‘विनीताभ अपनी कविता के माध्यम से झूठ से भरे इस वक़्त की पहचान करते हैं।’–कुमार विनीताभ के संग्रह इस वक़्त की समीक्षा कर रहे हैं, कवि और आलोचक, जन संस्कृति मंच की उत्तर प्रदेश इकाई के अध्यक्ष कौशल किशोर।

कुमार विनीताभ के कविता संग्रह ‘इस वक्त’ की कविताओं को पढ़ते हुए मार्क्स याद आते हैं। उन्होंने बर्बरता और पाखंड को पूंजीवाद की चारित्रिक विशेषता बताया था, लूट और झूठ को उसकी संस्कृति कहा था। वह श्रम की बर्बर तरीके से लूट करता है और उसे छिपाने के लिए तरह-तरह के झूठ की रचना करता है। आज के समय को दार्शनिकों-विचारकों ने ‘पोस्ट ट्रुथ’ की संज्ञा दी है अर्थात झूठ ही सच के रूप में प्रतिष्ठित किया जा रहा है। सच दर-बदर है। वह निष्कासित व निर्वासित है। विनीताभ अपनी कविता के माध्यम से झूठ से भरे इस वक्त की पहचान करते हैं। संग्रह में 74 कविताएं हैं जिसे न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन ने प्रकाशित किया है।
कैसा है वक्त? विनीताभ कहते हैं, ‘ईमान के पथ पर चलना/छुरियों की तेज धार पर चलना है।’ हम देख सकते हैं कि सच की राह पर चलना कठिन ही नहीं, कठिनतम हो गया है। जहां हत्यारे-बलात्कारियों की प्रतिष्ठा है, वहीं सच व ईमान की राह का अनुगमन करने वालों के लिए जेल की सलाखें हैं, दमन का क्रूरतम रूप है। न्याय व्यवस्था में उनकी सुनवाई नहीं है। उदाहरण के लिए, हत्यारे-बलात्कारी राम रहीम को ही लें । उसे 2017 के बाद से 16 बार पैरोल पर रिहा किया जा चुका है। दूसरी तरफ उमर खालिद हैं, जो बीते 5 साल से बिना ट्रायल के, बिना आरोप के सिर्फ संदेह के आधार पर जेल में हैं। सुप्रीम कोर्ट भी उन्हें जमानत देने को तैयार नहीं है।
कैसी है वक्त की पहचान? विनीताभ कहते हैं ‘पहचान कर भी/नहीं पहचान करने का स्वांग भरना/वक्त की पहचान है’। हालात चुनौतीपूर्ण हैं तो उसका साहस के साथ सामना करने की जगह बच निकलने की प्रवृत्ति आम हो गई है। दूसरे जलें, हम बचे रहें – यह कब होता है? जब समाज में भय का वातावरण हो, एक-दूसरे पर भरोसा नहीं हो और स्वार्थपरता हावी हो। विनीताभ का प्रश्न है – क्या ऐसा ही वक्त नहीं है?
जब देश आजाद हुआ, हमारा लक्ष्य आधुनिक और लोकतांत्रिक राष्ट्र बनाने का था। समता, स्वतंत्रता और बंधुत्व पर आधारित संविधान इसकी बुनियाद थी। लोकतांत्रिक, सेकुलर गणतांत्रिक भारत का उदय हुआ। इसकी एक विशेषता असहमति का सम्मान, नागरिक स्वतंत्रता तथा अभिव्यक्ति की आजादी थी। आज इस पर कुठाराघात हो रहा है। एक ऐसा आज्ञापालक समाज बनाने की कुचेष्टा हो रही है, जिसमें विरोध के लिए कोई स्पेस न हो। विनीताभ कहते हैं, ‘विरोध के हर एक स्वर को दबाना/वक्त की नजाकत है’। यही आज की खासियत है। यूएपीए, एन एस ए का धड़ल्ले से इस्तेमाल किया जा रहा है।
कभी भारतीय राज्य को लोक कल्याणकारी राज्य कहा जाता था। क्या यह पुलिस राज में नहीं बदल गया है? आतंकवाद की चर्चा होती है। लेकिन पुलिस-फौज, दमन-विभाजन, हिंसा पर आधारित-संचालित इस राज्य को क्या कहेंगे? आम जीवन असुरक्षित हो गया है। पहलगाम और ऐसी अनेक घटनाएं हमारे सामने हैं। आम आदमी कहीं जाते हुए डरता है और यदि वह अल्पसंख्यक है तो कभी भी, कहीं भी वह भीड़ हिंसा का शिकार हो सकता है। जब विनीताभ कहते हैं, ‘हर तरफ राख ही राख’ है तो यह आज के वक्त पर एक गंभीर टिप्पणी है कि जिन मूल्यों को संघर्ष के द्वारा कल अर्जित किया गया था, वह सब संकट में है, प्रेम-भाईचारा संकट में है, संविधान संकट में है, लोकतंत्र संकट में है, जनजीवन संकट में है।
विनीताभ की विशेषता है कि वह मात्र स्थितियों का चित्रण नहीं करते हैं बल्कि इस चित्रण के पीछे आज के वक्त व कारकों को समझना व समझाना है और संकट को लेकर जागरूक और संवेदनशील होना है। वह मानते हैं कि जो हो रहा है, वह असह्य है, वहीं जन असंतोष भी उत्तरोत्तर बढ़ रहा है। संभव है वह प्रत्यक्ष न दिखे लेकिन वह राख के नीचे ‘दबी सुलग रही आग है’। वे इस आग की पहचान करते हैं जिसे हम छात्र, नौजवानों, मजदूरों के स्वतः स्फूर्त उभार में हम देखते हैं। पिछले दिनों किसानों के आंदोलन हुए। सीएए के विरुद्ध शाहीन बाग का संघर्ष हुआ। इसी तरह के संघर्ष को आगे बढ़ने, संगठित होने तथा इसे दावानल बन जाने की उम्मीद को विनीताभ अपनी कविता में जिलाए रखते हैं।
इस तरह ‘इस वक्त’ कविता आज के वक्त का आख्यान रचती है । वह वक्त की सच्चाई तथा समय के द्वंद्व को सामने लाती है। संग्रह की अन्य कविताएं जैसे ‘समय संगीन है’, ‘एक एक कर’ आदि अनेक कविताएं हैं जिनमें ‘इस वक्त’ के भाव-विचार का विस्तार है। इस वक्त सब कुछ उल्टा पुल्टा जा रहा है। काल को महाकाल में, उदारता को अनुदारता में, ‘सु’ शासन को ‘कु’ शासन में, लौकिक को पारलौकिक में, प्रेम को नफरत में बदला जा रहा है। विधर्मी ही धर्म के संवेदक व रक्षक हैं। जो बात अभिधा में कही जा सकती है, उसे लक्षणा में व्यक्त किया जा रहा है। जिस समाज को विरोध-प्रतिरोध में खड़ा होना था, वह लोभ, लाभ व लालच में फंसा है। देशभक्त और देशद्रोही दोनों की परिभाषाएं बदली गई हैं। बटमारी व हकमारी करने वाले, भ्रष्ट-रिश्वतखोर-दलाल, बलात्कारी-अपराधी आज देशभक्त की श्रेणी में हैं। वहीं, तानाशाही का विरोध करने वालों को देश के लिए खतरा बताया जा रहा है। इस व्यवस्था ने ऐसे लोगों को देशद्रोही घोषित किया है। उनके लिए अर्बन नक्सल, टुकड़े-टुकड़े गैंग, अवार्ड वापसी गैंग जैसे शब्द इस्तेमाल हो रहे हैं। यही है आज के वक्त की सच्चाई।
कुमार विनीताभ के पास समय, समाज और जीवन को देखने-विश्लेषित करने की वैज्ञानिक दृष्टि है। वे जानते हैं कि जो हो रहा है या जो हुआ है, वह अचानक हो जाने वाली घटना नहीं है। इसमें प्रतिक्रियावादी दक्षिणपंथी ताकतों की सक्रिय भूमिका रही है। इससे समाज में दमन, उत्पीड़न, हिंसा, नफरत और विभाजन को बढ़ावा मिला है। विनीताभ अपनी कविता में उन घटनाओं को सामने ले आते हैं जो मात्र घटनाएं नहीं हैं बल्कि इनसे सामाजिक ताना-बाना क्षतिग्रस्त हुआ। इस संदर्भ में वे 1984 की सिख विरोधी हिंसा को याद करते हैं। इसमें सिखों के खिलाफ बड़े पैमाने पर हिंसा हुई और समाज के एक हिस्से के अंदर अलगाव को बढ़ाया गया। 87 में भागलपुर में सांप्रदायिक हिंसा हुई। ‘6 दिसंबर’ को लेकर उनकी कविता है। इस दौर में दो बड़ी घटनाएं हुईं। बाबरी मस्जिद का विध्वंस और इसके साथ नई उदारवादी नीतियों का लागू होना। विनीताभ कहते हैं कि इन्हीं के कंधे पर सवार होकर देश 21वीं सदी की ओर आगे बढ़ा जिसकी परिणीति 2014 में नरेन्द्र मोदी के रूप में भाजपा का सत्तासीन होना है। बीते 12 साल में कारपोरेट की लूट बढ़ी है। आर्थिक-सामाजिक-सांस्कृतिक असमानता चरम पर है। शोषण-दमन बढ़ा है। नफरत-विभाजन पर आधारित सांप्रदायिक राष्ट्रवाद को स्थापित किया गया है। संविधान दरकिनार है। संस्थाओं की स्वायत्तता खत्म हो चुकी है। लोकतंत्र के सारे स्तंभ ‘केचुआ’ में तब्दील हो चुके हैं। रीढ़विहीनता और आज्ञाकारिता को मूल्य के रूप में स्थापित किया गया है। विनीताभ की कविताएं आज के क्रूर और बर्बर समय को सामने ले आती हैं।
विनीताभ उन कवियों में हैं, जिनके लिए मानवता ही सबसे बड़ा धर्म है। वे धर्म के नाम पर चल रही राजनीति के विरुद्ध हैं। उनके लिए जाति-धर्म-संप्रदाय लोगों को विभाजित करने और नफरत के हथियार हैं। वे आजादी के बाद की उन घटनाओं को याद करते हैं जिनमें मनुष्यता को लहूलुहान किया गया। उन्हें यह पसंद नहीं है कि आदमी अपनी पहचान के लिए नाम के साथ जाति का उपनाम जोड़े। एक इंसान की पहचान क्या काफी नहीं है? उनकी भावना पुरजोर तरीके से यूं व्यक्त होती है ‘मैं आदमी हूं/और आदमी की तरह जीना चाहता हूं’। और ‘उस हर मेहनतकश अवाम से/प्यार करना चाहता हूं/जो आदमी को समझता है इंसान/जो नहीं मानता अगड़ा-पिछड़ा/हिंदू या मुसलमान/जिसे कलियों को फूल बनते देखने की ख्वाहिश है/प्यार करना चाहता हूं/नफरत-घृणा/शिकवा-शिकायत/संदेह-संशय/विवाद-निंदा/सब तुम्हारे हिस्से – तुम्हें मुबारक/मैं तो प्यार,/केवल प्यार करना चाहता हूं।’
विनीताभ की प्रतिबद्धता और पक्षधरता स्पष्ट है। कविता में जहां शासकों, उत्पीड़कों, धन पशुओं, कॉरपोरेट लॉबी, लुटेरों, बलात्कारियों को लेकर तीव्र घृणा और आक्रोश का भाव है, वहीं शोषितों, उत्पीड़ितों, दलितों, वंचितों, मेहनतकशों के प्रति भावनात्मक लगाव है। यही कारण है कि जब व्यवस्था की लापरवाही का शिकार बच्चे होते हैं तो ‘मासूमों की मौत पर’ कवि भाव-विह्वल हो जाता है। वह बच्चों में देश का भविष्य और बड़ी संभावना देखता है। इसीलिए इसे मौत नहीं वह हत्या मानता है। उसका आक्रोश यूं फूटता है – ‘वे मासूम बच्चे/इस दुनिया में कभी वापस नहीं आएंगे/क्या सचमुच/उन्होंने मृत्यु को अंगीकार किया?/नहीं-नहीं/मेरे देश के भविष्य/उन मासूमों का/विक्षिप्त बीमार तंत्र ने मारा/सत्ता के गलियारे घूमते/लालची भेड़ियों के षड्यंत्र ने मारा।’
कवि ‘इस वक्त’ पर बात करे और कोरोना त्रासदी की चर्चा ना करे यह कैसे संभव है? संग्रह में ‘ओ कोरोना!’, ‘यह अप्रैल है’, ‘लॉकडाउन’, ‘हम जिंदा हैं’ आदि कई कविताएं हैं, जो त्रासदी भरे उस दौर को सदृश्य करती हैं, उन यादों को ताजा कर देती हैं, जिसमें महामारी का जनजीवन पर पड़ने वाला प्रभाव है, लॉकडाउन के दौरान मजदूरों से उनके रोजगार का छिन जाना है, उनका महानगरों से गांवों की ओर पलायन है और सरकार का संवेदनहीन और गैरजिम्मेदाराना रवैया है। इस संकट में कविता आस नहीं छोड़ती । वह मानती है कि विपरीताओं के विरुद्ध मनुष्य का हमेशा से संघर्ष रहा है और रहेगा। इसमें अंततः मनुष्यता की ही जीत होगी – ‘यह अप्रैल का महीना भी/बीत जाएगा/मनुष्यत्व निश्चित रूप से/जीत जाएगा।’
विनीताभ के कविता संग्रह में अनेक कविताएं हैं जिनमें बेरोजगारी, महंगाई सहित आम जीवन की समस्याएं व्यक्त हुई हैं। नेताओं का चारित्रिक पतन, राजनीति में बढ़ती मूल्यहीनता, पूंजी का वर्चस्व, शोषण तंत्र का मजबूत होते जाना आदि पर कवि की निगाह है। कवि की चिंता-चिंतन में लोकतंत्र का क्षरण है। इसके पीछे के कारण क्या हैं? कवि के शब्दों में – ‘हत्यारा लोकतंत्र/अत्यल्प मुट्ठियों में कैद है/चुनाव आयोग/कानून-संविधान/चंद पूंजी के बहुपाश में जकड़े हैं’। क्या यह आज की नग्न सच्चाई नहीं है?
ऐसे में कवि और कविता की क्या भूमिका हो या हो सकती है? ‘जो पुरस्कार पाने को/धनराशि कमाने को/जाति-संप्रदाय के चहारदीवारी में/नौकरशाहों की यारी में/राज दरबारी/भाट बन जाता है/वह कवि नहीं रह जाता है’। सच्चा कवि सत्ता-सुख से दूर रहता है। ऐसे कवि रवि के समान होते हैं। एक कवि के लिए कविता ही जीवन है। कविता का मान ही उसका सम्मान है। अर्थात कविता करना कवि के लिए ‘इस वक्त’ एक जोखिम व खतरे का सांस्कृतिक कार्य है। कितने कवि हैं जो आज इस भूमिका में हैं? संग्रह की अंतिम कविता एक उभरते युवा कवि के असामयिक निधन पर ‘अविनाश अशेष के प्रति’ है। इसमें कवि के संवेदनात्मक व भावनात्मक आवेग को देखा-समझा जा सकता है। नाउम्मीदी के दौर में संभावना और उम्मीद से भरा कवि और वह भी साथी हो, उसका असमय चले जाना कितना पीड़ा दायक होता है, इस कविता में देखा जा सकता है।
सार रूप में कहें तो विनीताभ की ‘इस वक्त’ की कविताओं से गुजरते हुए मुक्तिबोध याद आते हैं। कविता के बारे में वह कहते हैं ‘नहीं होती खत्म/कविता कभी खत्म नहीं होती/वह आवेग त्वरित कालयात्री है…’ कविता को लेकर मुक्तिबोध ने जिन गुणों की चर्चा की है, वे विशेषताएं कमोबेश विनीताभ की कविताओं में मिलती है। अच्छी बात है कि क्रूर व बर्बर व्यवस्था से संघर्ष करते हुए वे निराश-हताश नहीं है बल्कि उनके अंदर ‘आस’ है। कवि के शब्दों में – ‘गहरा अंधेरा है/रात स्याह/खूब स्याह होती जा रही है/…. हौसलापस्त नहीं हुए हैं हम/कालिमा मिटाने की जद्दोजहद में/टिमटिमाते जुगनू के स्वरों के साथ/अपने सुर मिला रहे हैं/काल की कुहेलिका की सर्द परतों पर/अपनी उष्मीय ऊर्जा से/चोट-दर-चोट करते जा रहे हैं/ताकि बर्फ सा क्षितिज पिघले/दिशाएं हो लाल और/नया सूरज उग सके।’
एफ – 3144, राजाजीपुरम, लखनऊ – 226017
मोबाइल – 8400208031







विनिताभ जी को बधाई अच्छे काव्य संग्रह के लिए।
अच्छी समीक्षा कौशल किशोर जी की।
समीक्षा-प्रकाशन के लिए संपादक-मंडल के प्रति कोटिशः आभार!
झूठ परोसती इस गुत्थी को तार तार करने वाली कविताओं की एक बेहतर समीक्षा l
शुभकामनाएं l