दिलो दानिश : अक्स है इंतिहाई गहरा / डॉ. दीपशिखा सिंह


“राष्ट्र-राज्य की अवधारणा किस तरह सांस्कृतिक शुद्धता की अवधारणा से जुड़कर अंध-राष्ट्रवाद की ओर बढ़ती है, इसे कृष्णा सोबती अपने जीवन में बारीकी से देख और दर्ज कर रही थीं। इसलिए सांस्कृतिक शुद्धतावाद का प्रत्याख्यान उनकी सम्पूर्ण रचनात्मकता में देखा जा सकता है। श्रेष्ठताबोध और सांस्कृतिक वर्चस्व का विस्तार एक शृंखला  के रूप में समाज के हर स्तर में व्याप्त है। इसे इसके मूल रूप में समझने के लिए हर स्तर पर इसका विश्लेषण करना ज़रूरी है। ‘दिलो दानिश’ इस बहुस्तरीयता के उद्घाटन में महत्त्वपूर्ण हो जाता है।” –‘दिलो दानिश’ पर अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के हिंदी विभाग में सहायक आचार्य डॉ. दीपशिखा सिंह का सुविचारित आलोचनात्मक लेख।

शीर्षक शमशेर की एक काव्य-पंक्ति से बनाया गया है। 

 

वैसे तो कृष्णा सोबती का सम्पूर्ण लेखन ही हिंदी साहित्य में एक चुनौती की तरह है, लेकिन दिलो दानिश में जिस तरह की बहुस्तरीयता है, वह इस उपन्यास को और चुनौतीपूर्ण बनाता है। सामंती पितृसत्तात्मक ढाँचे में स्त्री की स्थिति इस उपन्यास का प्रस्थान बिंदु है, लेकिन अपनी सम्पूर्णता में यह एक युग की समस्त सामाजिक-सांस्कृतिक हलचलों को समेटे हुए है। पुरानी दिल्ली की एक हवेली में रहने वाले परिवार और उसके समानांतर पारंपरिक पारिवारिक ढाँचे के प्रत्याख्यान के रूप में आये ‘फ़राशख़ाने के लोगों के बीच चलने वाले द्वंद्वों के उतार-चढ़ाव में एक पूरी संस्कृति का भी उतार-चढ़ाव प्रतिबिंबित होता है। पारिवारिक व सामाजिक सम्बन्धों के दो तरह के ढाँचे दरअस्ल उस परिवेश के यथार्थ को दिखाते हैं; जहाँ परम्परागत रूप में स्वीकृत और अस्वीकृत, उससे बंधे और मुक्त, सार्वजनिक रूप से अच्छे और बुरे का नियामक वास्तव में एक ही है। यह द्वंद्व दो रूपों में सम्पूर्ण उपन्यास में विन्यस्त है, पहला स्थूल रूप में दिखायी देने वाला और बेहद सपाट तौर पर नैतिकता और अनैतिकता, शुद्धता और अशुद्धता, उत्कृष्ट और निकृष्ट, सांस्कृतिक वर्चस्व और पतन, पत्नी और रखैल का, तो दूसरी ओर उतने ही सूक्ष्म रूप में व्यक्ति के अपने मनोभावों और समाज प्रदत्त वर्चस्व के सामंजस्य का। इसलिए एक ओर उपन्यास के चरित्रों के प्रति पाठक के मन में सहानुभूति उपजती है तो दूसरी ओर कई बार उनकी क्षुद्रताएँ मन में क्षोभ भी पैदा करती हैं।

तमाम सामाजिक-सांस्कृतिक संस्थानों और प्रतिष्ठानों के ऊपर चढ़े सभ्यता के आवरण इस उपन्यास में परत-दर-परत खुलते जाते हैं। इतिहास के एक ऐसे कालखंड में इस उपन्यास को रचा गया है जहाँ सामंती परिवेश में एक साथ कई मान्यताएँ पद-प्रतिष्ठा-पैसे की बदौलत स्वीकृत-अस्वीकृत दोनों हैं। इसके पूरे लोकवृत्त में स्त्री का कहीं कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है और हर तरह की स्त्री के लिए निर्मित तमाम मान्यताएँ अस्ल में उस सार्वभौमिक वर्चस्ववादी संस्कृति का हिस्सा हैं जो पूरी दुनिया का सबसे बड़ा सच आज भी है। उपन्यास के सभी स्त्री-चरित्र इसी सार्वभौमिक वर्चस्ववादी संस्कृति से पीड़ित हैं। लेकिन इस यथार्थ में एक ऐसे ढाँचे को कृष्णा सोबती ने खड़ा किया है जिसमें इन तमाम स्त्री-चरित्रों का अपना जीवन है, उनके अपने लक्ष्य भी हैं और उनके लिए निरंतर चलता उनका संघर्ष भी है। महक, कुटुंब और छुन्ना इनमें मुख्य स्त्री-चरित्र हैं, जिनकी जीवन-धुरी का केंद्र कृपानारायण है। तीनों स्त्रियों से कृपानारायण का सम्बन्ध अलग-अलग है। महक उसकी प्रेमिका और समाज की नज़र में रखैल है तो कुटुंब उसकी पत्नी और छुन्ना उसकी बहन। छुन्ना विधवा है और विधवा के समाज प्रदत्त बाने को अस्वीकार किये हुए है।संभवतः अपने स्वतंत्र अस्तित्व की इस चेतना के चलते ही भाई के सामाजिक रूप से अस्वीकृत ‘फ़ाराशख़ाने’ वाले परिवार से सबसे ज़्यादा जुड़ाव छुन्ना का ही है। महक उसकी भाभी है तो मासूमा और बदरू की वह चहेती छुन्ना बुआ है। इन तीनों स्त्रियों के जीवन में उठने वाली हलचलों को कृष्णा सोबती ने जिस तरह से उपन्यास में पिरोया है, वह न सिर्फ़ स्त्री की नियति को बल्कि समाज की गति को भी बदलकर रख देता है।

रैल्फ फॉक्स ने लिखा है –

“जनता (चाहे वह ऊपर से देखने में कितनी ही उदासीन और निष्क्रिय क्यों न लगती हो) प्रचंड वर्ग-संघर्षों, राष्ट्रीय और जातीय पूर्वाग्रहों तथा मानवता के जीवन में अपनी अनिवार्य गति से आगे बढ़ते हुए इतिहास की विरासत से आंदोलित होती रहती है।….महान उपन्यासों में स्रष्टा, पात्रों और पाठकों के बीच एक प्रकार की सजीव एकता होती है।”1

ऐसे ही बाहरी तौर पर अपनी-अपनी नियति से बँधी ये स्त्रियाँ अपनी आतंरिक इच्छाओं-आकांक्षाओं को फलित करने में जी-जान से लगी हैं। सतही रूप में कुटुंब और महक एक-दूसरे के आमने-सामने खड़ी दिखायी पड़ती हैं लेकिन इन दोनों का असल द्वंद्व कृपानारायण से है। कृपानारायण उस सामंती पुरुषवाद का प्रतीक है जो अपने अहं और उससे जन्म लेने वाली इच्छाओं-कल्पनाओं में जीता है। किसी भी स्त्री का जीवन उसकी कल्पना के बाहर कुछ भी नहीं। यह उस वर्चस्ववादी संस्कृति का दंभ है जिसमें उस व्यक्ति का जन्म और विकास हुआ है। यह उस पितृसत्ता का दंभ है जिसके लिए स्त्री प्रेरणा और प्रेयसी तो हो सकती है, लेकिन उसके बराबर की हक़दार कभी नहीं। यह उस पुरुष का दंभ है जो स्त्री को आश्रय के रूप में एक प्राकृतिक उपादान के अतिरिक्त कोई भी सामाजिक महत्त्व नहीं देना चाहता-  “और हम? कभी कुटुंब के किनारे और कभी महक के। क्या समझाएँ! जिस्म को राहत चाहिए होती है। पर दिलो-दिमाग भी कुछ माँगते हैं। सारा खेल खाने-पीने-सोने और घर चलाने का ही तो नहीं। अगर है ही तो उसकी अदायगी क्या हमीं को करनी होगी! क्या सिलसिला है! कुछ पाबन्दियाँ अपने साँचे में ढाल देती हैं और कुछ बिना साँचे के भी चल निकलती हैं। इतनी सी बात हमारी बीवी की समझ में नहीं आती। चिड़िया बनी आईने में अक्स को कोंचे चली जाती हैं।”2 आईने को लगातार कोंचते रहने से उसमें दिखने वाले अक्स भी धीरे-धीरे बदल जाते हैं। यह बदलाव इन दोनों स्त्रियों के तईं कृपानारायण के जीवन में आता है। इस बदलाव में निश्चित तौर पर पलड़ा उसी का भारी रहता है जो संसार की प्रचलित परम्पराओं और मान्यताओं के साथ किसी न किसी रूप में बँधा हुआ है।

यह भी तय है कि जीवन किसी बने-बनाये साँचे में नहीं ढलता है, लेकिन असल सवाल जो पूरे उपन्यास में गूँजता है, वह है- स्त्री का उसके अधिकारों को लेकर दुश्चिन्ताएँ। चाहे वह एक ब्याहता के तौर पर कुटुंब की भावनात्मक असुरक्षा हो, या फिर नसीम बानो से होते हुए महक बानो तक उसकी परम्परागत संपत्ति और उसके बच्चों के भविष्य की असुरक्षा का सवाल या फिर एक विधवा के रूप में छुन्ना का अपने पिता के घर में रहने और ससुराल की संपत्ति में उसकी हिस्सेदारी का प्रश्न। ये सवालात इस उपन्यास में क़दम-क़दम पर मुँह बाये खड़े हैं। इन सवालों के जवाब में ही उपन्यास के कथानक का पूरा ढाँचा खड़ा हुआ है। कुटुंब को समझाते हुए बउआजी कहती हैं- “मर्द को गुमराह करनेवाले फ़कत हुस्न और जवानी नहीं, उसकी कमाई है जो उसे ख़ुदमुख्तारी देती है। सोचो, घर में बैठे-बैठे औरत क्या करेगी! गहनों की बकुची में से अक्ल की पुड़िया निकाल लेगी या भंडारघर से पैसा कमाने का तजुरबा समेट लेगी! हमसे पूछो तो घर की बहू जिंदगी भर या मर्द की सुनेगी या बेटों की। धर्मशास्त्र भी तो यही कहते हैं।”3 कुटुंब का दुःख रईस परिवारों में बहू बनकर आने वाली तमाम स्त्रियों का साझा दुःख है, जो इसी तरह के शास्त्रसम्मत आधारों पर पीढ़ी-दर-पीढ़ी एक-दूसरे को सांत्वना देता हुआ पलता रहता है। बउआजी की इस बात में जहाँ एक ओर कुटुंब को यथास्थितिवाद की तरफ़ खींचने की कोशिश है, वहीं दूसरी ओर बहुत मज़बूती से इस बात की ताक़ीद भी है कि विवाहेतर संबंधों की जड़ दरअस्ल सिर्फ़ किसी दूसरी स्त्री का हुस्न और जवानी नहीं है, बल्कि यह पुरुष की आर्थिक स्थिति पर निर्भर है। स्त्री के मत्थे ही हर तरह का ठीकरा फोड़ने वाले समाज के सामने यह बात बहुत स्पष्ट है, लेकिन ‘समरथ को नहिं दोष गोसाईं’।  इसलिए कुटुंब उपन्यास के कथानक में सीधे महक को टक्कर देती हुई दिखायी देती है या उसकी कुंठा का आधार महक है, लेकिन उसकी असल लड़ाई अपने अधिकारों को संपूर्णता में पाने की है, जिसके लिए वह किसी भी हद तक जाने को तैयार है, और वह जाती भी है। पहले उसे अपने भाइयों पर भरोसा है कि उनके हस्तक्षेप से संभवतः कृपानारायण के विवाहेतर संबंध पर शिकंजा कस लेगी, लेकिन ‘हम्माम में सब नंगे हैं’। यह उस दौर के आर्थिक रूप से संपन्न हर घर की कहानी है। अपनी अम्माँ की बात याद कर बउआजी कहती हैं- “जो हमने देखा है, सहा है, कमोबेश वही तो तुम भी देखोगी और सहोगी। मरदों के हिस्से में आये हैं महफ़िल, मुजरे, खेल-तमाशे, और औरत को लगे हैं बाल-बच्चे, दिन-त्यौहार, पूजा-व्रत। रोने-धोने से क्या कुछ बदलने वाला है! अब जैसा जो कुछ है चलाती चलो।”4 लेकिन कुटुंब इसे चलाती नहीं चलती, क्योंकि यहाँ मामला मुजरे-महफ़िल भर का नहीं बल्कि उससे कहीं आगे बढ़ा हुआ है। मामला उसके और उसके बच्चों के प्रेम और अधिकारों के बँटवारे का है, जिसे वह क्षण भर भी स्वीकार करने को तैयार नहीं है। अंततः इस बँटवारे के ख़िलाफ़ चलने वाले उसके संघर्ष को किसी भी पारिवारिक-सामाजिक व्यवस्था से कोई संबल नहीं मिलता। यह उसकी नितांत निजी लड़ाई बन जाती है और इस क्रम में उसे जो रास्ता दीखता है, वह उस पर उफनती नदी की तरह बहती चली जाती है। सामंती पितृसत्तात्मक पारिवारिक ढाँचे में एक तरह से अनुकूलित कुटुंब अपनी उपेक्षा और अपने बच्चों के उत्तराधिकार संबंधी असुरक्षा के चलते इस बनी-बनायी व्यवस्था के ख़िलाफ़ हो जाती है। यहाँ पर वह पितृसत्तात्मक नियमों और स्त्री-जीवन संबंधी तमाम मान्यताओं के विरुद्ध पूरे तेवर के साथ खड़ी दिखायी देती है। इस क्रम में संबंधों की जिस एकनिष्ठता और यौन शुचिता की माँग वह दूसरों से करती है, ख़ुद उसका अतिक्रमण कर जाती है। किसी बाबा से उसका शारीरिक संबंध बन जाता है, लेकिन अपनी इस निजी लड़ाई में वह बिना किसी अपराधबोध या कुंठा के इस यथार्थ को स्वीकार करती है- “क्या हर्ज़ है, ऐसी बेवफ़ाई पर। यह भी तो फ़राशख़ाने में उँड़ेल आते हैं अपने को। हमारे लिए कितना बचता है। फिर हाथ लगते ही हमारे बदन पर उस औरत का कंटक चुभने लगता है। क्या करें! हमारी मज़बूरी। हमारा दर्द इन तक नहीं पहुँचता। इन्हें, इनके ख़ानदान की इज्जत को हमीं तो सिर पर उठाये रहेंगे! इनके बच्चों की माँ हैं न हम!”5 यह संबंध सोच-समझकर बेवफ़ाई करने के लिए नहीं बना था, लेकिन जब बन गया तो उसकी सहज स्वीकृति भी है। एक स्त्री के रूप में यौन-शुचिता से ज़्यादा महत्त्वपूर्ण उसके लिए उसके अपने पारिवारिक-सामाजिक अधिकार और अपने बच्चों के भविष्य की आर्थिक सुरक्षा है। इसलिए इस तरह के अपने विचलन के सामने वह हथियार नहीं डालती है।

दूसरी तरफ़ महक है जो पूरी तरह कृपानारायण के प्रेम में डूबी हुई है और एक तरह से उसकी कृपादृष्टि पर अपना और अपने बच्चों का जीवन-बसर कर रही है। कृपानारायण के सामने एक तरफ़ तो हवेली है, जहाँ हर तरह के संसाधनों की न केवल उपलब्धता है बल्कि अधिकता है, वहीं दूसरी तरफ फ़राशख़ाने का ख़स्ताहाल मकान है। ज़िम्मेदारी दोनों की बराबर होनी चाहिए थी, लेकिन एक तरफ़ सामाजिक स्वीकृति पद-प्रतिष्ठा है तो दूसरी तरफ अस्वीकृति-परदेदारी और सही मायने में कहें तो हक़-तल़फी है, जिसे बार-बार मन में आने के बावजूद महक कह नहीं पाती है। यहाँ तक कि वाजिब ज़रूरतों के लिए भी कह पाने में उसे अतिशय संकोच होता है। संसाधनों की दृष्टि से देखें तो  कृपानारायण का ध्यान बहुत कम इस मकान और इसमें रहने वालों के अभावों की तरफ जाता है, क्योंकि यहाँ आकर उसके जीवन के जिन अभावों की पूर्ति महक जैसी प्रेयसी और मासूमा-बदरू जैसे सलीक़ेदार अपने बच्चों से होती है, उससे वह खुद इतना भरा-पूरा महसूस करता है कि भौतिक अभाव कभी उसकी दृष्टि में आते ही नहीं। महक और बच्चों की अनुपस्थिति में जब यह अभाव सामने आये भी तो उसे हवेली की बराबरी में बैठा पाना कृपानारायण के लिए संभव नहीं हुआ। यहाँ वह निश्छल प्रेम और स्नेह सामंती पुरुषवादी ठसक से मात खा गया।महक बानो तो पहले से ही इसमें अनुकूलित थीं- “जो इस तर्ज़ का दामन पकड़े वह वही करे जो वकील साहिब ने किया। उनके लिए तो ग़लत भी कहाँ था! घर-गृहस्थी में जमे पड़े थे। जितना हो सका, चला लिया। हम थे सो नत्थी हुए रहे। अपना आगा-पीछा ही ऐसा रहा….वकील साहिब दूर हो चुके तो क्या कीजिएगा! उनके बहाने ज़िंदगी में कुछ बरकत हो आई।”6

महक को भौतिक संसाधनों या सामाजिक प्रतिष्ठा की कोई लालसा नहीं है। एक तवायफ़ की बेटी होने के कारण अपनी नियति और यथार्थ को उसने सहज स्वीकार कर लिया है। फिर भी इस उपन्यास में महक के दो रूप शुरू से एक-दूसरे में घुले-मिले दिखाई देते हैं। एक तो बेहद सलीक़ेदार और संकोची महक है जो उसी में संतुष्ट है जितना उसे कृपानारायण सहजता से देता है- चाहे वह प्रेम-स्नेह हो या फिर जीवन-यापन की अन्य आवश्यकताओं से जुड़ी चीज़ें। दूसरी वह महक है जिसके भीतर अपनी माँ नसीम बानो का अक्स छुपा हुआ है, जो रह-रहकर उसे अपने अधिकारों के प्रति सचेत करता रहता है। लेकिन पितृसत्ता में पूरी तरह अनुकूलित महक पूरी तरह खुद को कृपानारायण के एहसानों तले दबा हुआ पाती है। उसके सामने यह स्पष्ट है कि उसकी समाज-प्रदत्त नियति नहीं बदल सकती, लेकिन अपने बच्चों की नियति वह बदलना चाहती है। मासूमा और बदरू के भविष्य की चिंता दरअसल उसकी अपनी नियति का प्रत्याख्यान है और इस क्रम में उसका चिंतन समाज में मौजूद लिंगुअल, सोशल, पॉलिटिकल हर स्तर पर मौजूद पुरुषवाद को बेनक़ाब करता है। कुटुंब की लड़ाई एक उफनती नदी की तरह है जो सबकुछ को अपने बहाव में बहा ले जाने को आतुर है तो महक का संघर्ष चट्टान की तरह ठस्स है। वह सबकुछ को, यहाँ तक कि अपनी उपेक्षा को भी अपनी नियति मानकर शांत भाव के साथ स्वीकार कर लेती है, अभावों से जूझते बच्चों के मन में कभी भी उनके पिता या फिर हवेलीवालों के प्रति कोई दुराव नहीं आने देना चाहती है। फिर भी एक आशंका है जिससे वह निरंतर जूझती रहती है। जब-जब यह आशंका उठती है, उसे अपने ही भीतर अपनी माँ का अक्स उभरता दिखायी देता है, जिसे उसका मानसिक अनुकूलन बार-बार दबा देना चाहता है। उसे अपनी ही माँ के उस अक्स से भय लगता है, क्योंकि कहीं न कहीं इस सच से भी वह जूझ रही है कि जिस दिन अपने अधिकारों की माँग वह सीधे-सीधे करेगी, उस दिन इस निश्छल प्रेम-संबंध में गिरह ज़रूर पड़ेगी। अपनी भावनात्मकता के कारण बार-बार वह इस सच से भागती है और अपनी यथास्थिति में संतुष्ट रहने की कोशिश जारी रखती है। अपने हर तरह के अधिकारों से वह विमुख हो जाती है, लेकिन जब सवाल मातृत्व के अधिकार के छिनने का आता है, तब महक अपने उसी चट्टानी ठस्से के साथ कृपानारायण के बहाने पूरे पितृसत्तात्मक ढाँचे के सामने एक चुनौती बन जाती है। इस परिस्थिति में उसके अपने बच्चे भी उसके साथ पूरी तरह खड़े नहीं रह पाते, क्योंकि अब वह सिर्फ फ़राशख़ाने के मासूमा-बदरू नहीं हैं बल्कि उन्हें हवेली ने अनुकूलित कर लिया है। इसलिए एक स्त्री के रूप में महक का संघर्ष कुटुंब से आगे बढ़ा हुआ, उसके अस्तित्व को बचाने की लड़ाई है। यहाँ महक किसी भी संस्थागत रूप में बँधी नहीं बल्कि एक स्वतंत्र स्त्री के रूप में दिखायी देती है। अपने संबंध के एवज में वह कृपानारायण से कोई माँग भी नहीं करती, बस अपनी  नानी-परनानी-माँ के उन जेवरों की ही माँग करती है, जो उसकी पुश्तैनी सम्पत्ति हैं और जिस पर उसका मालिकाना हक़ है। स्त्री के इस स्वतंत्र और सम्पूर्ण रूप को कृपानारायण या कहें कि पितृसत्ता बर्दाश्त नहीं कर पाती। आलोक धन्वा ‘भागी हुई लड़कियाँ’ शीर्षक कविता में लिखते हैं-

तुम
जो
पत्नियों को अलग रखते हो
वेश्याओं से
और प्रेमिकाओं को अलग रखते हो
पत्नियों से
कितना आतंकित होते हो
जब स्त्री बेखौफ़ भटकती है
ढूँढ़ती हुई अपना व्यक्तित्व
एक ही साथ वेश्याओं और पत्नियों
और प्रेमिकाओं में !

पुरुष फिर से उसे अपने सतही नज़रिये से देखता है और फिर उसका अस्तित्व किसी अन्य पुरुष से जोड़कर ख़ुद को तसल्ली देता है। लेकिन एक चेतस स्त्री के तौर पर छुन्ना इसे इसकी वास्तविकता में देख पाती है- “दद्दा आप हमारी बात का यक़ीन मानिए। उस मौक़े पर महक भाभी के खड़े होने का अंदाज़, बात करने में रुआब उनका ख़ास अपना ही था। खाँ साहिब का इस अदा से कोई ताल्लुक़ न था। लगता था वह जेवर पहनते ही उन पर उनका ख़ानदानी स्वरूप उतर आया था, ऐसे जैसे दुनिया को पछाड़कर खड़ी हो गयी हों।”7 अपने अस्तित्व की जिस लड़ाई के लिए महक ने कृपानारायण के ख़िलाफ़ मोर्चा खोला है, वह  लड़ाई बहुस्तरीय हो जाती है। जिस कालखंड को कृष्णा सोबती ने इस उपन्यास के कथानक का आधार बनाया है, उसमें महक जैसी स्त्रियाँ न सिर्फ़ सामंती पितृसत्ता से जूझ रही हैं, बल्कि एक नया ख़तरा विक्टोरियन नैतिकता के नाम पर तमाम स्वतंत्र स्त्री-समूहों के ऊपर थोपा जा रहा था, क्योंकि शासक वर्ग की नियामक विचारधारा की ही तर्ज पर सत्ता वर्ग की नियामक संस्कृति के भी निर्माण की कोशिश की जाती है। भारतीय परिप्रेक्ष्य में सबसे ज़्यादा त्रासद है यहाँ की सामाजिक व्यवस्था में गहरे तक पैठी पितृसत्तात्मक सामंतवादी प्रवृत्ति जो सभ्यता विरोधी ऐसी हर कार्रवाई को दोनों हाथों से लपकती है और उससे अपने परम्परागत शोषण के आधारों को मज़बूत बनाने में जुट जाती है। महक को उसके बच्चों से भी अलग-थलग कर देना इसी परम्परागत वर्चस्ववादी संस्कृति का हिस्सा है, जिसमें उसकी उपलब्धियों को तो ले लिया जाता है लेकिन स्रष्टा को उपेक्षित छोड़ दिया जाता है। जेवर पहनते ही महक के ऊपर जिस ख़ानदानी स्वरूप के उतरने की बात छुन्ना कह रही है, वह अस्ल में इन्हीं स्वतंत्र स्त्री समूहों के अपने स्वाभिमान और अस्तित्व को बचाये रखने की ओर संकेत करता है। यहाँ आकर महक का संघर्ष उसके निजी संघर्ष से एक सामूहिक संघर्ष में बदल जाता है। वह अपनी नियति की डोर जो लम्बे समय तक मुख्यधारा के समाज के हाथों नैतिकता और शुद्धता के हवाले से पड़ी हुई थी, उसे खुद पकड़ लेती है। वह इस मायने में सामाजिक अनुकूलन में मिलने वाले किसी भी लाभ को ठुकराकर अपनी वास्तविक पहचान को बचाये रखती है। वह अपने बच्चे को बदरुद्दीन से बद्रीनारायण नहीं बनाना चाहती, लेकिन आख़िर में पिता की तरफ़ का झुकाव और सामाजिक रंग-ढंग में बदरुद्दीन, बदरू उर्फ़ बद्रीनारायण बन ही जाते हैं।

जिस सामाजिक-संरचना को इतिहास में नैतिकता और अनैतिकता के खाँचे में डालकर देखा गया है, उसे कृष्णा सोबती ने उसके अपने यथार्थ रूप में दिलो-दानिश में जीवित किया है। हवेली और फ़राशख़ाने में एक निश्चित दूरी है। एक केंद्र है तो दूसरा हाशिया। सार्वजनिक जीवन में फ़राशख़ाने की उपेक्षा तो है लेकिन वर्जना नहीं है। दोनों में आवाजाही के कुछ रास्ते खुले हुए हैं। उसके बाद नैतिकतावाद की जो लहर अँगरेजी राज के साथ आयी, उसने पुरानी सामाजिक-संरचनाओं को अपने एकरेखीय नज़रिये से परिभाषित किया। इस ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य को देखते हुए यह उपन्यास भारतीय सांस्कृतिक-परम्परा और सामाजिक-संरचना को भारतीयता के नज़रिये से देखने की एक दृष्टि की तरह है। कुटुंब, महक और छुन्ना के जीवन में आने वाले बदलाव उस ऐतिहासिक कालखंड में होने वाले बदलावों की ओर भी इशारा कर रहे हैं। एक तरफ़ भारतीय स्त्री सुधारवाद से आगे बढ़ते हुए अपने अधिकारों के प्रति सचेत हो रही है, जिसका सबसे महत्त्वपूर्ण प्रतीक इस उपन्यास में छुन्ना नामक चरित्र है। वहीं दूसरी ओर भारत माता के रूप में राष्ट्र-राज्य की एक ऐसी संकल्पना भी विकसित हो रही है, जिसमें एक बड़ा तबका उपेक्षित होता जा रहा है। महक इस उपेक्षित होने वाली आबादी का भी प्रतीक है, जो भारत माता की संकल्पना में नहीं अँट पा रही है। पुनरुत्थानवाद की लहर किस तरह बहुलवादी भारतीय समाज का रूप बदलती जा रही है, उसे महक के जीवन में आये बदलावों के रूप में देखा जा सकता है।  कृपानारायण सामंती पितृसत्ता का प्रतीक होने के साथ-साथ बहुलतावादी भारतीय संस्कृति में जीने वाला व्यक्ति है। वह उस समय का भी प्रतीक है जब भारतीय समाज की अपनी तमाम जड़ताएँ और कमजोरियाँ थीं, लेकिन फ़िरक़ापरस्ती नहीं थी। पुनरुत्थान के उफान ने किस तरह साम्प्रदायिक अलगाववाद को बढ़ावा दिया और द्विराष्ट्र के सिद्धांत की ज़मीन तैयार की, इसे भी यह उपन्यास बखूबी बयाँ करता है- “यूँ देखें तो रज्जो और बदरू में क्या फ़र्क है साहिब! दोनों भाई हैं! आधे भाई ही तो कहलाएँगे| इधर दम्मो उस्ताद इस छोटी सी उम्र में बग़ावत करने पर तुले हैं। जो आज तक हमारे सामने किसी ने न कहा, वह दम्मो साहिब भरी महफ़िल में कह गये। माँ की सिखावत है और क्या! सच तो यह है कि ये दोनों जमातें अलग हैं और शायद अलग ही रहेंगी। बीच में हद बनकर खड़ी रहेगी वह औरत जिसे दम्मो मुसलमानी के नाम से पुकारते हैं। फ़िरक़ापरस्ती, और क्या! लेकिन साहिब फ़िरक़ापरस्ती है कहाँ नहीं! पूरी तरह ज़िंदगी को घेरे हुए है। अपनी बात करें तो एक मुसलमानी है; दूसरी मुसलमानी नहीं, हिन्दुआनी है। हक़ीक़त यह भी कि दोनों माँएँ हैं और दोनों ने बच्चे हमीं से पाये हैं|”

देश का विभाजन एक बड़ी ऐतिहासिक घटना है, जिसका दंश आज भी भारतीय उपमहाद्वीप झेल रहा है। कृष्णा सोबती हिंदी के कुछ उन लेखकों में से हैं जिनके निजी जीवन पर इसके परिणामों का प्रभाव पड़ा है। इसीलिए कभी भी उन परिणामों से उपजे दर्द को वह विस्मृत नहीं कर पायीं। उनके लगभग सम्पूर्ण लेखन में विभाजन की त्रासदी आंतरिक सूत्र के रूप में मौजूद है। राष्ट्र-राज्य की अवधारणा किस तरह सांस्कृतिक शुद्धता की अवधारणा से जुड़कर अंध-राष्ट्रवाद की ओर बढ़ती है, इसे कृष्णा सोबती अपने जीवन में बारीकी से देख और दर्ज कर रही थीं। इसलिए सांस्कृतिक शुद्धतावाद का प्रत्याख्यान उनकी सम्पूर्ण रचनात्मकता में देखा जा सकता है। श्रेष्ठताबोध और सांस्कृतिक वर्चस्व का विस्तार एक शृंखला  के रूप में समाज के हर स्तर में व्याप्त है। इसे इसके मूल रूप में समझने के लिए हर स्तर पर इसका विश्लेषण करना ज़रूरी है। दिलो दानिश  इस बहुस्तरीयता के उद्घाटन में महत्त्वपूर्ण हो जाता है। राजनीतिक या सांस्कृतिक साम्राज्यवाद हो या फिर धार्मिक उन्माद, नस्ल आधारित भेदभाव हो या फिर लैंगिक भेदभाव, सामाजिक वर्चस्व हो या फिर पारिवारिक वर्चस्व- सब एक ही शृंखला की कड़ियाँ हैं। इनमें से सबकी मूल चेतना एक ही है और समय-समय पर एक-दूसरे का पक्ष मजबूत करने के लिए ये आवश्यक तर्क का आधार भी बनते रहते हैं। इस उपन्यास और इसके चरित्रों के  संवेदनात्मक विकास में इसे देखा जा सकता है|

संस्कृति किसी भी समय और समाज की  कला, परम्परा, चिंतन आदि का उत्कृष्ट रूप है, जो उस समय और समाज की चेतना की सामूहिक अभिव्यक्ति होती है। लेकिन इसका स्वरूप उस समय बेहद ख़तरनाक हो जाता है, जब किसी ख़ास धर्म, संप्रदाय, जाति या नस्ल से जोड़कर इसका इस्तेमाल सत्ता स्थापित करने के लिए किया जाने लगता है। इस सन्दर्भ में एडवर्ड सईद ने कल्चर एंड इंपीरियलिज्म  में विस्तार से लिखा है। संस्कृति के दो अर्थ करते हुए एडवर्ड सईद ने पहला अर्थ कलात्मक अभिव्यक्ति से लगाया है और दूसरे अर्थ के सम्बन्ध में लिखा है –

“दूसरे अर्थ में संस्कृति प्रत्येक समाज के सर्वोत्तम ज्ञान और चिंतन का वह भंडार है, जो मनुष्य को परिष्कृत करने और ऊँचा उठाने वाला तत्त्व है तथा जिसके आधार पर हम स्वयं को, अपने लोगों को, अपने समाज को तथा अपनी परम्परा को सर्वोत्तम रूपों में जानते और समझते हैं। लेकिन संस्कृति का यह दूसरा अर्थ उस समय बदल जाता है, जब संस्कृति को राष्ट्र या राज्य से जोड़ा जाने लगता है और अन्य राष्ट्रों तथा राज्यों की संस्कृतियों से हम अपनी संस्कृति को आक्रामक ढंग से ‘हम’ और ‘वे’ में फर्क करने के लिए बेहतर बताने लगते हैं। इस अर्थ में संस्कृति हमारी एक लड़ाकू पहचान बन जाती है और हम अपनी अस्मिता की खोज में संस्कृति और परम्परा की ओर ‘लौटने’ लगते हैं। यह ‘लौटना’ बौद्धिक और नैतिक व्यवहार के ऐसे कट्टर नियमों के साथ होता है, जो अपेक्षाकृत उदारतावादी दर्शनों, सिद्धांतों और विचारों के विरुद्ध होते हैं।”9

‘हम’ और ‘वे’ का यह फ़र्क़  एक देश के भीतर ही किस तरह धर्म आधारित उग्र राष्ट्रवाद को बढ़ावा देता है, इसे आजादी और विभाजन के बाद निरंतर बढ़ती साम्प्रदायिक खाई के रूप में देखा जा सकता है। ‘हम’ और ‘वे’ के फ़र्क़ को पुख्ता करने के लिए तरह-तरह से वास्तविक सांस्कृतिक इतिहास की जगह एक छद्म को संस्कृति और इतिहास बनाकर सामान्य-बोध के रूप में प्रचारित-प्रसारित किया जाता है और उससे राजनीतिक लाभ उठाये जाते हैं। इसे नयी  अर्थव्यवस्था के साथ इक्कीसवीं सदी में क़दम बढ़ाते भारत में आसानी से देखा जा सकता है। इन बिन्दुओं के आधार पर यह कहा जा सकता है कि  1993 ई. में लिखा गया यह उपन्यास भारत-विभाजन के बाद पहली बार बड़े स्तर पर उभरने वाले साम्प्रदायिक-राजनीतिक ध्रुवीकरण का प्रत्याख्यान, ऐतिहासिक-सांस्कृतिक स्तर पर रचता है। यह कहने में कोई हर्ज़ नहीं कि दिलो दानिश में बहुत मज़बूती के साथ उस भारतीय संस्कृति का अक्स पैबस्त है जिसे इस देश के तमाम समुदायों ने मिलकर गढ़ा है।

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संदर्भ

  1. उपन्यास और लोक-जीवन, रैल्फ फॉक्स, पृ.124, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, संस्करण-2015
  2. दिलो दानिश, कृष्णा सोबती, पृ. 13, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, संस्करण-2010
  3. वही, पृ. 98
  4. वही, पृ. 98
  5. वही, पृ. 135
  6. वही, पृ. 163
  7. वही, पृ. 220
  8. वही, पृ. 43
  9. सांस्कृतिक साम्राज्यवाद, सं- रमेश उपाध्याय, संज्ञा उपाध्याय, पृ. 33, शब्दसंधान प्रकाशन, नई दिल्ली, संस्करण- 2009

 


2 thoughts on “दिलो दानिश : अक्स है इंतिहाई गहरा / डॉ. दीपशिखा सिंह”

  1. दिलो दानिश को लगभग एक दशक से मंच पर प्रस्तुत कर रहे हैं बहुत जटिल प्रश्नों और अनुत्तर की बारीक गांठों को उठाया है आपने
    एक बहुआयामी शानदार समीक्षा

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