तीन कविताएँ / सत्येंद्र कुमार


‘वे फिलिस्तीनी बच्चे हैं/ खुशियाँ बची रहें पृथ्वी पर/ वे इसके लिए लड़ रहे हैं/ वे फूलों की तरह कोमल बच्चे हैं/ पहाड़ों की दृढ़ता के साथ जीते बच्चे हैं’–इस बार पढ़िये, गया निवासी सत्येंद्र कुमार की कविताएँ। 

उपहार

मैंने उससे कहा
फूलों ने तुम्हारे लिए
उपहार और संदेश के रूप में
अपनी सुगंध और स्पर्श भेजे हैं।

उसने कहा
तुम मुझे छुओ
उसका रोम रोम सिहर उठा
और वह
सुगंध बन कर फैल गई पृथ्वी पर।

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नई उड़ान

मेरी बिटिया
छोटी उम्र में ही
तैराकी करती है
स्केटिंग करती है
साइकिल चलाती है
गाना और नाचना सीखती है।

मैने पूछा
इतना सबकुछ कैसे कर पाओगी एक साथ
पढ़ने पर ध्यान लगाओ।

उसने कहा
मैं मछलियाँ बन
समुद्र की गहराई में समाना चाहती हूँ
मैं अपने गीत में
पीड़ितों के दुख को गाना चाहती हूँ
मैं साइकिल से पृथ्वी के
कोने कोने में झाँकना चाहती हूँ
मैं नदियों, चाँद, तारों के नृत्य के साथ शामिल हो
पूरी पृथ्वी और आकाश को
थिरकते देखना चाहती हूँ।
मैं बरसों की गुलाम कड़ियों को तोड़ रही हूँ
अपने लोगों के उन सपनों को
साकार रूप दे रही हूँ
जिसे वे नहीं जी पायीं
और तुम्हारी शिक्षा ने तो
उन्हें गुलाम ही बनाया
मैं जानने लगी हूँ आकाश का रंग
और वर्षा की बूँदों का अहसास
मेरी असफलता में भी
उन ज़ंजीरों को तोड़ने का दर्प रहेगा
पिता !
हो सके तो मुझे माफ़ करना।

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फिलिस्तीनी बच्चे

शासक की तरफ़ उछाला गया एक पत्थर
हज़ारों मिसाइलों पर भारी पड़ता है
वे जब स्कूलों, हॉस्पिटलों पर बम गिराते हैं
उनके घरों को ज़मींदोज करते हैं
वैसे समय में भी
बच्चे आसमान के नीचे
तारों के साथ
बातें करते
माँ की गोद में
उसके आँसुओ को पोंछते
कल के सुनहरे सपने देखते हैं
कोई कैसे बिना घर, बिना पानी, बिना बिजली
बिना रोटी के जीने का संकल्प लेता है!
ये बात खूनी शासकों को कभी समझ में नहीं आती।
वे फिलिस्तीनी बच्चे हैं
खुशियाँ बची रहें पृथ्वी पर
वे इसके लिए लड़ रहे हैं
वे फूलों की तरह कोमल बच्चे हैं
पहाड़ों की दृढ़ता के साथ जीते बच्चे हैं
वे लड़ रहे हैं कि
हिंसा ख़त्म हो दुनिया से
वे धर्म के लिए नहीं
भाईचारे, बराबरी के लिए लड़ रहे हैं
युद्ध पिपासु भेड़ियों के ख़िलाफ़
बच्चे हर रोज़ नयी तकनीक गढ़ रहे हैं
वे जानने लगे हैं
बराबरी की लड़ाई
समानता का
युद्ध के समय उम्र का कोई अर्थ नहीं होता
एक छोटी कंकरी से
बड़े बड़े घड़े तोड़े जा सकते हैं।

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संपर्क : 8521817778


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