कुछ लोगों की राय है कि दमन के दौर लेखन को व्यंजना शक्ति की ओर अधिकाधिक उन्मुख करते हैं और इस तरह ज़्यादा गहरे अर्थों वाला साहित्य सामने आता है। जॉर्ज ऑरवेल की इस पुस्तिका के लेखों, ख़ासकर ‘साहित्य और सर्वसत्तावाद’ पर बात करते हुए महेश मिश्र की राय इसके विपरीत है। एक ऐसे समाज में जहाँ “लेखक जानते हैं कि अगर वे सच बोलेंगे, तो उन्हें गंभीर परिणाम भुगतने होंगे,… वे या तो चुप हो जाते हैं या अपनी कला को इतना अस्पष्ट कर देते हैं कि वह अपना अर्थ ही खो दे।”
————————————————-
जॉर्ज ऑरवेल की पुस्तिका Fascism and Democracy, 1941-42 के दौरान लिखे गये पाँच लेखों का संग्रह है। यह हमें एक ऐसे दौर में ले जाती है जब दुनिया तानाशाही और स्वतंत्रता के बीच एक निर्णायक संघर्ष से जूझ रही थी।
पुस्तिका में ‘फासीवाद और लोकतंत्र’ शीर्षक बहुत विकसित रूप में सामने नहीं आता है लेकिन ऑरवेल हमें एक सीख देते हुए नज़र आते हैं, वह है बुर्जुआ लोकतंत्र की आलोचना करते समय यह ध्यान रखना कि हमें हर राजनीतिक धड़े की चलताऊ आलोचना से बचना चाहिए। वे हमें सावधान करते नज़र आते हैं कि भलेमानुष, “सब धान बाईस पसेरी” न करो।
यह चेतावनी आज भी क्या उतनी ही प्रासंगिक नहीं लगती है, जब हम विभिन्न राजनीतिक प्रणालियों की जटिलताओं को देखने और समझने का प्रयास करते हैं?
इस संग्रह का एक अत्यंत प्रभावशाली लेख है ‘साहित्य और सर्वसत्तावाद’ (Literature and Totalitarianism)। यह लेख ऑरवेल की गहन अंतर्दृष्टि का प्रमाण है और यह स्पष्ट करता है कि सर्वसत्तावादी शासन प्रणाली में साहित्य वस्तुतः असंभव क्यों हो जाता है। यह एक ऐसा निष्कर्ष है जो केवल साहित्य तक सीमित नहीं रहता है, बल्कि मानविकी और स्वतंत्र चिंतन के हर पहलू तक चला जाता है।
मध्यकालीन रूढ़िवाद और ख़ास क़िस्म की वैचारिक जड़ता वाले वातावरण में भी साहित्य संभव था, लेकिन सर्वसत्तावादी शासन प्रणाली में साहित्य संभव नहीं। इसकी मूल वजह ऑरवेल के शब्दों में यह है: सर्वसत्तावादी व्यवस्था न केवल विचारों पर अंकुश लगाती है, बल्कि भावनाओं पर भी। साहित्य, अपने सबसे शुद्ध रूप में, मानवीय भावनाओं, अनुभवों और विचारों का मूर्त रूप होता है। भावनाओं के बिना, लेखन केवल एक जड़ काम बन कर रह जायेगा, जिसमें कोई आत्मा नहीं होगी।
ऑरवेल ने अपनी अन्य रचनाओं में भी इस बात को दोहराया है। ‘1984’ में न्यूस्पीक (Newspeak) का निर्माण सिर्फ़ भाषा को सरल बनाने के लिए नहीं था, बल्कि विचारों की शृंखला को तोड़ने और भावनात्मक अभिव्यक्ति की संभावना को नष्ट करने के लिए था। जब भाषा इतनी सीमित हो जाए कि आप प्रेम, घृणा, आशा या निराशा को पूरी तरह से व्यक्त ही न कर सकें, तो साहित्य का जन्म कैसे हो सकता है?ऑरवेल लिखते हैं:
‘हर साल शब्दों की संख्या कम होती जाती है, और शब्दों की संख्या जितनी कम होती है, विचारों का दायरा उतना ही छोटा होता जाता है।’
यह केवल विचारों को नियंत्रित करने का मामला नहीं है, बल्कि उन सूक्ष्म भावनात्मक रंगों को मिटाने का भी है जो किसी भी कलात्मक अभिव्यक्ति को गहराई देते हैं। हम जानते हैं कि भावनाएँ एक विशाल स्पेक्ट्रम में होती हैं और वे मनुष्य जीवन की आंतरिक समृद्धि का वैविध्य वहन करती हैं।
सर्वसत्तावादी प्रणाली में, शासन पल-प्रतिपल विचार और भावनाओं, दोनों के ‘गोलपोस्ट’ बदलता रहता है। सत्य की अवधारणा ही अस्थिर कर दी जाती है, और जो कल स्वीकार्य था, वह आज राजद्रोह हो सकता है। ऑरवेल ने ‘1984’ में इस निरंतर अस्थिरता को और स्पष्ट करते हुए लिखा है:
‘जो अतीत को नियंत्रित करता है, वह भविष्य को नियंत्रित करता है; और जो वर्तमान को नियंत्रित करता है, वह अतीत को नियंत्रित करता है।’
यह ‘निरंतर अस्थिरता सोचने और महसूस करने, कांटेम्प्लेट करने का अवकाश न देना’ साहित्य के लिए घातक सिद्ध होता है। साहित्य को पनपने के लिए स्थिरता, चिंतन और चेतना की स्वतंत्रता की आवश्यकता होती है। जब व्यक्ति हर पल इस डर में जीता है कि उसके विचार या भावनाएँ उसे जेल भेज सकती हैं, तो वह रचनात्मक नहीं हो सकता।
ऑरवेल के इन विचारों को समकालीन राजनीतिविज्ञानियों और भाषाविदों के कार्यों में भी प्रतिध्वनित होते देखा जा सकता है। नोम चॉम्स्की एक प्रमुख भाषाविद् और राजनीतिक विश्लेषक हैं। उन्होंने लगातार इस बात पर ज़ोर दिया है कि कैसे शक्तिशाली संस्थाएँ, चाहे वे राज्य हों या निगम, भाषा और विचार को नियंत्रित करके जनता की चेतना को आकार देती हैं। चॉम्स्की का ‘सहमति विनिर्माण’ (manufacturing consent) का सिद्धांत ऑरवेल के विचारों से मिलता-जुलता है। चॉम्स्की के अनुसार:
‘जो लोग विचारों को नियंत्रित करते हैं, वे जनता को नियंत्रित करते हैं।’
सर्वसत्तावादी राज्य में यह नियंत्रण चरम पर होता है। साहित्य प्रतिरोध, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और मानव अनुभव की विविधता का सबसे बेहतर प्रतिनिधि होता है और इसीलिए इस नियंत्रण के लिए एक सीधा ख़तरा बन जाता है। इसलिए इसे या तो दबा दिया जाता है या पूरी तरह से राज्य के प्रचार के साधन में बदल दिया जाता है। जब साहित्य केवल सत्ता की महिमा का गुणगान करने वाला या उसके नरेटिव को आगे बढ़ाने वाला उपकरण बन जाए, तो वह अपनी आत्मा खो देता है। ऑरवेल ने अपनी एक अन्य टिप्पणी में कहा था:
‘हर तानाशाही का लक्ष्य सत्य को नियंत्रित करना है।’
यह सिर्फ़ राजनीतिक सेंसरशिप का मामला नहीं है, बल्कि स्व-सेंसरशिप का भी है, जो आंतरिक रूप से व्यक्ति को तोड़ देती है। लेखक जानते हैं कि अगर वे सच बोलेंगे, तो उन्हें गंभीर परिणाम भुगतने होंगे। ऐसे में, वे या तो चुप हो जाते हैं या अपनी कला को इतना अस्पष्ट कर देते हैं कि वह अपना अर्थ ही खो दे। यह एक ऐसा वातावरण है जहाँ ‘अर्थपूर्ण साहित्य असंभव हो जाता है’।
‘फासीवाद और लोकतंत्र’ शीर्षक वाले लेख की अपनी एक गहराई है। ऑरवेल इस बात पर ज़ोर देना चाहते थे कि फासीवाद और लोकतंत्र के बीच का अंतर केवल राजनीतिक संरचनाओं का नहीं है, बल्कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता और मानवीय गरिमा के सार का भी है। बुर्जुआ लोकतंत्र में भी कमियाँ हो सकती हैं, लेकिन इसमें अभी भी आलोचना, असहमति और सुधार की गुंजाइश बनी रहती है। यही वह ‘गुंजाइश’ है जहाँ साहित्य, कला और स्वतंत्र चिंतन पनपते हैं। जैसा कि ऑरवेल ने स्वयं लिखा है:
‘यदि स्वतंत्रता का अर्थ कुछ भी है, तो वह लोगों को वह बताने का अधिकार है जो वे सुनना नहीं चाहते।’ (George Orwell, The Freedom of the Press, preface to Animal Farm)
इसके विपरीत, फासीवाद या कोई भी सर्वसत्तावादी प्रणाली इस गुंजाइश को पूरी तरह से मिटा देती है। यह एक ऐसी दुनिया बनाती है जहाँ ‘दो और दो पाँच हो सकते हैं’ यदि पार्टी ऐसा कहे। इस तरह के वातावरण में व्यक्ति की आत्मा कुंठित हो जाती है और उसकी रचनात्मक क्षमता सूख जाती है, निष्प्राण हो जाती है।
संक्षेप में, ऑरवेल का “साहित्य और सर्वसत्तावाद” लेख एक शक्तिशाली चेतावनी है। यह हमें याद दिलाता है कि साहित्य केवल शब्दों का संग्रह नहीं है, बल्कि मानवीय भावना, विचार और स्वतंत्रता की अभिव्यक्ति है। जब इस स्वतंत्रता को कुचला जाता है, तो साहित्य नष्ट हो जाता है, और उसके साथ ही मानव आत्मा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा भी।
ऑरवेल की अंतर्दृष्टि आज भी उतनी ही प्रासंगिक है, ख़ासकर एक ऐसे युग में जहाँ सूचना का अति-भार है, व्यर्थ की सूचनाओं की अधिकता है, अप्रासंगिक और भरमाने वाली सूचना का अंबार लगा हुआ है और सत्य को अक्सर भटकाव का शिकार होना पड़ता है। हमें यह समझना होगा कि भाषा पर नियंत्रण, विचारों पर नियंत्रण और अंततः भावनाओं पर नियंत्रण, एक ऐसे समाज का निर्माण करता है जहाँ कोई वास्तविक कला या साहित्य पनप ही नहीं सकता, और ऐसे में मनुष्य गरिमा-विहीन, स्वत्वहीन और आभाहीन संस्करण बनकर ही रह जायेगा।






