पन्द्रह ग्राम वज़न / बसंत त्रिपाठी


बसंत त्रिपाठी की यह पूर्व-प्रकाशित कहानी ख़ुद ‘कहानी’ के बारे में है। और जितना यह ‘कहानी’ के बारे में है, उतना ही रचना-प्रक्रिया, रचनाकार के संघर्ष, साहित्य और प्रकाशन की दुनिया की एब्सर्डिटी, हो-हुल्लड़, उठा-पटक, और ग़मगीन अकेलेपन के बारे में भी है। बेहद मज़ेदार इशारों में चलती कहानी अंत की ओर बढ़ते हुए सृजन के क्षण के सम्बन्ध में एक गंभीर वक्तव्य बनती जाती है, जिसमें कहीं उदासी का एक धूसर रंग भी घुला है। कहने की ज़रूरत नहीं कि बसंत त्रिपाठी के संग्रह ‘शब्द’ में शामिल होने के बावजूद इसे ‘नया पथ’ के पाठकों तक लाने का लोभ अप्रतिरोध्य था। 

मैंने अपने कहानी संग्रह की पांडुलिपि उठायी और ज़ोर से टेबिल पर पटक दी। हालाँकि मैं इसे प्रकाशक की टेबिल पर पटकना चाहता था। लेकिन प्रकाशकों ने अपने बँगलों के बाहर हर नये आगन्तुक लेखक के लिए पट्टिका टाँग रखी थी – ‘कुत्तों से सावधान’। और चूँकि मैं लेखक से पहले एक सभ्य नागरिक होने की कोशिश करता हुआ आला दर्जे का चूतिया था, सो उन अदृश्य कुत्तों को चकमा देने का ख़याल छोड़ दिया और घर आ गया। मुझे बाद में पता चला कि छापेख़ाने तक पहुँचने का रास्ता प्रकाशकों के घरों और दफ़्तरों से होकर हमेशा नहीं जाता।

लेकिन हुआ बस यूँ कि मैं लौट आया।

दरअसल, मेरी कहानियाँ किसी हद तक पसंद की जाने लगी थीं। जब भी छपी, ठीक-ठाक प्रतिक्रिया मिली। उन्हीं प्रतिक्रियाओं से उत्साहित होकर मैं सोचने लगा था कि अब इन्हें पुस्तक रूप दे ही दिया जाना चाहिए। यह मैं ऐसे सोच रहा था जैसे मेरे घर के दरवाज़े पर प्रकाशकों की लाइन लगी हो और वे मुझसे मेरी पांडुलिपि छापने की गुज़ारिश कर रहे हों कि जनाब, अब तो इसे सौंप ही दीजिए! काश कि ऐसा होता! लेकिन यह सच है कि सपने में आजकल इससे कम तो मैं कुछ देखता ही नहीं था।

सो हुआ यूँ कि मैंने अपनी किताब की पांडुलिपि तैयार की। कहानियाँ नये सिरे से टाईप करवाकर और उन्हें एक फाईल में बंद कर प्रकाशक की ओर चल पड़ा।

पहले प्रकाशक का वाक़िआ तो मैंने ऊपर लिखा ही है। लेकिन इतनी जल्दी मायूसी के सागर में डूबकर अपनी किताब की योजना का गर्भपात नहीं करवाना चाहता था। इसलिए सारा कुछ नये सिरे से करने की प्रतिज्ञा करते हुए तमाम कार्रवाइयों को अगले दिन के लिए मुल्तवी कर मैं बिस्तर पर लंबा हो गया।

दोपहर से रात तक झुँझलाते हुए चहलक़दमी करने और बेजान चीज़ों पर अपना ग़ुस्सा उगलने के बाद इसके सिवाय मैं कर ही क्या सकता था?

अगले दिन मैं, जितना भी मुमकिन था, बन-ठनकर निकला। अपने शबनम झोले में, जिसे मैं क्रांतिधर्मिता का न्यूनतम प्रतीक मानता था और लेखकीय पहचान का सर्वमान्य रूपक, पांडुलिपि सहेज कर पब्लिक बस में सवार हो गया। अंदर ही अंदर मेरा आत्मविश्वास कुलबुला रहा था। लेकिन उसके ऊपर मैंने गंभीर भाव का आवरण डाल रखा था। और अब एक दूसरे दर्जे के प्रकाशक के सामने बैठा था।

‘अपने समय की मुख्य पत्रिकाओं में मेरी कहानियाँ छप चुकी हैं,’ बिना पूछे ही मैं कह पड़ा था, ‘किताब छापना आपके लिए घाटे का सौदा नहीं होगा।’

प्रकाशक ने मुझे यूँ देखा जैसे राह चलते टटपूँजिये को लोग हिकारत और विस्मय की मिली-जुली नज़र से देखा करते हैं। ‘देखिए,’ आखिर उसने कहा, ‘सौदा, आप जैसा समझते हैं वैसा नहीं होता। तमाम और चीज़ों को मैं छोड़ भी दूँ तो आपकी कहानियाँ कुल सात ही हैं।’ पांडुलिपि के पन्नों को फाईल से अलग कर उसने टेबिल में रखी वजन मशीन पर रखा, ‘कुल एक सौ पचपन ग्राम….यानी प्री-मेच्योर बेबी…सतमासा बच्चा….’

‘फिर दो महीने बाद आऊँ..?’ मैंने पूछा।

‘पांडुलिपि का वज़न कम-से-कम एक सौ सत्तर ग्राम तो होना ही चाहिए, यह हमारी पहली शर्त है। दूसरी शर्त भी मैं बता दूँ कि आपकी ओर से कोई शर्त नहीं होगी। और बाकी बातें तो बाद में होगी लेकिन आपको अपनी पांडुलिपि में कम-से-कम पंद्रह ग्राम की बढ़ोतरी करनी होगी। इसका मतलब एक औसत से थोड़ी बड़ी या फिर दो छोटी कहानियाँ। हमारी ओर से समय की कोई बंदिश नहीं है। न आपके आने की और न ही पुस्तक छापने की।’

‘पत्रिकाओं में छपना अलग मसला है,’ मेरी पत्रिका वाली बात पर वह अब जाकर आया, ‘उनके तयशुदा विज्ञापनदाता और पाठक होते हैं। किसी अंक में कोई बुरी चीज़ छाप भी दो तो खास फर्क नहीं पड़ता। लेकिन हमारे खरीददार तो निर्धारित हैं। हमें उनके स्तर और उनकी खरीद पाने की योग्यता का खयाल रखना ही पड़ता है। खैर, इन सारे झमेलों से आप लोगों को क्या फर्क पड़ता है? आप लोग तो बच्चे पैदा कर बस निश्चिंत हो जाते हैं। अपनी रचनाओं को आप लोग अपनी संतान ही कहते हैं न! आपमें से थोड़े से लोग हैं जो बच्चे को पालने-पोसने यानी प्रचार-प्रसार की कोशिश भी करते हैं। लेकिन उनके खिलाफ तो आप लोग डंडा उठाए घूमते रहते हैं। सारी जिम्मेदारी जैसे हमारी है। आपके बच्चों को पालो-पोसो, उन्हें पढ़ाओ-लिखाओ, अच्छा इनसान बनाओ। और यदि वह कुछ बन गया तो आप लोग अपने पितृत्व का दावा करने आ जाएँगे। प्रकाशन का धंधा भी अज़ीब चूतियापा है।’

मुझे तमाम कमीशनखोर प्रकाशकों के, दलालों की तरह मंत्रालयों, कार्यालयों और पुस्तकालयों का चक्कर लगाते हुए एजेंट याद आ गये थे, जो अपने मालिकों की ओर से पचास प्रतिशत तक की कमीशन की पेशकश करते थे। मैं इस बाबत बोलना ही चाहता था कि मुझे अपने अग्रज और असफल लेखक की शराब में डूबी हुई समझाइश याद आ गयी –‘यदि इस दुनिया में नाम कमाना है तो आलोचक और प्रकाशक, इन दोनों के खिलाफ़ कभी कुछ मत कहना। लेकिन अपने से वरिष्ठ और स्थापित लेखकों के खिलाफ़ लगातार कुछ कहते रहना। ज़रूरी नहीं कि बात हमेशा तार्किक हो….इस दुनिया में अनर्गल बातों का भी विशेष महत्त्व है।’ सो मैंने चुप रहना ही बेहतर समझा और मुस्कुराहट की मोटी परत अपने चेहरे पर पोत ली ताकि अंदर का क्षोभ चेहरे की दरारों से बाहर न झाँकने लगे।

फिर मैंने पांडुलिपियों के भाग्य-निर्धारक उस महान वज़न मशीन को देखा। प्रकाशक की टेबिल के बाँयी ओर आसन जमाये हुए वह बैठी थी।

‘हर पांडुलिपि को छपने से पहले इन मशीनों की जाँच-विधि से उत्तीर्ण होकर निकलना पड़ता है,’ प्रकाशक कह रहा था, ‘आपकी पांडुलिपि तो खैर, पहली ही मशीन से ओ.के. का सर्टिफिकेट नहीं ले पायी। यदि कोई पांडुलिपि इस स्टेज को पार कर लेती है तो हम उसे अगली मशीन में डालते हैं जो अलग-अलग तत्त्वों के आँकड़े देती है। यानी विचार, कला, विषय, भाषा, समाज आदि की प्रतिशत मात्रा बताती है। उसके बाद वाली मशीन लेखक के जन-संपर्क यानी संभावित खरीद का दायरा बताती है। इस मशीन में हर लेखक के संपर्क-अभियान, संवाद, वरिष्ठ और समकालीन लेखकों से संबंध और मोबाइल फोन के बिल संबंधी विस्तृत जानकारियाँ फीड हैं। यह हमारा सीक्रेट सॉफ्टवेयर है। और भी कुछ मशीनें हैं लेकिन उसके बारे में फिलहाल मैं आपको बता नहीं सकता। यह हमारा ‘ट्रेड सीक्रेट’ है। आप लेकिन इतना जान लीजिए कि हमारे प्रतिमान निर्धारित और अपरिवर्तनीय हैं।’

प्रकाशक खुद को ढीला छोड़ते हुए कुर्सी की पीठ से टिक गया, ‘यदि आपको जाँच के इस दीर्घ और जोखिम भरे गलियारे से नहीं गुज़रना है तो एक रास्ता और है, उसे शर्माजी समझा देंगे। लेकिन आजकल वो ज़रा व्यस्त रहते हैं। दरअसल संपादकों ने युवा विशेषांक निकाल-निकालकर छपास की ऐसी भूख पैदा कर दी है कि नये से नये लेखक के पास भी किताब भर की रचनाएँ तो हैं ही। और हर कोई जल्द से जल्द अपनी पुस्तक छपा लेना चाहता है। आप समझ सकते हैं कि स्थिति कितनी विकट है। ऐसे में हमारे शर्माजी किताब छपवाने का घोषित रहस्य सबको अलग-अलग अकेले में बताते हैं। आप चाहें तो उनसे भी मिल सकते हैं।’

मैं जानता था कि शर्माजी पुस्तक छपवाने का कौन-सा महान रहस्य बताते हैं, इसलिए तुरंत बोल पड़ा – ‘शर्माजी से मिलने की बजाय मैं मशीनों की जाँच-प्रक्रिया से गुज़रना ही बेहतर समझता हूँ। लेकिन मेरी पहली चिन्ता तो पंद्रह ग्राम वजन की कोई कहानी लिखना है। उसके बाद आपसे मिलता हूँ। बहुत-बहुत धन्यवाद!’ मेरे ज़वाब से वह थोड़ा खिन्न लगा। जैसे दस-बीस हज़ार का कोई असामी उसके हाथ से निकल गया हो। लेकिन मैंने उसकी खिन्नता को अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया और प्रकाशक के कार्यालय से बाहर निकलकर सड़क की दूसरी ओर स्थित रचनामण्डी में घुस गया।

मण्डी में कहानियों और कविताओं की भरमार थी। मण्डी की सँकरी गलियों में वे इतनी तेज़ी से इधर-उधर भाग रही थीं कि उन्हें पकड़ना आसान नहीं था। फिर भी बीसियों रचनाकार अपना फंदा डाले हुए सड़क के किनारे व्यग्रता से बैठे हुए थे। और उन्हें जब-तब फाँस ही लेते थे। बीच-बीच में महानगरपालिका का कोई गुमाश्ता आ जाता तो मण्डी में हड़कंप मच जाता। रचनाकार बेचारे अपना झोला-डंगर उठाकर भागने लगते। भागते-भागते भी कोई न कोई तो पकड़ा ही जाता और गुमाश्ता उनकी कहानियों और कविताओं को चींथ डालता। था तो वह अदना-सा गुमाश्ता, लेकिन ऐसे तन कर चलता जैसे शहंशाहे हिन्दुस्तान हो।

ऐसी गहमा-गहमी में चर्चित होने की बीमारी से ग्रस्त कुछ स्थापित और रेहड़ीनुमा रचनाकार उसके पीछे भी हो लेते थे। अपने पीछे बहुत चलाने के बाद गुमाश्ता उनके झाँसे में आयी हुई रचनाओं को उलट पलटकर देखता और अचानक अदृश्य हो जाता। रचनाएँ बेचारी कोसती रह जातीं कि ऐसे टटपूँजिये रचनाकारों के झाँसे में आयी ही क्यों? उपन्यासों की चाल में लेकिन ज़रा-सा इत्मीनान था। वे भारी भरकम भी थे, इसलिए उन्हें फाँसने का सीधा अर्थ होता देर तक निबाह। एक तो वे जल्दी झाँसे में आते नहीं और आ गये तो जल्दी पीछा छोड़ते नहीं। कौन ऐसी मुसीबत मोल ले?

कहने को तो वह मण्डी एक ही थी, लेकिन हर गली अपने आप में एक जुदा दुनिया थी। एक गली बहुत साफ़ सुथरी थी। वहाँ आला दर्जे की बेदाग़ रचनाएँ इत्मीनान से टहल रही थीं। एक गली में हर बिकने वाली चीज़ लाल रंग के पैकेट में बेची जा रही थी। एक लोक गली भी थी। वहाँ घूमने वाली रचनाएँ धान या गेहूँ की बाली, बैल की घंटी के साथ कुछ ग्रामीण शब्दों का फूँदना लगाये इधर-उधर डोल रही थीं। एक अवसाद गली भी थी। यहाँ कवियों की आवाजाही अधिक थी। खा-पीकर अघाये हुए कवि डकारते हुए इतने आँसू बहा रहे थे कि ज़लज़ला आ जाने का ख़तरा आन पड़ा था। युवा लेखकों ने अपना एक अलग डिपार्टमेंटल स्टोर खोल रखा था। यहाँ की कहानियों के पास मोबाइल, कंप्यूटर, लैपटॉप, आला दर्ज़े के जींस और टी-शर्ट अत्यधिक मात्रा में थे। इसी स्टोर के बरक्स दूसरी युवा मंडली ने भी अपनी दुकान खोल रखी थी। दोनों मंडली के लोग बात-बेबात आपस में भिड़ पड़ते थे जिससे मण्डी में घूमने वाले लोगों का अच्छा ख़ासा मनोरंजन हो जाता था। इन दोनों ही दुकानों के लिए कुछ बूढ़े रचनाकारों ने लीज़ पर ज़मीन उपलब्ध करवायी थी।

दो और दिलचस्प गलियाँ थीं। एक का नाम स्त्री गली था और दूसरे का नाम था दलित गली। यहाँ की कहानियाँ रबर के मोटे और लचीले डंडे हाथ में लिये चलती थीं। और हर आने जाने वाले लोगों पर इस तरह से प्रहार करतीं कि शरीर की टूट फूट तो नहीं होती लेकिन उस पर नीले निशान ज़रूर उभर आते। ऐसे निशान बाद में शरीर छोड़कर आत्मा जैसी किसी अनजान जगह में रहने लगते थे। इन गलियों में केवल स्त्री और दलित ही आ जा सकते थे। गली के मुहाने पर एक स्कैनिंग लेज़र मशीन भी लगी थी। यदि कोई अपनी पहचान छुपाकर भीतर घुसने की कोशिश करता तो बीप् बीप् की आवाज़ बजने लगती।

बाकी सब गलियों में ब्राह्मणों, ठाकुरों और कायस्थों का राज था। लेकिन यहाँ उनकी पैठ नहीं थी। इसलिए वे इन गलियों के धुर विरोधी थे। और अक्सर ही इन गलियों को मटियामेट कर दिये जाने की बात करते थे। कुछ पुरुषों और ऊँची जात वाले लोगों को भी बहुत मान-मनुहार के बीच यहाँ आने जाने की सुविधा मिल गयी थी। शर्त बस यही थी कि उन्हें बात-बेबात, वक़्त-बेवक़्त अपनी निष्ठा प्रदर्शित करनी पड़ती थी।

रचना मण्डी का व्यापक सर्वेक्षण कर लेने के बाद मैं किसी एक कहानी को फाँस लेने की मुहिम में जुट गया। पिछली सात कहानियों को फाँसने में ज़्यादा दिक़्क़त नहीं हुई थी। बल्कि वे खुद ही मेरी झोली में आ गिरी थीं। सो ऐसी ही किसी चमत्कारिक घटना की उम्मीद में इस बार भी आया था लेकिन मामला कुछ जम नहीं पा रहा था।

मैंने रचना मण्डी में ही किराये का एक मकान ले लिया था ताकि आने जाने की परेशानी से मुक्ति मिले। सुबह से शाम तक मैं वहाँ मारा मारा फिरता रहता। इस बीच कुछ कहानियों से दोस्ती भी हुई, लेकिन कुछ देर समय गुज़ारने के बाद पता चला कि उनमें कोई दम नहीं था। वे अन्दर से खोखली थीं और इतनी कमज़ोर कि चलना तो दूर, बिना सहारे के खड़ी भी न हो पाती थीं।

जब बहुत मशक्कत के बावजूद कोई कहानी मेरे झाँसे में नहीं आयी तो मैं मण्डी के पिछवाड़े की ओर निकल आया। पूरी मण्डी चूँकि मोटी और ऊँची दीवारों के भीतर थी, इसलिए बाहर की दुनिया का ठीक-ठीक अंदाज़ा नहीं हो पा रहा था। मैं हताशा से भरा हुआ इस ओर चला आया था। न सही कहानी, कुछ फुर्सत की साँसें तो मिलें। पिछवाड़े की ओर एक टूटा-फूटा, लगभग गिरता-गिरता-सा शराबखाना था। वहाँ इक्के दुक्के लोग बैठे थे और चुपचाप पी रहे थे।

शराबखाना किसी रूसी उपन्यास के जर्जर पन्ने की तरह लग रहा था।

मैं भीतर गया और एक कोने में मक्खियों से भिनभिनाती टेबल के सामने की कुर्सी खींचकर बैठ गया और रम के एक क्वार्टर का ऑर्डर दे दिया।

‘इस शराबखाने को किसी टी.बी. वार्ड के पीछे होना चाहिए था।’

‘सही सोच रहे हैं आप,’ वेटर ने रम का क्वार्टर टेबल पर रखते हुए कहा,‘पानी सादा लाऊँ या…’

‘बिसलरी…,’ उसका वाक्य पूरा होने से पहले ही मैं कह पड़ा।

मैं कुछ और सोचने की शुरुआत करता कि उसने पानी की बोतल, गाजर-ककड़ी के कुछ टुकड़े और बड़े से कटोरे में मुरमुरा लाकर रख दिया और काउंटर के पास जाकर खड़ा हो गया।

‘शराबखाना गंदा और उपेक्षित ज़रूर है लेकिन रचना मण्डी की अनियंत्रित दौड़-भाग, कॉफ़ी हाऊस और चमकते बार की तुलना में यहाँ इत्मीनान है…,’ एक साँस में गिलास खाली करते हुए मैंने सोचा।

‘फिर भी आप लोग यहाँ आने से कतराते हैं। बल्कि साफ कहूँ तो बचते हैं। क्या है कि यहाँ आपके शहीदाना फक्कड़पन को नोटिस में लेकर पन्ने रँगने वाले लोग नहीं आते हैं न…?’ उसने काउंटर के पास से ही कहा।

‘अजीब है ये वेटर। मेरे सोचे हुए वाक्यों से संवाद बना रहा है।’ उसके चेहरे पर अपनी नज़रें गड़ाते हुए मैंने सोचा।
हल्की मुस्कुराहट उसके चेहरे पर उभर आयी थी, जिसके कारण उसकी आँखें बंद-सी हो गयी थीं। ‘अपन तो ऐसे ही हैं…,’ वहीं से उसने फिर कहा था।

शराबखाने में जो इक्के दुक्के लोग बैठे थे, वे अब नहीं थे। मैंने वेटर को गौर से देखा। वह निश्चित तौर पर कोई पहाड़ी था। छोटा चपटा चेहरा, छोटी-छोटी आँखें। कद-काठी भी पहाड़ियों जैसी ही। उसकी उम्र पचास के आस-पास रही होगी। हालाँकि पहाड़ी लोगों की उम्र का अंदाज़ा लगाना आसान नहीं होता।

‘कितना अच्छा होता यदि मक्खियों और मच्छरों के इस निर्विकल्प साथ के अलावा किसी इनसान का साथ भी मिल जाता। वैसे यह वेटर भी बुरा विकल्प नहीं है।’ मैं सोच ही रहा था कि वह अपना गिलास भरकर ले आया और मेरे सामने की कुर्सी खींचकर बैठते हुए कहा – ‘थैंक यू…’

‘आप पहाड़ी ही हैं न?’ मैंने सीधा उससे पूछा क्योंकि मेरे सोचे हुए वाक्यों पर अपने ज़वाबों से वह जो हमला कर रहा था, उसके कारण मैं तनिक दबा-दबा-सा महसूस करने लगा था। इसलिए मन की ज़बान से कहने की बजाय मैंने सीधे ही कहा। बाक़ायदा होंठ, दाँत और जीभ का वांछित उपयोग करते हुए।

‘क्या फ़र्क़ पड़ता है? आप एक इनसान का साथ चाहते हैं। वह पहाड़ी हो या मैदानी, देशी हो या विदेशी, औरत हो या आदमी, क्या फ़र्क़ पड़ता है?’

‘आपकी बात सही है, लेकिन बात कहीं से तो शुरू होनी चाहिए। इसलिए आपके पहाड़ी होने से ही शुरू हो तो क्या बुरा है?’

उसके रट-पिट जवाब देने से मैं थोड़ा असहज हो गया था। फिर भी अपनी खीज छुपाते हुए और पर्याप्त शालीनता का परिचय देते हुए मैंने कहा।

मेरी शालीनता ने उस पर थोड़ा रंग जमाया भी था क्योंकि उसके चेहरे की व्यंग्य-मिश्रित लकीरें पिघलने लगी थीं।

‘हाँ, मैं पैदा तो पहाड़ में ही हुआ था। लेकिन अब मैदानों में रहता हूँ। और अक्सर अपनी जगह बदलता रहता हूँ।’ वह फिर चुप हो गया था। उसकी चुप्पी ने पहाड़ी वाले प्रसंग पर पूर्ण विराम लगा दिया था।

‘लगता है, कोई कहानी आज आपकी पकड़ में नहीं आयी?’ उसने मेरे घाव पर नमक का बुरादा छींटा।

‘आज…,’ मैं मायूस हँसी के साथ बोला, ‘पिछले सात दिनों से लगातार यहाँ भटक रहा हूँ… लेकिन कहानी तो कहानी, कोई लघुकथा भी हाथ नहीं लगी। लगता है वायदा बाज़ार की तर्ज़ पर सारी कहानियाँ बुक हो चुकी हैं।’

‘हो सकता है कि वे पूरी तरह आज़ाद हों। आप ही उन्हें पहचान न पा रहे हों। हो सकता है कि आप ही के भीतर कोई पूर्वाग्रह या दुराग्रह हो।’

‘हो सकता है… लेकिन इस पर सोचने के लिए फिलहाल मेरे पास वक़्त नहीं है। मुझे अपनी किताब के लिए एक ही कहानी की ज़रूरत है। यदि उसका स्तर औसत से भी थोड़ा नीचे हो, तो भी चलेगा। आखिर दुनिया के बड़े-बड़े उस्तादों ने औसत स्तर का काम किया है या नहीं?’

उसने ज़ोर का ठहाका लगाया, ‘वे उस्ताद हैं। उनका औसत काम भी तुम जैसे लोगों के महत्त्वाकांक्षी कामों से ज़्यादा बेहतर होता है। फिर…,’ उसने मक्खियों को उड़ाते हुए दोनों के गिलास भरे, ‘एक बेहतर रचना कई औसत रचनाओं की ख़ामी को पूरा कर देती है। उस्तादों की औसत रचनाओं से नहीं, क्लासिक रचनाओं से सीखना चाहिए। लगता है लेखन का पहला सबक ही आपने अधूरा पढ़ा है।’ हँसी फिर उसके दाँतों के बीच से निकलकर तीर की तरह मेरे चेहरे में घुस गयी।

मैंने सिगरेट सुलगाते हुए उसे घूर कर देखा और सोचा – ‘एक पहाड़ी वेटर की रहस्यमय मौत, यह अगली कहानी का शीर्षक हो तो कैसा रहेगा?’

‘हा…हा…हा…,’ अबकि बार वह पहले की तुलना में ज्यादा खुलकर हँसा, ‘आपको किसी टी.वी. चैनल के सस्ते थ्रिलर धारावाहिक के लिए भी ज़रूर कोशिश करनी चाहिए। वहाँ आपका सफल होना निश्चित है।’

‘एक क्वार्टर और ले आओ। और आधा पैकेट सिगरेट भी। खाने के लिए पकौड़े या चिली चिकन, जो भी बन सके ले आना।’

‘यहाँ किचन नहीं है। मूँगदाल, भुजिया सेव या फल्ली ही मिल सकती है।’

‘फिर भुजिया सेव के दो पैकेट ले आओ।’

बाहर धूप अब ढलान पर आ गयी थी। दुकानों की परछाइयाँ पूरब की ओर की जगहों को घेरने लगी थीं। रचना मण्डी का शोर भी उतार पर था। सौदे या तो पूरे हो चुके थे या होने की राह में थे। कुछ कहानीकारों ने अपनी फाँसी हुई कहानियों को तमगे की तरह गले में टाँग लिया था। कुछ लोग अपनी कहानियों को कंधे पर चढ़ाये हुए विजयी मुद्रा में मण्डी की परिक्रमा कर रहे थे। उनके पीछे-पीछे तमाशायी लेखकों का झुण्ड भी था। उसमें प्रशंसक और ईर्ष्यालू, दोनों ही प्रजाति के लोग शामिल थे। मण्डी का गुमाश्ता विजेता कहानीकारों के नाम पते नोट कर रहा था। आख़िर उसे मण्डी का रचना टैक्स जो वसूलना था! मेरे जैसे कुछ असफल लेखक अपनी हताशाओं के साथ अकेले रह गये थे।

पहाड़ी वेटर रम का क्वार्टर और भुजिया सेव, सिगरेट के पैकेट के साथ रख गया था। इस बार वह मेरे साथ बैठा नहीं। मैंने भी बैठने के लिए नहीं कहा। शाम के धंधे का समय हो रहा था। मैं जानता था कि असफलता के मारे हुए लेखक कॉफ़ी हाउस या चमकते बार में नहीं जाते। उन्हें ऐसे ही शराबख़ाने पनाह देते हैं।

शराबख़ाने की सभी लाइटें जला दी गयी थीं। मक्खियों की काम की पाली खत्म हो गयी थी, लिहाज़ा मच्छरों ने दुगुनी ताक़त से अपना काम शुरू कर दिया था। शराबख़ाने में तीन-चार लेखक और आ गये थे। सभी अपनी मायूसियों को शराब में घोलकर पिये जा रहे थे। पहाड़ी वेटर भी रोशनी करने के बाद पीछे की ओर के दरवाज़े से निकलकर जो ग़ायब हुआ तो फिर दिखा ही नहीं। उसकी पाली भी शायद खत्म हो गयी थी। अब वहाँ कुछ दूसरे वेटर दिखायी पड़ रहे थे जो ऑर्डर की हुई चीज़ों को टेबिल पर रखते जाते।

‘इस शराबख़ाने को किसी टी.बी. वार्ड के पीछे ही होना चाहिए,’ मैंने अपना अंतिम गिलास ख़ाली करते हुए सोचा। कहीं से कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली। न हामी के रूप में, न हँसी के रूप में।

‘बिल ले आओ…,’ मैंने एक युवा वेटर को चिल्लाकर कहा।

‘यहाँ बिल नहीं देना पड़ता है…,’ शराबख़ाने के मैनेजर ने काउंटर से कहा। मैनेजर को मैं वहाँ पहली बार देख रहा था।

‘क्यों…,’ मैं लड़खड़ाते हुए उसके पास पहुँचा और आश्चर्य से पूछा।

‘यह असफल लेखकों की धर्मसेवा है। भगवान ने बहुत दिया है. बस, समझ लीजिए कि मैं उसकी मर्ज़ी निभा रहा हूँ। प्याऊ खोलता, धर्मशाला खोलता या मंदिरों में फल, कपड़े या खाना बँटवाता तो क्या हासिल हो जाता! आखिरकार लाचार मनुष्यों की क्षणिक सेवा ही होती। विद्वानों ने कहा है कि लेखक भगवान के बरोबर होते हैं। इसलिए मैं हालात के मारे हुए हताश लेखकों की सेवा करता हूँ। आप कह सकते हैं कि हताश देवताओं को बहकने का अवसर देकर मैं उनकी घायल इच्छाओं को मज़बूत बनाता हूँ।’ उसने दार्शनिक अंदाज़ में अपना महान उद्देश्य लज़ीज टँगड़ी कबाब की तरह परोस दिया था।

‘जो पानी खरीद सकता है, वह प्याऊ से मुफ़्त में पानी नहीं पीता,’ मैंने पाँच सौ रुपये का एक नोट काउंटर पर रखते हुए कहा।

‘जिसने प्याऊ खोला है, वह पानी बेचता नहीं है…,’ उसने विनम्रता के साथ मेरा नोट मेरी मुट्ठी में बंद करते हुए कहा, ‘भगवान आपको जल्दी ही सफलता दे।’

उसकी शुभकामनाओं की बारिश में भीगते हुए मैंने उसका चेहरा देखा। टॉलस्टाय की तरह लंबी सफेद दाढ़ी वाला वह बूढ़ा भव्य देवदूत लग रहा था। शायद वह टॉलस्टाय ही था। रचना मण्डी की घायल आत्माओं पर मलहम लगी रुई के फाहे रखता हुआ-सा।

‘मुझे इतने भी अचरज से मत देखिए! जब आप अपने लायक़ कोई ज़बर्दस्त कहानी तलाश लेंगे, तब आप भी विजयोल्लास के घमंड में लिथड़े लेखकों के साथ जुलूस में शामिल हो जाएँगे। तब तक आप खुद को मेरा मेहमान ही समझें। और आप तो जानते हैं मेहमान और भगवान का रिश्ता….फिलहाल आप किसी कृति को रचने की कोशिश में असफल होकर हाँफ रहे लेखक हैं। हो सकता है, मेरी धर्म-सेवा से आपको उम्मीद की रोशनी का कोई कतरा दिखायी पड़ जाये।’

थोड़ी देर वह चुप रहा। शायद इस इंतज़ार में था कि मैं कुछ कहूँगा। लेकिन मेरे पास नशे में डूबी हुई नज़रों से उसे देखते रहने के अलावा और कुछ भी नहीं था।

‘वैसे किस तरह की कहानी की तलाश में हैं आप?’ उसने पूछा।

‘कुछ निश्चय करके तो यहाँ नहीं आया था। बस, कम से कम पंद्रह ग्राम वजन की कोई कहानी चाहिए।’

टॉलस्टाय मुस्कुराया, ‘रचनाकारों की रचनात्मक कामयाबियों, उनकी निजी कुंठाओं और महत्त्वाकांक्षाओं पर पलने वाले टटपूँजिये प्रकाशक, देखिए, आपकी भाषा में कितने ताक़तवर हैं! और इस हद तक ताक़तवर कि उनकी भ्रष्ट और आतार्किक शर्तें भी आप लोगों के लिए प्रतिमान बन जाती है….वैसे…यदि कोई भी कहानी चल जाती तो वही क्या बुरा था जिसके साथ आपने पूरी दोपहर गुज़ारी?’

‘क्या…वह पहाड़ी वेटर…कहानी था?’ मेरा सारा नशा एक ही झटके में उछलकर ग़ायब हो गया था। मैं उस कहानी को फिर से पकड़ लेने की ख़ातिर शराबख़ाने के उसी दरवाज़े की ओर लपका जिसमें से अंतिम बार जाने के बाद वह ग़ायब हो गया था। लेकिन दरवाज़े के उस पार रचना मण्डी के बाहर के अँधेरे के अलावा कुछ नहीं था। अँधेरा, जो बेतरह फैला हुआ था।

‘अब कोई फ़ायदा नहीं,’ उसने कहा, ‘कहानी एक बार यदि पकड़ से छूट जाये तो वापिस झाँसे में नहीं आती। यदि आप उसे पकड़ भी लेंगे तो अब निभा नहीं पाएँगे। आप अपना अवसर खो चुके हैं। अच्छा होगा कि आप नये सिरे से कोशिश करें।’

कहानियों को न पहचान पाने के कारण पकड़ पाने में असफल होने का अनुभव मेरे लिए नया नहीं था। इससे पहले भी मैं कई बार ऐसी मुर्खतापूर्ण ग़लती कर चुका हूँ। लेकिन यह मामला इस रूप में नया था कि मेरी चूक को मेरे अलावा शराबख़ाने का मालिक और वहाँ बैठे कई दूसरे लेखक भी देख रहे थे। शराबख़ाने की उस लाल मद्धिम रोशनी में खड़ा हुआ मैं इतना शर्मसार था जैसे किसी ने मेरे अंतर को निर्वसन कर दिया हो और सारा कालिख इधर-उधर बिखर रहा हो।

अपनी असफलता का बोझ उठाये हुए इस तरह खड़ा रहना मुझे बहुत नागवार गुज़र रहा था। आख़िरकार बोझिल क़दमों से खुद को लगभग घसीटते हुए मैं वहाँ से चला आया और सारी रात रचना मण्डी की सूनी गलियों में भटकता रहा। गलियों में लेखकों के बीमार सपने टहल रहे थे। दिन में ये सारे सपने क़ैद कर लिये जाते ताकि दिनचर्या की गतिशीलता को अपनी बाधाओं से ठेस न पहुँचाएँ। रचना मण्डी की रातें अधूरी इच्छाओं की कब्रगाह थीं। उनके बीच घूमता हुआ मैं भी एक अधूरी कहानी ही लग रहा था।

सुबह-सुबह मैंने अपना सामान बाँधा और रचना मण्डी से बाहर के बस स्टॉप पर आ गया। मण्डी के चारों ओर दूर-दूर तक उजाड़ था। प्रशासन ने बड़ी चालाकी से इसे जन-समुदाय से बहुत दूर बसाया था ताकि मण्डी की गहमा-गहमी नागरिकों की ज़िन्दगी में अवांछित हस्तक्षेप न करे।

कोई घंटे भर बाद बस आयी। मैं मय सामान, अस्त-व्यस्त और थका-हारा, बस में चढ़ा। बस में सवार सारे मुसाफ़िर मुझे देखकर पहले तो मुस्कुराये, फिर ठहाका मार कर हँसे पड़े।

मो. 9850313062
basantgtripathi@gmail.com


2 thoughts on “पन्द्रह ग्राम वज़न / बसंत त्रिपाठी”

  1. कहानी पंद्रह ग्राम वजन पढ़कर अभिभूत हूं। बसंत जी ने हमारे समय को क्या खूब कहा है। कहानी में व्यंग्य और विडंबना की एक धारा सतत बहती है। कई पंक्तियों में दर्शन के स्तर पर ले जाती है। रचना मंडी का अद्भुत चित्र शब्दों में प्रगट कर दिया है। लेखक का भटकाव, बेचैनी, दुख, अवसाद, निराशा, खुद को जाने-समझे-पहचाने जाने की तड़प। सबकुछ सामने है।
    रचनामंडी की गलियों में लेखकों के बीमार सपने टहल रहे थे। दिन में ये सारे सपने कैद कर लिए जाते थे ताकि दिनचर्या की गतिशीलता को अपनी बाधाओं से ठेस नहीं पहुंचाए। रचनामंडी की रातें अधूरी इच्छाओं की कब्रगाह थीं।
    क्या खूब पंक्तियां लिखी हैं। सचमुच, हम जैसे तमाम लोग अपनी दिनचर्या का कुछ ऐसे ही गुलाम हैं। उन इच्छाओं और सपनों को ताक पर रखते चलते हैं जो दिनचर्या की गतिशीलता में बाधा बन सकते हैं। हमारे अंदर तमाम अधूरी इच्छाओं का कब्रिस्तान बनता चलता है।
    बसंत जी को इस कहानी के लिए बहुत बधाई।

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  2. वाह, लेखक और लेखन का संघर्ष और सफलता, दोनों किन अंतरपीड़ा से गुजरते हैं, यह रचना बखूबी दर्शाती है..

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