‘शांता देवी अब उत्तरों की प्रतीक्षा नहीं करतीं। उन्हें अब केवल अपनी बात कहनी होती है—चाहे कोई सुने या न सुने।’–उम्रदराज़ स्त्री के अकेलेपन की अत्यंत संवेदनशील कहानी।… ज्ञानचन्द बागड़ी उपन्यास, कहानी, यात्रा वृतांत, संस्मरण और कथेतर लेखन के साथ-साथ पत्र-पत्रिकाओं में स्तंभ लेखन करते रहे हैं। वाणी प्रकाशन, दिल्ली से आख़िरी गांव (उपन्यास), संभावना प्रकाशन से ये जो दिल्ली है (उपन्यास), रे माधव आर्ट से बातन के ठाठ (कहानी संग्रह), आधार प्रकाशन से सफ़र में धूप तो होगी (यात्रा वृतांत) और जो सम्भव हुआ (संस्मरण) प्रकाशित।

कुछ दोपहरें केवल मौसम नहीं होतीं—वो स्मृति बन जाती हैं। ऐसी स्मृतियाँ जो ख़ामोश रहती हैं, मगर भीतर बहुत कुछ कह जाती हैं।
बड़े शहर की पुरानी बस्ती बह्मपुरी में, ईंट और समय की परतों से ढँका एक मकान था—ऐसा मकान, जो अब न किसी नक़्शे में ठीक से दिखायी देता, न किसी याद में। उसके छज्जे टेढ़े होकर नीचे झुक आये थे, जैसे बरसों की थकान के बाद अब दीवारों से कोई सहारा माँग रहे हों। गीली पपड़ी जैसी प्लास्टर की परतें हर बारिश में और उधड़ जातीं और जब धूप आती तो पुराने चूने की बदरंग परछाइयाँ आँगन में उतरतीं, जैसे कोई भूल चुका सपना धीरे-धीरे मिट रहा हो।
आँगन के बीचों-बीच तुलसी का पौधा था—नहीं, अब केवल उसकी जगह थी। वह छोटा-सा चबूतरा, जिस पर एक समय में हर मंगलवार दिया जलता था, अब सूखा हुआ, राख-जैसा, जड़हीन पड़ा था। खिड़की की सलाखों पर टँगा एक लोहे का परिंडा था।
कभी वहाँ गौरैया का जोड़ा सुबह-सुबह चहचहाता था।
शांता देवी उस चहचहाहट को आँगन में फैले सन्नाटे की पहली दरार मानती थीं—जैसे कोई कह रहा हो, “उठो, दिन आ गया है। जीवन फिर से शुरू हो सकता है।”
पर अब?
परिंडा वहीं था, पर ख़ाली। धूप उसमें से बेझिझक गुज़र जाती और हवा जब चलती तो उसमें धूल और मुरझाये पत्ते आकर अटक जाते थे—जैसे समय रुक गया हो, बस साँसें चल रही हों।
उस घर में रहती थीं—शांता देवी। उम्र कोई पक्की नहीं, लेकिन चेहरे की झुर्रियों और आँखों के किनारों पर जमी महीन दरारों से अनुमान लगाया जा सकता था कि उन्होंने समय को एक-एक पल देखा था। लगभग सत्तर वर्ष की तो हो ही चली थीं। विधवा थीं। लेकिन उनके चेहरे पर शोक का कोई गाढ़ा रंग नहीं था—बल्कि एक तरह की धीमी, अडिग प्रतीक्षा थी, जैसे किसी पुराने रेडियो पर बजती आवाज़ जो रुक-रुक कर फिर शुरू हो जाती है।
उनकी चाल में अब कंपन नहीं रहा, सिर्फ़ एक मशीन-सी आदत बाक़ी थी—सुबह चाय बनाना, पौधे को देखना (या उसकी अनुपस्थिति को), फिर उस खिड़की तक आकर बैठ जाना जहाँ से बाहर की सड़क तो दिखती थी, पर बाहर निकलने की कोई ख्वाहिश अब नहीं बची थी।
उनकी दुनिया आजकल दो हिस्सों में बँटी थी—दीवार पर टँगी एक धुँधली तस्वीर और उस तस्वीर की याद से उपजे दिन। तस्वीर में था राहुल, उनका बेटा। युवा, आत्मविश्वासी, हल्की मुस्कान के साथ—वह मुस्कान जिसमें देश छोड़ने से पहले की उम्मीद और अनकही जिम्मेदारियाँ एक साथ ठहरी थीं।
राहुल एम.टेक. करने के बाद इन दिनों अमेरिका में था। पहले सप्ताह में दो बार कॉल करता था। माँ हर बुधवार और रविवार की शाम समय से पहले तैयार हो जाती थीं। शॉल ठीक से ओढ़तीं, बाल पीछे कसे हुए, जैसे फोन पर नहीं, आमने-सामने बैठकर बात होने वाली हो। उनके चेहरे पर एक छोटा-सा उजास आ जाता—जैसे घर में फिर से कोई त्योहार आया हो।
धीरे-धीरे वो कॉल महीने में एक बार होने लगे। फिर त्योहारों तक सीमित हो गये। अब? अब भी कभी-कभी बस व्हाट्सएप पर एक नीला टिक आता है। संदेश लिखती हैं कई बार, फिर मिटा देती हैं। डरती हैं—कहीं ‘डिलीवर’ होकर भी ‘देखा नहीं गया’ में अटका रह गया तो? वो इंतज़ार, जो पहले कुछ घंटों का था, अब हफ़्तों का हो गया है।
उनकी आवाज़ अब ख़ामोशी से बात करती है—दीवारों से, परिंदों से और उस पुरानी घड़ी से जो अभी भी टिक-टिक करती है।
“वो घड़ी अब वक्त नहीं, इंतज़ार की धड़कन बताती थी।”
शांता देवी की दिनचर्या जैसे किसी पुराने ग्रामोफ़ोन की सुई पर अटकी हुई थी—हर सुबह एक जैसी, हर क्रिया वैसी ही। सुबह पौने पाँच बजे नींद खुलती थी, जैसे भीतर कोई घड़ी चल रही हो। सबसे पहले बिस्तर से उतरते ही काँपती उंगलियों से बचे हुए पौधों में पानी देतीं, फिर धीमे-धीमे लकड़ी की अलमारी से पूजा की थाली निकालतीं। अगरबत्ती जलातीं तो उस थोड़े से धुएँ में जैसे अपनी स्मृतियों को भी जलाने की कोशिश करतीं। फिर दूध गरम करतीं और दो कप चाय बनातीं। एक अपने लिए—और एक उस बेटे के लिए… जो अब नहीं आता।
चाय की प्याली बरामदे की रेलिंग पर रख दी जाती, जैसे कोई प्रतीक्षा अब भी बाक़ी हो। कभी कोई चिट्ठी आयेगी, कोई दरवाज़ा खटखटायेगा, कभी एक अनजान टैक्सी से उतर कर कहेगा, “माँ!”
घर में टीवी है, लेकिन उसका रिमोट अब उनकी काँपती उंगलियों से नहीं दबता। चैनल बदलने की इच्छा भी नहीं रही। वही पुराने धारावाहिक, जिनके किरदारों की तरह उनका अपना जीवन भी कहीं अटक गया है। रेडियो भी है, मगर उससे उठती आवाज़ें जैसे किसी और समय से आती हैं—एक ऐसा समय जो अब लौट कर नहीं आयेगा।
दीवार की पुरानी घड़ी हर घंटे पर आवाज़ करती है, मगर शांता देवी को लगता है जैसे वह समय को गिनती नहीं, बल्कि स्मृतियों की परतें झाड़ती है। जैसे वह समय को गिनती नहीं, बल्कि अकेलेपन की साँसें गिनती है।
रात के समय, जब बाहर सब कुछ थम जाता—घड़ी की टिक-टिक इतनी तेज हो जाती जैसे वह कमरे में अकेली नहीं, कोई अदृश्य उपस्थिति है जो हर सेकंड उनकी ओर देख रही है।
पड़ोस अब उनका नहीं रहा—वहाँ जहाँ कभी कच्ची छतों और इमली के पेड़ थे, अब तीन मंज़िला इमारतें खड़ी हैं। बच्चों की किलकारियाँ नहीं, पार्किंग की आवाज़ें हैं। कोई “शांता दी” नहीं कहता अब।
कभी-कभी सब्ज़ीवाला आते वक़्त “माँजी” कह जाता है—और बस, उसी एक शब्द में जैसे दिन भर की गर्मी, अपनापन और अस्तित्व की पुष्टि मिल जाती है। वह आवाज़ पूरे दिन उनके भीतर बनी रहती है, जैसे किसी ने उनकी उपस्थिति को पहचान लिया हो।
बरामदे के कोने में रखी कुर्सी पर बैठी शांता देवी, सामने देखती हैं—जहाँ नज़रों के आगे कुछ नहीं होता, मगर स्मृतियों की एक गहराती परछाईं होती है।
आज भी दोपहर आयी है—वैसी ही चुप, वैसी ही खाली।
पर उनके भीतर जैसे कोई बातचीत चल रही हो—बीते कल से, खोये रिश्तों से और उस बेटे से… जो अब केवल यादों में आता है।
उस दोपहर धूप कुछ ज़्यादा ही चुप थी। जैसे कमरे की हर चीज़, हर कोना—शब्दहीन संवाद में डूबा हो। शांता देवी ने धीरे से अलमारी की ऊपरी दराज़ खोली। पुराने कपड़ों, रूमालों, और कुछ बेनाम चीज़ों के नीचे दबा वह मोबाइल रखा था—वही, जिसमें आख़िरी बार राहुल की आवाज़ रिकॉर्ड हुई थी।
मोबाइल का की-पैड अब ढीला हा चुका था, स्क्रीन पर हल्की-सी दरार थी और बैटरी को चार्ज करने में बहुत धैर्य लगता था—जैसे किसी बीते रिश्ते को फिर से साँस देने की कोशिश। फिर भी, वो उसे हर हफ़्ते चार्ज करती थीं। इंतज़ार करतीं, जब तक उस धुँधली-सी स्क्रीन पर रोशनी न लौट आये।
वह मोबाइल—पुराना, धीमी साँसों वाला, जिसमें बेटे की आख़िरी आवाज़ अब भी बंद थी।
एक बार ऐसा हुआ—वह मोबाइल टेबल पर रखा था, चार्ज हो रहा था। शांता देवी ने छुआ भी नहीं था, लेकिन अचानक स्क्रीन जल उठी, और वही आवाज़ गूँजी—
“माँ, चाय पी?”
उनके हाथ काँपने लगे।
वे कुछ देर वैसे ही खड़ी रहीं, जैसे किसी भूतपूर्व क्षण ने वर्तमान को छू लिया हो।
शांता देवी हर रविवार उस मोबाइल को सहेजकर निकालतीं—बिलकुल वैसे, जैसे कोई अपनी मंदिर की घंटी छूने से पहले हाथ धोता है।
धीरे से उसकी स्क्रीन को कपड़े से साफ़ करतीं, जैसे किसी मूर्ति की आँखों से धूल हटाती हों।
फिर चार्जर लगातीं—धैर्य से, बिना किसी जल्दी के। जब तक वह हल्की-सी नीली रेखा न दिख जाये, वो वहीं बैठी रहतीं—चुप, शांत, जैसे ध्यान में।
और जब वह बटन दबता, तो एक पुरानी आवाज़ गूँजती—”माँ, खाना खा लिया? चाय पी?”
वो शब्द अब संवाद नहीं थे—वे मंत्र थे।
उनकी आँखें बंद हो जातीं, जैसे आरती के समय।
उनकी उंगलियाँ काँपती थीं, लेकिन चेहरे पर वही शांति थी जो किसी मंदिर के गर्भगृह में जाकर मिलती है।
वो कुछ नहीं बोलती थीं, जैसे जवाब देना उस अनंत की शांति को तोड़ना हो।
वह आवाज़ अब कोई सूचना नहीं, बल्कि एक स्मृति बन चुकी थी—हर हफ़्ते जलाये जाने वाले दीपक की तरह, जो बुझने से पहले एक बार फिर टिमटिमाता है।
मोबाइल अब उनके लिए उपकरण नहीं था, वह एक तीर्थ-स्थान बन गया था जहाँ वह हर सप्ताह जाती थीं बेटे की आवाज़ से मिलने, और फिर वही आवाज़ अपनी आत्मा में बसा कर लौटती थीं।
वह मोबाइल अब एक पुजारी था—जो केवल एक मंत्र जानता था: “माँ, चाय पी?”
एक रविवार, जब उन्होंने हमेशा की तरह रिकॉर्डिंग प्ले की—तो आवाज़ बदली हुई थी।
यह राहुल नहीं था।
यह उनकी खुद की धीमी आवाज़ थी—“मैं ठीक हूँ बेटा… अब अकेली नहीं हूँ…”
वो चौंक गयीं।
उन्हें याद नहीं था कि उन्होंने यह कब कहा था।
या फिर… क्या यह उनकी कल्पना थी?
उस दिन उन्हें पहली बार डर महसूस हुआ—जैसे वक़्त और आवाज़ें अब उन्हें धोखा देने लगी थीं।
टीवी घर में था तो, मगर उसकी आवाज़ उन्हें अजनबी लगती थी। अख़बार अब कभी-कभी ही आता और उसमें सिर्फ़ दो चीज़ें पढ़ती थीं—मौसम और मृत्यु की सूचनाएँ।
कई महीनों पहले उन्होंने व्हाट्सएप चलाना सीख लिया था। बहुत मेहनत से, कई बार ग़लती करके, वो अब एक-एक करके चीज़ें समझने लगी थीं। कभी भोर में गुलाब का फूल भेज देतीं किसी को, कभी अपनी डायरी से कोई कविता टाइप कर डालतीं।
“जीते रहो”, “खुश रहो” जैसे संदेश जब भी वे भेजतीं, तो लौटती थीं बस इमोजियाँ—वो भी हफ़्तों बाद।
इमोजियों में आँसू नहीं होते। उसमें माँ की बातों की गर्माहट नहीं होती। उसमें राहुल की ‘माँ’ कहने की मिठास नहीं होती।
इसलिए शांता देवी अब उत्तरों की प्रतीक्षा नहीं करतीं। उन्हें अब केवल अपनी बात कहनी होती है—चाहे कोई सुने या न सुने।
कमरे की दीवारों पर समय टिका था। और उस मोबाइल में, एक आवाज़ — जो हर बार कहती:
“माँ, दूध पी लिया?”
और जैसे, उसी एक वाक्य में उनका पूरा दिन बीत जाता।
कभी-कभी, जब पूरा घर शांत होता, तो उन्हें लगता—जैसे रसोई में कुछ गिरा हो।
शायद स्टील का गिलास?
वो धीरे-से उठतीं, जाकर देखतीं… मगर वहाँ कुछ नहीं होता।
फिर सोचतीं—“शायद यादें भी अब आवाज़ करने लगी हैं।”
कई दिनों से सब कुछ जैसे रुका हुआ था—घड़ी की सूईयाँ चलती थीं, पर समय जैसे थम गया था। बाहर की गली में बच्चों की आवाज़ें आती थीं, पर शांता देवी के दरवाज़े पर कोई नहीं आता था। वह घर अब सिर्फ़ दीवारों से नहीं, ख़ामोशी से भी घिरा था।
लेकिन फिर एक दोपहर, जैसे उस सन्नाटे में एक हल्की-सी दरार पड़ी।
दरवाज़े पर हल्की सी दस्तक हुई—टक-टक।
शांता देवी ने चौंककर रेडियो की ओर देखा, फिर दरवाज़े की ओर।
“कौन?” उन्होंने धीमे से पूछा।
बाहर से एक मासूम सी आवाज़ आई—“दादी… मेरी गेंद अंदर गिर गयी…”
दरवाज़ा खोलते ही एक रोशनी-सा चेहरा सामने था। गोरा, घुंघराले बालों वाला छोटा लड़का, जिसकी आँखों में सवाल नहीं, अपनापन था।
“अंदर आ जाओ बेटा,” उन्होंने कहा, झुककर मुस्कराते हुए।
“चाय पियोगे?”
लड़के ने सिर हिलाया, “हाँ! मेरे मम्मी-पापा ऑफिस गये हैं। मैं अकेले खेलता हूँ।”
शांता देवी हँस दीं—वो हँसी जो महीनों बाद उनके चेहरे पर लौटी थी।
“मैं भी अकेली चाय पीती हूँ।”
बस उस एक वाक्य में दो अलग-अलग अकेलेपन एक चाय में घुल गये। उस दिन पहली बार दो कप चाय सही जगह पहुँचीं।
और कमरे में बरसों से ठहरी हुई हवा एकदम से थोड़ी हल्की लगने लगी।
लड़के का नाम आर्यन था।
उस दिन के बाद वह रोज़ आने लगा। कभी गेंद के बहाने, कभी कहानी सुनने के लिए। कभी बिस्किट खाने की ज़िद लेकर, तो कभी यह कहकर कि “दादी, आपके घर की चाय मम्मी से भी अच्छी है!”
शांता देवी अब भी दो कप चाय बनाती थीं—एक अपने लिए, दूसरा आर्यन के लिए।
टीवी के रिमोट के बटन अब उनके हाथों से दबने लगे थे।
बरसों से न धोया गया वह परिंडा अब जंग खा चुका था। गौरैया तो कब की उड़ गयी थी, पर उसका एक छोटा-सा पंख अब भी जालियों में अटका था—सूखा हुआ, भूरा और लगभग अदृश्य।
शांता देवी कभी-कभी उस परिंडे को देखतीं तो सोचतीं—”क्या सब कुछ यूँ ही एक दिन रुक जाता है? एक दिन कोई उड़ जाता है… और पीछे बस जंग, धूल और प्रतीक्षा बचती है?”
बस, वहीं से सिलसिला शुरू हुआ।
हर दोपहर आर्यन आता। कभी स्कूल की कॉपी लेकर, कभी बस यूँ ही।
शांता देवी उसे गिलहरियों की कहानियाँ सुनातीं—कैसे एक बार एक गिलहरी बर्फ़ी चुराकर भागी थी। रामायण के पात्रों को वो खिलौनों की तरह सजाकर समझातीं—”ये हनुमान हैं, सबसे बहादुर। और ये सीता मैया—सबसे समझदार।”
टीवी अब मुश्किल से चलता था। रेडियो की धीमी आवाज़ में पुराने गीत फिर से घर में तैरने लगे थे।
उन्होंने फिर से स्वेटर बुनना शुरू किया—हर फंदा जैसे किसी अधूरी बात को पूरा करता हुआ।
एक दिन, बारिश की नमी खिड़की से भीतर झाँक रही थी।
आर्यन ने चाय का प्याला हाथ में लिया और कहा, “दादी, आप सच में दादी जैसी लगती हैं। मेरे पास तो बस फोन वाली दादी हैं—जो वीडियो कॉल पर आती हैं और जल्दी-जल्दी बाय कर देती हैं।”
शांता देवी ने उसकी ओर देखा—आँखों में हल्की नमी, होंठों पर वर्षों के इंतज़ार के बाद आआयी एक पूर्ण मुस्कान।
उन्होंने उसका गाल सहलाया और कहा, “तो आज से मैं तेरी असली वाली दादी—चाय वाली, कहानी सुनाने वाली और स्वेटर बुनने वाली भी।”
बाहर बारिश अब भी गिर रही थी, लेकिन उस दोपहर एक रिश्ता भीतर गहराई से भींग रहा था—चाय की भाप में, कहानियों की मिठास में, और दो अधूरी ज़िंदगियों के संपूर्ण हो जाने की ख़ामोश ख़ुशी में।
बाहर की सड़क पर ज़िंदगी एक उफनती नदी की तरह बहती थी। तेज़ बाइकें धड़धड़ाती हुई निकलतीं, लोग मोबाइल पर चीखते-चिल्लाते किसी अदृश्य गंतव्य की ओर बढ़ते जाते। किसी के चेहरे पर ठहराव नहीं था—सब जैसे किसी अदृश्य घड़ी से बँधे हुए थे।
शांता देवी खिड़की के पास रखी पुरानी कुर्सी पर बैठी थीं। वह कुर्सी भी अब चरमराने लगी थी, जैसे उसके भी घुटनों में दर्द हो गया हो। उनकी सफ़ेद साड़ी का पल्लू काँपते हाथों से थामे हुए वह बाहर झाँक रही थीं।
सड़क का यह दृश्य उन्हें अक्सर एक मूक चलचित्र जैसा लगता—जिसमें सब कुछ गति में था, आवाज़ें थीं, मगर संवेदना नहीं। वे सोचतीं—”कितने लोग हैं, मगर कितना अकेलापन है… कोई किसी की तरफ़ देखता भी नहीं। सब जैसे एक-दूसरे से मुँह छिपाकर भाग रहे हैं।”
उनका घर उस तेज़ दौड़ते समय की परछाईं से बाहर था। वही पुराना दरवाज़ा, जिस पर अब दस्तक नहीं होती। वही लकड़ी का भारी फर्नीचर, जिसके हत्थों पर अब भी उनके पति के हाथों के निशान जैसे ज़िंदा थे। अलमारी में राहुल की स्कूल की कॉपियाँ अब भी करीने से सजी थीं, आख़िरी पन्नों पर कुछ अधूरी ड्राइंग्स—घर, पेड़, और ‘माँ’ लिखे अक्षर।
कमरे के कोने में टँगी थी एक तस्वीर—उनकी शादी की। शांता और रमेश, दोनों के चेहरे पर एक मुस्कान थी, जैसी पहली बार साड़ी पहनने या घूँघट हटाने के वक़्त होती है।
वह तस्वीर अब धुँधली हो गयी थी, जैसे उसमें कैद वक़्त भी थक गया हो।
शांता सोचतीं—अब यादें रोने नहीं देतीं, आँसू नहीं निकलते। बस एक ठंडक-सी उतर आती है सीने में, जैसे रात के वक़्त ओस की चादर बिछ गयी हो।
वे उठीं, धीरे-धीरे रसोई की तरफ़ चलीं। वहाँ दो कप चाय के बर्तन रखे थे—एक अपने लिए, और एक उस आर्यन के लिए… जो अब नियमित आने लगा था।
सूरज डूबने को था। हल्की ठंडक हवाओं में घुलने लगी थी। शांता देवी ने खिड़की से बाहर देखा—सड़कें अब भी वैसी ही व्यस्त थीं, पर उनके भीतर एक अजीब-सी ख़ामोशी थी।
आर्यन आज नहीं आया।
वो छोटा लड़का, जो हर शाम गेंद लेने के बहाने आता था, फिर चाय पीते-पीते कहानियाँ सुनता था—आज गली में नहीं दिखा।
शांता देवी चुपचाप बस पकड़कर जयपुर के रेलवे स्टेशन पहुँच गयीं—वहीं, जहाँ वह अक्सर राहुल को स्टेशन से लेने आया करती थीं।
स्टेशन वही था—पर अब उसमें एक भीड़ थी जो पहले कभी नहीं दिखती थी।
लोग भाग रहे थे, मोबाइल पर चिल्ला रहे थे, पर हर चेहरा जैसे अकेलेपन में लिपटा था।
शांता देवी एक लोहे की बेंच पर बैठ गयीं।
सामने की बेंच पर एक बुज़ुर्ग थे—सफ़ेद धोती, ढीली-सी कमीज़ और हाथ में एक काग़ज़ का चाय का कप।
उन्होंने मुस्कराकर पूछा—”कोई ट्रेन से उतरना भूल गया क्या?”
शांता देवी थोड़ा मुस्कुरायीं। “नहीं… बस कुछ पुरानी आदतें हैं, जो छूटती नहीं।”
बुज़ुर्ग चाय की चुस्की लेते हुए बोले—”हम तो हर हफ्ते आते हैं यहाँ। कोई नहीं उतरता, फिर भी बैठते हैं। बीवी कहा करती थी—लोग भले छूट जाएँ, पर इंतज़ार की जगह मत छोड़ना।”
शांता देवी की आँखें गीली हो आयीं। “आपकी बीवी…?”
“पाँच साल पहले चली गयीं। पर हम दोनों स्टेशन बहुत पसंद करते थे। शाम की ट्रेन देखना, चाय पीना, लोगों को आते-जाते देखना…जैसे ज़िंदगी की कहानी है हर डिब्बे में।”
शांता देवी धीमे स्वर में बोलीं—”मेरा बेटा भी यहीं से ट्रेन पकड़ता था। अब तो फोन पर भी बात कम होती है।”
बुज़ुर्ग ने हल्के से सिर हिलाया। “अब के बच्चे वाई-फ़ाई से जुड़े हैं, रिश्तों की गर्मी से नहीं। नाम क्या है आपका?”
“शांता।”
“अरे वाह, मेरी माँ का नाम भी यही था!”
फिर हँसते हुए बोले—”मैं मोहन… मोहनलाल पारीक। पुराने डाक विभाग में काम करता था। तार भेजने का काम—’आपके बेटे ने फर्स्ट क्लास में पास किया’,
या ‘पिता का निधन हो गया है’—दोनों खबरें मेरे ही हाथ से जाती थीं।”
शांता देवी ने ध्यान से उनकी तरफ देखा। “तो आप तो… भावनाओं के डाकिये रहे होंगे?”
मोहनलाल जी मुस्कुराये—”हाँ… और अब, हम जैसे लोग धीरे-धीरे… स्मृति में रह गये हैं।”
दोनों चुप हो गये।
स्टेशन पर एक ट्रेन सीटी देकर गुज़री—तेज़, मगर उनके भीतर जैसे कुछ और धीरे-से चलने लगा।
कुछ मिनटों बाद शांता देवी उठ खड़ी हुईं।
“आज आपकी चाय ने कुछ पुराना लौटा दिया। धन्यवाद!”
“और आपकी ख़ामोशी ने भी। अगली बार फिर यहीं मिलेंगे… शायद।”
शांता देवी लौटते समय सोच रही थीं—शायद अकेलापन वह चीज़ है, जो दो अजनबियों को सबसे गहराई से जोड़ती है।
शाम की हल्की रोशनी बस की खिड़कियों से छनकर भीतर आ रही थी। शांता देवी ख़ामोश बैठी थीं, गोद में साड़ी की कोर को मरोड़ती हुईं। शहर की सड़कें पीछे छूट रही थीं, जैसे कोई पुरानी किताब धीरे-धीरे बंद हो रही हो।
तभी मोबाइल की घंटी बजी।
“राहुल कॉलिंग…”
उन्होंने कँपकँपाते हाथों से फोन उठाया।
“हैलो माँ… कैसी हो?”
कुछ पल की चुप्पी छायी रही। जैसे कई सालों की दूरी उस छोटे-से सवाल में समा गयी हो। फिर शांता देवी ने खिड़की से बाहर झाँकते हुए धीमी आवाज़ में कहा—
“अच्छी हूँ बेटा। अब अकेली नहीं हूँ। मेरे पास एक दोस्त है… जो गेंद के बहाने आता है, और कहानी के लिए रुक जाता है।”
“कौन माँ?”
राहुल की आवाज़ में जिज्ञासा थी, शायद हल्का-सा अपराधबोध भी।
शांता देवी मुस्कुरायीं।
“बस एक बच्चा। अब मुझे दादी कहता है। और मैं उसे पोता समझती हूँ।”
फोन के उस ओर कुछ पल की चुप्पी रही।
फिर राहुल ने धीरे से पूछा—”आप… खुश हो?”
शांता देवी की आँखें भींग आयीं, लेकिन उनकी आवाज़ शांत थी।
“हाँ बेटा… अब मेरी दोपहरें खाली नहीं रहीं। अब किसी के आने का इंतज़ार अच्छा लगता है।”
बस शहर के पुराने हिस्से में दाख़िल हो चुकी थी। वही टेढ़ी गलियाँ, वही खिड़कियों से झाँकते सुखाये कपड़े और वही घर… मगर अब कुछ बदला था।
दरवाज़े के पास अब एक और चप्पल रखी रहती थी —छोटी-सी, मिट्टी से सनी हुई।
रसोई में अब दो कप चाय बनती थी—एक शांता देवी के लिए, दूसरी उस बच्चे के लिए… जो रोज़ गेंद लेने आता और फिर रामायण की कहानी, या दादी की मसाले वाली चाय की ज़िद करने लगता।
टीवी चलता था, मगर अब ज़रूरत नहीं थी, मगर रेडियो पर अब “बच्चों की कहानियाँ” फिर से बजने लगी थीं।
शहर अब भी भाग रहा था।
लोग अब भी एक-दूसरे को नहीं पहचानते थे।
रेल की पटरियाँ अब भी दूर कहीं जाती थीं।
लेकिन…
एक पुराना घर अब फिर से साँस ले रहा था।
दीवारों पर नयी परछाइयाँ थीं,
और खिड़की पर परिंडा फिर से लौट आया था।
एक साँझ बिजली चली गयी। कमरे में अँधेरा है। शांता देवी एक मोमबत्ती जलाती हैं और उसकी लौ को देखती हुई पुरानी बातों में खो जाती हैं।
मोमबत्ती की लौ में उन्हें अपना बचपन दिखता है, शादी के दिन का पहला दीपक और वो पहली रात जब राहुल को उन्होंने दूध की बोतल दी थी।
धीरे-धीरे मोमबत्ती की लौ काँपती है और तभी आर्यन की आवाज़ बाहर से आती है—“दादी, मैं आ गया!”
अँधेरे में जैसे उजाले की एक दरार खुलती है।
उस दिन जब आर्यन आया और बोला—”दादी, आज कौन-सी कहानी सुनाओगी?”
तो शांता देवी ने खिड़की से बाहर देखा।
धूप कुछ कोमल थी। और… वहीं उस पुराने परिंडे में कुछ फड़फड़ाया।
एक नई गौरैया आकर बैठी थी।
उसके पंख चमकते थे और आँखें उत्सुक थीं—जैसे जानना चाहती हो कि यह घर किसका है।
शांता देवी की आँखें भर आयीं।
उन्हें लगा, जैसे वक़्त ने फिर करवट ली हो। परिंडा अब खाली नहीं था—उसमें जीवन था, चहक थी… और एक नयी सुबह का वादा।
रेलवे स्टेशन की उस बेंच पर, जहाँ कभी दो अकेले लोग बैठे थे—अब वे थोड़ा मुस्कुराते थे।
एक चाय पीता था, दूसरा बिस्कुट बाँटकर खाता था।
और उस दिन…
शांता देवी के मोबाइल में पहली बार राहुल ने कहा—
“माँ…”
कुछ सेकंड की चुप्पी रही।
“उस बच्चे से कहना… अगली बार मैं भी कहानी सुनने आऊँगा।”
संपर्क : 9351159540







कहानी मार्मिक है और बदलते समय की तस्वीर को प्रस्तुत करती है.बच्चे वाई फाई से जुड़े हुए हैं,रिश्ते से नहीं. आज की हकीकत यही है.मनुष्य को मनुष्य की आवश्यकता सदैव बनी रहेगी.
दिल को घर कर गई ये कहानी 🙏❤️🙏
बढ़िया कहानी 🌹🌹
सामयिक कहानी। घरों में रहते अकेले वृद्ध होते माता पिता की कहानी।
आपने बदलते समय और रिश्तों में बढ़ती दूरियों को बहुत ही सुंदर ढंग से उकेरा है। आपने शांता देवी के घर का जो चित्र उकेरा है, वह बहुत ही सुंदर और सटीक है। गौरैया विलुप्त होने के कगार पर है, उनकी स्थिति को दर्ज करना कबीले तारीफ है। अकेलापन व्यक्ति को अन्दर से खोखला कर देता है, उसके अंदर कुछ नया करने की इच्छा ही नहीं होती है। यही इस कहानी में भी है, बच्चे के आने का बाद शांता देवी में जीने की इच्छा जाग जाती है, उनमें फिर से शक्ति का प्रवाह होने लगता है।
कहानी बहुत मार्मिक है, कहानी पढ़ कर भाव विभोर हो गया।
आपने बदलते समय और रिश्तों में बढ़ती दूरियों को बहुत ही सुंदर ढंग से उकेरा है। आपने शांता देवी के घर का जो चित्र उकेरा है, वह बहुत ही सुंदर और सटीक है। गौरैया विलुप्त होने के कगार पर है, उनकी स्थिति को दर्ज करना कबीले तारीफ है। अकेलापन व्यक्ति को अन्दर से खोखला कर देता है, उसके अंदर कुछ नया करने की इच्छा ही नहीं होती है। यही इस कहानी में भी है, बच्चे के आने का बाद शांता देवी में जीने की इच्छा जाग जाती है, उनमें फिर से शक्ति का प्रवाह होने लगता है।
कहानी पढ़ कर भाव विभोर हो गया।
अतीत और वर्तमान की जुगलबंदी की बेहतरीन कहानी। संतप्त जिंदगी में उम्मीद का ऐसा प्रवेश भविष्य को मरने नहीं देने जैसा है। तथाकथित आधुनिकता और तकनीकी दुनिया के सच को यह कहानी उघाड़ती तो है ही, मनुष्यता का संरक्षण भी करती है।
बुजुर्ग जीवन के अकेलेपन की मार्मिक दास्तां है यह कहानी।
मार्मिक और बहुत अच्छी कहानी।
क्या वृद्धावस्था और क्या युवावस्था…सब स्मृतियों के सहारे बीतता है।
कथाकार श्री ज्ञानचंद जी को बधाई।
मौजू विषय पर शानदार और भावप्रवण प्रस्तुति, आज की युवा पीढ़ी के व्यामोह को तोड़ती मर्मस्पर्शी रचना, बहुत बधाई 🙏
मौजू विषय पर शानदार और भावप्रवण प्रस्तुति, आज की युवा पीढ़ी के व्यामोह को तोड़ती मर्मस्पर्शी रचना, बहुत बधाई 🙏
आपका गद्य बहाते हुए ले चलता है। बांधता नहीं बल्कि यादों के टुकड़ों के बीच से जीवन की ओर ले जाता है। बहुत अच्छी ,उदास करने वाली मगर फिर चमक उठने वाली कहानी।
शानदार और बेहतरीन कहानी है। समाज की भौतिकवादी सोच रिश्तों की दूरी बढ़ा रही है, हमारे पास धन है लेकिन मन नहीं है। घर के अकेलापन में दिन महीनों के बराबर लगते हैं। वृद्धावस्था में अपनों से दूरी मन को अशांत बना देती है। सोशल नेटवर्किंग के रिश्तों में वो कसक नहीं है, जो मन में जगह बना ली। सोशल नेटवर्किंग के रिश्तों में केवल बनावटीपन है कि हमें कोई ऐसा बोले कि आप अपने वृद्धजनों का ख्याल नहीं रखते।
“मेरे पास तो बस फोन वाली दादी हैं—जो वीडियो कॉल पर आती हैं और जल्दी-जल्दी बाय कर देती हैं।” यह वाक्य अपने आप में इस कहानी के अंदर प्रतिकथा की तरह गूंज जाता है। बढ़िया कहानी।
कहानी मार्मिकता लिए हुए है। मां के अथाह प्रेम की, अलगाव की सुंदर अभिव्यक्ति है। वात्सल्य की खोज, जो बच्चे से पूर्ण होती नजर आती है। जबरदस्त देशकाल वातावरण। कहानी प्रासंगिकता लिए हुए और अंत तक जिज्ञासा का भाव लिए हुए आगे बढ़ी।
इस रचना के लिए आपको ढेरों शुभकामनाएं जी।
आपका
डॉ एस कश्मीरी
उम्र के दिसम्बर में अकेलेपन की सुन्दर व्यथा कथा. सूना, पुराना घर, बेटे की आवाज को तरसते कान, आर्यन, चाय, रेलवे स्टेशन, दूसरा अजनबी…. सब कुछ सलीके से उकेरा गया है. मानव मन की गहराई से पड़ताल करती मनस्पर्शी कहानी.
बधाई.
सहज, सरल, सुंदर लेकिन बेहद ज़रूरी कहानी। आपको बहुत बधाई और शुभकामनाएँ बागड़ी जी। कहानी पढ़वाने के लिए नया पथ का आभार🌻
भावनाओं को सहेजती एक उम्दा कहानी। वर्तमान समय के डिजिटल होते रिश्ते,एक नजदीकी रिश्तों में पसरती दूरी सभी को खूबसूरती से बयां किया गया है। शांता और आर्यन का वह एक दूसरे का पूरक बनना नई राह दिखाता है।
मार्मिक कहानी।
उम्र के आखरी पड़ाव का खालीपन।
प्रिय मित्र,
आपकी लिखी कहानी “एक ख़ाली दोपहर” को पढ़ते हुए ऐसा लगा जैसे मैंने उस दोपहर को खुद जिया हो। आपकी लेखनी बेहद संवेदनशील, चित्रात्मक और मन के भावों को छू लेने वाली है।
आपने बहुत सरल लेकिन प्रभावशाली शब्दों के माध्यम से अकेलेपन, स्मृतियों और आत्ममंथन को जिस तरह से पिरोया है, वह वास्तव में सराहनीय है।
कहानी का प्रवाह बहुत सहज है और पाठक को एक अनकहे एहसास की दुनिया में ले जाता है। इस तरह की लेखनी पढ़ना एक शांति देने वाला अनुभव होता है।
मेरी शुभकामनाएं हैं कि आप आगे भी इसी तरह अपनी भावनाओं को शब्दों में ढालते रहें। आपके लेखन में नयापन और गहराई दोनों है।
सादर,
किशोर कुमार
प्रिय मित्र,
आपकी कहानी ने सचमुच मन को छू लिया। शब्दों में छुपा सूनापन, बीते पलों की झलक और आत्ममंथन का भाव बहुत सहजता से उभरा है। कहानी धीमे-धीमे मन में उतरती है — जैसे दोपहर की नीरवता, जो बाहर से ख़ाली पर भीतर से बहुत गहराई लिए होती है। आपकी लेखनी में ठहराव और भावनात्मक गहराई है, जो कहानी को विशेष बनाती है।
हार्दिक शुभकामनाएँ – इसी तरह लिखते रहिए।
Bilkul sajag Hakikat kahani
भावुक कर देने वाली कहानी।
कहानीकार ने जो पक्ष चुना है उसका निर्वाह ठीक से हुआ है।
यह कहानी अलियनेशन की अवधारणा का विस्तार करती अगर बेटे (राहुल) का पक्ष, उसकी जटिल जीवन स्थितियाँ भी समुचित जगह पातीं।
उसे स्वार्थी पुत्र के रूप में कहानीकार प्रस्तुत नहीं करना चाहता।
संदेहपूरित समय में आर्यन का नियमित घर आना, चाय पीना आसानी से स्वीकार नहीं होगा। उसके माता-पिता इतने असम्पृक्त कैसे रह सकते हैं! इस मकान के पड़ोस में शायद कोई नहीं रहता।
पक्षियों का कलरव शांतादेवी के अकेलेपन को तोड़ने की कोशिश में लगा रहता है।
एक खाली दोपहर कहानी में जो खाली विशेषण आया है वहीं यहां कहानी की अंतर्वस्तु बन गया है यद्यपि कहानीकार इसकी वजूहात की तरफ़ इतना ही इशारा करता है कि देश के उन मध्यवर्गीय परिवारों का समय बदल गया है या कहें कि खाली हो गया है जहां पूंजी से वह भर गया है किन्तु रिश्तों में खाली हो गया है। प्रेमचंद के ज़माने में अभावों से उत्पन्न तनावों की कहानियां रची जाती थी किन्तु वर्तमान में उस खालीपन की कहानी कही जा रही है जिसमें अभाव नहीं अकेलापन है जो संबंधहीनता का संकट पैदा कर रहा है। ज़िंदगी में संबंध खत्म इसलिए हो रहे हैं कि सहकार खत्म हो रहा है। संबंधों का निर्माण सहकार से होता है जिसके लिए साथ साथ रहना जरूरी होता है लेकिन यह समय उन लोगों का नहीं है जो सहकार के लिए जीते मरते हैं।यही कारण है कि वैधव्य भोगती वृद्धा शांता,बेटे के होते हुए अलगाव के तनावों में जैसे तैसे जीती है। हमारे वर्तमान ने हमारे पड़ोस के उन रिश्तों को भी बदलते हुए खालीपन से भर दिया है जो कभी पड़ोस के सहकार धर्म का निर्वाह करते रहने के लिए जाने जाते थे। लेकिन यह एक ऐसे समृद्ध होते समय खालीपन है जो मनुष्यता के खालीपन की व्यंजना करता है। आदमी के पास सब कुछ है और कुछ भी नहीं है।केवल स्मृतियां हैं जिनको टटोल टटोलकर वह अपने होने और जीने की जुगत भिड़ाता है लेकिन कहानी का अंत खालीपन को उन्हें पुराने औजारों से भरता है जो जीवन को किसी पड़ोसी बच्चे या उन स्मृतियों तक ले जाते हैं जहां वे स्मृतियों के साथ जीवन की धड़कनें सुन पाते हैं।
कहानी की गद्य भाषा को स्मृतियों के रूपकों से कहानीकार ने तरल बनाए रखने का सफ़ल प्रयास किया है।रमणीयता का भाव कहानी को आदि से अंत तक पठनीय बनाये रखता है। कहानीकार को हार्दिक बधाई