वरिष्ठ नवगीतकार जगदीश पंकज की निर्दुष्ट छंद-योजना ‘शक्ति के उन्माद में इतराते जग के स्वघोषित चौधरी ‘ पर तीखा व्यंग्य कर सकती है तो ‘सम्मान सहित छूटकर अभिनंदित होते अपराधियों’ पर लानत भी भेज सकती है। नवगीत का यह नया तेवर है।आइए, आज पढ़ते हैं उनके पाँच नवगीत।
(1)
ऊब का उत्सव मनाने
ऊब का
उत्सव मनाने के लिए
चुप्पियाँ लिपिबद्ध होने को चलीं !
पेड़-पौधों , खेत-बागों में खड़ा
जब पसीना
हँस रहा है खिलखिला
शहर के उद्यान में सहमा हुआ
चल रहा
योगासनों का सिलसिला
आपदा में
अवसरों को खोजने
पीढ़ियाँ अवसाद ढोने को चलीं !
अब घुटन
आक्रोश की प्रतियोगिता
सनक को उन्माद से कहने लगी
युद्ध की
शब्दावली को छानकर
संतुलन का छद्म ले बहने लगी
ध्वंस से
जर्जर हुईं खुद्दारियाँ
शान्ति-पथ को खुद भिगोने को चलीं !
स्वयंभू
जग का स्वघोषित चौधरी
शक्ति के उन्माद में इतरा रहा
पीड़ितों की
आहतों की चीख सुन
वह लगाता ही रहा है कहकहा
भूख के
भूगोल को कर अनसुना
मान्यताएँ पाप धोने को चलीं !
जो किसी
आवाज के मोहताज थे
चुप्पियों को तोड़ आगे आ सकें
बेबसी की
साँकलों में जो बँधी
नये युग की रोशनी को ला सकें
अमन की
प्रतिबद्ध निष्ठाएँ सजग
प्रेममय अनुभव संजोने को चलीं !
(2)
न्याय और निर्णय में अंतर दीख रहा
न्याय और निर्णय में अंतर दीख रहा
खंडपीठ पर
देवालय की है छाया ।
लम्बित पड़ीं याचिकाएँ हैं वर्षों से
याचक पेशी पर आ
उम्र गुजार रहे
साक्ष्य सुरक्षित नहीं रह सके हैं घर में
आरोपी पाते पग-पग
सत्कार रहे
छोड़े हैं सम्मान सहित जो अपराधी
वे अभिनन्दित हुए
सत्य भी सकुचाया ।
जहाँ धर्म के संस्कार संदिग्ध हुए
नारों हुंकारों तक
निष्ठा सीमित है
वहाँ गरजती हुई घोषणाएँ लेकर
भक्तिभाव की कैसी
श्रृद्धा अंकित है
जन्म-जाति निर्णायक दंड-संहिता में
मानवता का पाठ
न अब तक दुहराया ।
बहुसंख्यक भय ग्रस्त हो रहा जब फिर भी
गरज रहा कहकर
भविष्य की शंकाएँ
वहाँ अल्पसंख्यक अस्तित्व बचाने को
कहाँ-कहाँ जाकर
कैसी कसमें खायें
न्याय-संहिता को रख किसी तिजोरी में
बंद आँख रख
दरबारी सुर में गाया ।
(3)
छद्म से बचते-बचाते भी हमें
छद्म से बचते-बचाते भी हमें
समय से हर बार
निर्वासन मिला ।
खो दिया हमने
नियंत्रण ही स्वयं
भीगते मन पर सुखद बरसात में
यह नहीं सोचा
कभी विश्वास को
तोड़ने कुछ लोग बैठे घात में
राजधानी के सजे हर द्वार से
सिर्फ उड़ता
सहज अभिवादन मिला ।
एक कारागार में
रहते हुए
सब अपरिचित ही रहे दस्तूर से
सांत्वना डूबी रही
उपचार में
शब्द पहुँचाये गये हैं दूर से
बेतहाशा दौड़ में हारा थका
हाँफता सा
मौन अपनापन मिला ।
आदमीयत की
कसौटी पर खरा
कौन उतरेगा नदी में चाव से
सुर्खियों में जो
रहेगा रात-दिन
बच सकेगा वह नहीं दुहराव से
सिर्फ बहलाकर ठगे जाते रहे
सत्य को भी
मात्र आश्वासन मिला ।
जब न अनुशासित रहे
आक्रोश को
द्रोह के अनुपात से मापा गया
हर किसी संदर्भ में
कसते हुए
साँच को मिलता रहा जुमला नया
निष्कपट संवेदना को ही सदा
बस उपेक्षा
और विस्थापन मिला ।
जिस जगह हम हैं
वहाँ पर देखिये
कभी करुणा के नहीं छींटे मिले
यातना अपमान की
शब्दावली
और अत्याचार के हैं सिलसिले
जहाँ अमृतकाल का गुणगान है
वहाँ हमको
क्रूर निष्कासन मिला ।
(4)
खोजने को आस के पंछी
खोजने को आस के पंछी
हम मुंडेरों पर
चढ़े जाकर ।
देखकर संकेत
कुछ बिखरे
शब्द के अनुमान तक आये
और अटकल से
मिले उत्तर
हर परीक्षा में रहे छाये
खड़खड़ाहट नर्म पत्तों की
सुन रहे हम
रोज़ सकुचाकर ।
हम सदा
आश्वस्तियाँ सुनकर
शिखर के उद्घोष में डूबे
पर समझ
पाये नहीं अब तक
घोषणा में छिपे मंसूबे
क्रूर मैलापन छिपाने को
झूठ फैलाया
कसम खाकर ।
सहज निष्ठा के
सहारे कब
धर्म-सत्ता आग में कूदी
घृणा के
व्यवहार ने ही तो
यातना की देह आ छू दी
पंथ की
सापेक्ष कट्टरता
कहाँ छोड़ेगी हमें लाकर ।
वहाँ कल्पित
क्रोध को लेकर
ढो रहा काँवड़ श्रवण थककर
मित्रवत्
सौहार्द की फसलें
सूख जाती हैं जहाँ पककर
प्यार के
प्यासे परिंदों को
पास लायें पंख सहलाकर ।
(5)
जब उत्तर-आधुनिक हो गये
जब उत्तर-आधुनिक हो गये
फिर क्यों जीते हैं अतीत में ।
गलियों में
हड़कंप मचा है
श्रद्धा के निर्मूल विषय का
सड़कों पर
फैला सन्नाटा
संशय और अजाने भय का
विश्वासों पर प्रश्नचिह्न हैं
लेकिन उलझे हार-जीत में ।
मिला विभाजन
जिन्हें सनातन
पोथी-पतरों उपदेशों में
औरों की छोड़ो
अपनों को
बाँट दिया है आदेशों में
समता के संदेश दब गये
नयी पुरानी मिली रीत में ।
किस विकास के
लिए होड़ में
दौड़े दुनिया की क़तार में
शुभ मुहूर्त में
घृणा सजाकर
लगे हुए हैं आर पार में
ज्ञान बाँटने लगे विश्व को
हर अवसर पर बातचीत में ।
विश्वगुरु
बन गये स्वयं ही
दंभ पालकर अपने घर में
कसर नहीं कोई
रह जाये
रोज़ बदलते आडम्बर में
पीछे देख चल रहे आगे
विश्व विजय करने सुभीत में।
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बेहतरीन नवगीत ।
कथ्य और शिल्प दोनों उत्कृष्ट ।