नौ कविताएँ / आशुतोष प्रसिद्ध


कवि का दु:ख एक बार कविता में आ जाए तो ‘उसका’ दु:ख नहीं रह जाता। यह बात आशुतोष प्रसिद्ध की कविताओं को पढ़ते हुए मन में बार-बार कौंधती है। ‘हमारी हर रिरियाहट पर मिला पैना /पैना झेलते झेलते पत्थर का हो गया पुट्ठा /जाबा बाँधे बाँधे हम सीख गये साँस पीकर जीना’– इस तरह की लाइनों को आप एक निजी दुख का कथन भर कैसे कह सकते हैं !

आशुतोष की काव्यभाषा और मुहावरे में एक ताज़गी है जो कविताओं के तल में व्याप्त अवसाद को धूसर और भारी नहीं रहने देती। वे अयोध्या के निवासी हैं। वाणिज्य और हिंदी में परास्नातक हैं। अनुमान लगाया जा सकता है कि उनकी कथित ‘प्रसिद्धि’ में अयोध्या, वाणिज्य और हिंदी तीनों का कुछ-न-कुछ योगदान होगा।

 

अधसोई आँखों का सपना

हम पहली बार कहाँ मिले
इसका कोई ठीक ठीक उत्तर नहीं है
उत्तर खोजा जा सकता है
पर उसका कोई अर्थ नहीं होगा

हम खेत के मेड़ से आते जाते
हल और जुआठ में नधे बैलों की तरह मिले
देखकर नथुना फुलाया
पूँछ हिलायी और आँख से पूछ लिया
पेट भर चारा मिला था कि नहीं ?
जवाब मिलता इससे पहले ही
पुट्ठे पर दो पैना खाकर चल पड़े

हमसे जो कहा गया हम वो करते गये
हम नहीं जानते थे
तत, पली, नौ और आरि का अर्थ
हम पैना झेलते गये
चलते गये
और जल्द ही समझ गये
की किस ध्वनि पर सीधी रेखा में चलना है
किस पर बीच में
और किस ध्वनि पर
मेड़ के किनारे चलना है

हमारे पास रुकने का विकल्प नहीं था
न ही आसपास की हरियाली से कुछ खाने का
हमारे मुँह पर समय नाम का जाबा कस दिया गया था
हम भाग नहीं सकते थे
हमारी नाक छेद करके
कस दी गयी थी दुनिया समाज नाम की
मोटी नायलॉन की रस्सी

हम भूल गये कि हमारी भी आँख हैं
हमने सारी दुनिया की आँख देखी
जो उसकी आँखों को सही लगा वही किया
मारते रहे मन लगातार
घुटते रहे यह सोचकर कि
एक दिन तो दिखेगी दुनिया को
हमारी डबडबायी हुई आँख

हम देते गये
दुनिया लेती गयी
कई कई बार तो छीन लिया गया हमसे
हम खड़े हो जाते तो दुनिया
हमें बात से भी मारती और पैने से भी

अपना सब खो चुकने के बाद भी
हम नहीं सुधरे
माँगते रहे फर्लांग भर ज़मीन
आते जाते मेड़ों पर रुक रुक कर
नथुने फुलाकर पूछते रहे एक दूसरे का हाल

हम रिरियाते रहे
दुनिया नहीं पसीजी
हमारी हर रिरियाहट पर मिला पैना
पैना झेलते झेलते पत्थर का हो गया पुट्ठा
जाबा बाँधे बाँधे हम सीख गये साँस पीकर जीना
और तब हमने घोषणा की
‘यह दुनिया प्रेम करने वाले के लिए नहीं’

हम पर आरोप लगे
हमें हर जगह से धकियाया गया
हमें कहा गया तुम्हें प्रेम करना नहीं आता
निकलो यहाँ से व्यभिचारी
यह दुनिया तुम जैसों के लिए नहीं है
हम निकल गये
हमने दुनिया से अलग बनायी एक दुनिया
हमारी दुनिया में आँख कम है
हृदय ज़्यादा
औपचारिकता कम है
भावना ज़्यादा
यहाँ सब सुखी हैं।

000

 

जन्मदिन अगोरते हुए

बैठे बैठे कैलेंडर में गिन रहा हूँ महीना
यह नवाँ,
अगला दसवाँ,
ग्यारहवें महीने में मुझे लग जायेगा
सत्ताइसवाँ
कमाता नहीं हूँ पर एक नवाँ

जन्मते ज्योतिष ने नाम रखा था भूपति
जबकि अब तक न किसी का पति हूँ
न बित्ता भर है कहीं मेरी अपनी भू

कहा था
इनके राशि स्वामी हैं राहू
करेंगे कुछ अलग
चलेंगे नयी राह
भाँप लेंगे होनी को पहले
उपस्थित होकर भी
अनुपस्थित रहेंगे हर जगह
अरे छाया हैं छाया

रहा भी वैसे ही
तस्वीरों से डरता रहा
लोगों से बचता रहा
भीड़ में अकेले की तरह रहा
और अकेले में भीड़ की तरह

आसपास उपजती लगभग चीज़ में मेरा दिमाग रहा
पल्लवित होती योजना में रहा मेरा प्रबंधन
पर मेरा नाम नहीं रहा कहीं

मैं गेहूँ में घोड्जवा था
सरसों में लमेरा

हर जगह लगता रहा
आ गया हूँ ग़लत जगह

जबकि मैं रहना चाहता था
देह में रीढ़ की तरह
पर नहीं रह सका
रह गया वही
जिससे भागता था

न जाने कब तक भागना
न जाने कब तक बचना है

000

 

छूटे हुए दोस्तों को देखकर

वे सामने से निकलते हैं अक्सर
देखता हूँ
पर देख रहा हूँ
यह ज़ाहिर करने से बचता हूँ

खड़ा हो जाता हूँ कुछ पल
कहीं किसी दीवार की ओट से लगकर
जल्दी में होता हूँ तो निकल जाता हूँ
सिर सीधा किये उसके बिल्कुल बगल से

इतने बगल से
जितने बगल होने पर
पहले वह और मैं
पीठ पर हाथ रख कह लिया करते थे
‘देख लिया जाएगा यार, लोड न लो’

जानता हूँ जब भी मिलेंगे
भीतर टूटकर बिखरे काँच
चुभेंगे
दबी हुई धूल उड़ेगी

अच्छा है बचती रहें आँखें
आँखों में देखने से
जो काँच बिखरे हैं वो बिखरे ही रहें
जो धूल दबी है दबी ही रहे न उठे

बचता रहूँगा यूँ ही
जब तक थक नहीं जाता
बचते रहने से

बचते रहने से बना रहेगा भ्रम
भूल जाने का
भुला दिये जाने का
अपने सच्चे होने का
और दूसरे के झूठे

000

 

आईने में देखते हुए

खड़े होने चलने और दौड़ लेने की प्रक्रिया में
अनगिनत निशान मिले हैं देह पर

हर निशान एक स्मृति है
और हर स्मृति अलग दिन
जिसे छूकर जब जहाँ जिस दिन
लौटना चाहता हूँ
लौट लेता हूँ

सीने के सबसे निचले हिस्से को छूता हूँ
तो पेट के बल घिसटने के दिन में लौट जाता हूँ

सिर के पिछले हिस्से को छूकर
लौट लेता हूँ
गिर गिर कर खड़े होने के दिनों में
अगले हिस्से को छूता हूँ
तो याद करता हूँ
आरी कोना गोड़ने के दिन
मेड़ कटनो की बरजोरी के दिन
हाँफ हाँफ कर मेड़ डाँड़ बाँधने के दिन

तर्जनी उँगली पर बना निशान छूकर
उन दिनों में चला जाता हूँ
जब आधा पेट खाकर
पूरा काम करती थी मेरी माँ
हमसे ज़्यादा सहेजती रहती थी
बड़ी माँ के बच्चों को
पसीने से लथपथ
सिला करती थी हमारे लिए नये कपड़े
घर के पुराने कपड़ों से

गाँठ पर लगे टाँके छूता हूँ
तो उन चेहरों को याद करता हूँ
जिन्होंने वादा किया था
छोटी साइकिल देने का जन्मदिन पर
जो आज तक नहीं आयी

मोटरसाइकिल दौड़ाते हुए
स्मृति बार बार ले जाती है उन दिनों में
जब मेरे छूने से
गन्दी हो जाती थी किसी की मोटर साइकिल

अब जीवन बदल गया
जो थे कमज़ोर
वे हो गये हैं मज़बूत

कभी तीन लोगों की कमाई में नहीं अँटती थी
दो वक़्त की दाल सब्ज़ी और प्रेम की बोली
अब एक में अँट जाती है सब

जिनसे झुका नहीं जाता था खेत में
अब दिनभर झुके रहते हैं
भूल गये ‘खेती नाशे तीन’ का समीकरण

जो सबसे ईमानदार थे
उनके पास है सबसे ज़्यादा धन सम्पत्ति

जो सबसे मीठे थे
उन्होंने सबको दिया ज़हर

यह कुछ ऐसे निशान हैं
जिनकी कोई निशानी नहीं

जिनकी स्मृतियों तक लौटने के लिए
कुछ नहीं छूना पड़ता
कुछ नहीं करना पड़ता
बस ख़ुद को देखना पड़ता है आईने में

मैं अभी आईने के सामने खड़ा हूँ।

000

 

मुझे उल्टा पैदा होना था

दादी की बात से
और जो पीठ चमक जाने पर
लात लगवाने आते थे उनसे
पता चलता है
पिताजी उल्टा पैदा हुए थे

उल्टा पैदा होने का
उनके जीवन पर लात लगाने के अलावा क्या प्रभाव है
मुझे नहीं दिखता कुछ
उनके सारे काम सीधे हैं
सारी बात सीधी है
मन भी बहुत सीधा सादा है

रात देर हो जाये कहीं
तो फोन पर फोन करते हैं
फोन न उठे तो रोने लगते हैं
कभी डाँट दिया
तो ख़ुद ही आकर माफ़ी माँग लेते हैं
मुश्किल से कभी इरिटेट होते हैं
12 घण्टे ऑफ़िस में झौं झौं झेलने के बाद भी
फोन करो तो कहते हैं
‘हाँ बेटा..’

खेत भरना हो तो सारा मेड़ नंगे पाँव चलकर देख लेते हैं कि कहीं किसी जीव ने अंडा तो नहीं दिया है।
चीटियों की बांबी हो तो मेड़ बना देते हैं
कहते हैं इतने में क्या ही पैदा कर लूँगा

उल्टा पैदा होने के बावजूद वो इतने सीधे हैं
जितना सीधे पैदा होने वाले नहीं होंगे

मैं उन्हीं का खून हूँ
माँ से पूछने पर पता चलता है
मैं सीधा पैदा हुआ था
मैंने पिता से सीखा है जीवन जीना
लोगों को सम्भालना
किसी की याद में रो पड़ना
पर मुझसे हर काम उल्टा होता है

उल्टा यहाँ तक कि जिसे देना चाहता हूँ प्रेम
दे देता हूँ घुटन
जिसे देना चाहता हूँ ख़ुशी
दे देता हूँ आसूँ
खड़ा होना चाहता हूँ जिसके साथ
दौड़ना पड़ता है उसे अकेले
हल्का करना चाहता हूँ जिसका जीवन भार
कर देता हूँ उसे और भारी

जहाँ सुनना चाहता हूँ ‘होने से जीवन आसान हो गया है’
वहाँ सुनता हूँ ‘ज़िन्दगी बोझ बनकर रह गयी है’

गाँव में एक कहावत है
‘जहाँ गयी लोला रानी वहीं परा पाथर पानी’
यह मुझ पर बाक़ायदा लागू होता है
लगता है लोला रानी मेरी ही कोई पुरखिन थी
उन्हीं का खून ढो रहा हूँ
जो वंशानुगत मिला है मुझे
जी रहा हूँ वह जो नहीं जीना है
कर रहा हूँ वह जो नहीं करना है
मैं इतना कर्मजला हूँ
कि मेरा न होना होने से भला है

काश, मैं भी पिताजी की तरह उल्टा पैदा हुआ होता
तो लोला रानी का खून भी उल्टा बहता मुझमें
और मैं जी पाता सीधा जीवन

000

 

सपना

यहीं आते हैं कई ऐसे भी विचार
जो विचार में नहीं थे

यहाँ ज़्यादा हँसता हूँ
ज़्यादा रोता हूँ

यहीं फूलती है साँस
जैसी कभी नहीं फूलती जीते जी

यहीं मैं चूम लिया जाता हूँ
उससे जो लजा जाती है चूमना शब्द से ही

हर कहीं से मरा हुआ
यहीं जी उठता हूँ मैं

इसी की ओट में
सोता हूँ मैं घण्टों

यही है वह जगह
जो बचाये रखता है वैसे
जैसे बचा रहना चाहता हूँ

जीवन सपना है
सपना जीवन है
जिसमें मैं मैं होता हूँ

000

 

सत्यासत्य

कई दिन का आया
जाते जाते भी दिख जाए
तो लगता है मिल गया पूरा

जिसके इंच इंच पर रखना था होंठ
पूछना था सुख से हाल
उसकी उँगली का पोर भी छू जाए तो लगता है
ढह गया कुछ भीतर
जान गया सब हाल चाल

सोचे हुए का
अंश भर भी मिल जाए
तो कई कई दिन
कूदता हूँ खुशी से

बहुत कुछ का सपना
हाथ आता है
कुछ कुछ
ज़्यादातर तो कुछ भी नहीं

फिर भी जब कोई कहता है
और बताओ
दोनों गालों को खींचकर
मुस्कुराने की सी भंगिमा बनाकर
कहता हूँ
‘एकदम मस्त, अपना बताओ ‘

000

 

क्या इस दुनिया से जाना इतना मुश्किल है हेमंत
(पार्श्वगायक हेमंत कुमार मुखोपाध्याय को समर्पित)

न बनारस में जन्मा हूँ
कि अखड़ई से दरेरा देकर निकल लूँ
एक घाट पर जी लूँ
और दूसरे पर जल जाऊँ

न कलकत्ते में पला बढ़ा हूँ
कि संस्कार संस्कृति और नवीनता के द्वंद्वों
के बोझ तले दबके मर जाऊँ

मेरे पास मरने के बहुत कम विकल्प हैं
मैं या तो अज्ञानता से मर सकता हूँ
या भीतर रह रह कर फुफकारती हुई ऊब से

कहीं भी जाता हूँ
जाते ही ऊबने लगता हूँ
जितनी हड़बड़ी और चाव से जाता हूँ
उतनी ही बे-दिली
और ना-उम्मीदी से लौट पड़ता हूँ

क्या चाहता हूँ नहीं पता
बस ऊबता रहता हूँ
दुनिया में रहकर दुनिया से भागता रहता हूँ

तुम कैसे रह लिये इतने दिन, हेमंत ?
जबकि तुम ठीक समय पर जान गये थे कि
‘तिरी दुनिया में जीने से तो बेहतर है कि मर जाएँ’

क्यूँ नहीं मर गये उन्हीं दिनों ?
कौन-सा आकर्षण है इस दुनिया में जो
तुम्हें अब तक यहीं रोके हुए है
यहीं आवाज़ बन गूँजते रहते हो हर दिशा में

मुझे स्पष्ट करो कि तुम ये बता रहे हो
या पूछ रहे हो कि
‘जाने वो कैसे लोग थे
जिनके प्यार को प्यार मिला’

किसी को प्यार नहीं मिला, हेमंत
हर कोई अकेला है
हर कोई ऊबा हुआ है
हर कोई इस दुनिया में जीने से बेहतर
मर जाने को कहता है
फिर भी जी रहा है
जैसे तुम जी रहे थे
अपनी देह के साथ के कुछ आख़िरी दिन
बांग्लादेश में गाते हुए
पद्मश्री ठुकराते हुए
ईश्वर की आवाज़ बनकर भी
ऊबते छटपटाते हुए

क्या इस दुनिया से जाना इतना मुश्किल है, हेमंत ?
तुम तो अब दैहिक कष्टों से मुक्त हो लिये
मेरा क्या होगा, हेमंत
कब तक जीना पड़ेगा ऐसे ऊबते हुए
भागते हुए ..

000

 

फ़रीदा, उसे जाने दो
(फ़रीदा ख़ानुम को समर्पित )

दुनिया देखने के लिए चाहिए
कई जोड़ी आँखें
कई धड़कते हृदय
कई आवाज़ें

दो जोड़ी आँख
कितना देख पायेगी दुनिया?

मत कहो
‘चंद घड़ियाँ यही हैं जो आज़ाद हैं’
बताओ उन घड़ियों के बाद क्या?

फ़रीदा
तुमने कर ली ज़िद
रो लिया
पकड़ लिया हाथ
कह दिया अपना सच
अब जाने दो

समझो वह जो जाने वाला समझ रहा है
केवल प्रेम भर नहीं है जीवन
प्रेमी भर नहीं है दुनिया
समझो फ़रीदा
स्वीकार करो उसकी ज़िद
मत रोको उसे
जाने दो

रोकने के लिए
कभी कभी न रोकना ज़्यादा ज़रूरी होता है।
मत कहो
‘जान जाती है जब उठ के जाते हो तुम’
मर जाओ
या जाने दो

उसे जाना ही था, फ़रीदा

मेरा दिल बैठा जा रहा है
मत गाओ अब
चुप हो जाओ
वह चला गया
फ़रीदा

000

ashutoshprasidha@gmail.com


10 thoughts on “नौ कविताएँ / आशुतोष प्रसिद्ध”

  1. दुख जब कविता में आ जाए तो वह निजी नहीं रहता ,वह अपने साथ कितनों को बहा ले जाता है । दुख की स्मृतियों से उपजी सुन्दर सहज और सधी हुई कविताएँ । कवि को बधाई और शुभकामनाएँ 💐

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  2. लंबी दौड़ का कवि है।

    आशुतोष को मेरी शुभकामनाएं।

    Reply
  3. आशुतोष की कविताएं पढ़ता रहा हूं। कुछ इस तरह कि ये तो मेरी ही कविताएं हैं। कोई कवि आपकी निजता को झकझोर दे, ऐसा कम हो पाता है। बहुत बेचैनी है इनमें। खासकर हेमंत कुमार पर लिखी कविता तो लाज़वाब है।

    आशुतोष को बहुत बहुत शुभकामनाएं।

    Reply
  4. बहुत सुन्दर। बहुत शुभकामनाएं।

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  5. मुझे खीझ हो रही है कि आशुतोष अयोध्या के हैं और मेरा उनसे परिचय नहीं है।

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