ये एक सुंदर दुनिया की चाहत में लिखी गयी कविताएँ हैं, जहाँ गाज़ा की गलियों में बसंत का हाथ पकड़कर वापस लौटते बच्चे की तस्वीर है, और उन लोगों की निशानदेही की माँग भी जिन्होंने सड़कें लाल तो कीं मगर फूलों से नहीं! चाहत अन्वी की कविताएँ हिन्दी की सभी प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में शाया हो चुकी हैं। वे अभी हिन्दी विभाग, दक्षिण बिहार केन्द्रीय विश्वविद्यालय, गया में शोधार्थी हैं।

1.
लोहे की चिड़िया
उसने पूछा
गेंदे क्यों उछलती हैं?
-क्योंकि पृथ्वी को उनके ठप्पों के स्पर्श से होती है गुदगुदी
भूख क्यों लगती है बार-बार?
-बर्तनों को पसंद है अनाज का संगीत
माँएँ क्यों हमें छिपाती हैं बार-बार?
-माँओं को प्रिय छुपा-छुपी का खेल
तो बताओ आकाश में कब देखी थी सिनीरिस ओसिया?
आखिर कब टूटेंगे उनके लोहे की चिड़ियों के
पंख? कब!
(सिनीरिस ओसिया: फिलिस्तीन का पक्षी है जिसे प्रतिरोध के प्रतीक के रूप में देखा जाता है)
2.
घर की ओर
एक मछुवारे ने कभी बताया था दिशा ज्ञान से रहित
रेत में दबे-थके नवजात कछुवे
सदियों से लौटते आए हैं घर की ओर
पक्षी तो अनिवार्यतः लौटते हैं हर शाम अपनी दिशाओं की तरफ़
कभी-कभी जंगल में भटके शिकारी भी अपने पदचिह्नों के
पीछे-पीछे लौट आते हैं वापस
और मेरी माँ की कहानी का हर थका-हारा किरदार तो हमेशा ही घर लौटता था
तुम्हें याद है कि एक कवि जाते-जाते कह गया था
कि तुम बसंत को आने से नहीं रोक सकते
गौर से देखो
बंदूकों को ठेंगा दिखाते हुए आज गाज़ा की गलियों में
वो बच्चा बसंत का हाथ पकड़े हुए
वापस घर लौट रहा है |
3.
जब गिरने की क्रिया अच्छी लगती थी
सुर्ख लाल फूल जब सड़कों पर गिरते थे
तो सलेटी सड़कें
थोड़ी लाल हो जाती थीं
आम के पेड़ों ने तो वैशाख में इतने टिकोले गिराए कि काले सिलबट्टे
हल्के हरे से हो गए
लेकिन जब हवाएँ फूलों की सखियाँ बन जाती थीं
और शाखें उनके पक्के दोस्त
तो हम उन्हें हौले से झाड़ कर गिरा देते थे
कौन हैं वो लोग जिन्होंने वहाँ सड़कें लाल तो कीं
मगर फूलों से नहीं?
जिनकी दोस्ती कभी शजर और हवाओं से नहीं हुई
वे गिरे तो बस गिरते चले गए
काश, वे समझ पाते मनुष्यता के गिरने से पहले
गिरना भी एक सुन्दर क्रिया हुआ करती थी!
और दुनिया में कितनी ही ऐसी चीज़ें थीं
जिनके गिरने से धरती कभी सुन्दर हो जाया करती थी।
4.
डर
पौधों को जल्दी नहीं थी
फूल आहिस्ता-आहिस्ता उन पर खिलते
फिर झुकते
और अन्त में हौले से अलविदा कह चले जाते
क्योंकि वे पौधे नहीं थे
और वे जानते थे उनकी बंदूकें कभी खिल नहीं सकती थी
इसलिए वे फूलों से डरते थे
5.
आकृतियाँ
वे दो छोटे-छोटे पंजों और दस अँगुलियों को जोड़कर
कितनी ही नाचतीं मछलियाँ बनाते
फिर उन्हें धीरे से पानी में उतारते
और नदियों के गर्भ मछलियों से भर जाते
दो पंजों को अर्द्ध आकार देकर उन्होंने
आकाश के छोर को थोड़ा नीचे झुकाया और
चिड़ियाँ की उड़ान की डोर से उन्हें बाँध दिया
थोड़े से प्रकाश और अँधकार से
उनकी अँगुलियाँ कुछ भी बन सकती थीं
दीवारों पर कभी खरगोश छुपते कभी गिलहरियाँ हँसती
या कभी-कभी हिरनें भागती मिलतीं
काश कि तुम्हारी शुष्क हथेलियों ने कभी
चखा होता
अँधेरे को उजाले में बदलने का स्वाद!
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व्यापक दृष्टि एवं गहरी भावनाओं को समेटे हुए कविताएँ।