‘चूल्हे की आग सिर्फ़ लकड़ियों से नहीं जली / हर उम्र की लड़कियों ने अपनी हड्डियाँ तक झोंकी हैं’–इस बार कंचन सिंह की कविताएँ। ‘वागर्थ’, ‘कृति बहुमत’ आदि पत्रिकाओं में उनकी कविताएँ पहले छपकर प्रशंसित हो चुकी हैं।

मेरी पहचान अलग से दर्ज की जाये
तुम किसकी बेटी हो? किसकी बहन हो ?
किसकी पत्नी हो या कि
किसकी माँ हो?
हमसे हमेशा ऐसे ही सवाल पूछे गये
हमारा होना किसी और के होने से तय हुआ
हमारा नाम हमारी पहचान के लिए
नाकाफ़ी रहा
बचपन को संस्कारों में ढाला गया
हमारी हँसी को रोका गया
उठने, बैठने, चलने सब पर
टोका गया
हमारी पूरी देह पर नियम चस्पा कर दिये गये
और आत्मा पर सिलवटें पड़ती रहीं
जिसकी परवाह किसी को नहीं थी
लेकिन मैं ज़ोर से कहना चाहती हूँ
कि मैं उस मिट्टी से बनी हूँ जो सिर्फ़ बर्तन नहीं बनती
आग भी सहती है
मैंने जितना जीवन जिया है
अपने ज़ख़्मों को ख़ुद ही सिया है
मेरी पहचान
अलग से दर्ज की जाये
मैं किसी की परछाईं नहीं हूँ
अपनी राख से मैं उठकर यहाँ तक आयी हूँ !
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अपनी राख से जन्म लेकर आयी स्त्री
परंपराओं की आँच में उसे युगों से जलाया गया
वह किसी पुरुष के वीर्य से नहीं जन्मी
अपनी राख से उठकर आयी है
वह स्त्री अक्सर ऐसा कहती रहती है
वर्षों से जलती रही है वह उस रसोई में जहाँ
उसकी भूख कभी गिनी ही नहीं जाती थी
उसके सपनों की आँच से ही रोटियाँ पकती थीं
और सपनों की राख
किसी को दिखायी नहीं देती थी
उसे जानने वाले जानते हैं
उसे मानने वाले मानते हैं
कि वह ऐसी स्त्री है जो अपनी राख से उठकर आयी है
कि अग्नि भी उसे नहीं जला सकती है बल्कि पुनः रचती है
उस राख से उठती हैं वह नये अर्थों में
एक नयी पहचान के साथ
गूँजती है नये स्वर में
वह चलती है अपना रास्ता बनाते हुए
वह लिखती हैं अपनी यात्राओं के अनंत अँधेरे
और उसके शब्दों से इतिहास की आँखे चौंधियाँ जाती हैं
अब वह चुप नहीं रहती उसकी चुप्पी भी
आवाज़ बन चुकी है!
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आँच
चूल्हे की आग सिर्फ़ लकड़ियों से नहीं जली
हर उम्र की लड़कियों ने अपनी हड्डियाँ तक झोंकी हैं
ईंधन की तरह
और जलती रही हैं सिर्फ़ रोटियाँ नहीं
सपनों के साथ हम भी
जरा-सी ‘ग़लतियों’ के साथ
लेकिन अब हमारे सपनों से भी लपटें उठती हैं
संकोच, संस्कार और समझदारी की राख से
बुझाना अब संभव नहीं है
नीला आकाश हमारे लिए सिर्फ़ सपना नहीं रहा
दूर, असंभव, हथेलियों से फिसलता हुआ
अगर उसे हम छूते हैं
तो क्या हुआ जो
‘मर्यादा’ की धरती दरकने लगे
हमारी उड़ान से असंतुलित होने लगे व्यवस्था
हमें सूरज चाहिए
हमारी हड्डियों में सुलगती है आग
अपनी ही आग में जलने के बजाय
अपने भीतर की आग से अब रोटी नहीं पकानी
अपनी आँच से पिघलाने हैं सदियों पुराने अन्याय के बर्तन
जिनमें हमें हमेशा ढाला गया है
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नाखून
नाखून
रोज़ घिसते हैं
और यह देह भी घिसती है
प्रतिदिन समय की खुरदरी सतह पर
नाखूनों के कोरों में
फँसी रहती है ज़िन्दगी जैसे फाँस
चाहे जितना भी जतन करो कसक बची रहती है
हमारे नाखूनों पर लगा रंग फैशन नहीं है
यह हमारे घिसे हुए सपनों की
एक पतली-सी परत है
हर पॉलिश के नीचे एक अधूरी चीख़ होती है
हर चमक के पीछे एक घुप्प अँधेरा
हर मुस्कराहट के पीछे
किसी देह से रगड़ खाई थकान होती है
हम अपने नाखून काटते हैं
जैसे अपने भीतर उग आये क्रोध
प्रतिकार और दुख को सभ्यता में ढाल रहे हों
लेकिन ये नाखून फिर उग आते हैं
चुपचाप बिना पूछे
ठीक उसी तरह
जैसे हम हर सुबह फिर से जीना शुरू करते हैं
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आलपीन
कपड़ों की सलवटों को तो आलपीन थाम सकती है
लेकिन मन की सलवटों को कौन थामेगा ?
इस असुरक्षित समय में
जब कोई स्त्री आलपीन लगाती है
तो वह सिर्फ़ साड़ी के पल्लू को नहीं कस रही होती है
अपनी देह को भी अपने भीतर टाँक रही होती है
किसी अदृश्य भय के धागे से
उँगलियाँ अभ्यस्त हो गयी हैं लेकिन फिर भी
एक चुभन बनी रहती है कहीं
एक स्मृति की तरह
एक घाव की तरह
कहा जाता है कि
आलपीन एक ऐसा यंत्र है
जो संस्कृति को
हमारी देह से फिसलने नहीं देता
लेकिन इन सलवटों के भीतर
आलपीन ने थाम रखे हैं संस्कार, संस्कृति, डर
और पुरुष समाज के गिरते हुए हर चरित्र को
पता नहीं
समाज की सलवटों और गिरते चरित्र के लिए
कोई आलपीन कब बनेगी !
kanchansinghckt123@gmail.com
मो – 7307426448







कविताआओं में नयी उपमाएं हैं । सत्य कविताएं। बधाई
मनीषा जैन
अच्छी कविताएं बस भावों का दोहराव बहुत ज्यादा है। लगभग एक ही सी आँच पर पकती हुई कविता है म
ये कविताएं कवयित्री के फेसबुक पर पढ़ी हैं। एकसाथ पढ़ने से अलग भाव मिलते हैं। सभी कविताएं स्त्री केंद्रित हैं और स्त्री की भावनाओं को व्यक्त करती हैं।
कवयित्री को बधाई और शुभकामनाएं।