हिंदी कहानी की विकास-यात्रा (2000-2025) : एक मसौदा / संजीव कुमार


इसे सचमुच लेख नहीं, मसौदा ही समझिए! मसौदे को सुझावों-संशोधनों के लिए सार्वजनिक किया जाता है। यहाँ भी उद्देश्य वही है। पहले गंभीर सेमिनारों में प्रस्तुति पर सवाल-जवाब और सुझावों का सिलसिला चलता था। उससे आलेख को अंतिम रूप देने में मदद मिलती थी। अब वह नदारद है तो ‘नया पथ’ ही ऐसा मंच बने, क्या बुरा है!–सं. कु.

जैसा कि किसी भी दौर के साहित्यिक उत्पादन में होता है, सन दो हजार के बाद की हिंदी कहानी में भी कई पीढ़ियों के कथाकारों का योगदान है। पहले से लिख रहे अनेक कहानीकारों के बारे में तो यह कहा जा सकता है कि कहानी के क्षेत्र में उनका उल्लेखनीय योगदान पिछली सदी में ही सामने आ चुका था जिसमें उन्होंने पिछले 25 सालों में कुछ विशेष जोड़ा नहीं। अमरकांत, शेखर जोशी, कृष्णा सोबती, कृष्ण बलदेव वैद, दूधनाथ सिंह, काशीनाथ सिंह, रवींद्र कालिया, गोविंद मिश्र, ममता कालिया, नमिता सिंह, मैत्रयी पुष्पा, मृदुला गर्ग, मंज़ूर एहतेशाम, स्वयं प्रकाश, अब्दुल बिस्मिल्लाह जैसे वरिष्ठ रचनाकारों को कम-से-कम कहानी विधा के मामले में हम इस श्रेणी में रख सकते हैं। लेकिन अनेक कहानीकार ऐसे हैं जिनकी महत्त्वपूर्ण कहानियाँ पिछली सदी और वर्तमान सदी, दोनों में बँटी हुई हैं। उदय प्रकाश, असग़र वजाहत, संजीव, शिवमूर्ति, ओम प्रकाश वाल्मीकि, अरुण प्रकाश, प्रियंवद, देवेन्द्र, मनोज रूपड़ा, योगेंद्र आहूजा, महेश कटारे, गीतांजलि श्री, सुधा अरोड़ा, अलका सरावगी, नासिरा शर्मा, सारा राय, मधु काँकरिया, अखिलेश, जयनन्दन, महेश दर्पण, अवधेश प्रीत, कैलाश बनवासी, गौरीनाथ, एस आर हरनोट, प्रह्लाद चंद्र दास, संजय सहाय, हृषिकेश सुलभ, आनंद हर्षुल, श्योराज सिंह बेचैन, चरण सिंह पथिक, हरी चरण प्रकाश, जयप्रकाश कर्दम, मोहनदास नैमिशराय, भालचंद्र जोशी, शैलेन्द्र सागर, हरियश राय, शंकर, उर्मिला शिरीष, हीरालाल नागर इत्यादि इसी श्रेणी में शामिल हैं। फिर एक बड़ी संख्या उन कहानीकारों की है जिन्होंने इसी सदी में लिखना शुरू किया, या अगर दो-चार साल पहले शुरू कर भी दिया था तो उनका उल्लेखनीय लेखन इसी सदी में सामने आया जिससे उनकी पहचान बननी शुरू हुई। इनमें शामिल हैं: पंकज मित्र, अनिल यादव, वंदना राग, किरण सिंह, नीलाक्षी सिंह, मनीषा कुलश्रेष्ठ, अल्पना मिश्र, कविता, गीता श्री, अंजली देशपांडे, संजय कुंदन, प्रभात रंजन, राकेश मिश्र, कुणाल सिंह, चंदन पांडेय, मनोज कुमार पांडेय, शशिभूषण द्विवेदी, उमाशंकर चौधरी, प्रवीण कुमार, अजय नावरिया, तरुण भटनागर, विमल चंद्र पांडेय, गौरव सोलंकी, मोहम्मद आरिफ़, पंकज सुबीर, दीपक श्रीवास्तव, रवि बुले, गीत चतुर्वेदी, कबीर संजय, राकेश बिहारी, आशुतोष, सत्यनारायण पटेल, अरुण कुमार असफल, दिनेश कर्नाटक, सूर्यनाथ सिंह, राकेश तिवारी, विपिन कुमार शर्मा, मनोज कुलकर्णी, सुभाष चंद्र कुशवाहा, ओमा शर्मा, संदीप मील, विवेक मिश्र, अनुज, राजीव कुमार, शिवेन्द्र, मिथिलेश प्रियदर्शी, विमलेश त्रिपाठी, मनीष वैद्य, रवींद्र आरोही, राकेश दुबे, प्रेम रंजन अनिमेष, अनघ शर्मा, वैभव सिंह, आकांक्षा पारे, पंखुरी सिन्हा, जयश्री रॉय, योगिता यादव, सोनी पांडेय, उपासना, प्रज्ञा, इंदिरा दांगी, ज्योति कुमारी, अंजू शर्मा, हुस्न तबस्सुम निहाँ, वंदना शुक्ल, रश्मि शर्मा, श्रद्धा थवाइत, प्रकृति किरगेती, समीना ख़ान, कैफ़ी हाशमी, आदित्य, शहादत इत्यादि। इनमें से अनेक कहानीकार ‘हंस’, ‘कथादेश’, ‘वागर्थ’, ‘नया ज्ञानोदय’, ‘प्रगतिशील वसुधा’, ‘परिकथा’ और आगे चलकर ‘वनमाली कथा’ जैसी पत्रिकाओं के युवा रचनाशीलता और नवलेखन पर केंद्रित विशेषांकों या स्तंभों के माध्यम से सामने आये/पहचाने गये।

कहानीकारों की इस बड़ी संख्या और उनके विपुल लेखन को सामने रखने पर शिल्प-संरचना तथा विषय-वस्तु के स्तर पर इतना वैविध्य दिखता है कि कुछ सर्वसामान्य प्रवृत्तिगत विशेषताएँ चिह्नित कर पाना बहुत मुश्किल है। लेकिन अगर हम निरन्तरता में बहुत पीछे से चली आती प्रवृत्तियों को छोड़कर सिर्फ़ नयी या अपेक्षाकृत नयी प्रवृत्तियों तक ही अपने को सीमित रखें, तो यह हमारे साहित्यिक समय को बेहतर परिभाषित कर पायेगा। होता यह है कि किसी भी समय शिल्प-संरचना तथा विषय-वस्तु के स्तर पर बदलाव कुल साहित्यिक उत्पादन के एक हिस्से में ही घटित होता है, शेष हिस्से पहले से बनी हुई लीक पर चलते जाते हैं (यहाँ ‘लीक पर चलने’ का मतलब गुणवत्ता की दृष्टि से कमतर होना नहीं है)। साहित्येतिहासिक अध्ययन का लक्ष्य इसी बदलाव का रेखांकन होना चाहिए, भले ही उस दौर की रचनाशीलता में उन बदलावों से अप्रभावित उदाहरण भी बड़ी संख्या में दिखें। 

इक्कीसवीं सदी के इन आरंभिक दशकों की हिंदी कहानी में जो नयी प्रवृत्तिगत विशेषताएँ मिलती हैं, उनकी शुरुआत पिछले सदी के आख़िरी दशक से ही चिह्नित की जा सकती है। इस दृष्टि से यह कहना ग़लत न होगा कि कहानी की विधा में पिछली सदी के आख़िरी दशक से जिस दौर की शुरुआत हुई, वह अभी जारी है।

वस्तुतः पिछली सदी का आख़िरी दशक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर युगांतरकारी समय था। 1991 में सोवियत संघ के पतन और एकध्रुवीय विश्व-व्यवस्था के आग़ाज़ के साथ एक नये युग की शुरुआत हुई, जिसे ध्यान में रखते हुए ब्रिटिश इतिहासकार एरिक हॉब्सबॉम ने 1991 में ही बीसवीं सदी का अंत माना था, जो उनकी दृष्टि में फ्रांसीसी राज्यक्रांति (1789) से शुरू होकर प्रथम विश्वयुद्ध की पूर्वसन्ध्या (1914) तक चलनेवाली ‘लॉन्ग नाइन्टीन्थ सेन्चरी’ के मुक़ाबले प्रथम विश्वयुद्ध से शुरू होकर सोवियत संघ के विघटन तक चलने वाली एक छोटी सदी थी (द एज ऑफ़ इक्स्ट्रीम्स : द शॉर्ट ट्वेंटीएथ सेन्चरी, 1914-1991)। 90 के दशक की यह शुरुआत भारतीय समाज, राजनीति और अर्थनीति के लिए भी, न सिर्फ़ नयी विश्व-व्यवस्था के साथ तालमेल बिठाने के मामले में बल्कि घरेलू स्तर पर भी, बहुत दूरगामी महत्त्व की थी। कुछ साल पहले से सूचना और संचार के क्षेत्र में एक बड़े बदलाव का आग़ाज़ हो गया था। उसी समय नियंत्रित अर्थव्यवस्था को बाज़ार के हक़ में खोलने की शुरुआत भी हो गयी थी जिसकी तार्किक परिणति के रूप में 1991 में भुगतान-संतुलन-संकट से निपटने के नाम पर उदारीकरण-निजीकरण-भूमंडलीकरण की नीति को तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव और वित्तमंत्री मनमोहन सिंह के नेतृत्व में शासकीय स्तर पर क्रियान्वित किया गया। भारतीय राजनीति में सांप्रदायिकता का गहरा असर इन्हीं सालों में दिखना शुरू हुआ जो 1992 के दिसम्बर महीने में बाबरी मस्जिद विध्वंस के साथ एक नयी ऊँचाई पर पहुँचा।

सूचना-संचार-क्रांति, मुक्त बाज़ार, और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण—पिछली सदी की आख़िरी दहाई में उभरे इन्हीं रुझानों का, अनेक परिणामों से संयुक्त बेहद परिपक्व रूप इक्कीसवीं सदी के आरंभिक ढाई दशकों में दिखता है।

यह समय के साथ साहित्य के कुछ ज़्यादा ही बेहतर तालमेल का नमूना प्रतीत होता है कि हिंदी कहानी में भी 90 के दशक में उभरी नयी प्रवृत्तिगत विशेषताएँ बाद में अधिक विस्तार और परिपक्वता हासिल करती देखी जा सकती हैं। उनका संबंध शिल्प-संरचना और विषय-वस्तु, दोनों से है। पहले हम शिल्प-संरचना-संबंधी नये रुझानों की बात करें और अपने समय के ऐतिहासिक उद्विकासों में उनकी जड़ें तलाशने की कोशिश करें, उसके बाद विषयवस्तुगत रुझानों की चर्चा करेंगे।

 

शिल्प-संरचना-संबंधी रुझान

90 के दशक में हिंदी कहानी में एक महत्त्वपूर्ण संरचनात्मक बदलाव कथा के नाभिक या परिणति-पक्ष और उत्प्रेरक या प्रक्रिया-पक्ष के अनुपात में आया। यह ध्यान रखें कि ‘कहानी’ एक विधा है जबकि ‘कथा’ उस विधा का कच्चा माल। उसमें कहानी के लिए आधार सामग्री का काम करती, निश्चित परिवेश और पात्रों के बीच घटित होती, एक सार्थक घटना-शृंखला आती है जिसमें स्पष्ट शुरुआत और अंत हो। इसे हम दो हिस्सों में बाँट सकते हैं: (1) किसी अंतिम नतीजे की ओर जाता स्थूल घटना-विकास; इसे हम परिणति-पक्ष कह सकते हैं और इसे ही हम कथा-सार के रूप में जानते/बताते हैं; (2) स्थूल घटना-विकास के बीच का विस्तार; इसे हम प्रक्रिया-पक्ष कह सकते हैं और कथा-सार बताते हुए हम इसे सामान्यतः छोड़ देते हैं। रोलां बार्थ ने इन्हें क्रमशः न्यूक्लिआई (नाभिक) और कैटेलाइज़र (उत्प्रेरक) कहा है। पहले में कथा की संघटक घटनाएँ (कॉन्सटीटुएन्ट इवेंट्स) आती हैं, दूसरे में पूरक घटनाएँ (कॉम्पलेमेन्टरी इवेंट्स)।  दोनों के मिलने से ‘कथा’ बनती है, और यह कथा ही तमाम तरह की युक्तियों, शैली-शिल्पगत रूढ़ियों और नवाचारों से संयुक्त होकर ‘कहानी’ का रूप ग्रहण करती है।

इक्कीसवीं सदी की हिंदी कहानी में परिणति-पक्ष के मुक़ाबले प्रक्रिया-पक्ष के महत्त्व और आकार की बढ़त एक उल्लेखनीय संरचनात्मक परिवर्तन है। यह परिवर्तन पिछली सदी के आखिरी दशक से ही कहानी में प्रकट होने लगा था और नई सदी में इसका प्रभाव अधिक व्यापक हुआ। 90 के दशक में प्रकाशित ‘और अंत में प्रार्थना’ और ‘पाल गोमरा का स्कूटर’ (उदय प्रकाश), ‘साज़-नासाज़’ (मनोज रूपड़ा), ‘ग़लत’ (योगेंद्र आहूजा), ‘नालंदा पर गिद्ध’ (देवेन्द्र) जैसी कहानियों में इसे देखा जा सकता है। 1998 में ‘कथादेश’ में छपी ‘नालंदा पर गिद्ध’, जो संकलन के प्रकाशन-वर्ष की दृष्टि से सन 2000 के बाद की कहानी ठहरती है, के उदाहरण से इसे समझ सकते हैं। कहानी में एक विश्वविद्यालय परिसर के जातिवाद, छल-प्रपंचों, दुरभिसंधियों आदि का विस्तार से वर्णन है। इसकी कथा के परिणति-पक्ष को बहुत कम में समेटा जा सकता है। एक मेधावी और ईमानदार विद्यार्थी अपनी विचारधारा के ही शिक्षक सह शोध-निर्देशक के प्रति पूरी तरह समर्पित है। उसके गुरु विश्वविद्यालय के गोटीबाज़ों में सबसे अव्वल हैं, पर दुरभिसंधियों के प्रति विरक्ति रखनेवाला यह शिष्य अपनी गुरुभक्ति में इस तथ्य की अनदेखी करता रहता है। मेधा के बावजूद बड़ी उम्र तक कोई नौकरी न मिलने पर वह अपने गाँव चला जाता है। इधर गुरु भी सेवानिवृत्त हो जाते हैं। फिर एक मौक़ा आता है जब गुरु से ही उसे पता चलता है कि किसी विश्वविद्यालय में वे नियुक्ति के लिए विशेषज्ञ बनकर जा रहे हैं। कथानायक उनके साथ साक्षात्कार देने वहाँ जाता भी है, पर नियुक्ति नहीं होती और भेद यह खुलता है कि गुरु ने तो उसे अपनी यात्रा की सहूलियत भर के लिए साथ ले लिया था, असली मक़सद तो अपने रीडर बेटे की—वही बेटा जिसने अपने क्वार्टर के आउट हाउस में उन्हें जगह दी हुई है—भविष्य की प्रोफेसरी सुनिश्चित करना था। जिस क्षण यह रहस्योद्घाटन होता है, शिष्य अपने कंधे से उनका होल्डॉल नीचे पटक कर अपनी राह लेता है। इसमें यह संदेश छिपा है कि जिस ग़लतफ़हमी को इतने लंबे अरसे से उसने दिल में पाल रखा था, उससे मुक्त होकर वह अब हल्का हो गया है।

गुरु-शिष्य की इस कथा में मुख्य/संघटक घटनाओं, जिनका संबंध उपर्युक्त कथा-सार से है, के अलावा पूरक घटनाएँ बहुत विस्तार से दी गयी हैं जिनसे विश्वविद्यालय परिसर और ख़ास तौर से सम्बद्ध विभाग की पतनशीलता का व्यापक परिदृश्य स्पष्ट होता है। पीछे कथा की जो परिणति बतायी गयी, उसके लिए ये घटनाएँ किसी तरह की अपरिहार्यता नहीं रखतीं, लेकिन कहानी के उद्देश्य को साधने में उनकी भूमिका परिणति-पक्ष की घटनाओं से किंचित अधिक ही है, कम नहीं। अगर प्रक्रिया-पक्ष के उन प्रसंगों को हटाकर कहानी का संक्षेपण कर दिया जाये तो आप पायेंगे कि उच्च शिक्षा के एक बड़े हिस्से में जिस तरह की ढलान है, और जिससे रू-ब-रू कराना कहानीकार का मुख्य उद्देश्य है, वह कहानी से ग़ायब हो गयी है।

यह उदाहरण परिणति-पक्ष और प्रक्रिया-पक्ष के बदलते अनुपात और महत्त्व का आशय स्पष्ट करने भर के लिए था। सन 2000 के बाद की अनेक चर्चित कहानियों को इस तरह से पढ़ा-समझा जा सकता है—‘मोहनदास’, ‘मैंगोसिल’, ‘दिल्ली की दीवार’ (उदय प्रकाश), ‘लफ़्फ़ाज़’ (योगेंद्र आहूजा), ‘भूलना’ (चंदन पांडेय), ‘गौसेवक’ (अनिल कुमार यादव), ‘सेंदरा’ (पंकज मित्र), ‘रोमियो, जूलियट और अँधेरा’ (कुणाल सिंह), ‘वसंत के हत्यारे’ (हृषिकेश सुलभ), ‘यूटोपिया’ (वंदना राग), ‘परिंदे का इंतज़ार सा कुछ’ (नीलाक्षी सिंह), ‘द्रौपदी पीक’ (किरण सिंह), ‘मिड डे मील’ (अल्पना मिश्र), ‘छबीला रंगबाज़ का शहर’ (प्रवीण कुमार)। ये बस नमूने के तौर पर सुझाये गये कुछ नाम हैं, पूरी सूची बनायी जाये तो वह कई पृष्ठों में फैली होगी।

निस्संदेह, ऐसी कहानियों की भी एक विस्तृत सूची बनायी जा सकती है जो गुणवत्ता में कहीं से कमतर नहीं हैं, लेकिन जिनमें दोनों पक्षों का बदला हुआ अनुपात और महत्त्व-क्रम नहीं दिखता। लिहाज़ा, यह ग़लतफ़हमी नहीं होनी चाहिए कि गुणवत्ता में बेहतर होने के लिए कहानी का नये संरचनात्मक रुझानों से युक्त होना अनिवार्य है।

बहरहाल, प्रक्रिया-पक्ष का यह बहुमुखी विस्तार जिन कहानियों में घटित हुआ है, उन्हें देखते हुए यह स्पष्ट हो जाता है कि यहाँ चेखव के इस सुझाव में व्यक्त हुए उसूल को दरकिनार कर दिया गया है कि अगर कहानी की शुरुआत में दीवार पर टँगी हुई बंदूक दिखे तो अंत तक उसे चल भी जाना चाहिए। आज की अनेक चर्चित कहानियाँ जैसे घोषणा करती हैं कि बंदूक का महत्त्व चलने में ही नहीं, दिखने में भी है, और कहानी को अपने पाठक से इस परिपक्वता की उम्मीद करनी चाहिए कि वह टँगी हुई बंदूक का भी अर्थ निकाले। ये कहानीकार ‘एकदम ज़रूरी’ विवरणों-ब्योरों से काम चलाने को तैयार नहीं दिखते, क्योंकि ज़रूरत की उनकी समझ पहले के कहानीकारों से भिन्न है। हम कह सकते हैं कि कहानी की विधा अधिक महत्त्वाकांक्षी हुई है और बाबू श्यामसुंदर दास ने साहित्यालोचन  में कहानी की जिस ‘स्वल्प क्षमता’ का उल्लेख किया था, उसके संकोच से मुक्त होकर वह सभ्यता-समीक्षा की दिशा में अग्रसर हुई है।

संरचना के स्तर पर इस बदलाव के पीछे सूचना-संचार-क्रांति की भूमिका को देखना संभवतः उचित होगा। 80 के दशक के उत्तरार्द्ध से हमारे यहाँ सूचनाओं का प्रवाह बढ़ा और संचार-माध्यम हमारे जीवन में क्रमशः अधिकाधिक पैठ बनाते गये। चिंतन-सृजन और मानवीय कल्पनाशीलता के स्तर पर इस परिवर्तन का कोई असर न हुआ हो, यह कैसे संभव है! ऐसा लगता है कि कहानी में प्रक्रिया-पक्ष की बढ़ोतरी का संबंध सूचनाओं और संचार-माध्यमों से चौतरफ़ा घिरे होने की इसी स्थिति के साथ है—उसके प्रति कहानीकार की एक स्वाभाविक अनुक्रिया। वह किसी भी घटना को अनेक कोणों से खँगालना चाहता है, कई तरह के निशाने और प्रक्षेप-पथ चुनता है, और ब्योरों-विवरणों के मामले में ज़रूरत भर कहकर काम चलाने को बिल्कुल तैयार नहीं क्योंकि जानकारियों के अंबार पर बैठे होने के कारण ज़रूरत को लेकर उसकी समझ पहले के कहानीकारों से आमूलतः भिन्न है।

यहाँ एक स्वाभाविक जिज्ञासा यह होगी कि क्या परिणति-पक्ष के मुक़ाबले प्रक्रिया-पक्ष का यह बढ़ा हुआ अनुपात और महत्त्व हिंदी कहानी में पहली बार घटित हुआ है? नहीं! नयी कहानी और साठोत्तरी कहानी के दौर में परिणति-पक्ष का महत्त्व और भी कमतर हुआ था, जिसका मतलब यह कि कहानी की जान प्रक्रिया-पक्ष में ही बसती थी। । वहाँ बड़ी संख्या ऐसी कहानियों की थी जिनमें घटना-शृंखला किसी चिह्नित किये जाने योग्य अंत पर नहीं पहुँचती। इसे ही रेखांकित करते हुए नामवर सिंह ने नयी कहानी के बारे में लिखा था कि इनमें आधारभूत संवेदना किसी एक जगह स्थित नहीं है बल्कि ‘द्रवीभूत होकर पूरी कहानी के शरीर में भर गयी है’। यह बात ‘नयी’ कही जाने वाली सभी कहानियों पर लागू नहीं होती, पर उसके एक बड़े हिस्से पर अवश्य लागू होती है। यह साठोत्तरी कहानी के बारे में भी सही है। इसलिए कोई आश्चर्य नहीं कि नामवर सिंह ने उस दौर में (ध्यान दीजिये, उस दौर ‘की’ नहीं, उस दौर ‘में’) कहानी के संक्षेपण को असंभव बताते हुए उसकी जैविक एकता और संश्लिष्टता पर बल दिया जो काट-छाँट करते ही नष्ट हो जाती है। यह विचार, निस्संदेह, उस दौर की कहानियों के कारण ही बना था जिनका कथा-सार निकालना मुश्किल था। अगर नामवर जी पीछे जाकर प्रेमचंद और मंटो और यशपाल जैसे कहानीकारों को याद करते तो उन्हें यह एहसास होता कि उनकी ज़्यादातर कहानियों को संक्षेप में प्रस्तुत करना उतना भी मुश्किल नहीं है—हाँ, संक्षेपण यानी कथा-सार स्वयं कहानी का स्थान नहीं ले सकता, यह तो साहित्य का सामान्य विद्यार्थी भी जानता है।

तो प्रक्रिया-पक्ष के महत्त्व की इस समानता के होते हुए समकालीन कहानियों का नयी और साठोत्तरी कहानी से फ़र्क़ क्या है? फ़र्क़ यह है कि यहाँ कथा को भी पुनर्प्रतिष्ठा मिली है। इसलिए यहाँ परिणति-पक्ष क्षीण नहीं हुआ है; अंत की ओर जाती मोटी-मोटी घटनाओं के आधार पर एक सार्थक कथा-सार बताया जा सकता है, जैसा कि आपने ‘नालंदा पर गिद्ध’ के संदर्भ में देखा। तो क्या यह अलग-अलग दौर की परिणति-पक्ष-प्रधान कहानियों की तरह ही है? नहीं, क्योंकि यहाँ प्रक्रिया-पक्ष की अवांतर प्रतीत होती घटनाएँ भी अवांतर नहीं हैं और उनसे वंचित कथा-सार कहानी के महत्त्व का एक छोटा अंश भी हम तक प्रेषित नहीं कर पाता। ऐसा नयी कहानी से पहले की कहानियों के साथ नहीं था और यहाँ तक कि अकहानी के बाद जब कहानी में कथा-तत्व की वापसी शुरू हुई, तब से लेकर 80 के दशक की कहानियों तक ऐसा नहीं था। इन दोनों मामलों में कथा-सार आपको कहानी की ताक़त का मोटा अंदाज़ा देने में सक्षम है, क्योंकि उससे परे जो प्रक्रिया-पक्ष है, वह या तो सिर्फ़ इस मुख्य कथा को जीवंत बनाने का उपक्रम है या फिर स्वतंत्र महत्त्व रखते हुए भी परिणति-पक्ष के महत्त्व से किसी भी मायने में बढ़त नहीं लेता। आप कह सकते हैं, पिछली लगभग तीस सालों की कहानी में (या कहना चाहिए, उसके एक पर्याप्त बड़े हिस्से में) कथा-तत्व—यानी एक रेखांकनीय अंत के साथ युक्त घटना-शृंखला—और प्रक्रिया-पक्ष का विस्तार, ये दोनों चीज़ें समन्वित हैं। इसीलिए आज की अनेक महत्त्वपूर्ण कहानियों का कथा-सार बताना उतना बेमानी नहीं है जितना किसी प्रारूपिक नयी कहानी का होगा, और उतना मानीख़ेज़ भी नहीं है जितना प्रेमचंद और यशपाल की कहानियों का होगा।

अब हम संरचना-संबंधी एक अन्य नवाचार पर आयें। संभवतः अधिक सूचना-सम्पन्न होने और चीज़ों को अधिकाधिक कोणों से देख पाने की कहानीकार की अवस्थिति के कारण ही कहानी की संरचना में एक और चीज़ घटित हुई—वाचक अधिक मुखर हो गया, वह पाठक से ढेर सारी बातें करता और कई बार कहानी में आये प्रसंगों का भाष्य करता भी नज़र आने लगा। कुल मिलाकर, कहानी में अंकन की जगह कहन का प्राधान्य हो गया। इन दो शब्दों—‘अंकन’ और ‘कहन’—को इस तरह समझें: ‘अंकन’ वहाँ होता है जहाँ कहानी में—(1) वाचक की मौजूदगी का एहसास नहीं होता (इसलिए प्रस्तुति निर्वैयक्तिक और वस्तुनिष्ठ प्रतीत होती है); (2) हम घटित हो रहे कार्यव्यापार के सामने होते हैं और वह नाटक या सिनेमा के दृश्य की तरह हमारे मन के रंगमंच या रजतपट पर चल रहा होता है; (3) कार्यव्यापार में लगने वाले समय (घटनाकाल) और उसकी प्रस्तुति में लगने वाले समय (कथाकाल) के बीच का अंतर बहुत कम होता है। इसके मुक़ाबले कहन की प्रविधि में—(1) वाचक की मौजूदगी का एहसास होता है (इसलिए प्रस्तुति में, हो सकता है,  निर्वैयक्तिकता और वस्तुनिष्ठता कम प्रतीत हो, साथ ही मुखर मूल्य-निर्णय से आपका सामना हो); (2) सम्मुख घटित हो रहे कार्यव्यापार के चित्रण की जगह, हो चुकी चीज़ों का निचोड़ पाठक को बताया जाता है; (3) घटनाकाल की बनिस्पत कथाकाल बहुत कम होता है।

हर कहानी में अंकन और कहन की प्रविधि किसी-न-किसी अनुपात में मौजूद रहती है। आधुनिक कहानी विधा अपनी शुरुआत में कहन-प्रधान ही थी, जिसे प्रेमचंद की बाद के दौर की कहानियों और जैनेन्द्र, अज्ञेय जैसे कहानीकारों की कुछ कहानियों ने किसी हद तक बदला। निर्णायक रूप से उसमें बदलाव नयी कहानी के दौर में आया जहाँ कहानियाँ अंकन-प्रधान और कहन-कृपण हो गयीं। यह पद्धति साठोत्तरी दौर में भी जारी रही। साठोत्तरी कहानीकारों के बीच से ही ज्ञानरंजन की ‘बहिर्गमन’ जैसी कहानी ने एक नये रूप में कहन की वापसी के संकेत दिये जहाँ हमारा सामना एक ऐसे वाचक से होता है जिसका लक्ष्य बड़े घटनाकाल को संक्षिप्त कथाकाल में समेट लेना भर नहीं है (जो कहन-प्रधानता का मुख्य उद्देश्य हुआ करता था), बल्कि अपनी वाक्पटुता और कथन-भंगी से अलग तरह का कथा-रस पैदा करना भी है। फिर 80 के दशक के उत्तरार्द्ध में उदय प्रकाश के यहाँ वाचक का यह हस्तक्षेप कहन की कई नयी विशेषताओं के साथ प्रकट होता है। ये विशेषताएँ 90 के दशक में अन्य कहानीकारों के यहाँ दिखने लगती हैं और सन 2000 के बाद की कहानियों में तो इसे एक व्यापक रुझान की तरह देखा जा सकता है।

पहले के कहन के मुक़ाबले वापसी के इस दौर के कहन का अंतर रेखांकित करने के लिए हम एक-दो उदाहरण देख सकते हैं। प्रेमचंद की दो कहानियों की शुरुआत देखिए:

‘बेनीमाधव सिंह गौरीपुर गाँव के ज़मींदार और नंबरदार थे। उनके पितामह किसी समय बड़े धन-धान्य सम्पन्न थे। गाँव का पक्का तालाब और मंदिर, जिनकी अब मरम्मत भी मुश्किल थी, उन्हीं के कीर्ति-स्तम्भ थे। कहते हैं, इस दरवाज़े पर कभी हाथी झूमता था…’ (बड़े घर की बेटी)

‘किसी ग़रीब गाँव में शंकर नाम का एक कुर्मी किसान रहता था। सीधा-सादा, ग़रीब आदमी था, अपने काम से काम, न किसी के लेने में न देने में।…’ (सवा सेर गेहूँ)

इस परिचयात्मक शुरुआत में वाचक मुख्य पात्र का परिचय देता हुआ घटना की पृष्ठभूमि तैयार कर रहा है। इसे पारंपरिक कहन का एक प्रतिनिधि उदाहरण समझें।

परिचयात्मक शुरुआत के उदाहरण निम्नांकित उद्धरण भी हैं, लेकिन वाचक का सामने आकर कोई बात कहना यहाँ कितना भिन्न है! ध्यान दें कि इन उद्धरणों में से पहला उस कहानी से है जो पिछली सदी में ‘हंस’ में प्रकाशित हुई और इस सदी में कहानी-संग्रह का हिस्सा बनी। शेष जिन कहानियों से हैं, वे हर तरह से इसी सदी की कहानियाँ हैं।

‘अब इसका क्या किया जाये कि डॉक्टर दिनेश मनोहर वाकणकर किसी कहानी या उपन्यास के पात्र नहीं हैं। उन्हें किसी कहानीकार की कल्पना ने पैदा नहीं किया है। डॉ. वाकणकर किसी कहानीकार या रचना के होने या न होने के बावजूद हैं।… कुछ-कुछ उसी तरह जैसे हम और आप हैं। क्या हमें होने के लिए किसी रचना की ज़रूरत है?’ (उदय प्रकाश की ‘और अंत में प्रार्थना’)

‘कहानी में आए विवरण एवं तथ्य पूर्णतया काल्पनिक हैं। किसी भी जीवित या मृत व्यक्ति से इसका कोई संबंध नहीं। दरअसल दुनिया में गुवाहाटी नामक कोई शहर ही नहीं। गुवाहाटी में कभी कोई दंगा हुआ ही नहीं। दंगे में कभी कोई मरा ही नहीं। दुनिया में हर कहीं अमन चैन है। लोग खुशहाल हैं। तमाम व्यस्तताएं हैं। फुर्सतें भी हैं। फुर्सतों में पढ़ने के लिए और कभी नहीं पढ़ने के लिए कहानियाँ हैं। कहानियों में गुवाहाटी है। गुवाहाटी में दंगे हैं। दंगों में लोग मारे जा रहे हैं। लेकिन गुवाहाटी, अहमदाबाद, अयोध्या, काबुल, बग़दाद आदि हमारे समय के क़द्दावर गप्प हैं बस! चिंता की कोई बात नहीं।’ (कुणाल सिंह की ‘रोमियो, जूलियट और अँधेरा’)

‘कहते हैं, कभी-कभी सूई के छेद में से हाथी भी निकल जाता है पर पूँछ अटक जाती है। इस कहानी को लिखते हुए भी कुछ ऐसा ही हुआ। मैंने सोचा कि छेद में से जब पूँछ उधर नहीं निकाल पा रही है तो हाथी को फिर से इधर ही खींच लूँ। लेकिन कड़ी मेहनत-मशक्कत के बाद भी मैं हाथी को सूई के छेद से आर-पार न कर सका।…’ (रवि बुले की ‘लापता नत्थू उर्फ़ दुनिया न माने’)

‘हुड़ी बाबा! किसी मोटर बाइक की अविश्वसनीय रफ़्तार को बताने वाला यह विज्ञापन जैसे हमेशा प्रणयकांत की उपस्थिति के बैकग्राउन्ड में बज रहा था। वैसे इस शहर में प्रणयकांत मोटर बाइक पर नहीं आए थे, वे भी लगभग वैसे ही आए थे जैसे इस शहर में दशकों पहले गाँधी जी आए थे, मतलब रेलगाड़ी से।’ (राकेश मिश्र की ‘तक्षशिला में आग’)

‘बात शुरू होती है पाकड़पुर सदर की चिल्लागंज चौमुहानी से। एक रास्ता जगदंबा पुल की ओर से होता हुआ सरपट भागा आता था। वहाँ, जहाँ से दो रास्ते बायें-दायें फूटते थे। उस जगह ठिठककर फिर एक रास्ता नाक की सीध में आगे बढ़ जाता था। साल रहा उन्नीस सौ चौरानबे। चौमुहानी से सटे दाहिने गाँधी बाबा के तीन बंदरों की तर्ज पर तीन बेचनहार बैठते थे। जाड़े के दिनों में आप देखें तो बंदर वाली बात बस बात नहीं लगेगी, सत्य प्रतीत होगी।’ (नीलाक्षी सिंह की ‘प्रतियोगी’)

‘यूँ तो सरसरी तौर पर यह एक सनसनीखेज फ़िल्मी पटकथा है जिसे पढ़ते हुए डर है कि कहीं लोग ब्लू फ़िल्म का आनंद न लेने लगें, हालाँकि ब्लू फ़िल्म में भी कहीं कोई आनंद होता है यह एक अलग विवाद का विषय है। फिलहाल, इस कहानी में कहीं-न-कहीं, कुछ-न-कुछ तो ऐसा है जो इस अनजान अबोध लेखक को बाध्य कर रहा है लिखने को, और लिखना भी ऐसा कि रातों की नींद हराम हो जाये!’ (शशिभूषण द्विवेदी की ‘विप्लव’)

‘तो हजरात, इसे कहानी समझने की भूल हरगिज़ भी न कीजिएगा। पन्नों पर स्क्रिप्ट-दर-स्क्रिप्ट पार होती बाक़ायदा एक फ़िल्म है यह। निहायत पिटी हुई, घिसी हुई थीम वाली, और बहुत-बहुत पहले की रिलीज़ हो चुकी फ़िल्म।’ (उपासना की ‘एक ज़िंदगी… एक स्क्रिप्ट भर’)

‘यह कहानी महज़ एक कहानी न होकर एक इश्तिहार है, जनसामान्य को यह सूचित करने के लिए कि बस्ती ज़िले के मुँडेरवा के निवासी अयोध्या प्रसाद त्रिपाठी, पिता हुकूम देव त्रिपाठी अपना दिमाग़ी संतुलन खो बैठे हैं। इस इश्तिहार का प्रकाशन उनको सतर्क करने के लिए है जो अयोध्या बाबू से परिचित हैं और पिछले छह महीने से उनसे नहीं मिले हैं और अब मिलने की सोच रहे हैं।…’ (उमाशंकर चौधरी की ‘अयोध्या बाबू सनक गए हैं’)

इन सभी उद्धरणों में इस बात पर ग़ौर किया जा सकता है कि वाचक का आत्मसजग कहन पुराने कहन से कितना भिन्न है! प्रेमचंद ने एक कहानी में बेनीमाधव सिंह की धन-धान्य-संपन्नता को और दूसरी कहानी में शंकर की ग़रीबी को नाटकीय दृश्यों, यानी अंकन, के माध्यम से उभारने का लंबा रास्ता छोड़कर उसे सूचना के रूप में बता देने का, यानी कहन का छोटा रास्ता चुना है। बाद के उदाहरणों में कहन के पीछे इस तरह का कोई प्रकट उपयोगितावाद चिह्नित कर पाना मुश्किल है। किसी उदाहरण में वह कौतुकपूर्ण तरीक़े से पाठक की दिलचस्पी जगाने के लिए आया है, कहीं किसी विडंबना को रेखांकित करने के लिए, और कहीं वाक्पटुता के द्वारा बतरस का माहौल बनाने के लिए।

ये जितने भी उदाहरण आपने देखे, ये कहानियों की शुरुआत से लिये गये हैं, पर इसका यह मतलब नहीं कि कहन का कहानी की शुरुआत से कोई संबंध होता है। यह प्रविधि कहानी में कहीं भी पायी जा सकती है, और जिन्हें हम कहन-प्रधान कहानियाँ कहते हैं, उनमें तो बड़ा हिस्सा कहन में ही चलता है। वहाँ दृश्य का निर्माण करने की जगह इतिहास की तरह ‘घटित’ का बयान किया जाता है और ऐसा करता हुआ वाचक अक्सर एक ऐसे सक्रिय टिप्पणीकार के रूप में दिखता है जिसकी टिप्पणियों में कहानी की आधी जान बसती है। कहीं वह कहानी के घटित को युग की परिक्रमा कक्षा में उछाल देने का साधन है, कहीं सूचनाओं को ज्ञान में रूपांतरित करने का औज़ार, कहीं पात्रों की पृष्ठभूमि को बतरसपूर्ण परिदृश्यात्मक विवरणों में उभारने का ज़रिया है, तो कहीं कथा-स्थितियों के बाँके-तिरछे ट्रीटमेन्ट की हिकमत। इनमें से जिस भी उद्देश्य से कहन का उपयोग हो, इतना निश्चित है कि कथा-स्थितियों के पाठक तक पहुँचने में वाचक की स्पष्ट मध्यस्थता दिखायी पड़ती है। यही चीज़ इसे पुराने कहन से अलग करती है। इसमें कहानी घटना के एक भाष्ययुक्त संस्करण की प्रस्तुति बन जाती है। इसे शिल्प-शैली के स्तर पर इस सदी की कहानियों की एक बड़ी विशेषता कहा जाना उचित होगा।

एक और शिल्प-शैलीगत विशेषता पिछले कुछ सालों में तेज़ी से सामने आयी है। वह यह कि आधुनिक कहानी विश्वसनीय अंकन की जिस विधि पर निर्भर रही है, जिसे अंग्रेजी में ‘वेरिसिमिलीट्यूड’ कहते हैं, उसे छोड़कर कुछ कहानीकार पुराकथाओं, नानी-दादी की कहानियों या विज्ञानकथाओं वाली पद्धति का इस्तेमाल कर रहे हैं जिसमें कथा-विकास दुनियावी तर्क का पालन नहीं करता। शिवेन्द्र के यहाँ इस तरह की अनेक कहानियाँ हैं जिन्हें पढ़ते हुए लगता है कि कहानीकार अपने पाठक को आधुनिक के मुक़ाबले पुरातन या वयस्क के मुक़ाबले बाल-सुलभ कथा-आस्वाद की ओर ले जाना चाहता है, लेकिन ये कहानियाँ जिस तरह के समकालीन मुद्दे उठाती हैं, वह इस भ्रम का निवारण कर देते हैं। शिवेन्द्र की ‘कहनी’, ‘ब्रेकअप टूल’, ‘सतरूपा’ जैसी कहानियाँ इसका उदाहरण हैं। इसी तरह कैफ़ी हाशमी की कहानी ‘शिया बटर’ चित्र-विचित्र घटनाओं से बुनी जाने के बावजूद हमारे समय की सत्ता-संरचना और उसके प्रतिरोध को अपना मुद्दा बनाती है। पद्धति की दृष्टि से इसी श्रेणी के अंतर्गत आनेवाली अन्योक्तिपरक और प्रतीकात्मक कहानियाँ भी इन सालों में ठीक-ठाक संख्या में लिखी गयीं। असग़र वजाहत के यहाँ ऐसी कहानियाँ पहले भी थीं, सन 2000 के बाद भी उन्होंने ‘शाह आलम कैम्प की रूहें’ जैसी चर्चित शृंखला लिखी। मनोज कुमार पांडेय की ‘बदलता हुआ देश’ शीर्षक से पुस्तकाकार प्रकाशित एक पूरी कहानी-शृंखला एक राजा के शासन का वर्णन करने के बहाने हमारे समकाल पर टिप्पणी करती है। इसी तरह प्रवीण कुमार की ‘एक राजा जो सीताफल से डरता था’, राकेश तिवारी की ‘गजब का मुँह’, सूर्यनाथ सिंह की ‘ठठेरे की मशीन’ जैसी कहानियाँ अपने समय का चित्र प्रस्तुत करने के लिए अन्योक्ति का सहारा लेती हैं।

 

विषय-वस्तु-संबंधी रुझान

इन पच्चीस सालों की कहानियों पर सामाजिक सरोकारों से कटे होने, ‘प्रतिबद्धता, विचारधारा और एक हद तक वैचारिकता से मुक्त होकर मूलहीन-रसहीन शाखाओं में तब्दील होते जाने’, ‘करतबों’, ‘चालाकियों’, और ‘रबड़नुमा भाषा’ की ‘मनमानी पैंतरेबाज़ी’ के आरोप लगाये जाते रहे हैं जो व्यवस्थित तरीक़े से इन वर्षों में लिखी गयी कहानियों का अध्ययन करने पर बेबुनियाद ठहरते हैं। यह समझने की ज़रूरत है कि इस सदी की बहुसंख्य कहानियों ने सामाजिक सरोकारों और प्रतिबद्धता आदि से नहीं, बल्कि उसकी जड़ होती समझ से अपना पल्ला झाड़ा है। विमल चंद्र पांडेय की कहानी ‘उत्तर प्रदेश की खिड़की’ में प्रथम पुरुष वाचक अपने दफ़्तर में काम करने वाले दीन जी की कविताओं के बारे में जो कहता है, उसे उक्त मुद्दे पर आज के कहानीकार की आम राय मान सकते हैं:

‘उनकी कविताओं में भूख, भूमंडलीकरण, बाज़ार और किसान शब्द बार-बार आते हैं और इस बिनाह पर वह मुझसे उम्मीद रखते हैं कि मैं उनकी कविताओं को सरोकार वाली कविताएँ कहूँ।… उनके पास अपनी कविताओं पर मिले कुछ प्रशंसा पत्र भी हैं जिनकी प्रतिक्रियास्वरूप अब वह एक कहानी लिखने का मन बना रहे हैं जिसका नाम वह ज़रूर ‘भूखे किसान’ या ‘भूखा बाज़ार’ रखेंगे।’

यह सच है कि एक बेहद वाक्पटु वाचक के प्रति आकर्षण और भाषा को पुराने ढर्रे पर बरतने के प्रति विरक्ति के कारण इस सदी में उभरे कहानिकारों के यहाँ कई बार ऐसे प्रयोग मिलते हैं जो पुराने आस्वाद वाले पाठक के गले सीधे नहीं उतरते, पर कुछ ऐसे उदाहरणों के आधार पर इन कहानियों के संबंध में सामान्यीकरण करना अनुचित होगा। सच्चाई यह है कि पीछे से चली आती पीढ़ी और सन 2000 के बाद उभरी पीढ़ी, दोनों के यहाँ अपने समय की वास्तविकता के अनेक पहलू बहुत रचनात्मक तरीके से दर्ज हुए हैं। इस दौर में भारतीय समाज का जिस तरह साम्प्रदायीकरण हुआ है और समुदायों के बीच संदेह और नफ़रत को हवा दी गयी है, उसे कई कहानीकारों ने विषय बनाया और कई बार उसे ऐसे कोण से देखने के उदाहरण प्रस्तुत किये जो समाजवैज्ञानिकों के यहाँ नहीं मिलते। अनिल यादव की कहानी ‘दंगा भेजियो मौला!’, योगेंद्र आहूजा की ‘मर्सिया’, चंदन पांडेय की ‘भूलना’, असग़र वजाहत की ‘शाह आलम कैम्प की रूहें’, वंदना राग की ‘यूटोपिया’, नीलाक्षी सिंह की ‘परिंदे का इंतज़ार सा कुछ’, अखिलेश की ‘अँधेरा’, किरण सिंह की ‘द्रौपदी पीक’, मो. आरिफ़ की ‘चोर-सिपाही’ और ‘तार’, राकेश मिश्र की ‘शह और मात’, प्रियदर्शन की ‘बुलडोज़र’, राकेश तिवारी की ‘मुकुटधारी चूहा’, संदीप मील की ‘जुस्तजू’, प्रवीण कुमार की ‘लादेन ओझा की हसरतें’ और ‘वास्को डी गामा की साइकिल’, मज़कूर आलम की ‘कबीर का मोहल्ला’ जैसी कहानियों में समाज के साम्प्रदायीकरण का समकालीन परिदृश्य कहीं मुख्य विषय के रूप में और कहीं अंशों में दर्ज हुआ है। इन कहानियों को पढ़ते हुए समझ में आता है कि 80 के दशक में लिखी गयी स्वयं प्रकाश की कहानी ‘पार्टिशन’ के यथार्थ ने कितनी आगे तक की यात्रा कर ली है।

समाज के साम्प्रदायीकरण के साथ-साथ मुक्त बाज़ार की नयी ग़ुलामी को भी इस दौर की कहानियों ने संबोधित किया है। बाज़ार और उपभोक्तावाद पहले भी कहानियों का विषय बनते रहे हैं, लेकिन उदारीकरण के बाद के दौर की बनिस्पत पहले उनकी जो स्थिति थी, वही उन कहानियों में भी दर्ज हुई थी। बाद के हालात की विकरालता बाद की कहानियों में ही देखी जा सकती है। आलोचक और कहानीकार राकेश बिहारी ने फणीश्वर नाथ रेणु की कहानी ‘पंचलाइट’ और संजय खाती की ‘पिंटी का साबुन’ के साथ 1997 में प्रकाशित पंकज मित्र की ‘पड़ताल’ की तुलना करते हुए बाज़ार और उपभोक्तावाद के प्रभाव के विभिन्न चरणों को बहुत स्पष्टता से सामने रखा है:

‘बाज़ार अपनी शुरुआती अवस्था में हमारे ज्ञानचक्षु खोलता है, हमारे भीतर कौतूहल और जिज्ञासा के बीज रोपता है। “पंचलाइट” में इस तथ्य को आसानी से रेखांकित किया जा सकता है। लेकिन बाज़ार का वही उत्पाद जब रोज नयी-नयी शक्लों में हमारे जीवन में दाख़िल हो हमें लुभाना शुरू करता है तो हमारे भीतर पहले से बैठा कौतूहल और जिज्ञासा का शुरुआती भाव आसानी से प्रतिस्पर्धा में परिणत हो जाता है। “पिंटी का साबुन” में साबुन की नयी टिकिया को हासिल करने के लिए छोटे भाई द्वारा बड़े भाई का सिर फोड़ देना बाज़ार प्रदत्त इसी प्रवृत्ति का परिचायक है। … कौतूहल से स्पर्धा तक का यह सफ़र भूमंडलीकरण से पहले का सच है। लेकिन नयी आर्थिक नीतियों के लागू किये जाने के बाद बाज़ार का चेहरा और ज़्यादा घातक और आक्रामक हो गया है… [“पड़ताल” में] रंगीन टेलीविजन पर अमिताभ की फ़िल्म देखने में मशगूल परिवार के सभी सदस्यों के बीच उपेक्षित किशोरीरमण बाबू का ठंड से ठिठुर कर मर जाना बाज़ार के दबाव में कुंद होती संवेदना और संबंधों के प्रस्तरीकरण का ही नतीजा है।’ (केंद्र में कहानी, पृ. 19)

मुक्त बाज़ार, उपभोक्तावाद और नयी से नयी टेक्नॉलजी की बमवर्षा ने हमारी समझ, संवेदना, ज़रूरतों और मूल्य-व्यवस्था को कितना बदला है, नव-उदारवाद के दौर में नये सिरे से आदिम पूंजी-संचय की शुरुआत ने जनजीवन पर क्या प्रभाव डाला है, यह इस दौर में आयी कई कहानियों की विषय-वस्तु है। संवेदनहीन बाज़ार को केंद्र में रखकर 90 के दशक में ‘साज़-नासाज़’ जैसी अविस्मरणीय कहानी दे चुके मनोज रूपड़ा ने इस सदी में ‘दूसरी दुनिया’ और ‘रद्दोबदल’ जैसी कहानियाँ दीं। ‘दूसरी दुनिया’ में जहाँ कॉर्पोरेट जगत की चालाकियों में पीछे छूट चुके एक असफल व्यक्ति के कंप्युटर गेम की आभासी दुनिया में रमकर बर्बाद हो जाने की मार्मिक दास्तान है, वहीं ‘रद्दोबदल’ विराट निगमों द्वारा पूरी दुनिया की सत्ता के अधिग्रहण का दृश्य पेश करने वाली एक फंतासी। योगेंद्र आहूजा की ‘स्त्री विमर्श’ हमारे जैसे पिछड़े मुल्क के जनजीवन में आ रहे उन भयावह बदलावों की कहानी कहती है जो इस पिछड़ेपन के बीच टापुओं की तरह पनपते अमरीका की देन हैं। उन्हीं की कहानी ‘खाना’ मुक्त बाज़ार के एक लाभार्थी की पीड़ा को उसके पेशे से जुड़ी एक अनोखी विडंबना के माध्यम से उभारती है—वह पाँच सितारा रेस्तराओं की समीक्षा करनेवाला स्तंभकार है, लेकिन उसकी जिह्वा को खाने का स्वाद आना बंद हो गया है। ‘बिलौती महतो का उधार फिकिर’, ‘बे ला का भू’, ‘मूंगरा मॉल’ (पंकज मित्र); ‘प्रतियोगी’ (नीलाक्षी सिंह); ‘मित्र की उदासी’ और ‘ज़मीन अपनी तो थी’ (चंदन पांडेय); ‘नगरवधुएँ अख़बार नहीं पढ़तीं’ (अनिल यादव); ‘पिंक स्लिप डैडी’ (गीत चतुर्वेदी); ‘दिलनवाज़, तुम बहुत अच्छी हो’ (प्रत्यक्षा); ‘बलमा जी का स्टूडियो’ (सोनी पांडेय); ‘धोखा’ (प्रह्लाद चंद्र दास); ‘लूगड़ी का सपना’ (सत्यनारायण पटेल); ‘वह सपने बेचता था’ (राकेश बिहारी); ‘गंगासागर’ (अजय नवारिया); ‘क़िस्सा-ए-कोहनूर’ (पंखुरी सिन्हा); ‘मन्नत टेलर्स’ (प्रज्ञा)—ये कहानियों की उस बड़ी गिनती में से कुछ नाम हैं जिनमें मुक्त बाज़ार के गतिशास्त्र से लेकर उसके गहरे असर तक का प्रभावी चित्रण मिलता है। मनोज कुमार पांडेय की ‘पानी’ जैसी कहानी को भी विषय की दृष्टि से इसी श्रेणी में रखा जाना चाहिए जिसमें वर्तमान देशकाल की स्पष्ट उपस्थिति न होने के बावजूद मुनाफ़े की हवस और उसके दुष्परिणामों का अत्यंत प्रभावशाली और सूक्ष्म चित्रण समकाल को लेकर हमारी समझ को समृद्ध करता है।

साम्प्रदायीकरण और मुक्त बाज़ार के प्रभाव के ये उदाहरण किसी भी दृष्टि से नाकाफ़ी हैं, लेकिन यहाँ उद्देश्य सिर्फ़ यह बताना है कि इन पच्चीस सालों की कहानी को समाज के नये उद्विकासों से विमुख बताना और उसमें किसी तरह के सरोकार न देखना दोषपूर्ण विश्लेषण है। उलटे यह कहना अधिक दुरुस्त होगा कि कहानी को लेकर कहानीकारों के बीच यह बात आम धारणा की तरह जगह बनाती गयी है कि यह कोई प्रगीतात्मक विधा नहीं है और इसमें कोई-न-कोई सामाजिक सत्य ही प्रकट होना चाहिए। इसीलिए हमारे समय के यथार्थ के जिन दो बड़े पक्षों को विषय बनाने के उदाहरण पीछे दिये गये, उनके अलावा भी कई तरीक़ों से हमारा समय कहानियों में दर्ज होता रहा है। जिस तरह कंप्युटर गेम के भीतर एक समानांतर दुनिया बसा लेने की कहानी ‘दूसरी दुनिया’ में कही गयी है, उसी तरह कंप्युटर गेम में हत्यारी विक्षिप्तता की हद तक तल्लीन होने की कहानी है, ‘आल्ट+शिफ्ट+कंट्रोल=डिलीट’ (आकांक्षा पारे)। ‘जानकीपुल’ (प्रभात रंजन) कहानी इस विडंबना पर केंद्रित है कि सीतामढ़ी में शहर को गाँव से जोड़ने वाला, सालों से बन रहा पुल अभी भी अधूरा है जबकि संचार के मामले में दुनिया इतनी बदल गयी कि उस पुल को लेकर दुनिया के दो छोर पर बैठे लोग आपस में ईमेल पर चर्चा कर रहे हैं। सन 2000 के बाद मोबाइल फ़ोन धीरे-धीरे हमारे जीवन का अनिवार्य हिस्सा बन गये और कहानियों ने उसके व्यापक असर को अपना विषय बनाया। ‘कठपुतली थक गई’ (राकेश तिवारी), ‘चाँद के पार एक चाभी’ (अवधेश प्रीत), ‘घड़ीसाज़’ (टेकचन्द) जैसी कहानियों में इसे देखा जा सकता है। कहीं यह पुरानी जीवन-शैली और पुराने काम-धंधों को नष्ट करनेवाली टेक्नॉलजी के रूप में आया है (घड़ीसाज़), कहीं पूँजीवाद और प्रौद्योगिकी के सकारात्मक/मुक्तिकारी पक्ष को रेखांकित करने के साथ-साथ उसकी सीमाओं को सामने लाने का साधन बना है (चाँद के पार एक चाभी), और कहीं वह बाज़ार-अर्थतंत्र के जनविरोधी चरित्र को त्रासद तरीक़े से उभारने का ज़रिया है (कठपुतली थक गई)। कहीं सूचना-संचार-क्रांति का शिकार होकर और कहीं पाँच-सितारा स्कूलों के उत्पीड़न का शिकार होकर बच्चे कैसे काउंसिलर और साइकियाट्रिस्ट के यहाँ पहुँच रहे हैं, इसे लेकर ‘दुश्मन मेमना’ (ओमा शर्मा) और ‘जाग तुझको दूर जाना’ (विपिन कुमार शर्मा) जैसी संवेदनशील कहानियाँ लिखी गयीं। इस सदी की ऑनर किलिंग, मॉब लिंचिंग, कथित ‘लव जिहाद’ को ख़त्म करने के नाम पर चल रहे घृणा-अभियान, अभिव्यक्ति की आज़ादी के हनन आदि को विषय बनाया गया है। ‘डॉग स्टोरी’ (योगेंद्र आहूजा), ‘इमाम दस्ता’ (अनिल यादव), ‘एक हँसोड़ का हलफ़नामा’ (पंकज मित्र), ‘प्रतिबंधन’ (कुणाल सिंह), ‘जंगल’ और ‘गर्व’ (मनोज कुलकर्णी) जैसी कहानियाँ हमारे समय के इन ज्वलंत प्रश्नों से सीधे टकराती हैं। पर्यावरण संकट को विषय बनाने वाली कहानियों की संख्या अधिक नहीं है, लेकिन पहले इस विषय पर जिस तरह कहानियाँ प्रायः नदारद थीं, उसे देखते हुए इस सदी की पहली चौथाई में इस संकट पर कुछ कहानियों का होना महत्त्वपूर्ण है। ‘पानी’ (मनोज कुमार पांडेय), ‘बोनसाई’ और ‘बिन पानी डॉट कॉम’ (पंकज मित्र), ‘कोकिला शास्त्र’ (संदीप मील) जैसी कहानियाँ पर्यावरण संकट को अपना विषय बनाने के कारण हरित साहित्य की श्रेणी में रखी जा सकती हैं। हरित साहित्य की श्रेणी में ही हम कबीर संजय की ‘सुरखाब के पंख’ समेत एकाधिक कहानियों को रख सकते हैं जो पाठकों को पशु-पक्षियों और वनस्पतियों की अनोखी दुनिया में ले जाती हैं।

इन वर्षों में लिखी गयी, दलित प्रश्न को संबोधित करती कहानियों की भी एक बड़ी संख्या है जो मुख्यतः दलित कहानीकारों द्वारा और गौणतः ग़ैर-दलित कहानीकारों द्वारा लिखी गयी हैं। इनमें से दलित कहानीकारों द्वारा लिखी गयी कहानियों को अलग करके देखना इस दृष्टि से ज़रूरी है कि उनमें दलित जीवन का प्रामाणिक अनुभव तो व्यक्त हुआ ही है, दलित जीवन के संघर्ष के प्रति भी ग़ैर-दलितों से भिन्न रवैया देखने को मिलता है। आलोचक बजरंग बिहारी तिवारी का यह अवलोकन महत्त्वपूर्ण है कि

‘ग़ैर-दलित कथाकारों द्वारा देखे गये और गढ़े गये दलित चरित्र अक्सर कमज़ोर हुआ करते हैं। या तो वे स्थितियों के विरुद्ध संघर्ष नहीं करते या प्रतिकूलताओं से टकराते हुए पलायन कर जाते हैं या आत्महत्या कर लेते हैं। इसके मुक़ाबले दलित कथाकारों के दलित चरित्र मज़बूती से डटे रहते हैं। … एक बनती हुई अस्मिता को मज़बूत चरित्र ही मज़बूती दे सकते हैं। शेष समाज तो उनका मनोबल तोड़ने में लगा ही हुआ है।’ (भूमिका, प्रतिनिधि दलित कहानियाँ, सं. बजरंग बिहारी तिवारी)

इस सदी में लिखी गयी विमल चंद्र पांडेय की ‘सोमनाथ का टाइम टेबल’, आशुतोष की ‘उम्र पैंतालीस बतलायी गयी थी’ और शिवेंद्र की ‘ब्रेकअप टूल’ जैसी ग़ैर-दलित लेखकों की कहानियाँ दलित मुद्दे को बहुत संवेदनशीलता से उठाती हैं, लेकिन अंततः ये पराजय की कहानियाँ हैं। उदय प्रकाश का मोहनदास (इसी शीर्षक की कहानी का नायक) उनके अतुलनीय कथा-कौशल के बल पर हमारी गहरी सहानुभूति का पात्र अवश्य बनता है, लेकिन कहानी से अंततः उत्पीड़न के आगे दलित समुदाय की चरम निरुपायता ही निकल कर आती है। इनके मुक़ाबले प्रह्लाद चंद्र दास की ‘लटकी हुई शर्त’, अजय नावरिया की ‘यस सर’, कैलाश वानखेड़े की ‘काली सड़क’, सुशीला टाकभौरे की ‘सिलिया’, मोहनदास नैमिशराय की ‘अपना गाँव’, कैलाश चंद्र चौहान की ‘संजीव का ढाबा’ जैसी कहानियाँ देखिए तो मज़बूत चरित्र और आशावाद अत्यंत विश्वसनीय रूप में सामने आते हैं। जहाँ इस तरह का सकारात्मक अंत नहीं है, वहाँ भी दलित जीवनानुभव की प्रामाणिकता आकर्षित करती है। उदाहरण के लिए, टेकचन्द की ‘खस्सी’ का कथ्य शिवेन्द्र के ‘ब्रेकअप टूल’ से गहरी समानता रखता है, लेकिन दलित जीवन का जैसा अनुभव-आधारित चित्र ‘खस्सी’ में मिलता है, वह शिवेन्द्र की कहानी में नदारद है और उसकी कमी को ढँकने का काम फंतासी का शिल्प करता है। इसी तरह अजय नावरिया की ‘उपमहाद्वीप’ में कोई मुखर आशावाद नहीं है लेकिन दलितों के साथ होने वाली हिंसा का प्रभावी अंकन उस कहानी को विशिष्ट बना देता है। जयप्रकाश कर्दम की कहानी ‘मोहरे’ में नायक की पराजय अवश्य होती है, पर उसके चरित्र की मज़बूती हमें यह अहसास कराती है कि उसकी जीत का दिन भी आयेगा।

इस सदी में स्त्री कहानीकारों की जितनी बड़ी संख्या सामने आयी है, उतनी पहले कभी नहीं थी। यह भी ग़ौर करने की बात है कि उन्होंने अपने को स्त्री जीवन के चित्रण तक सीमित नहीं रखा है। हाँ, यह अवश्य कहा जा सकता है कि स्त्री के पक्ष को प्रामाणिकता के साथ पेश करने के मामले में वे विशिष्ट हैं। मिसाल के लिए, प्रेम के स्त्री-पाठ की भिन्नता और विशिष्टता को ‘शहादत और अतिक्रमण’ (वंदना राग), ‘उलटबाँसी’ (कविता), ‘रंगमहल में नाची राधा’ (नीलाक्षी सिंह), ‘कठपुतलियाँ’ (मनीषा कुलश्रेष्ठ), ‘सोनमछरी’ और ‘गोरिल्ला प्यार’ (गीता श्री), ‘ग़लत पते की चिट्ठियाँ’ (योगिता यादव) जैसी कहानियों में चिह्नित किया जा सकता है। कविता की अनेक कहानियों में माँ और बेटी के रिश्तों का ऐसा रूप उभरा है जो हिंदी कहानी में पहले अनुपस्थित था। महानगर और गाँव के बीच फँसी लड़की के संघर्षों के जैसे विवरण योगिता यादव की ‘राजधानी के बाहर-भीतर’ में मिलते हैं, उनमें एक ताज़गी है। इस तरह के विषयों के साथ-साथ स्त्री कहानीकारों ने समाज और राजनीति के विभिन्न पक्षों को भी अपना विषय बनाया है जिसके उदाहरण पीछे की गयी चर्चा में देखे जा सकते हैं। यह स्त्री-प्रश्न से बाहर भी अपनी राय रखने के अधिकार की दावेदारी जैसा है जिसमें ये कहानीकार बहुत सफल रही हैं।

आख़िरी बात, इन 25 सालों की हिंदी कहानी को अन्य विधाओं के बगल में रखकर उसका क़द मापने की योग्यता तो इन पंक्तियों के लेखक में नहीं है, पर एक बात वह पूरे आत्मविश्वास के साथ कह सकता है : हिंदी कहानी में संरचनात्मक बदलाव भले ही पिछली सदी के आख़िरी दशक में आये हों, उन बदलावों की दिशा में सार्थक उद्विकास की दृष्टि से और अपने समय के प्रति संवेदनशील अनुक्रिया की दृष्टि से इस सदी की कहानी का महत्त्व असंदिग्ध है। कोई आश्चर्य नहीं कि इपंले को इधर की कहानियों को कमतर माननेवाले जो भी लोग मिले, वे आम तौर पर कहानियों के पाठक नहीं थे और उनके पाठक न होने का कारण ज़्यादातर मामलों में पुराने आस्वाद से बाहर न निकल पाने की दुश्वारी थी।

sanjusanjeev67@gmail.com

 

 

 

 

 

 

 


6 thoughts on “हिंदी कहानी की विकास-यात्रा (2000-2025) : एक मसौदा / संजीव कुमार”

  1. सर आपने बहुत विस्तार में लिखा है,काशीनाथ सिंह की कहानी ‘लाल किले का बाज’ भी एक महत्वपूर्ण कहानी रही इस पूरे कहानी आन्दोलन में।

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  2. “कुछ तो नाज़ुक मिज़ाज़ हैं हम भी, और ये चोट भी नई है अभी….”
    ‘परिकथा” ‘वागर्थ’ और ‘नया ज्ञानोदय’ में मेरी कहानियाँ निरंतर आईं हैं। शेष ‘सौतिया-डाह” निकालने के उद्देश्य से लिखे गए इस उपर्युक्त ‘शब्दों के ढेर’ में गिनाई गई पत्रिकाओं में मैंने कहानियाँ भेजी ही नहीं हैं।
    जब अश्क सौतलेपन का शिकार हुए, नीलाभ जी हुए तो भला भूमिका को क्यूँ ही बख्शा जाए‼️‼️
    शाबास, उद्देश्य कामयाब हुआ।
    अति उत्तम प्रयास।
    एक मासूम बच्चे से खरीदे थे गजरे हमने,
    हम किसी मुजरे से लौट कर नहीं आये हैं.
    हमको उड़ने का सलीका न सिखा रक़ीब मेरे,
    हरे भरे पेड़ से आये हैं, पिजड़े से नहीं आए हैं।

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  3. भौगोलिकता से निकली कहानियाॅं , ग्रामीण -शहरी परिवेश और उनकी व्यथाकथा ( कोरोना काल में और उसके बाद की व्यथा कथा ) की भी एक श्रेणी हो सकती है । क्या विज्ञान पर आधृत ” फेन्टेसी कथा ” हिन्दी साहित्य में नगण्य है ?
    धन्यवाद।

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  4. पूरे मसौदे में कई अंतर्दृटियाँ हैं।
    मेरी निगाह अटकी कहानियों की ओपनिंग संबंधी विवेचना पर।
    प्रेमचंद से दो उद्धरण और समकालीन कहानी से उदाहरणस्वरूप कई उद्धरण पेश करते हुए संजीव जी ने इन्हें कहन प्रधान कहानियाँ कहा है- “जिन्हें हम कहन-प्रधान कहानियाँ कहते हैं, उनमें तो बड़ा हिस्सा कहन में ही चलता है। वहाँ दृश्य का निर्माण करने की जगह इतिहास की तरह ‘घटित’ का बयान किया जाता है और ऐसा करता हुआ वाचक अक्सर एक ऐसे सक्रिय टिप्पणीकार के रूप में दिखता है जिसकी टिप्पणियों में कहानी की आधी जान बसती है।”

    हम अध्यापकों के लिए यह संजोकर रखा जाने योग्य (मसौदा-वत्) आलेख है।

    कहानीकारों और कहानी अध्येताओं के लिए निश्चित ही इसमें कई मूल्यवान, विचारणीय स्थापनाएँ/टीपें होंगी।

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  5. ( क्यों बनाम कैसे )

    हिंदी के सघन संसार में आलोचना की ठोस उपस्थिति है। यह हो सकता है कि बाकी भाषाओं में भी हो और यह भी संभव है कि आलोचना इसी तरह संभव हो लेकिन आलेख इत्यादि अमूमन रचना के उद्देश्य और उसके सार-संसार के इर्द गिर्द ही रहते हैं। कहना न होगा कि इस सीमा के बावजूद अनेक आलेख ऐसे मिले जिन्होंने पढ़ने लिखने की दिशा में मदद किया। समृद्ध किया।

    इस उद्देश्य वाली समीक्षा के बरक्स यह लेख हमें कहानी की ‘बनत’ की बारीकियों की तरफ़ ले जाता है। तथा इस तरफ भी कि रचना प्रक्रिया में बीते दशकों में कैसा बदलाव आया है? यह एक अलग बात लगी। चेखव की बन्दूक के मायने अब की कहानियों में कैसे बदले हैं, इस तरफ़ इशारा करता यह मसौदा प्रभावित करता है।

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  6. आदतन हिंसा के लिए बन्दूक की छाया भी दिख जाना बहुत कुछ कह जाता है। सवर्ण स्त्री की मनोवैज्ञानिक अंतर्विरोध की मेरी कहानियाँ, हवेली, डुप्लिकेट चाबी और डबरे का पानी भी देखी जानी चाहिए जो हंस और कथादेश में छपी थीं।

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