प्रकाश चंद्रायन को ‘नया पथ’ के प्रिंट संस्करण से लेकर ऑनलाइन तक आप पहले से पढ़ते आये हैं। उनका एक कविता संग्रह, ‘पददलित मातृभूमि की आत्मा’ अनन्य प्रकाशन से छपा है और दूसरा संग्रह, ‘हाशियास्तान’ प्रकाशनाधीन है। पढ़िए, उनकी तीन ताज़ा कविताएँ!

सपने नींद के और जाग के
सपने आदतन आवारा हैं
जहाँ देखी गहरी नींद,
वहीं आवारगी पर उतारू।
इतने रंग-रूप,भाव-भंगिमा,कहन-गढ़न के साथ चलती हैं
ख्वाबों की ये आवारगियाँ-
कि रूमानी फिल्मों के स्वप्नदृश्य भी बेमानी।
मानो इसके सिवा कोई अंदाज नहीं,
कोई अलहदा मन-मिज़ाज भी नहीं।
जैसे आवारगी की कोई दिशा नहीं,
वैसे ख्वाबों की भी कहाँ?
चाहे वे नीली रातों की पकी नींद के हों
या पीले दिनों की कच्ची नींद के।
बने-ठने या डरावने,
शुष्क-रुक्ष या सुहाने-सुहावने।
जिन्दगी की जद्दोजहद से उनका क्या सरोकार?
सिर्फ छायाभास…छायाभास…प्रतिभास।
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सपनों ने सपने में भी नहीं सोचा होगा-
कि उसे आवारागर्द विभूषित करने पर होगी अदभुत सहमति,
न स्वप्नजीवियों और न स्वप्नभक्षियों को कोई आपत्ति।
मनोवादी और राज्यवादी दोनों रजामंद,
इस रजामंदी पर सपने भी दंग-दंग।
नितांत स्वप्नजीवियों ने तो तत्क्षण स्वीकारा-
सपने कुदरतन आवारा।
आवारापन तो पार्श्व है हमारा
और सपने पार्श्वसंगीत।
इसी जुमले पर तो सपनों के सौदागरों का वारा न्यारा… वारा न्यारा।
स्वप्नभक्षियों ने भी लगाई मुहर-
जहाँ जितने आवारा स्वप्न,
वहाँ उतना आभासी जनतंत्र।
देश उनींदा रहे या निद्रामग्न रहे,
आवारा सपनों में खूब-खूब विचरे।
बस, एक याराना माँग है,
जाग के सपनों से दूर-बहुत दूर रहे।
रजामंदी के स्वर गूंजे
आमीन! आमीन !!
तथास्तु! तथास्तु !!
ऐसा ही हो! ऐसा ही हो !!
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जगी आँखों के स्वप्न नहीं होते,
किताबी भाष्यों के बंदी।
वे जिन्दगी में देखे जाते हैं,
कॉपीराइट के बाहर।
वे जिन्दगी देखते हैं और जिन्दगी उन्हें।
पहले वे दु:स्वप्न जैसे दिखते हैं,
फिर महास्वप्न में घटित होते हैं-
और नया महाजीवन प्रारंभ करते हैं।
ये सपने टकसाली सिक्के नहीं
कि तय साँचे में ढलें।
समय को सपनों में ढालना पड़ता है
और सपनों को समय से जूझना पड़ता है।
नींद भी दीर्घनिद्रा नहीं होती,
उसे भी टूटना ही है।
जब जाग होना है,
तब आवारा सपनों को दफ़ा होना ही है।
ऐसे सपने नहीं होते परालौकिक,
होते हैं इतने आमफहम
कि बताये जाते हैं फालतू।
वे नहीं होते शेखचिल्ली के सपने,
बुनियादी सपनों से ही चलती है दुनिया।
वे ही खतरों से खरबों साँसें बचा लाते हैं
और हो जाते हैं विराट जिंदा दृश्य।
आवारा ख्वाबों में आती होंगी,
हवा-हवाई तारिकाएँ और हीरो नंबर वन-
ख्यालों की भूलभुलैया में गड़प करने के लिए।
जाग के सपनों में ही आते हैं,
गली-मुहल्लों के हमकदम-
दुनिया का चक्का घुमाने के लिए।
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याद हैं वे रातें माई-दादी की नसीहतें,
घर-आंगन की जबर हिदायतें.
सिरहाने लिखो देव-पुरुख पीर-फकीर के नाम,
भाग जाएंगे बुरे सपने तमाम.
लिखे जाते रहे चुन-चुन के नाम,
आते ही रहे डरावने सपने बेलगाम.
भेद खुला कि दोनों के एकसूत्री काम,
कायम रहे कायम रहे डर का मुकाम.
जब छोड़ दिया ये भौकाल,
तब जाग से कटा अचेतन का जंजाल .
जाग के सपनों से टूटते हैं,
सपनों के सौदागरों के तिलस्म-
और उभर आते हैं जमीनी सपने।
साफ-साफ समझ आती है,
ख्वाबखोरों के ख्वाबों की कूटभाषा-
और आवारा सपनों का मायाजाल।
जाग के सपने देखे जाएँ,
जिन्दा रहें-
मारे न जाएँ।
मर न पाएँ ;
सच किए जाएँ।
रचना ही तो जगी आँखों का सपना है,
वही सपना तो रचना है।
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झूला
यह दौर-दौर की बात है,
लिमोजिन बनाया जाता था रथ।
वह पेट्रोल की बजाय ख़ून पीता था,
चीख़ों को रौंदता हुआ दौड़ता था।
उन्मत्त जयकारे लगते थे,
ध्वजाओं से लपटें उठतीं थीं।
उस लहकते-बहकते दौर में किया गया,
एक झूले का उत्पादन-लांचन।
झूलेदार इसे सिंहासन मानता था,
और देसावर राजसी झूला।
मंगलगान करते धर्माधीश कहते-
यह तो दैवीय गगन हिंडोला है।
*****
ऐलान हुआ कि यह झूला अटूट है,
हर करतब की मनमानी छूट है।
एक डोर पर सुपर बैंकों की पकड़ है,
दूसरे पर एकोअहं की जकड़ है।
वे दोनों इसे झुलाते हैं,
जैसे कठपुतले नचाते हैं।
कंपनियों के ब्रांड झूले पर चमकते नगीने हैं,
पताकाएं दमकते शोले हैं।
सजा-धजा झूला जब झूलता है,
तब बिजली-सा कौंधता है।
पेंग-दर-पेंग यह धरा-गगन छाप लेता है,
एक पेंग कश्मीर दूसरा कन्याकुमारी।
सुबह कच्छ शाम कामरुप कमच्छा,
कहता है सब प्रभु की इच्छा।
कभी उस देश कभी उस दिशा,
अभी दृश्य अभी अदृश्य।
जैसे झूला न हो तिलस्मी खेला हो,
मानो सिंहासन तो ब्रांडों का जगमग मेला हो।
*****
वह घोषित झूला युग है,
झूले में सजा-धजा झूलेदार झूम-झूम कहता है-
झूलो….झूलो….झूलो,
सब कुछ भूलो, भूलो, भूलो।
ऐसा युग कभी नहीं आएगा,
झूला युग सोने के अक्षरों में लिखा जाएगा।
इस युग में शेयर बाजार झूमता है,
रुपया बार-बार जमीन चूमता है।
झुठेरों की फौज देश रौंदती है,
हवा में नफरत की कटारें कौंधती है।
झूलेदार पेंडुलम-सा हिलता-डुलता है,
समय भी टिक-टिक बजता है।
हर टिक-टिक में संदेश छिपा रहता है,
जैसे बूंद-बूंद से घड़ा भरता है।
*****
धीरे-धीरे समय ने सुझा दिया,
सच जनमन पर छा गया।
वह दिन भी आ गया,
जब झूले का तिलस्म टूट गया।
अर्रा कर नीचे गिरा,
गर्त में समा गया।
झूले में जड़े नगीने कंपनियों के नजराने थे,
ध्वज-छत्र-आसन सब फसाने थे।
टकसाल में ढलते थे नारे कातिलाने,
एक-एक अल्फाज़ थे बेगाने।
झूला जहां गिरा,
वहां अंधा खोह बन गया।
झूलेदार अतल खोह में गया,
आखिर झूला युग अंधा युग बन गया।
यह पंचतंत्र नहीं अंधतंत्र की कथा है,
यह आहत जनतंत्र की व्यथा है।
असल सूत्रधार को दूसरे झूलेदार की तलाश है,
एक नए कठपुतले की आस है।
क्या आपको हमको सबको
आगत यथार्थ का पूर्वाभास है,
आम के नाम पर सबकुछ खासमखास है।
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सशस्त्र जुआ
जिस किसी देश पर जब-जब लदा सशस्त्र जुआ,
तब-तब क्या हुआ यह उस देश ने ही दोटूक कहा।
देश सुनाता रहता है अपना दर्द-ए-दास्तान,
सुनकर कैसे नहीं उठ खड़ी होगी हमदर्द संतान।
यह जुआ जितना भीतरी है उतना ही बाहरी भी है,
इरादा साफ है कि हमारे जीवन-मरण की बारी है।
जो पहाड़ से अड़ाए गए वे सब अब क्यों न बढ़ें,
जो खाई में गिराए गए वे सबके सब उठ नया गढ़ें।
उठो प्यारो! जुल्म के मारो उठो!!
वक्त उठने का है,मौसम खिलने का है।
उठो हक के लिए! नया रचने के लिए!!
वक्त गुनगुनाने का है,मिलजुल गाने का है।
सब उठे,कहते उठे कि उठो प्यारे देश!
सशस्त्र जुए को फेंकने जी-जान से उठो।
इस तरह जब देश और वक्त का संलाप हुआ,
तब सशस्त्र जुए पर हर संभव संघात हुआ।
आखिर देशज संतानों ने वह सब कुछ किया,
जिससे टूटने लगा देश पर लदा सशस्त्र जुआ।
जैसे ही जिंदा कौमें करतीं हैं नई पहल,
वैसे ही सतत होते हैं द्वंद्व-प्रतिद्वंद्व अटल।
यह पहली बार नहीं बार-बार हुआ,
सशस्त्र जुए को फेकने देश उठ खड़ा हुआ।
जो समझते रहे देश को महज राजपाट,
वे समा गए काल के गर्त में एक काली रात।
इतिहास में दबे ऐसे कई उदाहरण हैं,
साधारणों के हर कदम असाधारण हैं।
यही तो चाहती है अमनपसंद दुनिया,
जुओं से परे हो समस्त देस-देश-दुनिया।
कोई देश महज भूगोल नहीं जनगण की सांस है,
कोई देश सिर्फ भोग नहीं जिंदगी की आस है।
तारीखें बदलती हैं जब देश उठता है,
जीवंत वसंत सी ऐतिहासिक घ्वनि गूंजती है।
ऐसी कोई सदी नहीं जब कोई न कोई देश न उठा,
दुनियानामा में दर्ज है जब-जब सशस्त्र जुआ टूटा।
कितने दिन कितने दिन लदा सशस्त्र जुआ?
जितने दिन जितने दिन इंसान नहीं जगा।
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संपर्क: 301, इंदिरा अपार्टमेंट,
केशव भवन के पीछे,
रहाटे कालोनी,
साउथ अंबाझरी रोड,
नागपुर: 440022,
महाराष्ट्र।
मोबाइल: 9273090402
ईमेल –[email protected]







बहुत खूब
सार्थक और अत्यंत प्रशंसनीय कविताएँ
हमारे समय के अधेरे, उसमें उठती नागरिक हिलोरें, उनकी आवाज़ और जांबाज़ दखल को ठीक ढंग और दिशा से देखने वाली ये कविताएं महत्वपूर्ण हैं। इन कविताओं को धैर्य के साथ पढ़ने की ज़रूरत है।
प्रकाश जी का शिल्प बिल्कुल अलग है और अलग से पहचाना जाता है। यह पहचान विशिष्ट है और पाठकों के लिए श्रमसाध्य भी।
इन कविताओं के लिए संजीव जी का धन्यवाद और प्रकाश जी को बधाई।