‘मैरी रॉय के बहाने अरुंधती ने बार बार खुद से मिलवाया है।’ —मदर मैरी कम्स टू मी को पढ़ने के बाद ज्योति शोभा की आत्मीय टिप्पणी। वे मुख्यतः कवि हैं। सभी महत्त्वपूर्ण जगहों पर उनकी कविताएँ शाया हो चुकी हैं। संग्रह रूपाली दत्त और अन्य कविताएँ चर्चित रहा है। यह महज़ संयोग है कि नया पथ में पहले भी उनका गद्य ही प्रकाशित हुआ है।

अरुंधती के शब्दों में, यह मदर मैरी यानी मिसेज़ रॉय को ज़िंदा रखने के लिए लिखी गयी किताब है।
In my effort to fathom my mother, to see things from her perspective, to accommodate her, to understand what hurt her, what made her do the things she did and to predict what she may or may not do next, I turned into a maze.
अपनी पहली किताब गॉड ऑफ़ स्माल थिंग्स की सफलता के बाद एक सवाल के जवाब में अरुंधती कहती हैं – साहित्य दुनिया को गले से लगाता है और दुनिया भी उसे गले से लगा लेती है।
यह गले लगाना एक साथ तसल्ली भरा भी है और बेचैन करने वाला भी, उसकी दूसरी किताब पढ़ते हुए मुझे ये दोनों महसूस हुआ। हम जिन कहानियों से बने होते हैं, उनमें हमारे अलावा वे जगहें होती है जिन्होंने हमें बड़ा किया होता है– शहर, समाज, परिवार और क़रीबी लोग। इनको किसी कहानी की शक्ल में लिखना चुनौतीपूर्ण है और मदर मैरी इस पर खरी उतरती है। यह अरुंधती के लेखन का कमाल है जो दिल को और उसके सारे अहसास को एकदम ही अस्त-व्यस्त कर देता है।

अपनी बीती ज़िन्दगी का निरीक्षण अगर माइक्रोस्कोप से न करके बंद आँखों से किया जाए तो कुछ ऐसा लिखा जाएगा जो अरुंधती रॉय ने मदर मैरी कम्स टू मी में लिखा है। यह मेरी खुशकिस्मती कहूँ या बदकिस्मती कि कविताओं के बनने बिगड़ने की जिस बेचैनी से पीछा छुड़ाने की ग़रज़ से यह किताब पढ़ना शुरू किया, वही सबसे तेज़ नश्तर की तरह दिल में उतर गयी।
इसे मेमॉयर कहा है और नॉन फिक्शन के खाँचे में रखा गया है। ठीक भी है। अरुंधती के बचपन का केरल यानी 70 के दशक का केरल ऐसा ही रहा होगा जिसमें औरतों को उनके पढ़े लिखे पति जब चाहे मार सकते थे। औरत इसके एवज में अपने बच्चों को मारती थी। बच्चे मार और घर से बचने की जगह तलाशते थे। लगभग दुनिया ही ऐसी थी (है)। ये बच्चे असुरक्षा और डर से बचने के लिए जाने क्या नहीं करते थे। नशा और समाज में अपने से नीचे तल के लोगों के करीब सुकून खोजना शायद सबसे पहला और आसान काम था। अरुंधति उस जगह को तलाश करते हुए कैसा महसूस कर रही थी, यह उसकी भाषा में एकदम उसी असहायता से, उतनी ही सहमी हुई आवाज़ में आता है। यहाँ ऐसी कई जगहें और वाक्य हैं जो कहीं न कहीं अपने बचपन को सामने लाकर पटक देते हैं। तब उसकी गांठें खुलती हैं। इस समय अरुंधति को शुक्रिया कहने का मन होता है। इस समय उसे कोसने का मन होता है कि अपने बचपन के जिस मुर्दे को आधा दफ़नाया जा चुका था, उसे सामने ला कर रख दिया गया है।
अच्छा, यहाँ कमाल की बात यह हुई कि मैंने इस किताब को पढ़ने से इतने दिनों तक खुद को रोके रखा। बहुत-सी और किताबें थी, बहुत-से और काम थे। मौक़ा मिलते ही पहले गॉड ऑफ़ स्माल थिंग्स पढ़ी और तुरन्त ही मदर मैरी। यहाँ चोट दोहरी हो गयी। एक जगह इस किताब में लिखा है – मिसेस रॉय ने मुझे अजनबियों को अपना पेट या जिस्म का कोई भी हिस्सा दिखाने से मना किया है। चिकन पॉक्स हो तब भी नहीं। मगर किताब में उसने वे सब हिस्से दिखाए हैं जहाँ हमें भी वे दाने हुए थे और हम अब भी दाग लिए घूमते हैं।
क्या सचमुच अपने जीये हुए को ऐसे लिखा जा सकता है जैसा मदर मैरी में लिखा गया है – “मैरी रॉय, आधी रात को बगल वाले पलंग पर सोये भाई को नींद से उठा कर बगल वाले रूम में ले जाती है। मार्कशीट में ‘एवरेज स्टूडेंट’ यह लिखा होने के लिए उसे लकड़ी की रूलर से तब तक मारती है जब तक वह टूट नहीं जाती। वह कोई आवाज़ नहीं निकालता। कोई प्रतिक्रिया नहीं देता। चुपचाप आ कर अपने बिस्तर पर लेट जाता है। मैं जागती होती थी सोने का बहाना किये। अपने अच्छे नंबर्स से मुझे नफ़रत होती थी। अपने से नफ़रत होती थी। यह हमेशा होता होगा कि एक जीतने वाले के बदले में कोई एक दूसरा बगल वाले कमरे में पीटा जाता होगा।”
अरुंधती के पास दिल तोड़ देने वाली भाषा है। वह नौ साल की अरुंधती की तकलीफ़ को उतनी ही सहजता से बताती है जितनी सहजता से उन्नीस साल की अरुंधती के अकेलेपन और ग़ुरबत को लिखती है। आज़ादी से जीने की जद्दोजहद को लिखती है। उस आज़ादी को बार-बार बचाने के लिए समझौतों से अलग रहने को लिखती हैं। मैरी रॉय के स्कूल से ले कर दिल्ली के आर्किटेक्ट कॉलेज और उसके बाद अंतहीन विवादों तक का दुश्वारियों भरा सफ़र किस लचीली भाषा में लिखा है, वह सीखने लायक़ है।
यह लचीली भाषा उसने कैसे हासिल की, इसका पता भी यह किताब बताती है। घर छोड़ने से शुरू होकर अपने कई रिश्तों को छोड़ने तक का सिलसिला और बेघर हो कर बार-बार बचे रहने की कला शायद भाषा में बहने लगती है। इसका टेक्निकल पक्ष देखा जाए तो वह इस दौरान फिल्म और साहित्य के बेहतरीन लोगों से मिली। मेसी साब में एक्टिंग और ढेरों स्क्रिप्ट राइटिंग के दौरान उसे अपनी कला को, खुद को धारदार करने के मौक़े मिले और इसे बेबाकी से लिखने में वह पीछे नहीं हटी है। अब इसे उनकी अंग्रेजी भाषा के संस्कार का और संभ्रांत क्रिस्चियन परिवार से होने का प्रिविलेज कहा जा सकता है, मगर देखना चाहिए कि इतना नैतिक साहस और इतनी मँजी हुई प्रतिभा कितने लोगों के पास होती है।
इस बीच एक वाक़या याद आता है। अरुंधती के गद्य आज़ादी में पढ़ा था। गॉड ऑफ़ स्मॉल थिंग्स की सफलता के बाद वह एक ब्रिटिश टॉक शो का हिस्सा थी। वहाँ एक इंग्लिश हिस्टोरियन उससे कहते हैं – आपका इंग्लिश में लिखना ब्रिटिश एम्पायर को सलामी है। इसके जवाब में अरुंधती कहती है – यानी आपके मुताबिक जैज़ और ब्लूज़, और तमाम अमेरिकन अफ्रीकन पोएट्री, लिटरेचर ब्रिटिश एम्पायर की गुलामी को सलामी है? और इसके साथ तमाम लैटिन अमेरिकन लिटरेचर स्पेनिश और पोर्तुगीज़ उपनिवेशवाद को सलामी है?
बुकर मिलने और उस मुक़ाम पर होने के बाद जहाँ से उसकी आवाज़ लोगों तक पहुँचती है, वह हर क़दम पर अपनी लेखकीय आवाज़ को बुलंद करती नज़र आयी है। चाहे वह नर्मदा बचाओ आंदोलन हो या सीएए, किसान आंदोलन हो या कश्मीर मुद्दा। अपने लेखक के प्रति उसकी ईमानदारी उसके लिखे लेखों और लेक्चर्स में कौंधती है।
ज़िन्दगी में नाइंसाफ़ी के ख़िलाफ़ यह ख़लिश और इस किताब में छोटे छोटे पलों की मुलायमियत उसका मुरीद बनाती है।
गॉड ऑफ़ स्मॉल थिंग्स पढ़ते हुए मुझे यह अंदाज़ा था कि यह फिक्शन है यानी कोरी कल्पना। मगर हक़ीक़त के क़रीब। कुछ थी भी। बहुत असरदार भी। सबसे ज़्यादा वहाँ, जहाँ मैरी के दोनों बच्चों यानी अरुंधति और उसके भाई को अपनी मामा की बेटी के संग नदी में न डूबना मार देता है। और वहाँ, जहाँ वह अस्थमा से परेशानहाल और माँ के घर किसी बोझ की तरह रहती अपनी अम्मू, मैरी रॉय के लिए एक दलित प्रेमी की कल्पना करती है। उनके गहरे प्यार की कल्पना, बेहद इंटेंस प्यार। पहली किताब पढ़ने के बाद यह किस्सा देर तक दिल में धंसा रहा। इतना कि इसे सच मान लिया गया। अपने रचे गए इस किरदार के लिए वह कहती है
Had I been sixteen years old instead of six, who knows, if I got lucky, he might well have been mine. He was the kindest, most handsome man I had ever seen.
यह बाद में यानी मदर मैरी पढ़ने के बाद दिल को यक़ीन दिलाया कि यह कल्पना थी। नॉन फिक्शन में मदर मैरी को प्यार नहीं पॉवर की ज़रूरत है। अपने बच्चों से अधिक, अपने परिवार से अधिक। यह मुमकिन है, मैंने खुद से कहा। असुरक्षा से लड़ने के लिए परिवार जैसी संस्था की कल्पना इंसानों ने की थी। वही अब राजनीति और पूंजीवाद का ईजाद करता है। इस क़िस्से को (अम्मू और अपने मन को किसी पोस्टमॉर्टम की तरह खोल कर जानने के) अरुंधति ने शुरू से शुरू किया है। अपनी कठोर माँ मैरी की दहशत में साँस लेती एक बच्ची की नज़र से। मैरी का किरदार जटिल है। जैसा कि अरुंधती कहती है , वह माँ होने से पहले स्कूल और स्कूल के बच्चों की संरक्षक है , वह बहन होने से पहले नारीवादी है जो अपने भाई को कोर्ट में घसीट लाती है। सिर्फ़ अपने लिए ही नहीं सभी औरतों के लिए पिता की सम्पत्ति में हक़ सुरक्षित करती है। अरुंधती ने मैरी रॉय को उसकी ज़्यादतियों और केरल के पिछड़े समाज को ऊपर उठाने की कोशिशों के बीच उसके सख़्त किरदार को संतुलित रखा है। वह अपने बनाये स्कूल में बच्चों को पढ़ाई ,नहाने, टॉयलेट साफ़ करने की ट्रेनिंग, संगीत, साहित्य खेल हर चीज़ में दकियानूसी सोच से निकाल कर एक आधुनिक माहौल दे रही है। इसमें वह अपनी भी जगह मज़बूत करती है। समाज से वह सब कुछ लेने की ताकत जिस पर उसका हक़ है। इसमें उसे वह ताकत भी मिलती है जो किसी को एक पल में उजाड़ सकती है। मिसाल के तौर पर उसके अपने बच्चे। कुछ टीस सी महसूस होती है यह पढ़ते हुए कि – काश हम इसके बच्चे न होते। स्कूल में पढ़ने वाले किसी और के बच्चे होते जिसे मैरी रॉय प्यार भी करती है।
बीच रास्ते में मैरी रॉय द्वारा गाड़ी से उतार कर छोड़ जाने के बाद उसने कहा –
I got out. I was so used to getting out. Get out of my house. Get out of my car. Get out of my life. Every other day. She drove away. Still being fanned by the peacock-feather fan.
मेरा मन गॉड ऑफ़ की अम्मू पर पिघला था। मदर मैरी पर इन्तेहाँ फ़क़्र हुआ। अरुंधति को भी ज़रूर हुआ होगा, भले ही वह ज़िन्दगी भर उससे दूर रही। मैरी रॉय की तरह दुनिया में अपनी जगह तलाशती और बनाती रही। कितने किस्म के नशे में और दिल्ली की धूल में बिखरती रही। मगर उसके मुताबिक़ इसी ने उसे बचाया भी। यह हिस्सा अरुंधती ने बहुत मन से लिखा है। हॉस्टल की ज़िन्दगी की तमाम बेबसी और बेफ़िक्री। रिश्तों की रेल पेल जिससे निकलने में उसे मैरी रॉय के मिज़ाज जैसी बेज़ारी और महत्वकांक्षा सबसे काम आयी। हमारे इस प्यारे देश में जहाँ हर आज़ादी पुरुषों के नाम है, वहाँ किताब के ‘माय डिअर इंडिया’ में एक अंग्रेजीदा लड़की की चुनौतियों के कितने रंग रूप हो सकते हैं, यह पढ़ कर अपने लिए मरहम भी मिलता है और उम्मीद भी। इसे पढ़ने के बाद मैं अरुंधती को हॉस्टल वाली बेफ़िक्र लड़की की तरह प्यार करना चाहती हूँ जो झुग्गी के लोगों के बीच रहती है – मैं उसे मेसी साब वाली हीरोइन की तरह प्यार करना चाहती हूँ जो बस स्टॉप पर बैठी जितनी वल्नरेबल दिखती है, उससे कहीं ज़्यादा मज़बूत है। मैं इसे पढ़ने के दौरान बार-बार अपना दिल इस लड़की पर हारती हूँ जो एक निडर एक्टिविस्ट भी है और किताब के हर पन्ने में वह इतनी ज़्यादा है कि अक्सर मैं उसे खोने के डर से रुक जाती हूँ। क्या जाने, वह वही है जैसा कि उसने कहा – मैं अपनी माँ की ही बेटी हूँ।
I am my mother’s daughter.
मैरी रॉय के बहाने अरुंधती ने बार बार खुद से मिलवाया है। मैं पशोपेश में हूँ कि मुझे मैरी रॉय से मोहब्बत नहीं, मगर वह न होती तो अरुंधति न होती। मैं इसे अरुंधती से मिलने के लिए, खुद से मिलने के लिए शायद फिर फिर पढूँगी।







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