तर्कशील आंदोलन को अपनी भविष्यदृष्टि (vision ) का सवाल हल करना है / सुभाष गाताडे


[यह The Unheard Voice की तरफ़ से 20 अगस्त 2026 को Youtube पर आयोजित चर्चा का लिप्यंकन है। तेरह साल पहले इसी दिन पुणे की मुला-मुठा नदी के किनारे सुबह-सुबह सैर के लिए निकले तर्कशील आंदोलन के अगुआ, अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति  (https://antisuperstition-org) के कर्णधार, डॉक्टर नरेंद्र दाभोलकर की हत्या हुई। उनकी हत्या की साज़िश रचने वाले, दक्षिणपंथी जमातों के कारिंदों को लगा होगा कि उनके इस क़दम से आंदोलन को ज़बरदस्त धक्का पहुंचेगा, मगर आज आलम है कि इसी दौरान आंदोलन में सैकड़ों नए कार्यकर्त्ता जुड़े हैं और समिति का काम आगे बढ़ा है। डॉक्टर दाभोलकर के रहते हुए समिति के बैनर तले संगठन की सक्रियताओं का तीन सूबों तक विस्तार हुआ था। महाराष्ट्र, कर्णाटक और गोवा में समिति की दो सौ शाखाएं कार्यरत थीं। आज इस संख्या में दर्जनों नई शाखाएं जुड़ी हैं। ‘वैज्ञानिक चिंतन, मानवता, खोज की प्रवृत्ति और सुधार को विकसित करने’ के संविधान द्वारा निर्देशित नागरिक कर्तव्य की हिमायती नई टीमें बनी हैं जो धर्म की आड़ में जारी कुप्रथाओं के विरोध में सक्रिय हैं और ढोंगी बाबाओं के भंडाफोड़ के लिए तत्पर।
सीमा ने The Unheard Voices की तरफ से Youtube पर आयोजित प्रस्तुत चर्चा में तर्कशील आंदोलन के सामने खड़ी चुनौतियों  पर  सुभाष गाताडे–लेखक, वामपंथी कार्यकर्त्ता, NSI ( New Socialist Initiative)–से बात की।     (https://www.youtube.com/watch?v=vRoxtuWFVDQ&t=1817s&pp=ygUOdW5oZWFyZCB2b2ljZXM%3D)]

 

इस दुनिया में सच बोलने की सज़ा मिलती है। जैसे सुकरात ने ज़हर का प्याला इसलिए पिया कि उन्होंने धार्मिक मान्यताओं को मानने से इंकार किया और तर्कबुद्धि की वकालत की। इसी तरीके से गैलीलियो ने साबित किया कि सूर्य केंद्र में है और पृथ्वी उसके चारों तरफ़ घूमती है। उनकी यह बात उस समय पोप और चर्च को इतनी नागवार गुज़री कि उन्होंने उनको जीवन भर के लिए उन्हीं के घर में नज़रबंद कर दिया। ब्रूनो ने कहा कि ब्रह्मांड अनंत है; पृथ्वी ब्रह्मांड का केंद्र नहीं है और सूर्य भी अन्य तारों की तरह एक तारा मात्र है। उनकी इस बात के लिए उन्हें जेल में डाला गया। उन्हें यातनाएं दी गई। फिर भी उन्होंने अपने वैज्ञानिक विचारों को नहीं छोड़ा। उसके बाद उन्हें ज़िंदा जला दिया गया। 
इसी तरह से हमारे देश में भी जो लोग सच बोलते हैं, जो लोग तार्किकता की बात करते हैं, जो लोग समाज से अंधविश्वास को दूर भगाना चाहते हैं, उन्हें कट्टरपंथी विचारों का सामना करना पड़ता है। एक ऐसा ही नाम है डॉ. नरेंद्र दाभोलकर का। 20 अगस्त 2013 को पुणे में उनकी गोली मारकर हत्या कर दी गई। उनका कसूर सिर्फ़ इतना था कि वे समाज में वैज्ञानिक चेतना लाना चाहते थे। अंधविश्वास को दूर करना चाहते थे। ढोंगी बाबाओं और काला जादू, टोने टोटके में फंसे हुए समाज के एक बड़े तबके को तार्किकता की रोशनी में लाना चाहते थे। डर का धंधा कर रहे लोगों को वो बेनक़ाब करना चाहते थे। 20 अगस्त 2026 उनकी 13वीं पुण्यतिथि है। इस दिन को बहुत सारे संगठन  Scientific Temper Day  के रूप में भी मनाते हैं और इसी मौक़े पर सुभाष गाताडे जी के साथ मेरी यह बातचीत हुई।  
–सीमा

 

सीमा (the Unheard Voices): 

सर, मेरा सवाल यह है कि डॉक्टर दाभोलकर को जब गोलियों से भुना गया तो चर्चा में वो आए। लेकिन उससे पहले इंडिया में रैशनलिस्ट मूवमेंट की क्या स्थिति थी? क्या हिस्ट्री थी? उस पर आप थोड़ी सी बात रखिए।

 

सुभाष गाताडे: 

जहां तक मेरी जानकारी है, आजादी के पहले अगर देखा जाए तो कुछ उदाहरण हमें मिलते हैं। आंध्र प्रदेश में गांधीजी के अनुयायी और स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े गोरा थे (Goparaju Ramachandra Rao) जिन्होंने नास्तिक (Atheist) सेंटर बनाया था। तो छिटपुट मूवमेंट की झलक मिलती है। लेकिन उस दौरान जो वातावरण था आजादी का, उपनिवेशवाद के खिलाफ जो संघर्ष चल रहा था, तो उसे एक अलग धारा के तौर पर हम नहीं देख सकते हैं। रेशनलिस्ट विचार थे लोगों के और चाहे राजा राममोहन रॉय हों, महात्मा फुले हों, वे तार्किकता की बात करते थे, समाज सुधार का विचार करते थे, स्त्री मुक्ति की बात करते थे। तमाम सारी बातें जो आज हमें  रैशनलिस्ट मूवमेंट की  तरफ से ज्यादा सामने आती दिखती हैं, उन चीजों को वे अपने प्रोग्राम में लेते थे। तो मेरी जहां तक जानकारी है, आजादी के पहले ऐसा कोई तर्कवादी आंदोलन, कोई अलग धारा अस्तित्व में नहीं थी। आजादी के बाद ही ऐसे ग्रुप्स का बनना और तर्कवाद को लेकर, रैशनलिज्म को लेकर सक्रियता का ज्यादा संगठित रूप दिखाई देता  है और 70 के दशक के बाद ज्यादा दिखाई देता  है। एक बड़ा उदाहरण हम लोगों को पंजाब का मिलता है। पंजाब में तर्कशील सोसाइटी (https://www.tarksheel.co.in/) बनी हुई है और अलग-अलग इलाकों में उनकी शाखाएं हैं। वह पत्रिकाएं निकालती है, बाबाओं के एक्सपोजर का काम करती है। दक्षिण में भी कई तरह के ऐसे उदाहरण है जो बाबाओं को एक्सपोज करने का काम करते थे। तो यह ऐसे उदाहरण तो मिलते हैं, निश्चित तौर पर मिलते हैं और आजादी के बाद का ही यह सब डेवलपमेंट। आजादी के बाद का ही यह मूवमेंट ज्यादा दिखता है।

 

डॉक्टर दाभोलकर से क्या आप कभी मिले हैं ? और उनका  रैशनलिस्ट मूवमेंट में जो कंट्रीब्यूशन है, उसको आप कैसे देखते हैं? 

मैं 1978 में डॉक्टर दाभोलकर से पहली बार  मिला था। वहां पर विषमता निर्मूलन समिति नाम से एक समूह था विभिन्न संगठनों का, जिसमें तीन दिन का वर्कशॉप चलता था, जिसमें वह पहली बार व्याख्यान देने के लिए आए थे। वो समाजवादी विचारों के थे और उन दिनों जाति प्रथा के खिलाफ जो संघर्ष चल रहा था, उससे जुड़े हुए थे। उनका पहला व्याख्यान मैंने 78 में सुना था पुणे में। उसके बाद कई ऐसे अवसर आए जब उनको सुनने का मौका मिला, उनसे मिलने का मौका मिला। बाद के दिनों में उनसे व्यक्तिगत तौर पर मुलाकात भी होती रही। वो ‘साधना साप्ताहिक’ का संपादन करते थे। 18 साल उन्होंने संपादन किया था। उस दौरान उनसे मिलने का उनसे बात करने का निश्चित तौर पर मौका मिला। लेकिन ज्यादा उनके साथ काम करने का मौका मुझे मिला नहीं, क्योंकि मैं मूलत बनारस में ही सक्रिय था। राजनीतिक और सामाजिक तौर पर सक्रिय था। कुछ मुहिमों में हम लोग निश्चित तौर पर साथ थे। दो मुहिमों का उल्लेख मैं जरूर करना चाहूंगा।

पुणे के पास आलंदी नाम की जगह है। हर साल आलंदी से पंढरपुर नाम की जगह जहां विठोबा का मंदिर है, पैदल लोग जाते हैं। जैसे यहां पर कांवड़ यात्रा चलती है, वहां उसे ‘वारी’ कहते हैं। और उस ‘वारी’ में हजारों की तादाद में लोग आज भी पैदल जाते हैं, अपने-अपने समूह के साथ जिसे ‘दिंडी’ कहा जाता है लोग चलते हैं। ‘वारी’ जो आलंदी से निकलती है तो वहां पर लोगों ने नोट किया था कि वहां जातिभेद की घटनाएं साफ़ दिख रही हैं। लोगों ने देखा कि दलितों की जो ‘दिंडी’ रहती थी उनको अलग, आगे रखा जाता था और बाकी गैरदलितों की, सवर्णों की दिंडियां पीछे रहती थीं। इसका विरोध करने के लिए एक सत्याग्रह हुआ था जिसमें मैं बाकी लोगों के साथ शामिल था, डॉक्टर दाभोलकर भी शामिल थे। उसमें हम लोगों पर हमला हुआ था। तो ये एक ऐसा आंदोलन था जिसमें मैं उनके साथ कॉमरेड के तौर पर था।

और एक दूसरा आंदोलन था। आप कह सकते हैं, एक मुहिम थी, जिसमें दाऊदी बोहरा समाज में आंतरिक सुधारों की बात उठी थी… समाज में वहां के धर्मगुरुओं का बोलबाला है। उनका जो बोलबाला है, उसके खिलाफ समाज सुधार को लेकर के असग़रअजगर अली इंजीनियर और कई लोग सक्रिय रहे। इनके समर्थन में नागरिक समाज की तरफ से एक कमीशन बना था जिसका नाम था नाथवानी कमीशन। प्रस्तुत कमीशन को दाऊदी बोहरा समुदाय में धर्मगुरुओं की कथित तौर पर जो ज़्यादतियां थीं, उसका अध्ययन करना था , उसकी फेक्ट फाइंडिंग करनी थी। इस नाथवानी कमीशन के समर्थन में पुणे में एक मीटिंग बुलाई गई थी जिसमें हम लोग शामिल थे। इस मीटिंग में भी हममें से कुछ लोगों पर समाज के रूढ़िवादी तबकों की तरफ से हमला हुआ था।

ऐसे कुछ अनुभव है जब उनके साथ कॉमरेड के तौर पर रहने का मौका मिला, लेकिन ज्यादा काम करने का मौका मुझे उनके साथ नहीं मिला।

 

जैसे डॉक्टर दाभोलकर की हत्या की गई, उसके बाद उसी  पैटर्न में  हम देखते हैं कि कॉमरेड पानसरे,  उनके बाद प्रोफेसर कलबुर्गी जी, उनके बाद एक्टिविस्ट जर्नलिस्ट गौरी लंकेश की भी हत्या हुई। पैटर्न एक जैसा ही था। इसको आप किस रूप में देखते हैं ? 

इस घटनाक्रम को मैं मुख्यतः तीन स्तरों पर देखता हूं।

एक, 2014 में पूरे देश में जो सांप्रदायिक फासीवादी हुकूमत कायम हुई, जिस तरह की शक्तियां ताकतवर हुई हैं, उनके दबदबे के तौर पर देखता हूं।

दो, स्टेट की तरफ से भी ऐसी ताकतों को जो समर्थन मिल रहा है –  ऐसे संगठन जो दक्षिणपंथी संगठन हैं, जो किसी भी तरीके से स्वतंत्र आवाजों को दबाना चाहते हैं – उसकी अभिव्यक्ति के तौर पर मैं देखता हूं।

और तीसरी अहम बात, भारतीय समाज का जो मानस है, जो अभी भी पुरानी परंपराओं में अटका हुआ है और उनके प्रति जो उसका जो सम्मोहन है, उसकी अभिव्यक्ति के तौर देखता हूं।

एक दूसरे स्तर पर देखने की कोशिश करें , जो हत्याएं हो रही है इसका मतलब यही है कि प्रतिरोध हो रहा है। स्वतंत्र आवाजें बुलंद हो रही है और अलग-अलग मसलों पर लोग आवाज उठा रहे हैं, खामोशी टूट रही है, इसके प्रतिबिम्बन के तौर पर देखता हूं।

मालूम हो, डॉक्टर दाभोलकर ने जो कोशिशें की हैं, वे अलग-अलग हैं । जैसे उदाहरण के लिए, एक कोशिश उन्होंने की थी कि महिलाओं को जिन मंदिरों में प्रवेश नहीं दिया जाता, उसके खिलाफ आवाज उठानी पड़ेगी। जहां तय है कि समाज की रूढ़िवादी ताकतें आप के खिलाफ खड़ी होंगी। तो ऐसे सवालों को जब उठाया जाएगा तो विरोध होगा।

मेरे ख्याल से हम इसको प्रतिक्रिया के तौर पर देखते हैं। फासीवाद के रिएक्शन के तौर पर देख सकते हैं। फासीवादी संगठनों से विचारों से जुड़े संगठनों के रिएक्शन के तौर पर देख सकते हैं। आज भी हक़ीक़त है कि समाज में जड़ता है, समाज 21वीं सदी में भी बदलना नहीं चाहता है। आज भी पुरानी चीजों से अटका हुआ है। मैं उसकी अभिव्यक्ति के तौर पर देख रहा हूं।

गौर करें कि संविधान बनाते वक्त हम लोगों से वायदा किया गया था–संविधान में साइंटिफिक टेंपर ( Scientific Temper ) को एक अधिकार के तौर पर हम लोगों ने शामिल किया था। संविधान द्वारा हमें दिया गया यह जो हमारा अधिकार है और जमीनी स्तर पर जो अंतराल है, उसके तौर पर भी मैं इसे देखता हूँ।

 

भारत में हम ये घटनाएं देखते हैं, उसके अलावा जो हमारे पड़ोसी देश हैं जिनका बार-बार जिक्र किया जाता है कि पाकिस्तान में तो ये हालत है या उधर ये हालत है। हम बहुत अच्छे हैं।  इस तरह की घटनाएं क्या वहां पर भी होती हैं? उसके बारे में आप क्या कहेंगे ? 

हां, मैं साउथ एशिया की घटनाओं का जिक्र करना चाहूंगा जरूर। लेकिन पहले मैं भारत की दो घटनाओं का, भारत में सामने आये दो अलग किस्म के हस्तक्षेपों का जिक्र करना चाहूंगा।

जैसे हम लोग निश्चित डॉक्टर दाभोलकर की बात करते हैं, हम लोग कॉमरेड पानसरे की बात करते हैं। प्रोफेसर कलबुर्गी और गौरी लंकेश का उल्लेख करते हैं। लेकिन आम तौर पर हमारी चर्चाओं में एम फारूक का जिक्र नहीं होता। एम फारूक तमिलनाडु के थे। तमिलनाडु का संगठन है वीसीके, उसके कार्यकर्ता थे और वो मुसलमानों के बीच वैज्ञानिक चिंतन के प्रसार के लिए, नास्तिकता के प्रचार के लिए एक ग्रुप चलाते थे।(https://www.thenewsminute.com/tamil-nadu/hacked-death-his-beliefs-was-atheist-coimbatore-betrayed-his-own-friends-59134https://www.thequint.com/news/india/killed-for-being-an-atheist-was-farooq-betrayed-by-his-friends-coimbatore-tamil-nadu ) इस ग्रुप पर उन्होंने जो पोस्ट डाली थी, उससे उनके अपने दोस्तों को ही आपत्ति थी। नतीजा था, मार्च 17, 2017 को उनके करीबी दोस्तों ने उनको मार डाला। उनकी हत्या के खिलाफ पूरे तमिलनाडु में जगह-जगह प्रदर्शन हुए थे।

फारूक की हत्या पर उनके पिताजी ने कहा कि मेरे बेटे की इसलिए  हत्या हुई क्योंकि वो तर्क  की बात करते थे। मेरे ख्याल से यह एक उदाहरण महत्वपूर्ण है जिसका हम लोगों को जरूर उल्लेख करना चाहिए, ख़ासकर उन लोगों के बीच जो समुदाय विशेष के बेहद एकांगी चित्रण को ही समझते हैं।

महाराष्ट्र में एक ‘मुस्लिम सत्यशोधक मंडल’ (स्थापना 1970) है जिसका इतिहास 40-50 साल पुराना है। उसकी नींव पत्रकार, समाज सुधारक, एक्टिविस्ट हमीद दलवाई (1932-1977) ने डाली थी। उन्होंने मुस्लिम समाज के अंदर सुधार की लगातार कोशिश की और पहली बार मुस्लिम तलाकशुदा महिलाओं का जुलूस निकाला था, इस बात को रेखांकित करने ले लिए कि इन तलाकशुदा महिलाओं के भी अधिकार होते हैं। (https://timesofindia.indiatimes.com/india/hamid-dalwai-man-who-started-triple-talaq-movement-died-alone/articleshow/62321797.cmshttps://economictimes.indiatimes.com/news/politics-and-nation/hamid-dalwai-man-who-started-triple-talaq-movement/facing-opposition/slideshow/62325403.cms)  .

दलवाई की असामयिक मृत्यु के बाद भी यह संगठन मुसलमानों के अंदर समाज सुधार की कोशिश कर रहा है। जैसे अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति की तरफ से इस बात का विरोध होता रहा है कि महाराष्ट्र में जो धार्मिक यात्राएं होती हैं, उसमें कई जगहों पर पशु हत्या होती है, बकरे की बलि दी जाती है; उसी तरह से मुस्लिम सत्यशोधक मंडल बकरीद के दिन इस बात की अपील करता है कि बकरीद के दिन बकरे की कुर्बानी देने के बजाय हम लोगों को अपनी कुर्बानी देनी चाहिए और वे रक्तदान की मुहिम पूरे महाराष्ट्र भर में आयोजित करते हैं। इस तरह से मुस्लिम समाज में एक जागृति लाने की कोशिश करते हैं।

मेरे ख्याल से इन उदाहरणों  पर भी हम लोग को गौर करना चाहिए क्योंकि भारत के अंदर यह हक़ीक़त है कि  मुसलमान समाज में, क्रिश्चियन समाज में जागृति आ रही है। हम लोगों को उसका उल्लेख जरूर करना चाहिए।

साथ-साथ अगर हम दक्षिण एशिया के स्तर पर देखें तो – मुख्यत: हम पाकिस्तान और बांग्लादेश पर अगर गौर करें तो – मुझे बहुत समानांतर हालात दिखते हैं। अगर हिंदुस्तान में 2013 में जादूटोना विरोधी कानून बनाने के लिए डॉक्टर दाभोलकर की हत्या की गई थी तो उसके दो साल पहले 2011 में पाकिस्तान में पंजाब के गवर्नर सलमान तासीर जी की हत्या हुई थी। हमें भूलना नहीं चाहिए कि वो भले ही किसी संगठन से जुड़े नहीं थे, लेकिन वो पंजाब के गवर्नर थे और उन्होंने ब्लासफेमी (ईशनिंदा कानून) के तहत आसियाबी को – जो  क्रिश्चियन महिला थी, मजदूर महिला थी – उसको मिली सजा का विरोध किया था। उन्होंने इस बात का विरोध किया कि आसियाबी को सजा ए मौत का मतलब, जो कानून बनाया नहीं उसके मातहत सज़ा। उनकी इस बात को लेकर उन्हीं के गार्ड मुमताज कादरी ने उनकी हत्या की थी। उनकी हत्या के छह माह बाद पंजाब के उनके मंत्रिमंडल में शामिल दूसरे व्यक्ति शाहबाज भट्टी की हत्या हुई, जिन्होंने भी ईशनिंदा कानून पर सवाल उठाये थे। इसी पाकिस्तान में 2015 में सबीन  महमूद की हत्या हुई थी। इस्लामाबाद में वो अपना एक सेंटर चलाती थीं। मानवाधिकारों की आवाज उठाती थी। (https://caravanmagazine.in/vantage/stop-killing-my-friends-pakistan-sabeen-mahmud) पाकिस्तान की इन हत्याओं को देखें तो पत्रकार बीना सरवर एक नायाब किस्म का नामकरण करती हैं, उन्हें वह  प्रबोधन के शहीद अर्थात ‘Enlightenmet martyrs’ के तौर पर संबोधित करती हैं।

हम लोगों को बांग्लादेश की तरफ भी देखना चाहिए। बांग्लादेश का इतिहास भी भारत जैसा ही काफी हद तक समानांतर दिखता है। जैसे भारत के अंदर हिंदुत्ववादी ताकतें ज्यादा सक्रिय हैं तो बांगलादेश क्योंकि मुस्लिम बहुल देश है, वहां पर इस्लामिस्ट ताक़तें ज्यादा सक्रिय है और वह नहीं चाहती कि मुसलमानों के अंदर न्याय का विचार, तर्कवादी विचार पनपे, बढ़े, और वह उसका विरोध करती है।

याद रहे, वर्ष 2013 में एक बहुत ऐतिहासिक आंदोलन बांग्लादेश में हुआ था, जिसका फोकस युद्ध अपराधियों को दंडित करना था। सभी लोग जानते हैं कि 1971 में जो बांग्लादेश का मुक्ति युद्ध हुआ था – जिसमें बांग्लादेश जमाते इस्लामी ने पाकिस्तान का साथ दिया था, यहाँ तक कि कई अग्रणी लेखकों और कलाकारों, बुद्धिजीवियों की हत्या में शामिल होने के भी उनपर आरोप लगे थे – उन पर मुकदमा चले इसलिए यह ऐतिहासिक आंदोलन मुख्यतः ढाका में खड़ा हुआ था। बांग्लादेश में जिसको शाहबाग आंदोलन कहते हैं। (https://countercurrents.org/gatade251013.htm) और शाहबाग आंदोलन की शुरुआत में ही एक तर्कवादी और नास्तिक नौजवान की हत्या हुई थी, जिसका नाम था अहमद राजीब हैदर, उसके बाद 2015 में अविजित रॉय की हत्या हुई थी। अविजित रॉय ‘मुक्तो मना’ (Mukto Mana) नाम से ग्रुप चलाते थे। वैज्ञानिक चेतना और तर्कवाद का प्रचार करते थे। यूएस में रहते थे और बांग्ला में भी साहित्य की रचना करते थे। बांग्लादेश में ढाका में जो पुस्तक मेला आयोजित होता है, उसके सामने उनकी कुल्हाड़ी से हत्या हुई थी। ऐसे कई उदाहरण हमें बांग्लादेश में भी दिखते हैं और बाद में उन्होंने ऐसे कई कार्यकर्ताओं ने एक अपील निकाली थी। ( https://countercurrents.org/gatade010415.htm) उसमें लिखा था ‘कुल्हाड़ी की छाया में उम्मीद’ (Hope in the Shadow of Machetes)। इस्लामिस्टों की एक खासियत है कि वो कुल्हाड़ी से हत्या करते हैं। कई लोगों की हत्या हुई थी।

मेरे ख्याल से हम जब भारत में तर्कवादी आंदोलन के सामने चुनौतियों की बात करें तो हम लोगों को साउथ एशिया का जो परिप्रेक्ष्य है, वो भी ध्यान में रखना चाहिए। मुझे ये बहुत महत्वपूर्ण लगता है ताकि हम जानें कि हमारी लड़ाइयां समान किस्म की हैं और हम एक दूसरे के अनुभव से भी बहुत सीख सकते हैं। जैसे इस्लामाबाद में स्थित प्रोफेसर परवेज हुडभॉय का नाम सब लोग जानते हैं। ( https://www.saichicago.org/calendar/1t3jdovilljl9monrtuj20ufr955y8) फिजिक्स के प्रोफेसर रहे हैं और मानवाधिकार कार्यकर्ता भी है और उन्होंने The Black Hole नाम से एक सांस्कृतिक केंद्र कायम किया है, वहां पर विज्ञान के, लोक शिक्षण के कार्यक्रम आयोजित करते हैं। मशाल नाम से उर्दू में किताबें निकालते हैं। उन्होंने Eqbal Ahmad Centre for Public Education  (https://eacpe.org/) नाम से भी सार्वजनिक शिक्षा के लिए केंद्र कायम किया है।

ऐसे कई सारे अनुभव हैं जिसके जरिए हम सीख सकते हैं। इसके लिए भी जानना बहुत जरूरी है कि वो कैसे काम कर रहे हैं। विपरीत परिस्थितियों में सिर्फ भारत के तर्कवादी नहीं काम कर रहे हैं। साउथ एशिया के बाकी लोग भी काम कर रहे हैं। मुझे महत्वपूर्ण लगता है ये।

 

एक चीज और है कि जैसे अक्सर बोला जाता है कि बाबाओं के पास, गुरुओं के पास ज्यादातर अनपढ़ लोग जाते हैं। शिक्षित लोग नहीं जाते। लेकिन हम देखते हैं कि बहुत सारे शिक्षित लोग, पढ़े लिखे लोग, अच्छे घरों के लोग भी जो है बाबाओं के, गुरुओं के या मौलवियों की शरण में जाते हैं। तो इसको आप कैसे देखते हैं कि यहां हमारी शिक्षा व्यवस्था का दोष है या इस बात का कि हमारे समाज में साइंटिफिक टेम्पर  का वर्चस्व नहीं है। 

देखिए, जब आप ये बात कर रही हैं तो मुझे अचानक एक लेख याद आया। ए के रामानुजन का, जो कन्नड़ के कवि थे और बड़े विद्वान भी थे। (https://caravanmagazine.in/reportage/reading-small-print) उन्होंने एक महत्वपूर्ण लेख लिखा है कि इज देयर एन इंडियन वे ऑफ थिंकिंग (https://journals.sagepub.com/doi/abs/10.1177/006996689023001004)। उन्होंने अपने पिताजी का जिक्र किया है, वो फिजिक्स पढ़ाते थे। उनके पहनावे का जिक्र करते हैं। वो एस्ट्रोनॉमी के बड़े जानकार थे, साथ-साथ वो एस्ट्रोलॉजी (ज्योतिषशास्त्र) के भी मुरीद थे और उनके यहाँ बाबा लोग भी मिलने आते थे। अपने पिता का उल्लेख करके बताते हैं कि मैं अपने पिता को कभी समझ नहीं पाया। फिजिक्स के ज्ञाता थे। फिजिक्स पर पेपर लिखते थे। लेकिन साथ साथ वो ज्योतिष को भी पसंद करते थे। बाबाओं के भी चक्कर में पड़े रहते थे।

मैं उनके पिताजी को एक Quintessential Indian (‘आदर्श भारतीय’) के तौर पर देखता हूं। एक सारमय भारतीय के तौर पर देखता हूँ, जो भारतीय मानस को प्रतिबिम्बित करता है। मेरा मानना यह है कि हम लोगों ने आधुनिकता को इंस्ट्रूमेंटल ( instrumental ) आधार पर स्वीकारा है। टेक्नोलॉजी के स्तर पर हमें आधुनिकता चाहिए। हमें कंप्यूटर चाहिए, हमें मोबाइल चाहिए। लेकिन सैद्धांतिक आधार पर वैज्ञानिकता स्वीकार नहीं किये हैं। चीज़ों, परिघटनाओं के पीछे के कार्यकारण ( causality) को समझना अभी शुरू नहीं कर सके हैं। अगर वाकई हम लोगों ने आधुनिकता का स्वीकार किया होता तो इस देश में जाति प्रथा पर सवाल उठते। लेकिन हम साफ साफ देखते हैं कि अलग जातियों जातियों के अपार्टमेंट बने हुए हैं और लोग जाति प्रथा को, अपनी जाति को सेलिब्रेट करते हैं, ग्लोरिफाई करते हैं। ऊंची जाति के लोग, जो पढ़े लिखे लोग हैं, ग्लोरिफाई करते हैं। तो भारतीय मानस की यह दिक्कत है। वह दो स्तर पर जीता है और यह अंतराल मुझे दिखता है।

नेहरू जैसे व्यक्ति के चलते  जिस तरह का संविधान बना जिसमें उन्होंने साइंटिफिक टेम्पर को लागू किया, लेकिन उसका लोगों के जीवन पर, व्यक्तिगत जीवन पर असर दिखता नहीं है। ये अंतराल दिखता है, वह चिंतनीय है। अनपढ़ लोगों का बाबाओं के यहाँ जाना तो समझ में आता है, उनको ज्यादा समझ में नहीं आ रहा है। लेकिन मध्यम वर्ग का चिंतन भी वैसे ही है। चिंतन में वैज्ञानिक ढंग से सोचने को तैयार नहीं है। ग्रहण का लॉजिक समझता है। ग्रहण के पीछे का फिजिक्स समझ सकता है। लेकिन साथ-साथ ग्रहण के दिन क्या-क्या और करना चाहिए। कैसे  नहाना चाहिए, क्या खाना चाहिए, नहीं खाना चाहिए वो सारे खुद मानता है। अलग-अलग बाबाओं के चक्कर में पड़ा रहता है।

आप लोग आपको जानते ही होंगे कि  ‘इसरो’ (ISRO) जब भी रॉकेट भेजता है तो रॉकेट भेजे जाने के पहले रॉकेट की एक छोटी प्रतिकृति तिरुपति बालाजी मंदिर में चढ़ाई जाती है। तो ये जो विरोधाभास है, उस विरोधाभास के साथ अधिकतर भारतीय जीते हैं और मेरे ख्याल से जो तर्कशील आंदोलन के सामने, समाज में वैज्ञानिक चिंतन स्थापित करने का इरादा रखने वालों के सामने यह एक बड़ी चुनौती कि हम कैसे इसको डील करेंगे? किस तरह का आंदोलन हम लोगों  को समाज में करना होगा ताकि इस समस्या को हम एड्रेस कर सके?

 

अक्सर औरतों के सिर पर ठीकरा फोड़ा जाता है कि जो औरतें होती हैं, वो ज्यादातर धार्मिक अनुष्ठानों में खूब बढ़चढ़  के भाग लेती हैं। बाबाओं के पास भी जाती हैं और गुरुओं के पास जाती हैं। तो इस बारे में आप क्या कहेंगे? 

स्त्रियां जानकार हो गई हैं। शिक्षित हो रही हैं। ये बहुत पॉजिटिव बात है। रोजगार में जा रही है। ये भी अच्छी बात है। लेकिन साथ ही साथ जो पूरे भारत का जो मानस है, अब उस मानस की छाया तो उनके ऊपर भी पड़ रही है। उनके ऊपर अतिरिक्त पितृसत्ता का भी बोझ है। पितृसत्ता को भी जिस ढंग से उन्होंने आत्मसात किया है, वह गौरतलब है।

अगर हर साल दहेज प्रथा के तहत कुछ हजार बहुएं अगर मार दी जाती है, तो ऐसा तो नहीं कह सकते कि सारी हत्याएं पुरुष कर रहे है ! उनकी महिलाएं भी ऐसी हत्याओं में शामिल होती हैं। अगर aminocentesis के जरिए, अगर गर्भजल परीक्षण के जरिए लड़कियों का सेक्स सिलेक्टिव अबॉर्शन समाज में होता है तो हम यह नहीं कह सकते कि इसके लिए  पुरुष ही मजबूर कर रहे हैं। महिलाएं खुद भी चाह रही हैं। तो महिलाओं की जो दिमागी गुलामी है, महिलाओं का जो मानस है, वो इसी ढंग से कंस्ट्रक्ट हुआ है। तो मेरे ख्याल से यह भारतीय मानस का ही एक प्रतिबिंबन है।

और बाबाओं के पास जाने का एक मेरे ख्याल से अतिरिक्त कारण यह भी है कि समाज में स्त्री के लिए मुक्त वातावरण नहीं है। पुरुष के लिए फिर भी मुक्त वातावरण है। पुरुष कहीं भी जा सकता है, घूमने जा सकता है। लेकिन अगर स्त्री घूमना भी चाहे व्यक्तिगत तौर पर तो उस पर सवाल उठेंगे कि तुम कहां घूमने जा रही हो? लेकिन बाबा के यहां जाने पर तो कोई सवाल नहीं करता, अगर वो मंदिर जा रही है, किसी बाबा के दर्शन के लिए जा रही है तो पूरे परिवार के लोग कहीं भी आक्षेप नहीं करते। तो उसके लिए सीमित तौर पर ‘यही एक मुक्ति का दायरा’ होता है कि वह दर्शन करने जा सकती। वो अपना एक सर्कल बना सकती है। तो ये मुझे लगता है कि एक कॉम्प्लेक्स मामला है स्त्रियों के संदर्भ में लेकिन इस ढंग से भी देखा जाना चाहिए।

 

लेकिन साथ में यह भी तो होता है ना कि जैसे जिन महिलाओं के मान लीजिए बच्चे नहीं हो रहे हैं या बहुत सारी महिलाएं जो भी विच हंटिंग / डायन प्रथा का शिकार हैं, जब वो बाबाओं के पास जाती हैं तो उनका तो शोषण भी होता है। तो एक तरफ हम यह कह रहे हैं कि वहां जाती है तो परिवार को लगता है कि भाई कोई डर नहीं है। बाबा के पास ही तो जा रही है। अच्छे काम के लिए तो जा रही है। लेकिन वहां तो शोषण भी हो रहा है।

मेरे ख्याल से वही ना कि जिस तरह से तमाम बाबा महिलाओं को फंसाते हैं वो और उनकी फोटो लेते हैं, एक बार उस ट्रैप में फंसने के बाद उन पीड़िताओं के पास निकलने का भी रास्ता नहीं होता और ऐसी घटनाएं ज्यादा चर्चा भी नहीं होती है। हम जानते हैं कि हमारे समाज में अगर स्त्री के साथ दुर्व्यवहार हो जाए, स्त्रियां अगर अत्याचार का शिकार हो जाएं तो उसके बारे में ज्यादा चर्चा भी नहीं होती, अधिकतर स्त्री ही निशाने पर आती है भले स्त्री विक्टिम हो, ऐसे में उनका बोलना भी मुश्किल होता है। अगर बाबा राम रहीम का उदाहरण लें तो साफ सामने आता है कि वो क्या-क्या करते हैं, वह दोषसिद्ध हैं, वह कन्विक्ट है, हत्या के आरोप उनपर साबित हुए हैं। लेकिन फिर भी महिलाएं वहां पर जाती हैं। सब जानते हैं।

भारतीय समाज को मैं समझ ही नहीं पाता हूं कि मतलब बाबाओं को लेकर एक अजीब किस्म का सम्मोहन है! आसाराम बापू किन कारणों से जेल में रहे हैं। सब लोग जानते हैं। लेकिन आसाराम बापू जब जेल में थे अभी तो जमानत में छूटे हुए हैं। शायद उनको रिहा करने के लिए सैकड़ों हजार लोग प्रदर्शन करते हैं जिसमें पुरुष और महिलाएं दोनों रहते हैं। तो यह जो दिमागी गुलामी हमारी है जिसमें लोग अक्सर सोचते हैं कि हमारे बाबा बड़े अच्छे हैं। दूसरे बाबा खराब हो सकते हैं। ये एक विचित्र स्थिति बनी हुई है जो इस बात को भी दिखाता है कि हमारे यहाँ सामाजिक आंदोलन जितने होने चाहिए – इसमें जितना इन बाबाओं को बेपर्द किया जाना चाहिए वो हमारे समाज में हो नहीं रहे हैं। उनकी कमी है  और बहुत करने की जरूरत है और इस गुलामी की बेड़ियों को तोड़ने की जरूरत है।

 

एक चीज और है कि जो लोग संवैधानिक पदों पर बैठे होते हैं और राजनेता जो होते हैं या जो सेलिब्रिटीज होते हैं वो भी ऐसे गुरुओं बाबाओं के पास जाते हैं , कई बार चुनाव से पहले भी जाते हैं। तो उनका समाज पर  कैसा असर पड़ता है? जैसे हालिया उदाहरण  मैं एक देना चाहूंगी। जैसे प्रधानमंत्री अभी गए थे दिल्ली आईआईटी में और उन्होंने अपने जो वहां पर बात रखी उसमें उन्होंने बाबा बागेश्वर वाले बाबा का जिक्र किया कि भाई मैं तो मन की बात नहीं जानता तो वो कहीं ना कहीं उनको स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं तो इस पर आप क्या कहेंगे?

ये समाज पर बहुत नकारात्मक असर डालता है क्योंकि हम लोग लीडर का  अनुकरण करते हैं और जिसका समाज पर गलत असर पड़ता है।

दूसरा मेरे ख्याल से आज हमारे समाज में राजनीतिक सत्ता का , पूंजी का और धर्म सत्ता का जो गठबंधन है, वह इससे मजबूत होता है।  इसमें बाबा बागेश्वर जैसे लोग, बाबा राम रहीम जैसे लोग पॉलिटिकल सत्ता को मजबूती दिलाने का काम करते हैं क्योंकि वो अपने खास समुदाय के वोट भी दिलाते हैं। तो एक बहुत जानामाना अनहोली अलायंस है जो समाज पर नकारात्मक असर डाल रहा है।

मैं एक उदाहरण देना चाहूंगा इस संदर्भ में कि इससे उदाहरण भी दिखते हैं जैसे  दाभोलकर का उदाहरण है। दाभोलकर को महाराष्ट्र सरकार ने पुरस्कार का ऐलान किया। कोई महाराष्ट्र फाउंडेशन का पुरस्कार था और उस फाउंडेशन का पुरस्कार तत्कालीन मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख  देने वाले थे. इस अवसर पर विलासराव देशमुख को डॉक्टर दाभोलकर ने एक खुला पत्र लिखा। आपने हमारे कार्य का जो सम्मान किया है इसलिए मैं आपका बहुत शुक्रगुजार हूं। लेकिन मैं इस बात को स्वीकार नहीं करूंगा कि आप मुझे पुरस्कार देंगे क्योंकि मैंने आपको सत्य साईं बाबा के आश्रम में जाते देखा है। और सत्य साईं बाबा कैसे व्यक्ति हैं? क्या करते हैं? क्या चमत्कार करते हैं, नहीं करते, सब हम जानते हैं और ऐसा व्यक्ति जो एक संविधान के पद  पर बैठा हो और वो अगर बाबा के चरण में जाता हो और वो अगर हमें कार्यों के लिए सम्मानित करें तो मैं इस स्वीकार का आपके हाथों से स्वीकार नहीं करूंगा।

 

जब से इंटरनेट आया है, स्मार्टफोन सबके हाथ में आ गए हैं। हम देखते हैं कि तरह-तरह के बाबाओं की हमारे समाज में होड़ लग गई है। कोई हथौड़े वाला बाबा आ रहा है। कोई ये चाबी वाला बाबा आ रहा है। कोई तलवार वाला बाबा आ रहा है। कोई यह दावा कर रहा है कि मेरे फूंक मारने से आपकी असाध्य बीमारी ठीक हो जाएगी। कैंसर जैसी बीमारी को ठीक करने का दावा कर रहे हैं। तो ऐसे में समाज जो है वह कहां जा रहा है?

और एक चीज और भी है कि ये खुद तो विज्ञान का विरोध करते हैं लेकिन यही इंटरनेट का यूज कर रहे हैं। एआई का यूज कर रहे हैं। तो इसको आप कैसे देखते हैं? 

मेरे ख्याल से मतलब पिछले 15-20 साल से इंटरनेट का प्रचार हुआ है। हमारे समाज में चूँकि वैज्ञानिक चेतना उतनी ज्यादा है ही नहीं और इंटरनेट के प्रचार प्रसार के चलते, लोगों के लिए सारी चीजें चमत्कार के तौर पर सामने आ रही है। मोबाइल का बटन दबाने से दुनिया अब आपके मुट्ठी में होती है।

मेरे ख्याल से एक यह जो चीज हो रही है कि मोबाइल फोन के आने से, सोशल मीडिया के आने से जो दूसरा असर जो समाज पर पड़ रहा है वह यह कि Attention Span कम हो रहा है। लोगों का पढ़ना कम हो रहा है। ज्यादा गंभीर चिंतन कम हो रहा है। अगर आप कोई गंभीर बात करना चाहे तो  मुश्किल हो जाता है लोगों के लिए। आज से 30 साल पहले जब इंटरनेट नहीं था और अखबार पढ़े जाते थे, किताबें पढ़ी जाती थी तो बातचीत का जो स्तर हुआ करता था और आपको पढ़ना है, आपको रेफरेंस देखने हैं। आज आपके हाथ में मोबाइल फोन अगर है तो सारे तथ्य आपके हाथ में है, बस आप को क्लिक करना है, आपको मेहनत नहीं करनी है। इस घटनाक्रम का एक परिणाम यह हुआ है कि एक सारी चीज़ें एक स्पेक्टकल तौर पर, चमत्कार के तौर पर सामने आ रही हैं, जादू के तौर पर घटित होती दिखती है। इस टेक्नोलॉजी का पीछे का जो साइंस है वो स्पष्ट नहीं है। बेसिकली एक ऐसा समाज जो पढ़ा लिखा है लेकिन कुशिक्षित है, उस समाज में इंटरनेट का आना और इन चीजों के आने से समाज की वैज्ञानिक चेतना को कुंद किया है और ऐसे वातावरण में ऐसे बाबाओं का आना ज्यादा आसान हो गया है। (https://youtu.be/RQ1jkLgjFq4?si=LYEoI7lXDrzwyzhs)  बाबा जो ‘चमत्कार’ कर रहे हैं उसके लिए जनता का मानस तैयार हो गया है.

इंटरनेट के जरिए आप सनसनी पैदा  कर सकते हैं। जिस तरीके से हेट स्पीच का प्रचार होता है जिसकी वजह से आप कहीं पर लिंचिंग देख सकते हैं। उसी ढंग से किसी बाबा के चमत्कार का अगर प्रचार हो जाए तो वहां पर भी लोग भीड़ जुटने लगती है। तो ये जो फेनोमिना है मेरे ख्याल से ये सब समाज का ही प्रतिबिंबन दिखता है और समाज की यह जो स्थिति है और ये चिंताजनक स्थिति मैं मानता हूं।

 

हमारी शिक्षा पद्धति है और हमारा जो  सिलेबस है उसमें बहुत सारे चेंजेस हो रहे हैं। जैसे कि खबरें आती रही कि पीरियाडिक टेबल को हटा दिया गया, इवोल्यूशन की थ्योरी को हटा दिया गया या बहुत सारी हिस्ट्री है उसको हटा दिया गया।  उस पर आप क्या कमेंट करेंगे? 

मैं समझता हूं कि बहुत ऐसे ऐसे बदलाव हो रहे हैं जो समाज को पीछे ले जा रहे हैं। अभी कुछ वक़्त पहले  पहले आईआईटी मंडी में एक प्रोग्राम हुआ , छात्रों के लिए मैंडेटरी शिविर था (https://www.newindianexpress.com/cities/delhi/2026/Jun/13/scientists-see-red-over-iit-mandi-conference-on-astrology-reincarnation) वो भूत विद्या को लेकर और पुनर्जन्म विद्या को लेकर के बाकायदा था जिसमें मैंडेटरी था कि सबको आना है।  इसे  लेकर थोड़ा बहुत हंगामा मचा लेकिन उस इस बात को उन्होंने इंडियन नॉलेज सिस्टम (Indian Knowledge System) के तहत शामिल कर दिया।

इस प्रसंग को पढ़ा और मैं मुझे अचानक पाकिस्तान के जानेमाने भौतिकीविद और मानवाधिकार कार्यकर्त्ता प्रोफेसर परवेज हुडभॉय (Pervez Hoodbhoy ) का एक लेख याद आया। जो उन्होंने  2015-16 में  लिखा था Dawn (डॉन ) में. जिसका शीर्षक था Jinns Invade Campuses (जींस इनवेड  कैंपसेस) (https://www.dawn.com/news/1212051, https://www.newsclick.in/Jinns-Invade-Campuses-Ghosts-Haunt-Record-Rooms) इसमें पाकिस्तान के कैंपसेस अर्थात शिक्षा संस्थानों के बारे में उल्लेख किया था उन्होंने कि ‘जिन’ मतलब ‘भूत’ अर्थात  भूतों का शिक्षा संस्थानों पर हमला। मैं काफी हंसता था क्योंकि उन्होंने वर्णन किया था कि फिजिक्स की क्लास चल रही है और फिर कोई व्यक्ति आया उसने भूत के बारे में बताया, कुछ  व्याख्यान दिया और छात्रों ने प्रश्न पूछे थे। यह पाकिस्तान की शिक्षा व्यवस्था का वर्णन था कि वह किस गर्त में जा रही है और ज्यादा टाइम नहीं लगा हम लोगों को वहां पर पहुंचने में।

अगर आईआईटी, जहां पर अधिक पढ़े लिखे बच्चे जाते है वहां पर इंडियन नॉलेज सिस्टम के तहत अगर आप भूत विद्या और पुनर्जन्म के बारे में चर्चा करेंगे, अगर आप कोर्स के ऐसे बदलाव लाएंगे जिसमें लोग अधिक सोच ना पाए तो यह काफी नकारात्मक है। हमारे समाज ऐसे ही काफी वैज्ञानिक चिंतन  काफी बहुत मजबूत स्थिति में नहीं है। वहां पर अगर आप अग्रणी संस्थानों में  चमत्कारों के बारे में बताने लग जाए , पुनर्जन्म के बारे में बताने लग जाए और इंडियन नॉलेज सिस्टम के तहत बताया जाए, तो उसी गर्त में हम भी पहुंच सकते हैं , जहाँ पाकिस्तान पहले से मौजूद है।

अब स्थिति यह है कि जाति प्रथा को वैध ठहराने वाली मनुस्मृति  कई कई जगह इंट्रोड्यूस हो रही  है। जिस विश्वविद्यालय में पढ़ा हूं , काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वहां पर भी मनुस्मृति  इंट्रोड्यूस हुई है। मनुस्मृति पर रिसर्च हो रहा है। मनुस्मृति को पढ़ाया जा रहा है। वही मनुस्मति जिसे  डॉक्टर अंबेडकर ने जलाया था (1927) महाड सत्याग्रह के दूसरे चरण में। याद रहे, जब संविधान का निर्माण किया गया तो डॉक्टर अम्बेडकर ने कहा कि अब मनुस्मृति का युग खत्म हो गया है, संविधान का युग शुरू हो रहा है जिसे हम सब लोगों ने मिलकर बनाया है। आज उसकी अगर वापसी हो रही है, इंडियन नॉलेज सिस्टम के तहत पुरानी चीजों की वापसी हो रही है, तो ये समाज को पीछे ले जाने वाले बदलाव हैं।

 

आप रैशनलिस्ट मूवमेंट के सामने क्या-क्या चैलेंजेस देखते हैं? जैसा हमारा भारतीय समाज है। तो क्या-क्या चुनौतियां हैं? 

मुझे एक तो बड़ी चुनौती जिसका मैं शुरुआत में भी जिक्र कर रहा था।

सबसे बड़ी राजनीतिक चुनौती दिखती है। अगर आप 1950 के दौर को देखें , 1947 में जो भारत आजाद हुआ उस आजाद भारत ने एक संविधान बनाया जिसमें साइंटिफिक टेंपर के लिए भी जगह थी, जिसमें स्पेशल मैरिज एक्ट जैसे को जगह थी कि दो अलग धर्म के लोग शादी कर सकते हैं और जरूरी नहीं कि धर्म बदल ले. तो काफी अनुकूल हालात थे और तब से लेकर के आज जो  80 साल के अंदर जो हालात बदले हैं जिसमें आप अपने मर्जी से शादी नहीं कर सकते, यह संभव नहीं आपके लिए। राजनीतिक तौर पर बंदिश आ गई है। अगर आप अपनी मर्जी से किसी गैर समुदाय की महिला के साथ शादी करना चाहते हैं, पुरुष के साथ शादी करना चाहते हैं तो आप कर नहीं सकते। तो जो पूरा वातावरण बना है, समाज की भी  पहरेदारी बनी है और सिर्फ सरकार की पहरेदारी नहीं है, समाज की भी पहरेदारी है , उनके लोग समाज में भी मौजूद हैं। उन्होंने अपने लठैत  पैदा किए हैं।

तो सबसे बड़ी चुनौती राजनीतिक है। जो सांप्रदायिक फासीवाद इस देश में राज कर रहा है उसकी चुनौती है। संघ परिवार का  विचार है भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने का। संविधान को बदलने की उनकी कोशिश है। अभी तक बदल नहीं पाए हैं। उनकी कोशिशें इसी दिशा में चल रही है। तो ये जो हिंदू राष्ट्र की बनाने की प्रक्रिया रफ्ता रफ्ता चल रही है। तो सबसे बड़ा चैलेंज हमारे सामने वो है।

हमारे सामने उनसे जुड़े दक्षिणपंथी संगठनों की भी चुनौती है. अगर आप कुछ करना भी चाहे आप कोई कॉन्फ्रेंस करना चाहे, जादूटोना के लिए कानून बन रहा है, उसको लेकर तो आपके दरवाजे पर लोग हाजिर हो जाएंगे कि आप ये क्या कर रहे हैं, आप हिंदू धर्म का विरोध कर रहे हैं, कुछ भी कर सकते हैं। तो उन संगठनों की चुनौती है।

और साथ-साथ एक बड़ी चुनौती समाज की भी है. जैसे हम लोग चर्चा कर रहे थे कि हमारा समाज वैज्ञानिक चिंतन के नाम पर  पहले से कमजोर रहा है और पुरानी चीजों से अभी भी चिपका है। एक इंस्ट्रूमेंटल आधार पर वैज्ञानिकता को हमने स्वीकार किया है। वास्तविक जीवन में स्वीकार नहीं किया है। तो समाज की चुनौती है।

लेकिन मुझे इन तीनों चुनौतियों के अलावा सबसे बड़ी चुनौती जो तर्कशील आंदोलन के सामने जो लग रही है अपने विज़न ( vision ) की चुनौती है। विज़न अर्थात आंदोलन के अपने भविष्य के रास्ते की, जहाँ ऐसी बातें नज़र आती हैं, जिसमें मूलगामी नए चिंतन की या आप कहें कि एक breakthrough की / नई छलांग लगाने की जरूरत है। विजन की बात मैं स्पष्ट करना चाहूंगा दाभोलकर के अपने दृष्टिकोण के ही संदर्भ में. याद रहे, दाभोलकर की शहादत के पहले अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति ने उनके साथ एक लम्बा इंटरव्यू लिया था, ‘प्रश्न आपका जवाब डॉक्टर दाभोलकर के’ (प्रश्न तुमचा, उत्तर दाभोलकरांचे.!)। उनसे 25 प्रश्न पूछे गए थे, पुणे के एक कार्यक्रम में भारी जनसमुदाय के सामने उसकी रिकॉर्डिंग हुई थी और बाद में उसकी रिकॉर्डिंग ऑडियो और वीडियो तथा पुस्तिका के रूप में  भी जारी किया गया था। आज पीछे मुड़कर देखें तो आप पाएंगे कि इत्तेफ़ाक़ ऐसा रहा कि इस रिकॉर्डिंग के चंद माह बाद ही उनके विचारों और बढ़ते प्रभाव से परेशान दक्षिणपंथी अतिवादी समूह द्वारा रची साजिश के तहत उनकी हत्या कर दी गयी।

इस चर्चा में उनसे एक सवाल पूछा गया था अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति के कार्यक्रम के बारे में। उन्होंने बताया था  समिति का चार सूत्री प्रोग्राम :

पहला बिंदु था : अंधश्रद्धा और उससे जुड़े अन्याय का हर स्तर पर विरोध करना;

दूसरा बिंदु था :   वैज्ञानिक दृष्टिकोण का प्रचार करना;

तीसरा अहम बिंदु था : धर्म की आलोचना करना और इस आलोचना को व्यवहार में भी उतारना अर्थात उससे जुड़े उन प्रस्तावों का, प्रावधानों का  विरोध करना, जो मनुष्य की अपनी आज़ादी पर बंदिश लगाते हों, उसका संगठित विरोध करना;

और चौथा बिंदु था कि इस बात को गहराई से समझते हुए कि अंधश्रद्धा निर्मूलन का संघर्ष व्यापक सामाजिक बदलावों का अभिन्न हिस्सा है, इस आधार पर ऐसे तमाम आन्दोलनों से जुड़ना। उन्होंने साफ़ किया कि समिति का मानना है कि अंधश्रद्धा का काम तब तक पूरा नहीं हो सकता है जब तक हम सिर्फ अंधश्रद्धा पर ही बात करते रहे। हम लोगों को समाज के जो बाकी शोषण के खिलाफ आंदोलन चल रहे हैं उनसे भी जुड़ना पड़ेगा।

अपने चार सूत्री प्रोग्राम को स्पष्ट करते हुए उन्होंने कुछ बातों पर अधिक रौशनी डाली थी। उनके मुताबिक, धर्म की आलोचना करने का मतलब लोग अगर धर्म को मानते हैं हमारा उस पर सवाल नहीं है। लेकिन धर्म के बहाने आप स्त्रियों के साथ ज्यादती करेंगे, स्त्रियों या दमित तबकों के प्रवेश पर रोक लगाएंगे तो उसका विरोध।

समिति की तरफ से चलने वाली एक संगठित मुहिम पर भी उन्होंने रौशनी डाली थी, जिसका फोकस मूर्तियों के विसर्जन से होनेवाले जल प्रदूषण पर रहता है।  मिसाल के तौर पर हर साल महाराष्ट्र में लगभग एक डेढ़ करोड़ लोग गणेश की मूर्ति बिठाते हैं, अधिकतर गणेश की मूर्ति प्लास्टर ऑफ पेरिस की होती है। प्लास्टर ऑफ पेरिस पानी में घुलनशील नहीं है। और नुकसान करता है। साथ साथ, उस पर  जो पेंट होता है, वह भी जल को नुकसान करता है। समिति की तरफ से जन जागृति अभियान चलता है कि  सार्वजनिक जलाशयों के बजाय आप कृत्रिम बने तालाब में उसका विसर्जन करें।

इसमें कोई दोराय नहीं कि समिति के विचारों में एक स्पष्टता थी। समिति का चार सूत्री प्रोग्राम आकर्षित करने वाला प्रोग्राम है लेकिन मैं समझता हूं कि उसमें कुछ नए चिंतन की, नए प्रश्नों-चुनौतियों से जूझने के लिए अधिक स्पष्टता की जरूरत है। मिसाल के तौर पर, अगर आप दाभोलकर के विचारों को देखेंगे कि तो पाते हैं कि वह  सावरकर की बात करते थे। सब लोग जानते हैं कि सावरकर के विचारों का एक  पक्ष  था कि वो वैज्ञानिक चिंतन  की बात करते थे। उन्होंने लिखा भी है कि गाय पूजा के लिए नहीं है बल्कि गाय एक उपयोगी पशु है। कई अन्य मामलों में वो साइंटिफिक टेम्पर  की बात करते थे और इसकी वजह से वह महाराष्ट्र में एक बहुत एक बड़े हिस्से में लोकप्रिय हैं।

मुमकिन है, आप सावरकर की बात करके चार लोगों को ज्यादा आकर्षित कर सकते हैं। लेकिन सावरकर का ‘वैज्ञानिक चिंतन’ उनके विचारों का एक पक्ष था। सावरकर का दूसरा पक्ष यह भी था कि अंग्रेजों के जेल से निकलने के लिए उन्होंने ब्रिटिश आकाओं के सामने कई याचिकाएं भी डाली थी, माफ़ी की गुहार लगाई थी, यहाँ तक उन्हें जब अँगरेज़ सरकार ने रिहा किया, उसके बाद  वह उसी सरकार की तरफ से पेंशन भी पाते रहे। दरअसल सावरकर के चिंतन का दूसरा अहम पहलू  था, वो फासीवादी चिंतन का था। वो हिटलर जो जर्मनी में ‘नस्लीय सफाया’ कर रहा था, मुसोलिनी जो इटली में मेहनतकशों और दमितों-वंचितों के खिलाफ मुहिम चला रहा था, उसी तरह का भारत बनाना चाह रहे थे। जाहिर है, आप जब सावरकर की बात करेंगे तो महज़ ‘गाय को उपयोगी पशु’ कहनेवाले सावरकर नहीं आएंगे, वह समग्रता में हाज़िर होंगे, जहाँ न केवल वह हिटलर-मुसोलिनी के विचारों के मुरीद भी दिखेंगे बल्कि मनुस्मृति जैसी रचना को स्वाधीन भारत में अपनाने के हिमायती भी दिखेंगे।

क्या इस किस्म का पॉपुलिस्ट/लोकरंजक रुख दूरगामी तौर पर आंदोलन को कभी बेहतर भविष्य प्रदान कर सकता है?

डॉक्टर दाभोलकर के विचारों के संदर्भ में मेरी एक समस्या यह भी है जिसका ताल्लुक दाभोलकर द्वारा संत परंपरा और उसमें निहित ‘परिवर्तनवादी विचारों’ की हिमायत से भी  है.

सभी जानते हैं कि महाराष्ट्र में भक्ति आंदोलन के कई संत हुए हैं और उनमें से कुछ के विचारों में आप वैज्ञानिकता के तत्त्व भी ढूंढ सकते हैं, आप जब भक्ति आंदोलन की बात करेंगे, आप संतों की बात करेंगे, हो सकता है कि चार लोग आपके साथ जल्दी जुड़ जाए। लेकिन अगर आप बारीकी में जाएँ तो उनके विचारों की सीमाओं से – जो अपने समय के मुताबिक समझी जा सकती हैं – रूबरू हो सकते हैं। मिसाल के तौर पर अगर आप कबीर की बात करेंगे, तो आपको यह सोचना पड़ेगा कि कबीर के स्त्रियों के बारे में विचार क्या थे? क्या आप उस पर चुप रहेंगे? अगर आप तर्कशील आंदोलन को मजबूती दिलाना चाहते हैं तो कबीर के इस पक्ष को भी हमें देखना पड़ेगा, चर्चा करनी पड़ेगी।

मेरे ख्याल से रैशनलिस्ट आंदोलन के सामने सामाजिक राजनीतिक चुनौती तो है ही लेकिन ज्यादा मुझे विज़न की समस्या दिखती है और वह इस सवाल पर सोच नहीं पा रहा है कि अभी भी तर्कशील आंदोलन हाशिये  का आंदोलन क्यों बना है ?

मेरा मानना यह है कि अंधश्रद्धा निर्मूलन  समिति ने काफी जमीन नई जमीन तोड़ी है, काफी काम किया है लेकिन चिंतन के स्तर पर मुझे लगता है कि नई जमीन तोड़ने की जरूरत है।  पंजाब में तर्कशील सोसाइटी भी लम्बे वक़्त से सक्रिय है, देश के अलग अलग हिस्सों में कई अन्य तंज़ीमें हैं , लेकिन वह इस बात पर सोच नहीं पा रहे हैं कि गतिरोध कहाँ है।  अभी भी कई  तबकों में यह समझा जाता है कि भाई ये जो फर्जी बाबाओं को एक्सपोज करते रहते हैं या कुछ और करते रहते हैं।

जाहिर है यह समाज का आंदोलन नहीं हुआ है । निश्चित ही हम सभी को  इस स्थिति पर सोचना होगा।

एक बड़ा सवाल जो ना केवल तर्कशील आंदोलन के सामने बल्कि हिन्दोस्तां के विचारशील तबके के सामने यह है कि यह मुल्क और उसके लोग जो कभी विज्ञान में अव्वल थे वह रास्ता कहाँ भूल गए ?

अगर आप भारत की बात करें तो हमें यह सोचना होगा कि वह क्यों गुमराह हुआ ?

उसके पास इस बात की क्या अंडरस्टैंडिंग है कि भारत में एक जमाना था कि आर्यभट्ट थे , एक जमाना था आज से ईसा पूर्व हजार साल 500 साल पहले यहां बुद्ध हुए थे , महावीर , आजीवक हुए थे , उससे कुछ सदी पहले नासदीय सूक्त हुआ था। यहां पर कई सारी भौतिकवादी परंपराएं चिंतन की परंपराएं थी। चार्वाक  थे और सांख्य थे। इन सभी दार्शनिकों के चिंतन का बड़ा हिस्सा पदार्थवादी ( materialist ) कह सकते हैं । भारत में आर्यभट्ट के बारे में हम लोग जानते हैं कि आर्यभट्ट ने कोपरनिकस से 1000 साल पहले इस सच्चाई को बताया कि पृथ्वी सूर्य के इर्दगिर्द घूमती है। तो ऐसा भारत में क्या हुआ पांचवी छठी सदी के बाद कि हम वो सारा चीज भूल गए। क्या गतिरोध हुआ ? हम क्यों ठहर गए ?

मुझे लगता है कि तर्कशील आंदोलन के पास और  सिर्फ तर्कशील आंदोलन के बारे में मेरी आलोचना नहीं है। हमारे राजनीतिक सामाजिक आंदोलन के पास वाम आंदोलन के पास भी इसकी कोई अंडरस्टैंडिंग ठीक से है नहीं। एक अंडरस्टैंडिंग जो आ जाती है आसानी से आ जाती है कि जाति प्रथा के चलते हो गया। पहले बहुत अच्छा था। जाति प्रथा आ गई। ब्राह्मणवाद आ गया। अलबरूनी आए थे 1030  में और उन्होंने आर्यभट्ट का जिक्र किया है। आर्यभट्ट के के बाद उनके शिष्य आए थे वराहमिहिर  और ब्रह्मदत्त का जिक्र किया है। अलबरूनी की किताब पढ़ने लायक है जिसमें कहते हैं वराहमिहिर  और ब्रह्मदत्त तो आर्यभट्ट से ज्यादा तेज थे। लेकिन जाति प्रथा के चलते उन्होंने अपनी सच्चाई बता ज्यादा उजागर नहीं की। ( Alberuni’s India | Volumes 1 and 2 bound together | Hardcover | Alberuni’s India: An Account of the Religion, Philosophy, Literature, Geography, … with notes and indices by Dr Edward C. Sachau) तो अगर यह जो गतिरोध बना है भारत में आर्यभट्ट के बाद पांचवी छठी सदी के बाद एक अंधेरा है। हमारे चिंतन में गैप है। हम उसको आसानी से कह देते हैं कि भाई ब्राह्मणवाद के चलते हो गया, जाति प्रथा के चलते हो गया या अंग्रेज आए जिसके चलते हम लोग तबाह हो गए। हमारी अपनी कोई अंडरस्टैंडिंग नहीं है।

मेरा यह साफ़ मानना है कि इसे हम भक्ति आंदोलन के प्रभाव के तौर पर समझ सकते हैं। अभी सीमित टाइम में उस पर हम ज्यादा बात नहीं कर सकते हैं। इसमें कोई दोराय नहीं कि  भक्ति आंदोलन ने पूरे समाज तक धार्मिकता को पहुंचा दिया , कथित बहिष्कृत तबकों को भी ईश्वर से जोड़ दिया । भक्ति आंदोलन की कुछ तो उपलब्धियां साफ़ हैं जैसे उसके तहत दलित संत बने, पिछड़ी जाति से संत बने और सब लोगों तक ईश्वर की पहुंच आसान कर दी। लेकिन भक्ति आंदोलन का जो नकारात्मक पक्ष है उसकी विवेचना की जरूरत है।

भक्ति आंदोलन ने समाज को राजनीति से विमुख कर दिया। भक्ति आंदोलन ने समाज में जो वैज्ञानिक चेतना थी उसके स्वाभाविक विकास को अवरुद्ध किया वर्ना कोई वजह नहीं थी कि ‘नासदीय सूक्त से होते हुए बुद्ध – महावीर – आजीवक – सांख्य – वैशेषिक – चार्वाक से ‘ गुजरती ज्ञान विज्ञान की प्रगति रुक जाती, आर्यभट्ट इतने एकाकी दिखते।

अंत में, इस बात को रेखांकित करना जरूरी है कि यह कोई अंतिम राय नहीं कही जा सकती, समाज के विचारशील तबकों को इसमें अपना योगदान देना होगा।

तर्कशील आंदोलन अगर नयी ज़मीन तोड़ना चाहता है कि उसे यह समझना होगा कि अगर वो हाशिये तक पड़े नहीं रहना चाहते हैं, अगर वह इस बात के लिए प्रतिबद्ध है कि वैज्ञानिक चिंतन वाकई पूरे समाज का चिंतन बने, तो उनको इस पर सोचना पड़ेगा कि कहां कहां गाड़ी रुक गई और यह गतिरोध कैसे टूटेगा!

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