साहित्य-दृष्टि वस्तुतः जीवन-दृष्टि का ही विस्तार है, यह बात चेखव पर लिखी गई महेश मिश्र की इस छोटी और गहरी टिप्पणी को पढ़ते हुए महसूस होती है। महेश मिश्र आला दर्जे के पढ़ाकू ही नहीं हैं, पढ़ी हुई चीज़ों पर विचार करने के उनके तरीक़े में एक विलक्षण ताज़गी भी है, जिसे हिंदी आलोचना के प्रचलित-चिराचारित मुहावरों के असर में न आने का परिणाम मानना चाहिए।
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“जब कोई युवा होता है, तो अश्लीलता केवल मनोरंजक और महत्वहीन-सी बात लगती है, लेकिन यह धीरे-धीरे व्यक्ति को अपने चंगुल में ले लेती है। यह धुंध उसके मस्तिष्क और रक्त में ज़हर की तरह समा जाती है, और वह एक पुराने शराबखाने के बोर्ड जैसा हो जाता है…ज़ंग खाया हुआ, जिस पर कुछ चित्रित है, मगर अब समझ पाना असंभव।”
— मैक्सिम गोर्की, चेखव के कहानी संग्रह की भूमिका में
चेखव की दृष्टि में एक विशिष्ट कोमलता है, ऐसी कोमलता जो जीवन की सभी कपटपूर्ण और विनीत माँगों और विचित्रताओं को स्नेह से देख सकती है। इस दृष्टि में कोई हिंसा नहीं है, उग्रता नहीं है, निर्णयात्मकता की जल्दबाज़ी नहीं है। उनके पास दृष्टि की वह विरल सचाई है जो इतनी सीधी और स्पष्ट है कि आत्मा में हलचल ज़रूर पैदा कर देती है।
वे शोर नहीं मचाते, पर जैसे किसी गहरी जगह को छू लेते हैं। किसी ख़ामोश कमरे में बैठा कोई वृद्ध, जो सिर्फ़ चाहता है कि कोई उसकी बात सुन ले….चेखव उसकी चुप्पी की भी भाषा जानते थे। और जब वे उसकी कहानी लिखते हैं, तो हम उसमें उस समाज की परछाईं भी देख लेते हैं, जिसने इस वृद्ध को सुना नहीं।
मैक्सिम गोर्की ने लिखा कि चेखव अश्लीलता के अत्यंत कठोर न्यायाधीश थे। लेकिन यह कठोरता किसी नैतिक दंभ से नहीं आती थी। वह इसलिए थी कि चेखव के भीतर जीवन के प्रति एक गहरी श्रद्धा थी…एक ऐसी आकुलता जिससे वे मनुष्य में सहजता, सादगी और सौंदर्य की तलाश करते थे। और जब उन्हें उसमें बनावटीपन, दिखावा, चालाकी और भीतर से सड़ा हुआ भाव मिला, तो उन्होंने बिना चीखे-चिल्लाये उसे स्पष्ट कर दिया।
चेखव के पात्र भव्य नहीं हैं। वे टूटी, बिखरी हुई आत्माओं से बने हुए हैं। वे झूठ नहीं बोलते, पर हमेशा सत्य भी नहीं जानते। वे अधूरे हैं, पर ईमानदार हैं। और इसलिए चेखव का लेखन, आज के तमाम ‘पूरा दिखने’ वाले साहित्य की तुलना में कहीं अधिक संपूर्ण बोध देता है।
किसी पात्र के व्यर्थता-बोध को, उसकी धीमी घुटन भरी मृत्यु को, उसकी मौन उपेक्षा को चेखव जितनी सचाई से लिख सकते हैं, वैसा बहुत कम लेखक संभव कर पाते हैं। उनमें करुणा थी, पर वह करुणा आपको अपनी निष्क्रियता के साथ सहज नहीं रहने देती। वह आपको भीतर से कुरेदती है कि क्या तुम भी किसी को इसी तरह अनसुना तो नहीं कर रहे?
चेखव की अश्लीलता-विरोधी दृष्टि बहुत समग्र दृष्टि है और यह दरअसल उस ‘भाव-हीनता’ का प्रतिरोध है जो जीवन की जगह ‘प्रदर्शन’ को रख देती है। कोई दृश्य अश्लील इस कारण नहीं होता कि वह नग्न है बल्कि इसलिए कि उसमें जीवन की गरिमा को अपमानित करने की वृत्ति होती है। चेखव ने इस वृत्ति को बड़ी सीधी सपाट शैली के माध्यम से उजागर किया…बस अपनी बेधक निगाह से।
वे किसी निर्णयात्मक भाषा में नहीं बोले। उन्होंने शायद ही कभी कहा हो कि यह पात्र गलत है। लेकिन जब आप उन्हें पढ़ते हैं, तो आपके अंदर एक गहरी बेचैनी पनपने लगती है कि यह जो व्यक्ति जीवन को इस तरह से बर्बाद कर रहा है, उसकी विवशता और विडंबना दोनों हमारे भीतर कैसे चुभ रही हैं। उस पात्र को दया नहीं चाहिए होती, उसे पहचान चाहिए होती है। और यही पहचान जिसे चेखव अपने पाठकों से करवाते हैं। यही तो उनके लेखन की सबसे गंभीर नैतिक भंगिमा है।
पात्रों के जीवन से यह आत्मीय परिचय अर्थात् आपके अपने संसार की अपूर्णता से अधिक गहरा परिचय आपके हिस्से आयेगा।
आज जब हर चीज़ का एक रंगीन आवरण है…भावनाएँ, संबंध, प्रेम, मृत्यु…और सब कुछ या तो रोमांटिक है या भयानक, चेखव हमें एक तीसरे स्थान की याद दिलाते हैं: जहाँ जीवन जैसा है, वैसा ही रखा जा सकता है। बिना साज सज्जा के, बिना आवरणों के।
उन्होंने कहा था:
“तुम पूछते हो, जीवन क्या है? यह वैसा ही है जैसे कोई पूछे, गाजर क्या है? गाजर गाजर है, और हम इससे अधिक कुछ नहीं जानते।”
यह कोई सरलता से कही गई बात नहीं है। इसमें एक गहरी जड़ पकड़ सकने वाली विनम्रता है, दृढ़ता है, स्पष्टता है, यथा-तथ्यता है। यह मान्यता है कि जीवन की व्याख्या से अधिक ज़रूरी है उसका अनुभव। और अनुभव तभी संभव है जब हमारी संवेदना किसी नकली बेढब शोर से ढकी न हो।
चेखव की कहानियाँ हमें यह नहीं सिखातीं कि कैसे जिया जाए। वे यह भी नहीं कहतीं कि हमें क्या करना चाहिए। वे केवल इतना करती हैं कि हमारे भीतर से एक परत धीरे-धीरे हटती है। और जब वह हटती है, तो हम पाते हैं कि हमारे भीतर कोई अस्पष्ट दर्द, कोई छुपी हुई आवाज़, कोई भूला हुआ करुण भाव था…जिसे हमने कभी गंभीरता से लिया ही नहीं।
और शायद यही साहित्य का अंतिम प्रयोजन भी है कि हमें हमारी ही दबी और गुप्त संवेदनाओं से मिलाये।
चेखव की कहानियाँ पाठक को भावुक नहीं बनातीं, वे उसे थामती हैं एक ऐसी जगह पर जहाँ आपके भीतर कुछ अटका हुआ रह गया है। वे किसी नारे की तरह नहीं बोलतीं, बल्कि ऐसे बोलती हैं जैसे कोई आपका हाथ थामकर कहे, “देखो बन्धु, यहाँ कुछ ऐसा है जिसे तुम हमेशा टाल देते हो, मगर अब वक़्त है कि इसे देख लो।”
उनकी कला में सबसे अनोखी बात यही है कि वे मनुष्य को उस क्षण में पकड़ते हैं जब वह अपनी सबसे साधारण अवस्था में होता है— न छल रहा होता है, न बहुत चमक रहा होता है, बस जीवन के बोझ को चुपचाप खींचता हुआ चल रहा होता है। उसी साधारणता में चेखव की असाधारण संवेदना उतरती है।
और शायद उसी जगह हम पाठक भी थोड़े उघड़ जाते हैं।
वे किसी भी पात्र को उपेक्षा या घृणा से नहीं देखते, हालाँकि वे उसे बचाते भी नहीं। वह बूढ़ा कोचवान जो बेटे की मौत के बाद सबको कुछ कहने की कोशिश करता है, और कोई नहीं सुनता। अंत में वह अपने घोड़े से बात करता है। यहाँ कोई ड्रामा नहीं है। सिर्फ़ एक धीमी, घुलती हुई करुणा है। एक ऐसा मौन, जिसमें हर संवेदनशील पाठक देर तक अटका रह जाता है।
चेखव हमें उस बेचैनी की आदत डालते हैं जिससे हमारा समय छुटकारा पाना चाहता है। आज की दुनिया तेज़ी से सब कुछ तय करना चाहती है—क्या सही है, क्या बुरा, कौन पीड़ित है, कौन खलनायक। चेखव इन सब प्रश्नों को स्थगित करते हैं। वे पाठक को उस जगह लाकर छोड़ देते हैं जहाँ कोई उत्तर नहीं है, बस एक प्रश्न है—“तुम इस सबके बीच कहाँ हो? अपनी जगह भी तो तय करो।”
आज जब लेखन की दुनिया में, खासकर दृश्य माध्यमों में, संवेदना एक उत्पाद बन चुकी है, रील का युग संवेदना के कारोबार का युग लग रहा है जहाँ मासूमियत भी व्यापार के लिए पण्य बन चुकी है, ऐसा लग रहा है कि सतह पर तैरने वाली कहानियाँ अब हमें रुला भले देती हैं, पर शायद भीतर तक छूती नहीं। उनका उद्देश्य अब सच्चाई नहीं, प्रभाव डालना है।
अश्लीलता अब दृश्य या शब्दों की बात नहीं रह गई। वह उस स्थिति में है जहाँ करुणा खोखली बनावट बन जाए, जहाँ प्रेम सिर्फ़ दृश्य विन्यास हो, और जहाँ पीड़ा का कोई नैतिक वज़न न रह गया हो।
चेखव की नज़र से देखें तो यह अश्लीलता और कुछ नहीं, बल्कि संवेदना का दिखावटीपन है। और इसका विरोध किसी घोषणा से नहीं किया जा सकता। इसका विरोध तो वही दृष्टि कर सकती है जो भीतर से इतनी साफ़ हो कि उसमें कोई मिलावटी रंग न हो, कोई जाले न हों, कोई अतिरिक्त इरादे न हों।
चेखव ने कभी समाज का ‘सुधार’ नहीं किया। उन्होंने कोई महानायकों से भरी कथाएँ नहीं रचीं। लेकिन वे हमें धीरे-धीरे, बहुत शांति से, यह समझाते हैं कि मनुष्य का सबसे बड़ा संकट यह नहीं कि वह ग़लत करता है, बल्कि यह है कि वह अपने भीतर के खोखलेपन से भागता है।
आज की सबसे बड़ी ज़रूरत शायद वही है उस अंतराल की ओर लौटना। यह स्वीकार करना कि जीवन कई बार बहुत अधूरा, बहुत असहाय होता है, लेकिन उसकी गरिमा उसी अधूरेपन में है।
ध्यान रखने की बात है कि अश्लीलता को बेनक़ाब करना कोई उत्तेजक लेखकीय युद्ध नहीं है…यह एक करुण, सटीक, नैतिक संवेदना का अमुखर-सा हस्तक्षेप है।
संक्षेप में, चेखव को पढ़ना मनुष्यता को उसकी संपूर्णता में समझने की सलाहियत देने वाला अनुभव है और यह अनुभव नकली भंगिमाओं से रहित है, शोर से रहित है और बिलकुल जीवन की तरह थोड़ा उलझा हुआ है और फिर भी सरल है, दृष्टव्य है अगर आप देख सकें। चेखव हमें इस निगाह को देने में सक्षम लगते हैं।







महेश मिश्र को पढ़ना हमेशा समृद्धकारी होता है।
चेखव की निगाह पर उन्होंने जैसी निगाह डाली है वह पाठकों को रचनाकार के अर्जित तक पहुँचा देती है।
चेखव को पढ़ रहा था , कि , महेश मिश्र को समझ रहा था , यह ऊहापोह अन्त तक बना रहा ।
अत्यंत प्रशंसनीय
इतनी गहरी अंतर्दृष्टि। चेखव से अच्छी पहचान हो गई।