छह कविताएँ / केशव तिवारी


हमारे समय के शानदार कवि केशव तिवारी को ‘नया पथ’ ऑनलाइन में आप पहली बार नहीं पढ़ रहे हैं, अलबत्ता कलिंगा अवार्ड की शॉर्ट लिस्ट से उनके द्वारा अपना नाम वापस लिये जाने के बाद यह पहली बार है। जनवरी 2024 में हमने उनके तत्समय शीघ्र प्रकाश्य संग्रह ‘नदी का मर्सिया तो पानी ही गायेगा’ की कुछ कविताएँ आपको पढ़वायी थीं। वह संग्रह फरवरी 2024 के विश्व पुस्तक मेले में सामने आ गया था। उसके अलावा तीन और संग्रह — ‘इस मिट्टी से बना’, ‘आसान नहीं विदा कहना’, ‘तो काहे का मैं’ प्रकाशित हैं। पेश हैं उनकी कुछ ताज़ा कविताएँ।

 

देस-राग

सोचता हूँ जैसे मैं अवध
और बुदेलखण्ड को चाहता हूँ

मेवाती मेवात को
भोजपुरिया भोजपुर को चाहता होगा

कल रात बतिया रहा था
दोस्त के ईंट-भट्ठे पर

सपरिवार काम करने आये एक
छत्तीसगढ़िया मज़दूर से

वह शराब में डूबा बता रहा था
अपने लोगों की बदमाशी
कैसे अपने ही लोगों ने लिखाया झूठा मुक़दमा
सयानी होती बिटिया पर कसे छींटे

कई-कई बार बोला वह
एक रोटी खाकर भी न छोड़ता देश
रोटी ही नहीं ये वजहें भी थीं सब छोड़ने की

बोला, सालों से नहीं गया दुर्ग और न जाना चाहता है

चलते-चलते मैंने कहा-

कल मैं जा रहा हूँ दुर्ग
तुम भी तो पाटन के लिए उतरते होगे वहीं

जाने क्या छुपा था उसकी
नाराज़ आँखों के बीच
कि अचानक छलकने लगा बाहर

शराब के नशे में शिथिल
उदास आँखों को इस तरह रोते मैंने
देखा पहली बार।

000

मेरा दयार और
(मीर की क़ब्र की खोज में क़रीब 10 साल पहले की घटना पर)

दिन भर भटका था एक मित्र के साथ
तुम्हारी क़ब्र की तलाश में

पता चला इन फैली रेल लाइनों
के इर्द गिर्द थी वो, अब उसका
कोई निशाँ नहीं

पूछती है एक औरत, किसी
ख़ानदानी बुजुर्ग या फिर
किसी वली की क़ब्र खोज रहे हो क्या

मुझे तुमसे कोई शिकायत नहीं
इल्म और अदब के कहे जाने वाले शहर

उनसे भी नहीं जो उसके शेर पढ़
महफ़िलें लूट लेते थे

जो उसके शेरों के साथ
आवारा वार फिरे गलियों में

उनसे कुछ नहीं कहना
जिन्हें उसके शेरों ने
दर-बदर कर दिया

वो खुदाये सुख़न जो ज़िंदगी में
टुक सो लेने की मोहलत चाहता था

जो बस आहिश्ता बोलने की गुज़ारिश
करता चला गया

रेल की आवाज से काँप-काँप
उठता होगा वो
यहाँ भी सुकूँ न मिल सका उसे

वो बेचैनियों का हहराता समुद्र
आज भी हहरा रहा है

और हहरायेगा कायनात के रहते

उसे भी किसी से कोई शिकायत
क्या होगी

जो खुद कहते चला गया
मेरा दयार और

000

इतना तो कर ही सकता हूँ

गया तो एक मधुमालती के पौधे को
जिसे बहुत दिन से ऊपर
चढ़ने की कोशिश में देख रहा हूँ

एक मज़बूत रस्सी का सहारा
देकर जाऊँगा

इतना तो कर ही सकता हूँ
सो ये कर जाऊँगा l

000

घात

नदियों के मीठे पानी से
खारे हुए हैं समुद्र

बहुत कर्णप्रिय मृदुभाषियों आचार्यों ने
बिगाड़ा है भाषा का व्याकरण

शिष्टता नैतिकता के पीछे बैठा वह
अंधा चमगादड़ है जो उल्टा लटका है
किसी टूटती शहतीर से

वो इसीलिए बहुत झुक के चल रहे हैं कि
मर्मस्थल पर आसानी से कर सकें वार

दीनता के स्वांग में छिपी क्रूरता
तब काम करती है

जब आप दया प्रेम के
सरोवर में गोते लगा रहे होते हैं

000

बेतवा तट : एक रात

ठंड से ठिठुरती चाँदनी रात
कभी बादलों की कथरी ओढ़ता
कभी हटाता पूरी नींद में
कुनमुनाता चाँद

पूरे विस्तार से आकाश की ओर
बाँहे फैलाये पेड़

कभी किनारों से लिपटती
कभी धकियाती बेतवा
हवा के साथ-साथ बहता उन्माद

यहाँ पर तो
उन चित्रकारों को होना चाहिए
बासी पड़ रहे हैं जिनके रंग।

000

कितने दिन बाद 

कितने दिन बाद सद्यः प्रसवा गाय को
अपने बछड़े शिशु को चाटते चोकड़ते
देखा सुना

दूध से औराते तने थन

कितने दिन बाद देर तक सुनता रहा
बकरियों का अपने परिवार के साथ
सामूहिक स्वर

जम के झऊणी दरवाज़े की नीम की
मोटाई डार

कितने दिन बाद लगभग आँख खो चुकी
पूर्वहिन आजी ने टोया मेरा चेहरा

हाँथ पकड़ पूछा कहा रह्या एतने दिन
दुल्हिन आय अहैं की नाहीं

दिखा विपत्ति का खूँटा जस का तस
दरवाज़ों पर गड़ा

ओझा दिखे सोखा
काली के थान पर
अभूवाती स्त्रियाँ

घाम तापते
पंडा दिखे परधान दिखे

जिसे नहीं देखना चाहता था वह भी दिखा
कितना दिखा अनदिखा
कहा अनकहा

कितने बाद मथुरा काका ने
पिता के नाम से देख के पुकारा मुझे

कितने दिन बाद दिखे
वही तकलीफ़ भरे चेहरे

जो कुछ ख़ास बोले नहीं हाल लिया
और बुझे कदमों से चले गये

000

keshavtiwari1914@gmail.com


20 thoughts on “छह कविताएँ / केशव तिवारी”

  1. केशव जी हमारे भी प्रिय कवि हैँ : कविताओं की वजह से तो हैँ ही, इसलिए और हैँ कि वे अपने कवि को कवच, शिरस्त्राण और गाभीर्य को लबादे की तरह ओढ़ कर नहीं चलते – इंसानों की तरह रहते हैँ।
    यही बात उनकी कविताओं में भी है।
    कालिंजर दुर्ग पर लिखी उनकी कविता हमें और पसंद है। इसमें वे कालिंजर को भी बोलना सिखा देते हैँ।

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  2. बहुत अच्छी कविताएँ।
    ऐसी, जिन्हें दोबारा पढ़ने का जी चाहे।

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  3. बहुत सुंदर कविताएँ
    लोक कितना जीवंत है इन कविताओं में ।केशव जी को बधाई 💐

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  4. निःसंदेह ग्रामीण परिवेश कुछ सुखद कुछ गमगीन सटीक बिम्ब उभारती कविताएं ,बहुत महत्वपूर्ण।।

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  5. कमाल की कविताएँ हैं। कल ही पढ़ ली थी, आज दोबारा पढ़ी। पहली ही कविता कलेजा काढ़ लेती है। सच्ची कविताएँ, सच्चे आदमी की तरह लंबे समय तक साथ रहती हैं, याद रहती हैं। ये कविताएँ भी याद रहेंगी। केशव जी को बहुत बधाई और शुभकामनाएँ। पढ़वाने के लिए ‘नया पथ’ का आभार।

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  6. शानदार कविताएँ। लुप्त होते, सो रहे लोक को टोहती, खरोंचे। यह केशव का अपना रंग है। मीर वाली कविता तो अद्भुत है। बधाई कवि को। धन्यवाद आपका, पढ़ाने के लिए

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  7. दिल को गहरे मथने वाली कमाल की कविताएँ. भाषा की तरलता ने तो मोह लिया और प्रत्येक कविता की आख़िरी पंक्तियाँ दिल को कचोटती हुई ठहर जाती हैं लम्बे समय के लिए. देस-राग कविता से लेकर कितने दिन बाद कविता के रास्ते पर चलकर जैसे हमने लोकजीवन में पसरी तमाम विडम्बनाओं से दो-दो हाथ किया हो… प्रिय कवि को हार्दिक बधाई और साधुवाद.

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  8. केशव मेरे प्रिय कवि हैं। उनकी कविता में लोक जीवन के अनकहे पहलू सहजता से उजागर होते हैं। ये कविताएं भी उसी अंदाजेबयां का इजहार हैं।

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  9. कवि केशव तिवारी अवध के लोक जीवन को ऐसे टोते हैं जैसे कोई शिशु दादी के चेहरे को टोता है। समय की समझ उन्हें एक ऐसा काव्य-विवेक देती है कि उनकी अनेक पंक्तियां समय-सूक्ति की तरह दिल दिमाग पर दस्तक देती हैं। मसलन –

    दीनता के स्वांग में छिपी क्रूरता
    तब काम करती है
    जब आप दया प्रेम के
    सरोवर में गोते लगा रहे होते हैं।

    केशव जी की आत्मीयता का आयतन इतना है कि उसमें गांव, गोरू, मनई, चिरई चिरोमन सब के लिए जगह बन जाती है। केन बेतवा सई आदि नदियों की धार उनकी कविता को धारदार बनाती है।

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  10. कविता में बिंब और दृश्य की ऐसी पारस्परिकता कम देखने को मिलती है । लोक-संगति से उपजी इन कविताओं में एक ओर करुणा की पुकार है तो दूसरी ओर श्रम और चारागाही संस्कृति का आत्मीय प्रभाव ! ‘ मेरा दयार ‘ का रंग बिल्कुल अलग है..हार्दिक बधाई प्रिय कवि को…

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  11. कितनो दिनों बाद
    ऐसी कविता है जो लगातार घटित होती है। आजी ने टोह्या हाथ से चेहरा, कहाँ रहा इतने दिन।
    केशव का जुडाव ग्राम जीवन से बना है, और यही उनकी कविता की शक्ति है। मुझे कविताएँ बहुत अच्छी लगीं।

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