आन्ना करेनिना : एक आत्मीय पढ़त / महेश मिश्र


‘तोलस्तोय पतित स्त्री के चरित्र को ध्यान में रखकर यह उपन्यास लिखना शुरू करते हैं, पर आन्ना का चरित्र जिस तरह से उपन्यास में विकसित होता है, ऐसा लगता है कि वह अपने रचनाकार से स्वतंत्र अस्तित्व धारण कर लेती है और एक ईमानदार, भावुक, प्रेमिल, आवेगमय स्त्री के चरित्र में बदलती है। कभी सिर्फ़ प्रेमिल होती है, कभी असुरक्षित होती है और कभी-कभी शरारत भरी चालाकियाँ करती है, पर पूरे उपन्यास में वह बहुत प्रामाणिक व्यक्ति के रूप में आती है।’–आन्ना करेनिना  पर महेश मिश्र। वे इससे पहले युद्ध और शांति, अपराध और दंड, ब्रदर्स करमाजोव  जैसे रूसी क्लासिक्स पर लिख चुके हैं।

 

आन्ना करेनिना दुनिया के सबसे प्रभावशाली उपन्यासों में से एक है। इसे पूरी तरह से एक यूरोपीय शैली का उपन्यास माना जाता है। उपन्यास का कथा विस्तार सबसे सामान्य विषय–दाम्पत्य व प्रेम–के बारे में होने के बावजूद वह अपनी गहनता और सच्चेपन से सारी दुनिया को विस्मय-विमुग्ध करता रहा है।

तोलस्तोय और दोस्तोएव्स्की जैसे महान रचनाकर्मी अपने चरित्रों में ऐसी बेमिसाल विशिष्टता और गहराई भरते हैं कि वह रचित व्यक्तित्व अपनी मानवीय विशिष्टता से न सिर्फ़ पाठकों को लुभाता है बल्कि चेतना के स्तर पर उन्हें जोड़ता भी है, आन्दोलित और प्रभावित भी करता है।

उपन्यास की शुरुआत इन प्रसिद्ध पंक्तियों से होती है-

सारे सुखी परिवार एक ही तरह से सुखी होते हैं, हर दु:खी परिवार ख़ास अपनी तरह से दु:खी होता है।

आन्ना करेनिना दुनिया के बहुत सारे पाठकों और समीक्षकों की दृष्टि में महानतम उपन्यास है। कथा इस तरह से बुनी गयी है कि अद्भुत क़िस्सागोई के बीच चरित्रों की मन:स्थिति का जटिल विश्लेषण सम्भव हो पाया है, मनुष्य के स्वभाव का इतना गहन भावुक और नैतिक चित्रण सम्भव हो पाया है कि प्रेम, ईर्ष्या, महत्त्वाकांक्षा, परिवार और जीवन के अर्थ अधिक सहजता से समझ में आने लायक़ बन जाते हैं।

आन्ना एक ऐसा चरित्र बनकर उभरती है जो आवेगों से, प्रेम से भरी है लेकिन उसके मन में अपने बच्चे के लिए वात्सल्य के भी बहुत गहरे भाव हैं। अभिजात परिवार की सदस्य होने से सहज भाव-अभिव्यक्ति में बाधा है लेकिन उसके अंदर धड़क रहा दिल इसे मानने को तैयार नहीं है। यही कशमकश इस उपन्यास की कथा-स्थितियाँ गढ़ता है। मिस्टर करेनिन की समाज में एक हैसियत है, वे ऊँचे पद पर हैं और अपने सारे काम वे इस सामाजिक स्वीकार्यता और अपेक्षा के अनुरूप ही करते हैं। तोलस्तोय के शब्दों में करेनिन कुछ इस तरह के हैं:

करेनिन नौकरशाही में इतने दिन रह चुके थे और उसे इतनी गहराई से आत्मसात कर चुके थे कि वे घर में भी औपचारिक हो गए थे।

वे यह समझने में अक्षम हो चुके थे कि आन्ना को प्रेम की उसी तरह ज़रूरत थी जैसे किसी को साँस की ज़रूरत होती है। करेनिन को लगता था कि वे तो एक पति के सारे कर्त्तव्य निभाते हैं। उन्हें यह अन्देशा ही नहीं था कि आन्ना का इस शुष्क वातावरण में दम घुट रहा है।

आन्ना कैप्टन व्रांस्की के सम्पर्क में आती है और उनमें प्रेम हो जाता है। इस रोमांस को चित्रित करने में तोलस्तोय उदार हैं और इन प्रसंगों में कथ्य कहीं भी ढीला नहीं पड़ा। आवेग, दु:ख, नैतिक दुविधा सब कुछ व्यक्त होता है- एक महान प्रेम कहानी को न तो वे रोमांटिसाइज़ करते हैं और न ही उसकी अवहेलना करते हैं। पूरी तरह से मानवीय आवेगों से भरी इस कहानी को तोलस्तोय उद्वेगों की तार्किक निष्पत्ति तक ले जाते हैं। पहले-पहल जब दोनों में प्रबल आकर्षण पैदा होता है तो व्रांस्की अपना सर्वस्व त्यागने को तैयार है और आन्ना भी अपनी सारी प्रतिष्ठा, दाम्पत्य, वात्सल्य दाँव पर लगा देती है।

आन्ना के इस आवेग को तोलस्तोय की उदार नज़र से देखना चाहिए:

ऐसा पाप और अपराध उसे महसूस होता था कि उसे लगता था कि अब प्रेम के सिवा कुछ नहीं बचा। वह प्रेम को पूरी शिद्दत और खुशी से करना चाहती है।

पर इस उछाह को अबाधित रखना जीवन की दृष्टि से सम्भव नहीं था। कला की दृष्टि से भी नहीं। इसलिए तोलस्तोय धीरे-धीरे कथ्य में ही यह विकसित करना शुरू कर देते हैं कि प्रेम का जो अभाव उसे विवाह से दूर ले जा रहा है, वही प्रेम उसके अलगाव का कारण बनेगा। आवेग-सिक्त यह प्रेम आन्ना को समाज से बहिष्कृत करने की वजह बनने लगता है और व्रांस्की का सेना में करियर ढलान की ओर लुढ़कने लगता है।

तोलस्तोय ने इसे प्रांजलता से अभिव्यक्त किया है:

उनका प्रेम उन्हें दिन-ब-दिन और अधिक विशिष्ट और संकुचित करता जा रहा था। वह उन्हें जीवन के बाक़ी सभी पहलुओं से दूर करता जा रहा था। और यह अस्वाभाविक विलगाव दोनों को चिड़चिड़ा बना रहा था।

तोलस्तोय आन्ना के प्रेम को केवल समाज की अनुशंसा न मिलने की वजह से बुरा दिखाने की साधारण कलात्मक चुनौती नहीं लेते हैं बल्कि आन्ना (और व्रांस्की) के अपने आंतरिक संघर्ष और नाख़ुशी को भी इस चुनौती में शामिल करते हैं।

आन्ना और व्रांस्की के आत्म-विनाशक प्रेम के समानांतर वे लेविन और किटी के प्रेम को अपनी रचना में आयत्त करते हैं। लेविन के पात्र में लेखक ने स्वयं को ही चित्रित किया है–ऐसा विद्वानों का निष्कर्ष है। लेविन और किटी के प्रेम के माध्यम से तोलस्तोय अपने पाठकों को विकल्प देते हुए लगते हैं। इनके बीच का प्रेम संयमित और नैतिक है। पहली बार जब लेविन किटी को विवाह के लिए प्रस्ताव देते हैं तो किटी स्वीकार नहीं करती है, क्योंकि वह व्रांस्की के प्रति आकर्षित है। जब किटी का व्रांस्की से मोहभंग होता है, तभी वह लेविन के गुणों को देख पाती है। उसके प्रेम को सच्चा मान पाती है, क्योंकि वह स्थायित्व और विश्वास से भरा है। उन दोनों का विवाह होता है जिसमें गहरी आत्मीयता और आपसी समझदारी के संकेत निहित हैं।

तोलस्तोय प्रेम का अधिक संतुलित और व्यावहारिक रूप दिखाते हैं जो केवल आवेगों पर नहीं टिका होता है। वह समर्पण और आपसी सम्मान पर टिका होता है। तोलस्तोय के शब्द हैं:

अब वे एक-दूसरे को बिना बोले समझ सकते थे, और उनका प्रेम हर दिन गहरा होता जा रहा था।

आन्ना करेनिना में लेविन और किटी के प्रेम-प्रसंग के सन्दर्भ में यह उल्लेखनीय है कि पहली सफल मुलाक़ात के बाद जब किटी ने लेविन के प्रस्ताव को नकार दिया था, वह निराश और हताश हो गया था। किटी को भी बाद में कैप्टेन व्रांस्की की अस्थिरता और चपलता ने परेशान कर दिया था। वह अंदर तक हिली हुई थी और अपनी असफलता के लिए अपने निर्णय को दोष दे रही थी। वहीं लेविन भी लगभग अनिर्णय की स्थिति में था ही।

अब ऐसे में उन दोनों की दूसरी मुलाक़ात बहुत दिनों बाद हो रही है। इस प्रसंग को देखिए, कितना शानदार ट्रीटमेंट दिया है तोलस्तोय ने!

ऐसा उसमें कुछ विशेष नहीं था जो किटी बोल रही थी, पर लेविन के लिए तो उन शब्दों में अनिवर्चनीय अर्थ थे। हर ध्वनि मायनों से भरी, होंठों, आँखों, हाथों की गति में सब कुछ अद्भुत सुन्दर नज़र आ रहा था। उस वाणी में क्षमा के लिए प्रार्थना थी, लेविन के लिए भरोसा था, और एक सहलाने वाला भाव, नाज़ुक और डरा हुआ-सा, एक संकल्प, एक उम्मीद थी और उसके लिए प्रेम…और लेविन के पास कोई चारा नहीं था सिवाय इसके कि खुशी के मारे उसे अपना गला घुटता हुआ महसूस हो।

तोलस्तोय शब्द–चित्र बनाने में अद्भुत कुशल हैं। वे अपने चरित्रों की हर भंगिमा को बारीकी से पकड़ लेते हैं। हृदय की आंतरिक गति और दिख रहे अंगों की चपलता और संकोच…आँखों के भाव हों या उँगलियों का चलना, मुस्कान में व्यक्त-अव्यक्त सारे भाव हों–ऐसा लगता है कि उनकी पैनी आँखों से कुछ छूटता ही नहीं है।

पर लेविन-किटी के जीवन-प्रसंग हमेशा के लिए स्थिर हो जाएँगे, यह वे नहीं साबित करना चाहते। शायद प्रेम की, जीवन की प्रवृत्ति ही कुछ ऐसी होती है। उनके बीच भी मतभेद और झगड़े शुरू होते हैं। लेविन की आंतरिक विचारशीलता, आत्म-संदेह से भरी प्रवृत्ति और अस्तित्व संबंधी चिंताएँ ख़त्म ही नहीं होतीं।

ऐसा भी नहीं कि तोलस्तोय अपनी ऊर्जा केवल अपने सबसे ज़रूरी पात्रों की सर्जना के लिए सुरक्षित रखते हों। उनके पास तो शब्दों और वाक्यों का ऐसा ख़ज़ाना है जो चुकने का नाम ही नहीं लेता।

अपने मुख्य पात्रों–आन्ना, मिस्टर करेनिन, ब्रांस्की, लेविन और किटी–का तो सर्वांगपूर्ण चित्रण है ही, अन्य पात्रों के चित्रण में भी वही दक्षता और कुशलता दिखती है। जैसे, उपन्यास का एक शुरुआती चरित्र है ऑब्लांस्की। ऑब्लांस्की ऐसा चरित्र है जिसे हम आमतौर पर व्यावहारिक रूप से सफल व्यक्ति मानते हैं, जिसकी ज़रूरी जगहों पर पहचान है, जो अपने काम सबसे निकलवा सकता है और महफ़िलों में पसन्द किया जाता है। खुशमिज़ाज तो इतना कि परेशानियाँ चाहे जितनी वास्तविक हों, उसकी मोटी खाल पर उनका असर बहुत कम होता है।

उसके व्यक्तित्व के चित्रण मे तोलस्तोय ने इतनी कुशलता दिखाई है कि हम आज भी ऐसे चरित्रों को साकार देखते हुए महसूस करते हैं। पाठक को ऐसे ही एक विवरण के पास ले जाना उचित होगा:

ऑब्लांस्की एक उदारवादी अख़बार मँगवाता था। ज़्यादा उदारवादी भी नहीं। इतना उदारवादी कि बहुमत की राय से मिलता-जुलता रहता था। और यद्यपि उसे विज्ञान, कला और न ही राजनीति में कोई दिलचस्पी थी, वह बहुसंख्यकों के विचार मज़बूती से पकड़े रहता था…वह भी शायद जानबूझकर करने की ज़रूरत नहीं पड़ती थी, बल्कि स्वत: ही यह बदलाव हो जाया करता था। वह तो रिवाज़ मानने वाला व्यक्ति था, जैसे कोट और टोपी का रिवाज़ था वैसे ही उसके लिए विचार थे। वह अपने अख़बार का उसी तरह आदी था जैसे भोजन के बाद सिगार का।

हम पाते हैं कि तोलस्तोय अपने चित्रण में कोई हीला-हवाली नहीं करते। वे अपने सभी पात्रों को ऐसे रचते हैं कि एक साफ़ चित्र पाठक के मन में उतर जाए और यह एक समग्र चित्र हो जिसमें आंतरिक विसंगतियाँ उसी मात्रा में हों जितनी मात्रा में जीवित व्यक्तियों में होती हैं।

पूरे कथा प्रवाह में फिर इस चरित्र को, इस संपूर्ण व्यक्तित्व को एक निश्चित स्थान देना जिससे पूरे कथ्य के संघटन में वह अनुचित न प्रतीत हो बल्कि एक बड़े जीवित अवयव के हिस्से की तरह हो।

ऑब्लांस्की की भूमिका कथा के ऐसे प्रसंगों को बढ़ाने में ही है जो अन्यथा कथ्य में जुड़ने में मुश्किल खड़ी करते। उसके विवाह-वाह्य संबंधों के बारे में उसकी पत्नी जान गई है और उसने ऑब्लांस्की से संबंध तोड़ने की धमकी दी है। बात करने से और मिलने से मना कर दिया है। ऐसे में उसकी बहन आन्ना करेनिना उसके घर आ रही है। यह तार मिलता है और ऑब्लांस्की के घर से जुड़े कथ्य में गति आती है। वहीं जिस ट्रेन से आन्ना आ रही है, उसके पास बैठी हैं कैप्टन व्रांस्की की माँ।

ब्रांस्की और आन्ना का परिचय ऐसे ही अकस्मात होता है जिसकी शुरुआत में ही इन दोनों के आवेगमय संबंध की बुनियाद पड़ती है। वह ऑब्लांस्की के टूटने की कगार पर खड़े परिवार को बचाने आ रही है लेकिन उसके अपने परिवार पर जो आसन्न संकट है, उसकी शुरुआत भी इसी प्रसंग में आ जाती है। ये कुशलता से रचे हुए प्रसंग हैं जिनमें आगे के कथा-सूत्र भी छिपे हुए हैं। यहीं ट्रेन से कोई कुचल जाता है जो आन्ना करेनिना के अन्त का संकेत छोड़ जाता है।

कहानी एलिगरी और उपमाओं का भरपूर उपयोग करती है और वे सब इतने अच्छे ढंग से कथा में विन्यस्त हैं कि वे सहज और स्वाभाविक लगते हैं।

तोलस्तोय पतित स्त्री के चरित्र को ध्यान में रखकर यह उपन्यास लिखना शुरू करते हैं, पर आन्ना का चरित्र जिस तरह से उपन्यास में विकसित होता है, ऐसा लगता है कि वह अपने रचनाकार से स्वतंत्र अस्तित्व धारण कर लेती है और एक ईमानदार, भावुक, प्रेमिल, आवेगमय स्त्री के चरित्र में बदलती है। कभी सिर्फ़ प्रेमिल होती है, कभी असुरक्षित होती है और कभी-कभी शरारत भरी चालाकियाँ करती है, पर पूरे उपन्यास में वह बहुत प्रामाणिक व्यक्ति के रूप में आती है। प्रेम के बारे में आन्ना कहती है:

प्रेम। मैं इस शब्द को इसलिए नापसन्द करती हूँ क्योंकि यह मेरे लिए बड़ा शब्द है, इतना बड़ा कि तुम शायद समझ ही नहीं सकते।

जब आन्ना अपने अस्तित्त्व की लड़ाई लड़ रही होती है, सारी दुनिया की नज़र से जज की जा रही होती है तो कहती है:

मैं कुछ साबित नहीं करना चाहती हूँ, मैं तो सिर्फ़ जीना चाहती हूँ, अपने आप को छोड़कर मैं किसी को कोई नुकसान नहीं पहुँचाना चाहती। यह करने का अधिकार तो है न मेरे पास, या यह भी नहीं?

लगभग डेढ़ सौ साल पहले स्त्री-विमर्श इतने प्रखर रूप से, इतनी सरलतम तर्क-शैली में विरलता से ही मिलता है।

हम जानते हैं कि आज़ादी का मतलब ही है, ग़लती करने की भी आज़ादी।

क्या नहीं?

व्यक्तित्व की इसी माँग को, स्वायत्तता की इसी पुकार को तोलस्तोय आन्ना करेनिना में शब्द दे रहे थे।

आन्ना का व्यक्तित्व बहुत प्रभावशाली और ओजस्वी है। तोलस्तोय के शब्दों में,

हर चीज चमक जाती थी उसकी वज़ह से। वह स्वयं में ऐसी मुस्कान थी जो अपने चारों तरफ आभा-सी फैला देती थी।

ऐसे चरित्रों की सर्जना करना अपने-आपमें कितना चुनौतीपूर्ण रहा होगा, यह अनुमान पुस्तक पढ़कर ही लग सकता है। इतने पैशनेट और भावुक व्यक्ति का चित्रण और उसकी हर भाव-भंगिमा और हर आंतरिक संघर्ष को शब्द देने में तोलस्तोय उल्लेखनीय ढंग से सफल हुए हैं।

आन्ना के पति अलेक्सी करेनिन के व्यक्तित्व की औपचारिक छवि, अभावुक क़िस्म की संवेदनशीलताएँ, उनका ठण्डापन और उसके पीछे की पूरी तर्क-प्रणाली इतनी शिद्दत से उपन्यास में अभिव्यक्त्त हुई है कि लेखक के प्रति आप श्रद्धा से भर उठते हैं। अन्ना उनके बारे में कहती है: 

ऐसी बात नहीं है कि उसे प्यार नहीं हो सकता किन्तु उसमें वह कमज़ोरी नहीं है जो प्रेम में पड़ने के लिए ज़रूरी होती है।

करेनिन जैसे व्यक्तित्व किस विडम्बना का शिकार होते हैं और सिर्फ़ अपने व्यकितत्व के ख़ास तरह के होने की वजह से – शुष्क, अभावुक, गरिमा में लिपटे हुए, औपचारिक – यह बड़ी संपूर्णता से उपन्यास में व्यक्त्त हुआ है।

चरित्र किसी उपन्यास में कैसे विकसित हुए हैं और उनके चित्रण में आंतरिक संगति कितनी ज़्यादा है, यह उपन्यास की गुणवत्ता का एक अहम आधार है। हर चरित्र में इंटेग्रिटी होनी चाहिए, वह जैसा भी है, जीवित, स्पन्दित होना चाहिए और उसकी हर गतिविधि में एक आन्तरिक तर्क-बद्धता दिखनी चाहिए। तोलस्तोय यह करने में अप्रतिम हैं।

उनका हर चरित्र इस मापदंड में श्रेष्ठतम चित्रण के आसपास है। लेकिन एक और महत्त्वपूर्ण चरित्र लेविन के चित्रण में तोलस्तोय सायास चूकते हुए प्रतीत होते हैं। अलौकिकता के प्रति संदेह से भरा हुआ लेविन कैसे रहस्यवाद की तरफ उन्मुख होता है, उसका चित्रण उस तर्क-संगति को थोड़ा क्षीण करता है जो बाकी के चरित्रों और घटनाक्रमों में अचूक दिखता है।

लेविन वैज्ञानिक ढंग से कार्य-कारण के ढंग से सोचने का आदी है और अचानक उसको अपने अन्दर रिक्त्तता महसूस होने लगती है…कोई पर्याप्त वज़ह नहीं दिखती है। अपने ख़ुद के बेटे से पर्याप्त स्नेह नहीं महसूस होता है – कारण अनुपस्थित। अच्छाई जीवन भर करते रहने के बावजूद उसकी प्रेरणा का स्त्रोत उसे समझ नहीं आ रहा है।

फिर भी यह उपन्यास एक साथ प्रेम और भाग्य का करुण गीत बनता है। शिल्प में यूरोपीय और सत्त्व में रूसी यह कहानी प्रेम और विनाश की ऐसी गाथा है, इच्छा और नियति की ऐसी कहानी है जिसका हर शब्द जीवंत है। लेखक प्रेम और पीड़ा को उनके सबसे शुद्ध रूप में सामने आने देते हैं। ऐसा लगता है कि कथ्य ने लेखक से स्वायत्तता पा ली है।

तोलस्तोय का यह उपन्यास मानो याद दिलाता है कि जुनून नियति से तेज नहीं दौड़ सकता, कि प्रेम की मिठास का निरापद बने रहना चुनौतीपूर्ण है।

आन्ना करेनिना एक विरल और शाश्वत उपन्यास है जिसमें मानवीय नियति के संघर्ष की विराट गूंज अपने को साकार करती हुई दिखती है। आन्ना अपने भाग्य की दहलीज़ पर खड़ी है, संसार उसके मौन क्रंदन को अनसुना कर रहा है। जैसे ही रेलगाड़ी की सीटी बजती है, उपन्यास अपनी अंतिम सच्चाई कहता है:

प्रेम ही उद्धार है, प्रेम ही विनाश है।

आन्ना रेल के नीचे कुचली जाती है, आत्महत्या करती है, मिट जाती है और अमर हो जाती है– हमेशा के लिए।


4 thoughts on “आन्ना करेनिना : एक आत्मीय पढ़त / महेश मिश्र”

  1. आन्ना करेनिना की शानदार समीक्षात्मक प्रस्तुति हुई है। दीर्घ कथा-विन्यास की कई नई परतों का अर्थ खुलता है।
    *प्रेम ही उद्धार है, प्रेम ही विनाश है।*
    आवेगमय प्रयास और नियतिकृति परिणति का द्वन्द्वात्मक रूप विधान महेश मिश्र की आँखों से देखना समृद्ध करता है।

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  2. तोलस्तोय के माता-पिता का निधन उनके जीवन के पहले दस ‎साल में ही हो गया था। किसी भी आदमी के मन पर उस के ‎जीवन यथार्थ का गहरा असर पड़ता है — सकारात्मक भी ‎नकारात्मक भी। कुलीन और जागीरदार परिवार में जन्म ‎लेनेवाले तोलस्तोय की रचना-प्रक्रिया पर इस का केंद्रीय असर ‎पड़ा प्रतीत होता है। उनकी चेतना कहीं-न-कहीं व्यक्तिगत ‎सम्मान और व्यक्तिगत संप्रभुता का द्वंद्व सक्रिय रहता है। ‎सम्मान और संप्रभुता का यह द्वंद्व कोई साधारण द्वंद्व नहीं है — ‎असाधारण द्वंद्व है। इस में परिवार का महत्व राज्य की तरह का ‎है। परिवार का महत्व राज्य की तरह है और गांव या जागीर ही ‎पूरी दुनिया है। ‎
    नैतिक द्वंद्व और नैतिक दायित्व के सवाल और षड़यंत्र का ‎परिप्रेक्ष्य भी परिवार और जागीर है, जीवन और जगत है। ‎महात्मा गांधी को तोलस्तोय का यह जीवन दर्शन बहुत पसंद ‎था इतना कि उन्हें कभी-कभी राज्यविहीनता और ग्रामीण या ‎सामाजिक सर्वोच्चता के आकर्षण के क्षेत्र में ले जाता था — ‎कम्युन या कम्युनिटी सर्वोच्चता के साथ ग्राम स्वराज और ‎ट्रस्टीशिप को यहां से भी समझने की कोशिश की जा सकती है। ‎व्यक्तिगत सम्मान और व्यक्तिगत संप्रभुता के द्वंद्व में व्यक्ति ‎थोड़ा, एक हद तक थोड़ा नागरिक और बहुत, बहुत ज्यादा ‎ग्राहक मन जाता है। ग्राहक यानी ग्रहण करने, गह लेने, पकड़ ‎लेने की क्षमता! नैतिकता के बल पर नहीं, शस्त्रीकरण के बल ‎पर राज्य बहुत शक्तिशाली होता है। नागरिक कमजोर होता है। ‎हक को ग्रहण कर ग्राहक बनने की औकात उस की नहीं होती है। ‎नागरिक बहुत मुश्किल से वह भी कभी-कभार सामूहिक सौदा ‎कर पाता है। शक्तिशाली लोगों की व्यक्तिगत संप्रभुता तो उसे ‎ग्राहक बनकर राज्य बनने तक की छूट देता है। ‎
    शक्तिशाली लोगों को भी कभी-कभार नागरिक और कमजोर ‎लोगों को भी कभी-कभार ग्राहक बनाने की स्थिति पैदा करने ‎की संभावनाओं से लैस होने के चलते ही लोकतंत्र महत्वपूर्ण ‎होता है — शक्तिशालियों की व्यवस्था को अंतरध्वंस से और ‎कमजोरों की आकांक्षाओं को अकाल मौत से बचाता है। ‎ ‎
    यह तो लेव तोलस्तोय ही लक्षित करवा सकते थे कि प्रेम ‎बचाता ही नहीं, मार भी सकता है! ‎
    महेश जी और नया पथ दोनों के प्रति आभार।
    सादर
    प्रफुल्ल कोलख्यान ‎

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  3. बहुत ही सुंदर चित्रण हैं, इतना की मेरा मन भी इस उपन्यास को पढ़ने को करने लगा.

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