‘द बुक थीफ़’ : साधारण लोगों की असाधारण नैतिकता का आख्यान / महेश मिश्र


‘द बुक थीफ़ ‘ को अक्सर ‘एक युद्ध में फँसी बच्ची की कहानी’ समझा जाता है, लेकिन यह भाषा की युद्ध-भूमि है—जहाँ शब्दों का इस्तेमाल हत्या के लिए भी हो सकता है, और किसी को जीवित रखने के लिए भी। हिटलर ने शब्दों से सत्ता बनायी, मैक्स ने शब्दों से प्रतिरोध, और लीसेल ने शब्दों से स्मृति।–महेश मिश्र का सुचिन्तित आलोचनात्मक लेख।

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नाज़ी जर्मनी के एक छोटे से क़स्बे में घटित होने वाली मार्मिक कहानी, मार्कस ज़ुसाक द्वारा लिखित द बुक थीफ़  (2005) वास्तव में एक असाधारण साहित्यिक कृति है। यह एक ऐसी पुस्तक है जो यहूदियों के भयावह नरसंहार को उन जर्मन लोगों की नज़रों से देखने का प्रयास करती है जो नाज़ी विचारधारा के कटु प्रवाह में बह नहीं पाये थे– उन युवा किशोरों की नज़र से, जो हिटलर के यूथ दस्ते में शामिल नहीं हुए थे, जो यहूदियों की जान बचाना चाहते थे, उन्हें ब्रेड का एक टुकड़ा देना चाहते थे, भले ही इसके लिए उन्हें अपना सब कुछ दाँव पर लगाना पड़ जाये।

यह युद्ध के भयावह परिणामों को बताने वाली पुस्तक है जो मृत्यु को नैरेटर बनाती है और उसे कथावाचक बनाने के साथ-साथ एक संवेदनशील पर्यवेक्षक के रूप में भी सामने लाती है। यह एक विरल कलात्मक प्रयोग है! इससे पहले मैंने कभी ऐसी कोई कथा नहीं पढ़ी थी जिसमें ऐसा प्रयोग दिखा हो। लेखक की प्रतिभा इस बात में निहित है कि कैसे मृत्यु, जिसे हम आम तौर पर क्रूर और भावनाहीन मानते हैं, स्वयं को उन अत्याचारों से कहीं कम क्रूर पाती है जिनकी वह साक्षी बनती है। इस वर्णन में एक गहरी विडंबना है, क्योंकि मृत्यु स्वीकार करती है कि नाज़ी जर्मनी में क्रूरता के विशाल पैमाने से वह “थक चुकी” है, अक्सर कुछ आत्माओं को “अपने साथ ले जाने” में अपनी अनिच्छा व्यक्त करती है। जैसा कि मृत्यु मार्मिक रूप से टिप्पणी करती है, “I am haunted by humans.” कितनी अद्भुत विडंबना है कि मृत्यु, जो जीवन के अंतिम सत्य के रूप में जानी जाती है, वह यहाँ मनुष्य की हिंसा, नफ़रत और विवेक-हीनता से भयभीत हो गयी है।

मृत्यु केवल कथावाचक नहीं है, बल्कि एक दार्शनिक हस्तक्षेप भी है। पुस्तक की भाषा बार-बार काव्यात्मक हो जाती है, जैसे किसी थके हुए नियंता की आत्मस्वीकृति: “Even death has a heart.” यह बहुत महत्वपूर्ण वाक्य है, जो इस पुस्तक को किसी साधारण त्रासद-गाथा से ऊपर उठाकर मूल्य-बोध की पुस्तक बना देता है। मृत्यु की टिप्पणियाँ अक्सर एक दार्शनिक उदासी से रंगी होती हैं, यह देखते हुए कि

“The human heart is a line, whereas mine is a circle, and I have the unlimited capacity to be in the right place at the right time. The result is that I always find humans at their best and at their worst. I see their ugliness and their beauty, and I wonder how the same thing can be both.”

यह द्वंद्व, मानव अनुभव के लिए केंद्रीय महत्त्व का है।

यह कथा 1939 की नाज़ी जर्मनी में बसे एक छोटे-से क़स्बे मोलकिंग की है, जहाँ गूँजती हैं युद्ध की धमक, हिटलर की क्रूर छाया, और बालमन की काँपती, फिर भी जिजीविषा से भरी धड़कनें! मुख्य पात्र है लीसेल मेमिंगर—एक ऐसी जर्मन बच्ची जिसकी मासूम दुनिया युद्ध और भूख से तहस-नहस हो चुकी है। उसका छोटा भाई सर्दी और भूख से दम तोड़ देता है। पुस्तक शुरू होती है उसके अंतिम संस्कार के क्षण से, एक ऐसा पल जो गहरे दु:ख में डूबा हुआ है। और यहीं से लीसेल की परिवर्तनकारी यात्रा शुरू होती है। क़ब्र के लिए ताज़ी खोदी गई मिट्टी के बीच, उसे एक छोटी, साधारण पुस्तक मिलती है—कब्र खोदने और दफनाने की एक पुस्तिका, “The Grave Digger’s Handbook”। वह उसे चुरा लेती है, एक गुप्त कार्य जो शब्दों के साथ उसके नये-नये प्रेम संबंध की शुरुआत को चिह्नित करता है। यह पहला चोरी किया गया शब्दों का टुकड़ा है—मृत्यु के आँगन में पनपी भाषा की पहली कोंपल। दु:ख और एक अजीब आकर्षण से जन्मी यह प्रारंभिक चोरी, “द बुक थीफ़” के रूप में उसकी पहचान के लिए मंच तैयार करती है।

लीसेल की माँ उसे पालक माता-पिता के पास छोड़ जाती है—33 हिम्मल स्ट्रीट पर रहने वाले हुबरमैन दंपति के पास। यहीं से शुरू होती है द बुक थीफ़  की असली कथा।

यहाँ पर हैंस हुबेरमैन, उसका पालक पिता, उसके जीवन में प्रवेश करता है, उसका प्यारा ‘पापा’ बन जाता है। पेशे से एक विनम्र दीवार पेंटर और जुनून से एक अकॉर्डियन वादक, हैंस कोमल लेकिन अडिग दयालुता का प्रतीक है। वही है जो धैर्यपूर्वक लीसेल को शब्दों की दुनिया से परिचित कराता है, उसे वर्णमाला सिखाता है, उसे पढ़ने के रहस्यों के बारे में बताता है। उनके पाठ अक्सर रात के अँधेरे में आयोजित होते हैं जब लीसेल दुःस्वप्नों से अचानक जाग जाती है। ये पल कोमल अंतरंगता से भरे होते हैं।

“She learned to read and write in the moments between waking and sleeping.”

यह एक धीमा, लेकिन अत्यंत प्रभावशाली आत्मिक शिक्षण है, जहाँ शब्द प्रेम, सुरक्षा और स्मृति बनकर उतरते हैं।

हैंस के बारे में टिप्पणी है,

“Trust was accumulated quickly, due mainly to the humbleness of the man, his cruel strength of presence. The girl knew from the outset that Hans Hubermann would always appear in the middle of a scream, and he would not leave.”

यह “उपस्थिति” लीसेल की स्थिरता की आधारशिला है, एक ऐसी दुनिया में जो उलटी हो गयी है।

लीसेल धीरे-धीरे किताबों से प्रेम करने लगती है, और नाज़ियों द्वारा सार्वजनिक रूप से जलायी जा रही पुस्तकों की राख से कुछ अक्षर, कुछ अर्थ चुरा लेती है। वहाँ से शुरू होता है उसका बुक थीफ़ बनना—एक ऐसा चोर जो ज्ञान और सत्य के पक्ष में खड़ा है। चोरी के अपने कृत्यों में उसे रूडी स्टीनर नाम का एक अटूट साथी मिलता है। उसका समवय और आत्मा का साथी। रूडी, एक अदम्य, जीवंत और निडर लड़का, भोजन चुराने में अधिक समझदारी पाता है, फिर भी वह लीसेल की विचित्र किताबों की चोरियों में ईमानदारी से उसके साथ खड़ा रहता है। उनकी दोस्ती जीवंत और ईमानदार है, मासूमियत और लचीलेपन से भरी। रूडी बार-बार लीसेल से कहता है: “How about a kiss, Saumensch?”

रूडी के बारे में पुस्तक टिप्पणी करती है, “Crazy or not, Rudy was always destined to be Liesel’s best friend. A snowball in the face is surely the perfect beginning to a lasting friendship.” रूडी की साहसी भावना और जेसी ओवेन्स के प्रति उसकी प्रशंसा उसके चारों ओर के परिवेश और उसकी नस्लीय घृणा के विपरीत खड़ी है।

और यहीं प्रवेश करता है कहानी का सबसे निर्णायक मोड़—यहूदी युवक मैक्स वांडरबर्ग का आगमन। ‘पापा’ हैंस हुबरमैन उस यहूदी को अपने घर में छिपाने का जोख़िम उठाते हैं। प्रतिरोध का यह गहरा कार्य, हुबरमैन की अत्यधिक ग़रीबी को देखते हुए अकल्पनीय जोख़िमों से भरा हुआ है। लेकिन यह मानवीय करुणा की ऊँचाई को विरल प्रांजलता से दर्शाता है।

अब मैक्स जो भूख और ठण्ड से लड़ता है, लेकिन लीसेल को कहानियाँ सुनाता है, मीन काम्फ  (हिटलर की आत्मकथा) के पन्नों को रंगकर उनमें अपने शब्द सजाता है। यह एक सांकेतिक क्रांति है—घृणा और नस्लवाद के सबसे विकृत प्रतीक को बदल डालना। मैक्स उस परिवार की कठिनाइयों से अवगत है और विनम्रतापूर्वक अनुरोध करता है, “Whatever scraps you have, anything that no one else will eat, just don’t give me more than that.” यह अकेली पंक्ति उसकी गहरी विनम्रता और कृतज्ञता को प्रकट करती है, जो अपने संयम में गहराई से मार्मिक है- don’t give me more than that!

मैक्स की उपस्थिति हुबेरमैन परिवार को बदल देती है, और लीसेल और मैक्स के बीच प्रेम और दोस्ती का एक गहरा, भाई-बहन जैसा बंधन खिलता है।

मैक्स भूख, ठंड और लगातार डर से कमज़ोर होकर, अक्सर बीमार पड़ जाता है, लेकिन लीसेल और हैंस उसे ठीक करने, उसे जीवित रखने के लिए अथक प्रयास करते हैं। तहखाने की तंग ठंडक में मैक्स के माध्यम से कलात्मक अवज्ञा का एक रूपक सृजित होता है। इस आश्चर्यजनक युक्ति में, हिटलर के साथ वह एक काल्पनिक मुक्केबाज़ी मैच में संलग्न होता है, मानसिक रूप से फ्यूहरर को हराता है। और एक शक्तिशाली प्रतीकात्मक हावभाव में, वह मीन काम्फ के पन्नों को फाड़ देता है—वही किताब जिसे उसने सुरक्षा-कवच की तरह अपने अस्तित्व के लिए ढोया था—उन ज़हरीले शब्दों के ऊपर पेंट करता है, और अपनी खुद की कहानी लिखता है।

यह जहरीले शब्दों को जीवन-पुष्टि करने वाली चीज़ में बदलने का एक शानदार, कलात्मक प्रयास है, घृणा का एक रचनात्मक विध्वंस!

पुस्तक की सबसे महत्त्वपूर्ण अंतर्धारा है—शब्दों की सत्ता और उनका राजनीतिक दुरुपयोग। हिटलर का पूरा उदय मीन काम्फ जैसे ग्रंथों और भाषणों के ज़रिये हुआ। मृत्यु बार-बार यह कहती है:

“Yes, the Führer decided that he would rule the world with words.”

“Not guns. Not money. Just words.”

और फिर मैक्स उन शब्दों को काटता है, पोंछता है, मिटाता है—यह एक काव्यात्मक प्रतिरोध है, जो लेखन की नैतिक भूमिका को स्पष्ट करता है। यह बात वर्तमान राजनीतिक समय में भी बेहद प्रासंगिक है, जब झूठ, अफवाह और नफ़रत के लिए शब्दों का उपयोग हो रहा है। मैक्स द्वारा मीन काम्फ को अपनी कहानी, “द स्टैंडओवर मैन” और बाद में “द वर्ड शेकर” में बदलना, भाषा के गहरे प्रभाव का प्रतीक है जो गुलाम बनाने और मुक्त करने, नष्ट करने और बनाने, दोनों में सक्षम है।

लीसेल, हैंस—ये सब लोग कोई राजनैतिक कार्यकर्ता नहीं हैं, ये सहज नैतिकता से संचालित लोग हैं। उन्होंने कोई राजनीतिक घोषणापत्र नहीं पढ़ा, लेकिन उन्हें यहूदियों को छुपाना, भूखे को रोटी देना, या किताब जलाये जाने से पहले उठा लेना सही लगता है। यह ‘साधारण’ मनुष्यों की नैतिकता है—जो बहुत असाधारण है। यह पुस्तक एक ऐसी दुनिया का चित्र बनाती है जहाँ लोग सही करने की कोशिश करते हैं, भले ही वह अवैध हो। यह बात आज के समय में भी बेहद अनमोल है।

लीसेल सिर्फ़ किताबें चुराती नहीं, वह पढ़ती है, जीती है। उसका सफ़र एक रीडर से एक नैरेटर तक का है—जो इस पुस्तक का एक मेटाफिक्शनल पक्ष है। मृत्यु जब अंत में उसकी किताब उठाती है, तो यह महज़ एक प्रतीक नहीं, बल्कि पाठक से लेखक बनने की नैतिक यात्रा है। यह दर्शाती है कि शब्दों को आत्मसात करना, उन्हें जीना और फिर उन्हें अपनी आवाज़ में व्यक्त करना ही सच्ची शक्ति है। जैसा कि लीसेल बाद में शब्दों की शक्ति पर विचार करती है, अच्छे और बुरे दोनों के लिए:

“I have hated words and I have loved them, and I hope I have made them right.”

जैसे-जैसे युद्ध अपने भयानक रूप में सामने आता है, बमबारी से पूरा क़स्बा तबाह हो जाता है। 33 हिम्मल स्ट्रीट, जो लीसेल और उसके परिवार के लिए सुरक्षा और प्रेम का प्रतीक था, मलबे में बदल जाता है। लीसेल एक तहख़ाने में बैठी होती है—जहाँ वह अपने शब्दों के सहारे उस भयावह दुनिया से लड़ रही है। रूडी स्टीनर, जो जीवन भर लीसेल से एक चुंबन माँगता रहा, अंत में उसे युद्ध की भेंट चढ़ा हुआ, मृत देह में मिलता है। यह पल सबसे मार्मिक और हृदयविदारक है। वह चुम्बन लेती है और पाती है-

“He tasted like regret in the shadows of trees and in the glow of the falling bombs,”

रूडी का जीवन अधूरे बचपन और युद्ध की अमानवीयता दोनों की एक साथ गवाही देता है। यह दर्शाता है कि कैसे युद्ध ने निर्दोष भविष्य को बेरहमी से छीन लिया। मृत्यु, जो अब तक एक ‘आवाज़’ थी, इस बिंदु पर एक निरीह प्रेक्षक बन जाती है। वह लीसेल को जीवित देखती है और फिर वही मार्मिक टिप्पणी करती है—“I am haunted by humans।” यह वाक्य एक बार फिर मृत्यु की मानवीयता और मनुष्यों की क्रूरता के प्रति उसके आश्चर्य और पीड़ा को दर्शाता है। लीसेल, जिसने शब्दों को चुराया, जिन्होंने उसे ज़िंदा रखा, उन शब्दों के बल पर अपने भीतर एक दुनिया को बचा लेती है। वह सिर्फ़ बाहरी दुनिया से नहीं लड़ती, बल्कि शब्दों के माध्यम से अपनी आंतरिक दुनिया को भी सुरक्षित रखती है।

द बुक थीफ़  दोस्ती, प्रेम, घृणा, क्रोध, भूख-प्यास, हिंसा और मृत्यु जैसी कई भावनाओं को कुशलता से एक साथ बुनती है – फिर भी इस जटिल ताने-बाने के बीच, जीवन लगातार झाँकता रहता है। यह एक ऐसी कलाकृति है जो इन भिन्न भावनाओं को सहजता से संयोजित करके और उनकी विशालता को गले लगाकर, मानव अनुभव की समृद्धि और विविधता को सही मायने में पकड़ती है। इतनी विविध भावनाओं को संतुलन में रखने की यह गहरी क्षमता ही इसे एक महान कृति का दर्जा दिलाती है।

यह, सच्चे अर्थों में, एक “life-affirming” पुस्तक है—उस दुनिया की कहानी जिसे आधिकारिक इतिहास अक्सर अनदेखा कर देता है। यह उन लोगों की आवाज़ है, जो चुपचाप अपने तरीक़े से मनुष्यता को बचाने में लगे रहे। इसमें किसी बड़े नायक की कथा नहीं है—यह छोटी बच्चियों, चुप रहने वाली माताओं, अकॉर्डियन बजाने वाले पिताओं और तहख़ाने में कहानी लिखते यहूदियों की कथा है—जो इतिहास की गलियों में शायद अनसुने रह जाते। यह हमें सिखाता है कि सबसे भयावह परिस्थितियों में भी, मानवीयता, प्रेम और शब्दों की शक्ति हमें जीवित रख सकती है।

द बुक थीफ़  को अक्सर ‘एक युद्ध में फँसी बच्ची की कहानी’ समझा जाता है, लेकिन यह भाषा की युद्ध-भूमि है—जहाँ शब्दों का इस्तेमाल हत्या के लिए भी हो सकता है, और किसी को जीवित रखने के लिए भी। हिटलर ने शब्दों से सत्ता बनायी, मैक्स ने शब्दों से प्रतिरोध, और लीसेल ने शब्दों से स्मृति। मृत्यु ने अंत में यह जाना कि मनुष्य केवल अपने कर्मों से नहीं, अपने कहे-अनकहे शब्दों से भी अमर होता है।

मार्कस ज़ुसाक का यह उपन्यास एक अनिवार्य पाठ है जो शब्दों की असाधारण शक्ति और मानव आत्मा की स्थायी और अदम्य जिजीविषा को स्पष्ट रूप से हमारे सामने लाता है और एक अद्वितीय ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य भी प्रदान करता है।


1 thought on “‘द बुक थीफ़’ : साधारण लोगों की असाधारण नैतिकता का आख्यान / महेश मिश्र”

  1. ये इत्तेफाक है कि हताशा में डूबा था मन , हम गाज़ा देख रहे हैं , यूक्रेन देख रहे हैं लिंचिंग देख रहे हैं हताशा में डूबते हैं एकदम असहाय से कुछ नहीं कर पा रहे हैं । ऐसे में लेस्ली और हैंस एक जिंदा कोशिश भरते है …हां ये तो कर पा रहे हैं न और कुछ लोग ..फिर कुछ और ..
    शुक्रिया इसे पढ़वाने का ..

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