृ. 66-67, यह कविता रांगेय राघव के अंतिम काव्य-संग्रह ‘राह के दीपक’ (1948) में संग्रहीत है।
  7. ‘अछूत’, मुल्कराज आनंद, ‘अनटचेबल’ का अनुवाद, राजपाल एंड सन्ज, कश्मीरी गेट, दिल्ली, संस्करण 2022. पृ. 15.
  8. वही, पृ. 141.
  9. वही, पृ. 63.
  10. वही, पृ. 65.
  11. वही, पृ. 30.
  12. ‘मेरे पिता की समाधि’ (प्र.सं. 2025), कावेरी, स्वराज प्रकाशन, नई दिल्ली, पृ. 66-68.
  13. वही, पृ. 68.
  14. ‘मुक्तिबोध समग्र-1’ (2019) सं. नेमिचंद्र जैन, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, पृ. 250. राजकमल प्रकाशन से ही 1980 में प्रकाशित ‘मुक्तिबोध रचनावली’ का रमेश मुक्तिबोध द्वारा संशोधित परिवर्धित संस्करण। उद्धृत कविता का रचनाकाल 1949-50 अनुमानित है।
  15. ‘भारतीय साहित्य : एक परिचय’ (2006), सं. अंजना नीरा देव, बजरंग बिहारी तिवारी और सनम खन्ना, पीयर्सन पब्लिकेशन, सेक्टर-62, नोएडा, पृ. 219-224.
  16. ‘मुक्तिबोध समग्र-2’ (प्र.सं. 2019), शेष विवरण पूर्वोक्त, पृ. 454.
  17. ‘अदृश्य भारत’ (2012, पुनर्मुद्रित 2014), भाषा सिंह, पेंगुइन बुक्स, पृ. 11.
  18. ‘मुक्तिबोध समग्र-3’ (प्र.सं. 2019), शेष विवरण पूर्वोक्त, पृ. 119-20.
  19. ‘अदृश्य भारत’, पहला अध्याय, पृ. 4–25.
  20. ‘शमशेरबहादुर सिंह रचनावली’ (2017), संपादक- रंजना अरगड़े, शिल्पायन, शाहदरा, दिल्ली, कुल छह खंडों में प्रकाशित इस रचनावली के दूसरे खंड में दहेज हत्या पर लिखी कविता संकलित है। पृ. 120-21.
  21. ‘त्रिलोचन रचनावली खंड-2’ (प्र.सं. 2023), सं. गोबिन्द प्रसाद, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, कविता संख्या 106, पृ. 74. ‘उस जनपद का कवि हूँ’ संग्रह में कविताओं के शीर्षक नहीं हैं, उनकी जगह संख्या लिखी गई है।
  22. वही, पृ. 239. त्रिलोचन के ‘तुम्हें सौंपता हूँ’ (1984) में प्रकाशित इस कविता का शीर्षक ‘प्रेरणा’ है।
  23. वही, पृ. 64. कविता संख्या 86.
  24. ‘त्रिलोचन : रचना-संचयन’ (प्र.सं. 2023), चयन और संपादन- गोबिन्द प्रसाद, साहित्य अकादमी, नई दिल्ली, पृ. 100.
  25. वही, पृ. 38.
  26. वही, पृ. 55, ‘नगई महरा’ शीर्षक कविता।

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