गुलाबी शहर में  गुलाबी हाथी : सौंदर्य और कुरूपता का सांस्कृतिक-सेमियोटिक विश्लेषण / सुमन पाण्डेय


रूसी फोटोग्राफर जूलिया बुरुलेवा ने गुलाबी शहर जयपुर में एक हाथी को गुलाबी रंग में रंगने का प्रयोग किया। ऐसा प्रयोग सौंदर्य, संस्कृति, बाज़ार और नैतिकता के किन जटिल अंतर्संबंधों को उजागर करता है, इसका विश्लेषण कर रही हैं सुमन पाण्डेय। वे गुजरात लॉ सोसाइटी यूनिवर्सिटी, अहमदाबाद की फैकल्टी ऑफ़ डिज़ाइन में असिस्टंट प्रोफेसर हैं और नया पथ  के पाठक जॉन बर्जर की किताब देखने के तरीक़े  के मुखपृष्ठ के संबंध में उनकी टिप्पणी पहले पढ़ चुके हैं।

विगत वर्षों  का एक प्रचलित फ़िल्मी गीत ‘शाम गुलाबी, शहर गुलाबी, पहर गुलाबी…’ पहली दृष्टि में भले ही एक लोकप्रिय अभिव्यक्ति लगे, किंतु इसका बिंब जयपुर की सांस्कृतिक स्मृति और स्थापत्य सौंदर्य का गहन संकेत प्रस्तुत करता है। यहाँ ‘गुलाबी’ मात्र रंग नहीं, बल्कि एक संस्कृति-संकेत है जो आतिथ्य, शालीनता और ऐतिहासिक निरंतरता का प्रतिनिधित्व करता है।

किन्तु जब इसी ‘गुलाबी’ को एक जीवित हाथी ‘चंचल’ के शरीर पर आरोपित किया जाता है, तब यह संकेत अपने मूल संदर्भ से हटकर एक नए अर्थ-संघर्ष में प्रवेश करता है। रूसी फोटोग्राफर जूलिया बुरुलेवा द्वारा निर्मित यह दृश्य केवल एक कलात्मक प्रयोग नहीं, बल्कि सौंदर्य, संस्कृति, बाज़ार और नैतिकता के जटिल अंतर्संबंधों को उजागर करता है। ‘शाम’, ‘शहर’ और ‘पहर’ इन तीनों के माध्यम से ‘गुलाबी’ एक व्यापक सांस्कृतिक अनुभव का निर्माण करता है, जो स्थान और समय दोनों में व्याप्त है। यह सौंदर्य केवल स्थापत्य में नहीं, बल्कि जीवन-प्रवाह और सामूहिक अनुभव में भी अंतर्निहित है। इसी समग्रता के भीतर ‘गुलाबी हाथी’ एक विचलन के रूप में उभरता है जो इस स्वाभाविक सौंदर्य को एक कृत्रिम और आरोपित दृश्य में परिवर्तित कर देता है, जहाँ प्रतीक अपनी संवेदनशीलता खोकर मात्र दृश्य प्रभाव तक सीमित हो जाता है।

सौंदर्य के शास्त्रीय विमर्श में इमैनुएल कांट का “निष्काम आस्वाद” (disinterested pleasure) अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखता है। कांट के अनुसार, सौंदर्य का अनुभव तब शुद्ध और सार्वभौमिक होता है, जब उसमें किसी प्रकार की निजी इच्छा, उपयोगिता या स्वार्थ न हो। यह अनुभव व्यक्ति को वस्तु के साथ एक मुक्त, निर्लिप्त और चिंतनशील संबंध में स्थापित करता है, जहाँ सौंदर्य का मूल्य उसकी उपयोगिता में नहीं, बल्कि उसकी अनुभूति में निहित होता है। परंतु समकालीन दृश्य-संस्कृति में यह निष्कामता धीरे-धीरे समाप्त होती दिखाई देती है। सौंदर्य अब केवल अनुभव का विषय नहीं रह गया, बल्कि वह एक उत्पाद और एक रणनीतिक उपकरण बन गया है। “गुलाबी हाथी” जैसी दृश्य संरचनाएँ इस परिवर्तन को स्पष्ट करती हैं, जहाँ सौंदर्य का निर्माण दर्शक का ध्यान आकर्षित करने, उसे चौंकाने और दृश्य उपभोग के लिए किया जाता है। यहाँ सौंदर्य का मूल्य उसकी अंतर्निहित संवेदनात्मक गुणवत्ता में नहीं, बल्कि उसकी दृश्य प्रभावशीलता और वायरल क्षमता में निर्धारित होता है।

गाय देबोर्ड के “स्पेक्टेकल के समाज” (Society of the Spectacle) का सिद्धांत यह स्पष्ट करता है कि आधुनिक समाज में वास्तविक अनुभवों की जगह दृश्य प्रस्तुतियाँ ले लेती हैं। यहाँ “गुलाबी हाथी” केवल एक कलात्मक प्रयोग नहीं, बल्कि एक स्पेक्टेकल है — एक ऐसा दृश्य जो अपने आप में उद्देश्य बन जाता है और जिसकी सफलता इस बात से मापी जाती है कि वह कितनी देर तक और कितनी तीव्रता से दर्शकों का ध्यान बांध सकता है। अतः स्पष्ट होता है कि समकालीन परिप्रेक्ष्य में सौंदर्य अपने दार्शनिक आधार — निष्कामता, चिंतनशीलता और संवेदनात्मक गहराई — से हटकर एक प्रदर्शनात्मक और उपभोग-केन्द्रित रणनीति में परिवर्तित हो गया है। इस परिवर्तन में सौंदर्य का अनुभव अब स्वतंत्र नहीं बल्कि बाज़ार, मीडिया और दृश्य-संस्कृति की शक्तियों द्वारा नियंत्रित और निर्देशित होता है।

परंपरागत रूप से सौंदर्य और कुरूपता को विरोधी ध्रुवों के रूप में देखा गया है। परंतु इस घटना में यह द्वैत टूट जाता है। “गुलाबी हाथी” देखने में आकर्षक हो सकता है, परंतु यह आकर्षण एक गहरी नैतिक असहजता को जन्म देता है। यहाँ प्रश्न यह नहीं है कि दृश्य सुंदर है या नहीं, बल्कि यह है कि: क्या यह सौंदर्य किसी अन्य के स्वाभाविक अस्तित्व को बाधित करके निर्मित हुआ है? क्या यह आकर्षण किसी जीवित प्राणी की असहजता पर आधारित है? यदि उत्तर हाँ है, तो यह सौंदर्य नहीं, बल्कि सुसज्जित कुरूपता (aestheticized ugliness) है। जॉन बर्जर ने अपनी पुस्तक Ways of Seeing में कहा था कि “हम केवल वस्तुओं को नहीं देखते, बल्कि उनके पीछे छिपे अर्थों को भी देखते हैं।” इस संदर्भ में “गुलाबी हाथी” केवल एक दृश्य नहीं, बल्कि एक ऐसा अनुभव है जो हमें यह सोचने के लिए बाध्य करता है कि सौंदर्य किस हद तक नैतिकता से जुड़ा हुआ है।

सांस्कृतिक सेमियोटिक्स के अंतर्गत, हर दृश्य एक संकेत (sign) होता है, जिसमें संकेतक (signifier) और संकेतित (signified) के बीच संबंध होता है। जयपुर का गुलाबी रंग एक संकेतक है, जिसका संकेत है, आतिथ्य, सौम्यता और सांस्कृतिक गरिमा। हाथी एक अन्य संकेतक है, जो शक्ति, राजसत्ता और परंपरा का प्रतीक है। जब इन दोनों को कृत्रिम रूप से जोड़ दिया जाता है अर्थात एक हाथी को गुलाबी रंग में रंग दिया जाता है तो यह एक नया संकेत निर्मित करता है, जो उक्त दोनों के मूल अर्थों को विरूपित कर देता है। यहाँ हम रोलां बार्थ के “मिथ” के सिद्धांत को भी लागू कर सकते हैं। बार्थ के अनुसार, आधुनिक दृश्य अक्सर एक “मिथ” का निर्माण करते हैं जहाँ वास्तविकता को एक नए, कृत्रिम अर्थ से ढँक दिया जाता है। “गुलाबी हाथी” भी एक ऐसा ही मिथ है जो जयपुर की संस्कृति का प्रतिनिधित्व करने का दावा करता है, परंतु वास्तव में उसके अर्थ को विकृत कर देता है। इसके साथ ही यह भी ध्यान देने योग्य है कि जयपुर की सांस्कृतिक परंपराओं में हाथी को राजसत्ता और वैभव के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया जाना स्वयं एक अंतर्निहित शोषण की ओर संकेत करता है। पर्यटन उद्योग में हाथियों की सवारी जैसी प्रथाएँ लंबे समय से उनके स्वास्थ्य और कल्याण के लिए हानिकारक मानी गई हैं, विशेषतः इसलिए कि उनके शरीर, विशेषकर पैर, पथरीले और कठोर सतहों पर निरंतर भार वहन करने के लिए उपयुक्त नहीं होते। परिणामस्वरूप अनेक हाथी शारीरिक पीड़ा, पैरों की बीमारियों और दृष्टि-संबंधी समस्याओं से ग्रस्त हो जाते हैं।

जब हाथी की पीठ पर महावत और एक या अधिक पर्यटक बैठते हैं, तो यह भार सीधे उसकी रीढ़ और आसपास की मांसपेशियों पर केंद्रित दबाव उत्पन्न करता है। प्रायः इस भार को सहारा देने के लिए उपयोग किए जाने वाले हौदे या काठी कठोर संरचना के होते हैं जो रीढ़ की प्राकृतिक वक्रता के विपरीत दबाव डालते हैं। इसके परिणामस्वरूप हाथियों में रीढ़ की विकृतियाँ, मांसपेशीय तनाव, और दीर्घकालिक दर्द की स्थितियाँ विकसित हो सकती हैं। साथ ही, लगातार वज़न ढोने और कठोर सतहों पर चलने से उनके पैरों के तलवों और जोड़ों पर भी अत्यधिक दबाव पड़ता है, जिससे गठिया, संक्रमण और चलने-फिरने में कठिनाई जैसी समस्याएँ उत्पन्न होती हैं।  इस संदर्भ में “गुलाबी हाथी” की घटना कोई अपवाद नहीं, बल्कि उसी व्यापक संरचना का विस्तार प्रतीत होती है जहाँ सौंदर्य और सांस्कृतिक प्रतीकों के नाम पर जीवित प्राणियों के प्रति असंवेदनशीलता सामान्यीकृत हो चुकी है।

समकाल में कला, विज्ञापन और फैशन के बीच की सीमाएँ धुँधली हो चुकी हैं। थिओडोर अडोर्नो और गाय देबोर्ड, दोनों ने इस प्रवृत्ति की आलोचना की है। उनके अनुसार, जब कला बाज़ार का उपकरण बन जाती है, तो वह एक “स्पेक्टेकल” में परिवर्तित हो जाती है जहाँ वास्तविकता की जगह दृश्य प्रभाव ले लेता है। “गुलाबी हाथी” इसी स्पेक्टेकल का उदाहरण है। यहाँ सौंदर्य का उद्देश्य अनुभव नहीं, बल्कि ध्यान, आकर्षण और विरलता है। इस प्रक्रिया में: संस्कृति एक उत्पाद बन जाती है, प्रतीक एक दृश्य चाल (visual trick) बन जाते हैं और नैतिकता हाशिये पर चली जाती है।

फैशन और ब्रांडिंग की दुनिया में “नयापन” (novelty) और “अलग दिखना” एक प्रकार की प्रतिस्पर्धा बन चुका है। इस प्रतिस्पर्धा में: प्रकृति को पृष्ठभूमि बना दिया जाता है, जीव-जंतुओं को “प्रॉप” में बदल दिया जाता है और पर्यावरणीय संतुलन की उपेक्षा की जाती है। यह केवल एक सौंदर्यशास्त्रीय समस्या नहीं, बल्कि एक नैतिक और पारिस्थितिक संकट है। जब एक जीवित प्राणी को केवल दृश्य प्रभाव के लिए उपयोग किया जाता है, तो यह मनुष्य की उस मानसिकता को दर्शाता है जहाँ लाभ और आकर्षण, संवेदनशीलता और सह-अस्तित्व से अधिक महत्वपूर्ण हो जाते हैं।

“गुलाबी हाथी” की छवि में केवल एक रंग-प्रयोग या सांस्कृतिक संकेतों का विघटन ही नहीं, बल्कि एक और महत्वपूर्ण आयाम निहित है स्त्री की उपस्थिति और उसका दृश्य-निर्माण। इस चित्र में एक महिला, जो हाथी पर बैठी है और उसे केला खिला रही है, प्रथमदृष्टया एक सौम्य, सौंदर्यपरक और “इंस्टाग्राम-योग्य” क्षण का निर्माण करती है। किंतु गहराई से देखने पर यह दृश्य एक जटिल सत्ता-संबंध को उजागर करता है, जहाँ स्त्री और पशु दोनों ही एक दृश्य-उपभोग की वस्तु में परिवर्तित हो जाते हैं।

फिल्म सिद्धांतकार लॉरा मुलवे (Laura Mulvey) ने अपने प्रसिद्ध निबंध ‘Visual Pleasure and Narrative Cinema’ में मेल गेज़ की अवधारणा प्रस्तुत की थी, जिसके अनुसार दृश्य-संस्कृति में स्त्री को प्रायः एक ऐसी वस्तु के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, जिसे देखा जाए, सराहा जाए, और उपभोग किया जाए। इस संदर्भ में यह महिला भी एक सक्रिय सांस्कृतिक एजेंट के रूप में नहीं, बल्कि एक सौंदर्यात्मक तत्व के रूप में प्रस्तुत होती है, जो दृश्य को “आकर्षक” और “बिकाऊ” बनाती है।

यहाँ स्त्री की भूमिका दोहरे वस्तुकरण (dual objectification) की ओर संकेत करती है। एक ओर, वह स्वयं एक “फ्रेम” का हिस्सा बन जाती है, जहाँ उसकी देह, मुद्रा और गतिविधि को एक नियंत्रित दृश्य-रचना में ढाला जाता है; दूसरी ओर, वह उस प्रक्रिया में सहभागी दिखाई जाती है जिसमें हाथी को भी एक दृश्य-वस्तु में रूपांतरित किया गया है। इस प्रकार यह छवि न केवल पशु के शोषण को सामान्यीकृत करती है, बल्कि स्त्री की उपस्थिति को भी एक सजावटी माध्यम के रूप में स्थापित करती है। मार्था नुसबाम ने वस्तुकरण को समझाते हुए कहा है कि जब किसी व्यक्ति को उसकी स्वायत्तता, संवेदनशीलता और व्यक्तित्व से अलग करके केवल एक साधन या उपभोग की वस्तु के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, तो वह वस्तुकरण की स्थिति होती है। इस छवि में स्त्री की गौण हो जाती है — वह न तो एक स्वतंत्र सांस्कृतिक आवाज़ है और न ही एक आलोचनात्मक उपस्थिति; बल्कि वह एक पूर्व-निर्धारित दृश्य कथा का हिस्सा बन जाती है।

इसके अतिरिक्त, यह भी ध्यान देने योग्य है कि समकालीन विज्ञापन और फैशन उद्योग में स्त्री-देह का उपयोग अक्सर “सॉफ्ट पावर” के रूप में किया जाता है, जो दृश्य को अधिक आकर्षक और भावनात्मक रूप से संलग्न बनाता है। जॉन बर्जर के शब्दों में, “पुरुष देखते हैं, और स्त्रियाँ देखी जाती हैं” (men act and women appear)। इस दृष्टि से यह छवि केवल एक सांस्कृतिक या पर्यावरणीय समस्या नहीं, बल्कि एक लैंगिक संरचना भी है, जहाँ सौंदर्य का निर्माण स्त्री और पशु दोनों के वस्तुकरण पर आधारित है।

मैं यह साफ़ करना ज़रूरी समझती हूँ कि मेल गेज़ और पितृसत्तात्मक सोच को सिर्फ़ पुरुषों तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता। ये असल में एक तरह की सोच और व्यवहार की संरचना है, जिसे स्त्री और पुरुष दोनों ही अपनाते और आगे बढ़ाते हैं। इसलिए केवल इतना कि कैमरा अब स्त्री के हाथ में है, अपने आप में किसी बदलाव की गारंटी नहीं देता। उम्मीद यह होती है कि नज़र और प्रस्तुति बदलें, लेकिन हर बार ऐसा होता नहीं है।

जूलिया बुरुलेवा के काम में भी यही विरोधाभास दिखता है। सतह पर वह स्त्री दृष्टि का प्रतिनिधित्व करती हुई लगती हैं, लेकिन उनके काम में वही मर्दाना निगाह और शोषण की निरंतरता दिखाई देती है। इसे वे इस तर्क से उचित ठहराती हैं कि हाथी पर लगाया गया गुलाबी रंग “स्किन-फ्रेंडली” है। दरअसल, इस तरह का तर्क मूल मुद्दे से ध्यान हटाकर एक तकनीकी सफाई भर देता है, जबकि समस्या की जड़ — यानी दृष्टि और उसका शोषणकारी स्वरूप — जस की तस बनी रहती है।

अतः “गुलाबी हाथी” की यह छवि एक बहुस्तरीय संकट को उजागर करती है जहाँ संस्कृति का सरलीकरण, प्रकृति का शोषण, और स्त्री का वस्तुकरण एक साथ घटित होते हैं। यह हमें यह सोचने के लिए बाध्य करती है कि क्या समकालीन दृश्य-संस्कृति में सौंदर्य केवल एक आकर्षक सतह रह गया है, जिसके भीतर नैतिकता, संवेदनशीलता और समानता के प्रश्न लगातार हाशिये पर धकेले जा रहे हैं।

और उसी गुलाबी गोधूलि में चंचल अब विलीन हो चुकी है। जिस रात यह लेख पूरा हुआ, अगली ही सुबह यह खबर मिली कि चंचल हाथी ने अपना शरीर त्याग दिया। यह लेख किसी घटना पर शोर मचाने या हंगामा खड़ा करने के लिए नहीं लिखा गया है। इसका उद्देश्य केवल इतना है कि हम अपने आसपास के जीवों के प्रति थोड़ी और संवेदनशीलता और जागरूकता विकसित करें।

हम ज़रा ठहरकर यह समझने की कोशिश करें कि हमारा कौन-सा व्यवहार उनके लिए पीड़ा का कारण बनता है। हाथी जैसे जीव न तो सड़कों पर तमाशे के लिए बने हैं, न ही सवारी ढोने के लिए। इस तरह के व्यवहार से वे लगातार शारीरिक और मानसिक यातना झेलते हैं, यहाँ तक कि कई बार उनकी दृष्टि भी चली जाती है। यह सिर्फ़ एक जानवर की कहानी नहीं, बल्कि हमारी सामूहिक संवेदना की परीक्षा है।

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4 thoughts on “गुलाबी शहर में  गुलाबी हाथी : सौंदर्य और कुरूपता का सांस्कृतिक-सेमियोटिक विश्लेषण / सुमन पाण्डेय”

  1. “Being a author of this article i request you all please say no to elephant ride. Be the voice and love of all speechless being.”

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  2. बहुत-सी परिकल्पनाएँ भाषा में ही ठीक लगती हैं। वे मूर्त या साकार होती हैं तो पार्थिव से लेकर नैतिक-आध्यात्मिक मुश्किलों का अंबार लग जाता है। गुलाबी हाथी ऐसी ही परिकल्पना है। सफेद हाथी की परिकल्पना बहुत पुरानी है। क्या पता कभी किसी सनकी पुताईकार ने किसी हाथी को ऐरावत बनाना चाहा हो!
    बर्तोल्त ब्रेख्त की कविता है-
    And then a red bear arrived
    Who did not know of this world
    And he did not need to know of this world
    Because he was a red bear
    भाषा में यह कितनी अर्थपूर्ण परिकल्पना है!
    लाल भालू कविता में, सर्जनात्मक भाषा में साकार हुआ है। यह सकाम तथा निष्काम दोनों तरह का आस्वाद दे सकता है, दे रहा है। रज्जब अली (16वीं- 17वी सदी के मध्य) कहते हैं-
    सिरजनहारे जगत के
    सदा सु सब्दौ माँहिं।
    रज्जब गुरु गोब्यंद जिव
    बचनौ बाहिर नाहिं।।
    भगवान हों चाहे गुरु, जब तक वे भाषा में हैं; निरापद हैं। मूर्त होते ही आपदा बन जाते हैं। संतों ने इसीलिए अपने ब्रह्म को निराकार ही, भाषिक निर्मिति ही रहने दिया था। गुरु गोविन्द सिंह ने बहुत बाद में अनुभव किया कि गुरु भी जब तक भाषा में है, निरापद है। ग्रन्थसाहब को गुरु घोषित करने का यही कारण है।
    सौन्दर्यानुभूति के संबंध में सगुण मतानुयायी तुलसीदास कहते हैं कि जब तक यह अनुभूति पश्यन्ती और मध्यमा तक रहती है तब तक सुन्दरता की प्रतीति कराती है। बैखरी में आते ही नीरस लगने लगती है। उनके लेखे भाषा में साकार होना भी तो ‘साकार’ होना है।
    सुमन पाण्डेय ने जो चर्चा छेड़ी है उसे आगे ले जाया जा सकता है। विषय में मेरी गति होती तो मैं ही यह पहल करता।
    स्वयं को मैं स्थूल सौन्दर्यबोध का मानता हूँ।
    तब भी मुझे (लीपा हुआ) गुलाबी हाथी कहीं से सुन्दर नहीं लग रहा है। उस पर बैठी युवती भी गुलाबी रंग में अपनी स्वाभाविक आभा और आकर्षण गँवा चुकी है।
    पेंटिंग का यह विफल प्रयोग है। बाज़ार के काम का भी नहीं। मरियल से लगते हाथी को मर ही जाना था। दुख है कि उसे ‘प्रयोग का प्राणी’ बनाया गया। आर्टिस्ट ने अपयश का वरण किया।

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  3. बहुत ही सही और सटीक लिखा है, किसी दृश्य मे हसरतें भरना, उसके मूल स्वरूप से सिर्फ असहजता दिखलाता है, जो कि ग़लत है

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