सुमित की कविताएँ
सुमित अपने कवि-कर्म को लेकर गंभीर हैं यद्यपि उनकी काव्ययात्रा आरंभ हुए ज़्यादा दिन नहीं हुए हैं। वे समाजशास्त्र के विद्यार्थी हैं और जेंडर स्टडीज़ में दख़ल रखते हैं। पुरखों-पूर्वजों के अनुभवों को उन्होंने कई माध्यमों से आयत्त किया है। रोष को आक्रोश में और आक्रोश को चिंतन में घुलाकर वे कविताएँ रचते हैं। कमोबेश सबकी तासीर बची रह जाती है। यह सवाल उनके लिए भी पहेली की तरह है कि जाति जाती क्यों नहीं। माथे से छूटकर हाथ में चिपट जाती है। हाथ से छुड़ाओ तो पेट के रास्ते दिमाग में जाकर अदृश्य हो जाती है। अदृश्य होने का यह अर्थ नहीं कि वह निष्क्रिय हो जाती है। चेतना का नियंत्रण उसके हाथ आ जाता है। अपनी काया में आधुनिक दिखता व्यक्ति चेतना के स्तर पर जातिवादी होता है। इस अनंग सत्ता को पहचानना इतना मुश्किल भी नहीं है लेकिन उसकी तरफ़ ऊँगली उठा पाना, उसे मुद्दा बना पाना ख़तरनाक है। लोग जानकर इसीलिए अनजान बने रहते हैं। जाति की तरलता कितनी जानलेवा होती है, जानते हुए सुमित यह जोख़िम उठाते हैं।
सुमित की चिंतनशीलता मुख्यतः संस्कृति के इलाके में रुचि लेती है। संभव है ‘शुद्ध’ राजनीतिक संदर्भ उनके यहाँ बाद में आएँ। आखिऱकार, एक कवि की (अगर वह चलता जाता है) काव्ययात्रा में कई पड़ाव आते हैं। हर पड़ाव नई चुनौतियों का बंडल लिए हुए होता है। उनसे जूझने के क्रम में तर्कों का तरकस अर्थात् भाषा भी नया रूप ले लेती है। वैसे इन दिनों नदी उलटी बह रही है। कई कवि जो पहले राजनीतिक संदर्भों वाली कविता लिख रहे थे, संस्कृति की तरफ़ चले गए हैं। कुछ कवियों को ‘साहित्यिकता’ की रक्षा करने की चिंता सता रही है तो कुछ ‘उन्नति पथ पर अग्रसर’ होने के कारण संस्कृतिवादी हो गए हैं। कवि की प्रतिबद्धता की तत्काल जाँच करके किसी निष्कर्ष पर पहुँचना ठीक नहीं। समय आने पर लोक और काल रचनाकार को उनकी जगह पर ले आकर स्थापित कर ही देते हैं।
फ़िलहाल, आप सुमित की कविताएँ पढ़ें और अपनी राय से ज़रूर अवगत कराएँ।
–बजरंग बिहारी तिवारी

1.
जाति
आज भी कुछ तो ऊसारे में रखा है
मैं तो आगे आ गया पर, वो ज्यों का त्यों खड़ा है
कौन है तू , मेरे ख़यालों में अड़ा है
एक दंश है, जो मेरे अंदर ही पड़ा है
ये कहवत हैं कि–
पहिले होता था अब ऊ नाहिं
कौन बताए इन्हें –
अभी भी ऊ है पर दिखत नाहिं
पता नहीं है मुझको, बस इतना पता है
आज भी वो मन ही मन फैला हुआ है
मेरा एक दोस्त है, एक दोस्त है मेरा
उसने मुझको छोड़ा है क्योंकि
मैं ठहरा…
कल उसने भी कहा कि कल नहीं होगा
जब बात शादी की
तो फिर वहीं होगा…
जाता–जाता दंश उसका जा न पाता
और मरता ही नहीं
पर वंश उसका रह ही जाता…
2.
परिणाम
दो रास्ते
और
इरादे सटीक हैं
मरना या उठना
गिरा हुआ आखिर कितना गिरे ?
परिणाम का विपरीत होना
उनके लिए धोखा,
हमारे लिए यथार्थ रहा
आज भी…!
गिरा मल उठाकर आप
कितना उठ सकते हैं?
उठे मल को फेंकने के बराबर
वो भी पंजर से
और कुड़ी पर
तब ये दो रास्ते एक में रूपांतरित
मरना स्वीकारते हैं
वो भी
दूसरे के गटर में और अपनी नजरों में
काम के प्रति इतना समर्पित
मानो सपनों से भी बू आती हो
खुली हवा में घुटन
और प्रेम से चुभन
आम हैं…
3.
मज़बूत खोल
मेरी कहानी में ,
“मैं”अक्सर कहीं कमजोर जर-जर नज़र आता हूं
विकल्प, इच्छाएं, रुचि व सपने
किसी पंचायत में “होनी भी चईए ना भी होनी चईए” मत मात्र है
विरासत में बेबसी, गरीबी, लाचारी मिली
किन्तु पिता से आत्म-सम्मान का एक खोल मिला जिसकी बुनियाद मजबूत थी
पर टिकाऊ नहीं
पर खोल मिला
मन चाहता है कि
सारी विरासत को किसी के नाम कर दूं
पर अब तक
कोई एक ग्राहक ना मिला
अंतिम निर्णय मेरा या उस वक्त का होता है
शायद ये भी निरुत्तर है
बस चलते रहना ही …!
ना..ना..ना
कुछ तो करना पड़ेगा…!
पर क्या ?
सोचा
चित्त के कोरे कागज पर अपने पैरो के निशान बेच दूं
पर … वो भी चपटे निकले
विलंब है पर विलाप नहीं
शायद उसी मजबूत खोल ने अब तक बचा रखा है
4.
तरलता
तरलता से संभावित जीवन
बचपना पानी में तेरा
सब प्रभावित बाढ़ से
तुम ठाकुर की मार से
एक डेल्टा पर फंसे
फिर ऊझटके यूँ उठे
धुंधले पानी में देखा
हम जवानी से घिरे
मनोमन खींचतान
प्रश्न गिरे जैसे ओले
ना–समझ पाने की जिद्द को
दो कोड़ी ने समझा दिया
तुम पर धन था
पर हमने इसे कमाया
तुम बाहुबली थे
पर लड़ाइयां हमने लड़ी
वैचारिक बीमारियां है
या सजीव प्राणियों में आदमी
अपराधी नहीं
तो इतनी निगरानी क्यों ?
महंगे घर–गाड़ियां, महंगे कुत्ते–बिल्लियां
बहुत दयालु है साहब!
तपते बुखार से जीता हूं कई बार,
पर हारा हुआ हूं नींद से
फीस के बदले, बेटा इन्हीं के स्कूल में पढ़ता है
भले आदमी हैं पर छुट्टी नहीं देते
इस मानव विकास के क्रम में
मैं सिक्योरिटी गार्ड क्यों हूं!
5.
विशेषाधिकार
एक उपन्यास का सार
एक शब्द में कहा जा सकता है
एक जीवन के सार को,
एक सपने में गढ़ा जा सकता है
एक शब्द पर
पूर्ण उपन्यास लिखा जा सकता है
एक आप हो
जो हाथ को हाथ ,
कमल को कमल
और पति को परमेश्वर कहती हो
संदेह से देखना
प्रश्न पूछना
आलोचना करना
आपका विशेषाधिकार है
कोई देता नहीं
कोई देगा नहीं
फेंक दो ,
वो साइकल जो चलती नहीं
तोड़ दो वो तिजौरी
जिसमें तुम क़ैद हो
छीन लो वो
जो तुम चाहती हो
मैंने देखा है
मूर्त चीजों को
रसोई में पिसते हुए
और
अमूर्त चिन्हों को दौड़ते हुए
संसद में।
संपर्क : 9917557077







बहुत बढ़िया
आपका बहुत-बहुत आभार !
Very good bro
Thank you
Bhaiya
शब्दों को बहुत सधे हुए रूप में प्रकट किया है।और भावनाओं का संप्रेषण बहुत अच्छा है।
आपकी सकारात्मक प्रतिक्रिया अर्थात् कविता की सार्थकता है
मुझे अच्छा लगा।
शुक्रिया।
शब्द भीतर उतरे,
कुछ देर मौन खड़े रहे,
फिर पसीज गए।
वे कविताएँ
किसी और की पीड़ा से जन्मी थीं,
पर पढ़ते-पढ़ते
मेरी अपनी हो गईं।
जाति का एक मुहर बंद लिफाफा,
तेज धार वाली छोरी
कौन खोले, कौन झेले !
सुमित जी ,
आपके विचार बहुत उत्तम है। मन में दर्द बनाए रखिए ।
हाल ही में हुए छात्र आंदोलन में एक व्यक्ति काफी उभरा, मोहम्मद इरफान । उसे भी सुनिएगा। उसके विचार भी बहुत संवेदनशील है
आप सभी की एक एक प्रतिक्रिया मेरे मन की जमीन पर फिर से पलेवा कर, दबे बीजों को अनुकूल व उर्वरक बना रहे है
शुक्रिया l
आपकी सकारात्मक प्रतिक्रिया का शब्द चयन और भाव इस बात का प्रमाण है कि आप कविता
में उतरकर होले – होले निजी अंदाज में स्वतंत्र रूप में बह निकले जैसे समुद्र में कोई मछली l
शुक्रिया
जब शब्द मस्तिष्क को झिंझोरते हैं, भाव ह्रदय में उतर जाते हैं। बढ़िया हैं आपकी कविताएँ।
बहुत भावपूर्ण कविताएं हैं
Love you 😘 Sumit.. Your piece of writing is marvellous.
Thankyou mitr
सामाजिक दंश से व्यथित अंतर्मन को झकझोरती आपकी सभी कविताएँ शानदार और धारदार तेवर की हैं। शुभकामनाएँ, आप आगे बढ़ें💐🙏🏻
दर्द अगर अनमना हो जाए तो दर्द देने वाला भी दर्द महसूस करेंगा ।
हम सभी इस दंश से ग्रसित है किंतु बस! मैं तो शब्द देने की कोशिश कर रहा हूँ।
धन्यवाद।
बहुत ही सुंदर प्रिय सुमित,
तुम आगे बढ़ो जिंदगी के पथ पर।
बहुत शुभकामनाएं अग्रिम जीवन मिशन के लिए। लगे रहो मित्र।
यह पहचान है तुम्हारे ज़िन्दा होने की।
बहुत बहुत धन्यवाद l
घनीभूत पीड़ा से ओत-प्रोत आपकी कविताएँ बेहद हृदयस्पर्शी हैं। आपकी कविताएँ पढ़कर ऐसा महसूस हुआ जैसे कोई अपनी वेदना से आहत होकर सामाजिक यथार्थ और विसंगतियों को प्रकट कर रहा हो।
हार्दिक शुभकामनाएँ।
निरंतर लिखते रहें…..