बेटे को संबोधित कविताएँ / रूपम मिश्र


‘एक जीवन अलग से’ संग्रह और अन्यत्र प्रकाशित कविताओं के कारण समकालीन कवियों में रूपम मिश्र की अलहदा पहचान है। यहाँ बेटे को संबोधित जो कविताएँ पहली बार छप रही हैं, उनके बारे में उन्हें व्यक्तिगत रूप से भेजी गयी कवि प्रभात की यह टिप्पणी पढ़ने लायक़ है :

‘बहुत ही बहुत सुंदर कविताएँ। माँ की ओर से बेटे के लिए लिखी, मेरी नज़र में आई ये पहली ही कविताएँ हैं। शायद ऐसा भी है कि किसी माँ को अवसर ही इक्कीसवीं सदी में आकर मिला, ऐसी कविता लिख पाने का।

‘इससे पहले मैंने लोक कवि धवले के यहाँ ही ऐसी पंक्तियाँ पढ़ी हैं जहाँ राम की सेवा में लगे हनुमान का माँ से मिलना नहीं होता, एक बार राम के काम से कहीं जा रहे होते हैं तो माँ से भी मिल लेते हैं, तब माँ कहती हैं

‘तो बिन तेरी महतारी नं भारो दुख पायो रे
मेरी गोदी का खिलारी मोड़ो आयो रे

‘”तो बिन” यानी तेरे बिना, “मोड़ो” यानी बहुत देर से।’

1. 
तुमने ही मुझे जन्म दिया तुम मुझे भूल कैसे जाते हो

अब अक्सर तुम्हारे पास आकर लौट जाती हूँ
तुम्हारी याद में भरी मैं भटकती रहती हूँ
तुम्हारे पास भी जाती हूँ और तुम्हें न पाकर लौट आती हूँ
उजाले की एक डगर जो तुमसे ही होकर मुझ तक आयी थी वो डगर तुम्हारी ही ओर क्यों नहीं मुड़ जाती

तुम एक नयी दुनिया चिन्हा कर मुझे पुरानी दुनिया में अकेला छोड़ देते हो
मेरा जी नहीं लगता यहाँ
तुमसे ये कितनी बार और किस भाषा मे कहूँ
तुम जहाँ हो जीवन वही है लेकिन मैं जब उठकर तुम तक पहुँचती हूँ तुम मुझे मिलते नहीं
मैं निराश लौटती हूँ साथ रहने की अहक के साथ

मुझे तुमने ही जन्म दिया है तुम मुझे भूल कैसे जाते हो
शायद प्रसव पीड़ा नहीं सही तुमने
नहीं देखी थी मेरी ललछहुँ हथेली
शायद मेरा माँ होना यहीं से हारा है
इन दिनों सोचती रहती हूँ कि ये कैसे हुआ तुमने ही मुझे जन्म दिया तुम मुझे भूल कैसे जाते हो।

 

2. 
मुझसे आगे बढ़ गये मेरे साथी मुझे तुम्हारी याद आती है

हम किसी दंतकथा के पात्र नहीं थे इसी दुनिया में दो समय में जन्मे हुए दो जन थे

तुम्हें जन्म तो दिया था मैंने लेकिन बड़े हम दोनों साथ हुए थे
फिर जैसे उँगली पकड़कर तुम मुझे कविता की ओर ले आये
हमने मिलकर कविता का एक संसार बनाया
संवेदनाएँ मेरी जहाँ लिजबिज हुईं तुमने उन्हें सख्ती से तरेर दिया।
हम साथ पढ़ते, बहस करते बढ़ रहे थे लेकिन मेरे देखते ही देखते तुम मुझसे बड़े हो गये
करुणा और बेचैनी से भरा था तुम्हारा मन तुमने आगे बढ़कर अपने लिए एक अपाढ़ रास्ता चुना
जहाँ घाम, ओद का सही-सही हिसाब-किताब था
दीन दुखियों का वो रास्ता जिसके निकार की जगह कबसे छीन ली गयी हैं
उन दिनों जौ की सरई जैसा चमकता हुआ कुछ तुम्हारी बातों से झरता था
उन्हीं दिनों तुमने तय कर लिया कि कविता लिखने भर से नहीं होगा
गर्मियों में भट्ठी जैसा तपता तुम्हारा वो कमरा जहाँ अक्सर बिना बिजली पंखे के तुम पड़े रहते हो
वही यथार्थ है हमारे संसार का मुझे भी पता था लेकिन सुविधाओं की मारी मेरी आत्मा तुमसे बहस करती रही और तुमने
अपने लिये कठिन और धूसरित जीवन चुन लिया

गाँव, घर, परिजन कहते हैं कि मैंने तुम्हें बिगाड़ दिया उन्हें कौन बताये कि तुमने तो मुझे बिगाड़ दिया
माँ बहनों की गाली में लथेरा समाज को कौन समझाये माँ बहन को कॉमरेड भी बनाया जाता है

मुझसे आगे बढ़ गये मेरे साथी मुझे तुम्हारी याद आती है।।

 

3. 
एक पलट दिया गया सम्बोधन

ये जाने कब और कैसे शुरू हुआ
अथाह दुलार में मैंने एक आदिम सम्बोधन को पलट दिया
मैं तुम्हें दुलारते हुए जाने क्या-क्या कह सकती थी
लेकिन मैं तुम्हें माँ कहने लगी
और अजब ये कि हर बार मेरे सम्बोधन पर तुम हाँ कहते
एकदम गम्भीर सी माँ बने रहते

मैं ज्यादा बार जब तुम्हें ‘हमार मम्मी’ कह-कहकर बुलाती तो दुलार कर चूम लेते हो
मेरा जी फिर भी नहीं भरता
मैं फिर-फिर तुम्हें मम्मी कहकर बुलाती
तुम हर बार उसी तरह सहज होकर ‘हाँ!’ कहते हो

तब मैं तुम्हें कुछ पढ़ते हुए देखती सोचती कि
आखिर हम क्यों जेंडर को उलट-पलट कर एक दूसरे में घुल जाते हैं
या मेरी कोई छूटी रह गयी साध है जो तुममें ही लौटती है
अब मैं बहुत बार सोचती हूँ
तुमने कब स्वीकार किया होगा अपनी माँ की माँ बनना
कैसा लगता होगा तुम्हें एक प्रौढ़ स्त्री की माँ की भूमिका में
कभी-कभी मैं किताब पकड़कर रख देना चाहती हूँ
तब तुम सच में एकदम माँ बन जाते हो मुस्कुराते हुए कहते हो, ‘अभी मार पड़ेगी तुम्हें!’
कितना प्यार, कितना दुलार और कितना संग-साथ है हममें
लेकिन तुम चले जाते हो मुझे छोड़कर
और फिर बहुत लम्बे दिन उदासी में बीतते हैं।

 

4
ऐसे छुपने को नहीं कहा था

एक बड़ा सा कच्चे घर का आँगन है जिसके तीनों तरफ़ ओसारे हैं । एक तरफ मोरी से लगी चेहरायी सी नल की चौकी जहाँ मैं बर्तन माँजती हूँ और तुम धो-धोकर पाढ़े पर रखते हो। तिजहरिया के आँगन में एक तरफ़ हम तुम होते जब घर के सब और कहीं-कहीं होते हम दोनों आईस-पाईस खेलते साथ में एक दो बच्चे और भी होते पर हमारा केंद्र हमेशा हम दोनों ही होते। शुरुआत में तुम कहीं एकदम सामने ही छुपते मुझे झट से दिख जाते मुझे खीज होती तुम्हारे भोलेपन पर कि इतना भी सयाना नहीं है कि अच्छे से कहीं छुपे। तब पता नहीं था कि मैं ही सयानी नहीं हुई थी, फिर मैं तुरंत अपनी बारी ले लेती और तुम्हें खेल समझाने के लिए कुछ कठिन जगह जाकर छुपती तुम खूब ढूढते मैं तुम्हें नहीं मिलती अंत में हार कर तुम समझौते के रूप में कहते मम्मी तुम्हें हिंट के लिए कुहू…कुहू… बोलना चाहिए जब मुझे लगता तुम थक गये हो मुझे ढूँढ़कर तब कूहु… की आवाज़ लगाती तुम मुझ तक झट से पहुँच जाते और आइस-पाईस न कहकर मुझे देखकर जोर से मुस्कुरा पड़ते। फिर तुम छुपते…फिर मैं… खेल इसी तरह चलता लेकिन थोड़ी ही देर में ये जाने कैसे हो जाता शायद तब उम्र ही ऐसी कच्ची थी या बचपन में जी भर खेलने की अहक बाकी रह गई कि मैं खेल को गम्भीरता से ले लेती और तुम्हारी प्रतिद्वन्दी बन जाती । होता ये कि मैं ये साबित करने लगती कि खेल में तुम मेरी तरह नहीं छुप पाते।

और अन्ततः तुम जाकर छुपने के लिए किसी ऐसी जगह को चुन लेते जैसे उपले-लकड़ी रखने का घर, बखार का घर या दरवाज़े की सहन जहाँ रज़ाईयों का डारा बना होता ये सब ख़तरनाक जगहें लगतीं मुझे जहाँ अँधेरा होता, ये जर्जर जगहें थीं यहाँ साँप बिच्छू निकलते थे जहाँ कोई दिन में भी कोई काम पड़े तो टॉर्च लेकर ही जाता था ऐसी जगह तुम्हें छुपा देखकर मेरे भीतर की प्रतिद्वंद्वी बच्ची फिर से माँ में बदल जाती। मैं भय और गुस्से से चीख़ पड़ती और तुम्हें थप्पड़ लगा देती। मैं झट से तुम्हें उठाकर ले आती झाड़-पोछकर गोद में लेकर आँगन में बैठ जाती और तुम्हारी समझ पर रो पड़ती कि मैंने ऐसे छुपने को तो नहीं कहा था।

अब लगता है हमारा जीवन भी कुछ उस खेल की तरह ही हो गया है तुमने मेरी समझायी बातों को भी जीवन में उस खेल की तरह ले लिया लेकिन कैसे कहूँ मुझे तुम्हारी बहुत याद आती है! तुमसे दूर रहना कितनी तकलीफ़ की बात है तुमसे कह नहीं पाती! जीवन इतना कठिन है और ये बात जैसे चित पर चढ़ गयी है कि मुझे तुम्हारे पास ही रहना है।

rupammishra244@gmail.com


6 thoughts on “बेटे को संबोधित कविताएँ / रूपम मिश्र”

  1. अलग चित्र खिंचती, अच्छी कविताएं।

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  2. मार्मिक नवोन्मेष …पढ़ते हुए हम खो जाते हैं एक नई बनती दुनिया में…

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  3. बहुत भावुक करने वाली कविताएं…एक मां के दिल से निकली आवाज़

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  4. इतनी सच्ची गंध है कथ्य कि सुवासित हो उठता है मन इसे पढ़कर। अनुभूति का नया संसार समृद्ध होता रहे। बधाई रूपम।

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  5. कविताओं में हर बार माँ की आवाज़ आती है
    बधाई साथी

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