बीसवीं सदी के युद्ध और शांति के रूप में ख्यात लाइफ़ एण्ड फ़ेट की एक चिट्ठी के बारे में महेश मिश्र पहले भी लिख चुके हैं। इस बार वे बता रहे हैं कि कैसे वसीली ग्रॉसमैन का यह 950 पृष्ठों का उपन्यास ‘टोटैलिटेरियनिज़्म का इनसाइक्लोपीडिया’ है। ‘मनुष्य उस समय क्या करता है, जब इतिहास बहुत बड़ा हो जाए? जब राज्य बहुत बड़ा हो जाए? जब विचारधारा बहुत बड़ी हो जाए? जब भय इतना व्यापक हो जाए कि व्यक्ति का अपना अंतःकरण भी उससे सुरक्षित न रहे?’
न्यूरेम्बर्ग के ट्रायल्स में एक लेख का उल्लेख आता है- ‘द हेल ऑफ ट्रेबलिंका’।
यह उन शुरुआती और महत्त्वपूर्ण प्रमाणों में से एक था, जिनसे दुनिया को यह स्पष्ट रूप से पता चला कि नाज़ियों ने मृत्यु शिविर बना रखे हैं, कि होलोकास्ट हो रहा है और मनुष्यों की औद्योगिक ढंग से हत्या कैसे की जा रही है।
यह लेख लिखा था- वसीली ग्रॉसमैन ने।
ग्रॉसमैन सोवियत सेना के युद्ध संवाददाता थे। उन्होंने युद्ध को दूर बैठकर नहीं देखा था। वे उसके भीतर थे। उन्होंने उसके साथ-साथ चलते हुए मनुष्य को देखा था।
उन्हीं ग्रॉसमैन की एक कृति है—लाइफ़ एंड फ़ेट।
यह कृति 1960 में पूरी हुई और 1980 में प्रकाशित हो पाई। अभी भी इस शानदार उपन्यास को शायद वह प्रसिद्धि नहीं मिल पाई है, जो यह डिज़र्व करता है। इसे बीसवीं सदी का ‘वॉर ऐण्ड पीस’ कहा जाता है, लेकिन कुछ विश्लेषकों का मानना है कि यह तुलना मितकथन है, बल्कि अवमूल्यन है। इस तुलना में जाने की फ़िलहाल कोई आवश्यकता नहीं है। मेरे लिए ‘वॉर ऐण्ड पीस’ का अपना अन्यतम मूल्य है।
लेकिन इतना अवश्य कहा जा सकता है कि लाइफ़ एंड फ़ेट को किसी दूसरे उपन्यास की सहायता से समझने की आवश्यकता नहीं है। यह अपने आप में एक मुकम्मल कृति है।

एक युद्ध का उपन्यास, लेकिन केवल युद्ध का नहीं
यह ऐतिहासिक उपन्यास द्वितीय विश्वयुद्ध और विशेष रूप से स्टालिनग्राद की लड़ाई की पृष्ठभूमि में रचा गया है। शापोश्निकोव के विस्तृत परिवार और उससे जुड़े अनेक पात्रों के माध्यम से ग्रॉसमैन एक बहुत बड़ा संसार रचते हैं। सेनाएँ हैं। टैंक हैं। खाइयाँ हैं। बंकर हैं। जर्मन सेना है। रेड आर्मी है। कंसंट्रेशन कैम्प हैं। विज्ञान है। राजनीति है। परिवार हैं। प्रेम है। ईर्ष्या है। महत्त्वाकांक्षा है। कायरता है।
और सबसे अधिक है- भय।
प्रस्तावना, कालखण्ड और चरित्रों के परिचय के साथ लगभग 950 पृष्ठ का यह उपन्यास पढ़ना चुनौतीपूर्ण है। इतने सारे ऐतिहासिक और औपन्यासिक चरित्र पकड़े रखना, उनके व्यक्तित्व के रेशे पकड़ना, युद्ध में इस्तेमाल हथियारों के विवरण, खाइयों और बंकरों के भीतर तक के जीवन के चित्रण पर अपनी नज़र बनाए रखना धैर्य की माँग करता है। लेकिन उपन्यास को पढ़कर जो मिलता है, वह मेरी समझ में अतुलनीय है।
और शायद इसका कारण यह है कि इस उपन्यास का वास्तविक विषय युद्ध नहीं है।
इसका वास्तविक विषय है- मनुष्य।
मनुष्य उस समय क्या करता है, जब इतिहास बहुत बड़ा हो जाए? जब राज्य बहुत बड़ा हो जाए? जब विचारधारा बहुत बड़ी हो जाए? जब भय इतना व्यापक हो जाए कि व्यक्ति का अपना अंतःकरण भी उससे सुरक्षित न रहे?
आज्ञापालन की सीमा (द डिग्री ऑफ ओबीडीएन्स)
लाइफ़ एंड फ़ेट को आसानी से टोटैलिटेरियनिज़्म का इनसाइक्लोपीडिया कहा जा सकता है। ऐसा कहने के पीछे ग्रॉसमैन का वह विश्लेषण है, जिसे नाज़ी जर्मनी से संबंधित इस अंश में आसानी से देखा जा सकता है:
“And it was not merely tens of thousands, or hundreds of thousands, but hundreds of millions of people who were the obedient witnesses of this slaughter of the innocent. Nor were they merely obedient witnesses: when ordered to, they gave their support to this slaughter, voting in favour of it amid a hubbub of voices. There was something unexpected in their degree of obedience… The extreme violence of the totalitarian social systems proved able to paralyse the human spirit throughout whole continents.”
(यह केवल दसियों हज़ार या लाखों लोगों की बात नहीं थी। करोड़ों लोग निर्दोषों के इस संहार के आज्ञाकारी साक्षी बने हुए थे। और वे केवल आज्ञाकारी साक्षी भर थे भी नहीं। जब उन्हें आदेश दिया गया, तो उन्होंने इस संहार में अपना समर्थन भी दिया, शोर और नारों के बीच उसके पक्ष में अपनी सहमति प्रकट की। उनकी आज्ञाकारिता की सीमा में कुछ ऐसा था जिसकी कल्पना नहीं की गई थी… सर्वाधिकारवादी व्यवस्थाओं की चरम हिंसा में इतनी शक्ति थी कि उसने पूरे-पूरे महाद्वीपों में मनुष्य की आत्मा को लकवाग्रस्त कर दिया।)
समझने वाली बात यह है कि सर्वाधिकारवादी सत्ता केवल अपने विरोधियों को ही प्रभावित नहीं करती। भय का जो वातावरण वह बनाती है, उसका असर केवल उन लोगों पर नहीं होता जो सत्ता के प्रशंसक नहीं हैं। वह उन लोगों को भी अपने आगोश में ले लेती है जो उसके प्रशंसक, अनुयायी और उस वातावरण के कर्ता-धर्ता होते हैं।
धीरे-धीरे सत्ता को हर समय आदेश देने की आवश्यकता भी नहीं रहती। लोग स्वयं समझने लगते हैं कि क्या कहना है, क्या नहीं कहना है, किसके सामने चुप रहना है, किससे दूरी रखनी है।
सत्ता का सबसे अनोखा मायाजाल शायद वहीं होता है- जब वह मनुष्य के बाहर नहीं, उसके भीतर भी अपना करिश्मा दिखाने लगती है।
उपन्यास की कहानी का नायक है विक्टर श्ट्रम। वह प्रतिभावान वैज्ञानिक है। बल्कि असाधारण भौतिक-विज्ञानी है। उसकी वैज्ञानिक प्रतिभा वास्तविक है। विज्ञान के प्रति उसकी बौद्धिक निष्ठा भी वास्तविक है।
लेकिन प्रतिभा मनुष्य को भय से मुक्त नहीं कर पाती। बल्कि प्रतिभा भय की प्रतीति को कई बार और भी अधिक जटिल बना देती है, क्योंकि प्रतिभाशाली व्यक्ति जानता है कि वह क्या-क्या खो सकता है- अपना काम, अपनी प्रतिष्ठा, अपनी प्रयोगशाला, अपना भविष्य, अपना परिवार और संभवतः अपना जीवन।
विक्टर श्ट्रम का चरित्र इसलिए इतना अद्भुत है कि ग्रॉसमैन उसे किसी सरल नैतिक नायक की तरह नहीं रचते। ऊँचे-ऊँचे बोल देकर वे उसको महान नहीं बनाते बल्कि वह हाड़-माँस का साधारण मनुष्य ही बना रहता है। वह महान वैज्ञानिक है, लेकिन उसके डर सामान्य मनुष्यों जैसे ही हैं। वह अन्याय को जितनी बार होते हुए देखता है, उतनी बार वह उसके विरुद्ध खड़ा नहीं हो पाता।
वह अपने डर को पहचानता भी है, लेकिन उसे हर बार हरा नहीं पाता।
ग्रॉसमैन लिखते हैं:
“Good men and bad men alike are capable of weakness. The difference is simply that a bad man will be proud all his life of one good deed—while an honest man is hardly aware of his good acts, but remembers a single sin for years on end.”
यह वाक्य विक्टर को समझने में बहुत मदद करता है। एक ईमानदार मनुष्य अपने अच्छे कामों का हिसाब नहीं रखता, लेकिन अपनी एक नैतिक विफलता को वर्षों तक याद रख सकता है।
विक्टर के भीतर एक वैज्ञानिक है जो सत्य को जानना चाहता है। लेकिन उसके भीतर एक नागरिक भी है जो जानता है कि सत्य और सत्ता के संबंध किस तरह चल रहे हैं। यह सोवियत सत्ता के अप्रिय आख्यानों में से एक है। कम्युनिष्ट सत्ता के चरित्र का यह विश्लेषण जटिल है लेकिन विश्वसनीय है।
विज्ञान में सत्य किसी पार्टी की इच्छा से नहीं बदलता, यह विक्टर कहना चाहता है लेकिन वैज्ञानिक का जीवन पार्टी बदल सकती है, वह यह भी महसूस कर रहा है। उसकी नियुक्ति किसी ऐसी जगह हो सकती है जहाँ वह वैज्ञानिक के रूप में निरर्थकता के दलदल में फँस सकता है। उसकी प्रतिष्ठा समाफ्त हो सकती है। उसके दोस्त ग़ायब किए जा सकते हैं। वह स्वयं भी ग़ायब किया जा सकता है।
सत्ता के निकट आने पर भय समाप्त नहीं होता
विक्टर श्ट्रम के चरित्र का शायद सबसे उलझा हुआ पक्ष है, सत्ता के साथ बदलता उसका संबंध। एक समय वह राजनीतिक संदेह और असुरक्षा के वातावरण में है। फिर उसकी वैज्ञानिक प्रतिभा को सत्ता स्वीकार करती है। उसका महत्त्व स्वीकार किया जाता है।
लेकिन भय समाप्त नहीं होता। उसका केवल रूप बदल जाता है।
विक्टर एक आत्मालाप में कहता है:
“Now it was simply a more aristocratic fear, a fear that travelled by car and was allowed to use the Kremlin telephone switchboard.”
यह मेरे लिए उपन्यास के सबसे अद्भुत वाक्यों में से एक है।
A more aristocratic fear.
एक अधिक अभिजात भय।
जब मनुष्य सत्ता से दूर होता है, तो वह सत्ता से डरता है। लेकिन सत्ता के निकट आने पर भी डर समाप्त नहीं होता। अब वह और जटिल हो जाता है। आपको विशेष सुविधाएँ मिल सकती हैं। सम्मान मिल सकते हैं। आपका मशहूर हो सकते हैं। आपको सत्ता के शीर्ष से बुलावा आ सकता है। आपकी पहुँच बढ़ सकती है। लेकिन यह सब भी आपको आज़ादी नहीं देता।
कई बार तो यह आपको और अधिक असुरक्षित बना देता है क्योंकि अब आप जानते हैं कि आप सत्ता की दृष्टि में हैं।
सत्ता के निकट होना स्वतंत्र होना नहीं है। कई बार सत्ता के निकट होना केवल भय के एक नए स्वरूप में प्रवेश करना है।

विज्ञान और सत्ता
विक्टर श्ट्रम की वैज्ञानिक प्रतिभा उपन्यास में एक और बड़ा सवाल खड़ा करती है- क्या ऐसा हो सकता है कि विज्ञान स्वतंत्र हो, जबकि वैज्ञानिक स्वतंत्र न हो?
आइए, समझते हैं। सर्वाधिकारवादी सत्ता को भी प्रतिभावान लोग चाहिए, लेकिन स्वतंत्र व्यक्तित्त्व वाली प्रतिभाएँ नहीं। उसे बुद्धि चाहिए, लेकिन ऐसी बुद्धि जो सत्ता के आदेशों का पालन करे।
विक्टर की प्रतिभा सत्ता के लिए उपयोगी है, इसलिए सत्ता उसे स्वीकार करती है। लेकिन वह प्रतिभा अपने स्वतंत्र अंतःकरण के अनुसार चलना चाहेगी तो यह अनुमति तो नहीं दी जा सकती न?
ऐसे में विज्ञान और सत्ता का संबंध प्रेम और साहचर्य का नहीं, बल्कि उपयोग का संबंध है।
सत्ता प्रतिभा से प्रेम नहीं करती। वह उसका आदर नहीं करती, बस उपयोग करती है। और शायद नायक विक्टर की त्रासदी का एक हिस्सा यही है कि उसका वैज्ञानिक जीवन जितना सफल होता है, उसका नैतिक जीवन उतना सहज नहीं हो पाता। बल्कि और कठिन हो जाता है क्योंकि सत्ता उसके सामने केवल हिंसा के रूप में नहीं आती। वह सम्मान के रूप में भी आती है। स्वीकृति के रूप में भी। सुविधा के रूप में भी।
और मनुष्य के लिए यह तय करना हमेशा आसान नहीं होता कि वह किस क्षण समझौता कर रहा है।
हिटलर और स्टालिन: सत्ता के दो अकेले संसार
लाइफ़ एंड फ़ेट की एक और विशेषता यह है कि ग्रॉसमैन हिटलर और स्टालिन को केवल इतिहास की दूर की तस्वीरों की तरह प्रस्तुत नहीं करते। वे दोनों के व्यक्तित्व, उनके अकेलेपन, उनकी शक्ति और उनकी कमज़ोरियों को फ़िक्शन में ढालते हैं।
इतिहास हमें तानाशाहों की शक्ति दिखाता है- सेनाएँ, पुलिस, जेलें, भाषण, झंडे और लाखों लोगों का प्रभावित होता जीवन।
ग्रॉसमैन सत्ता के इस विराट दृश्य के पीछे उस व्यक्ति को भी देखते हैं जो अंततः अकेला है।
सर्वाधिकारवादी सत्ता केवल जनता को अकेला नहीं करती। वह स्वयं सत्ता में बैठे व्यक्ति को भी एक ऐसे संसार में पहुँचा देती है जहाँ वास्तविक मानवीय संबंध कठिन होते जाते हैं।
ग्रॉसमैन के लाइफ़ एण्ड फ़ेट में हिटलर और स्टालिन के एकांत के दृश्य इसलिए इतने असाधारण हैं कि वहाँ इतिहास के दो महा-तानाशाह पहली बार इतिहास से बाहर दिखाई देते हैं। सत्ता, जो उन्हें मनुष्य से अधिक कुछ बना देती है, एकांत में उनसे धीरे-धीरे उतर जाती है।
हिटलर जंगल में अकेला है। उसके साथ न सैनिक हैं, न अधिकारी, न वह विराट भय जो उसके नाम से पैदा होता है। अचानक वह स्वयं को “a little boy in a fairy-tale lost in a dark, enchanted forest” की तरह पाता है। उसे यह भी असह्य लगता है कि वह “the level of ordinary men” तक उतर आया है। कितनी विडंबना है- दूसरों को असाधारण मृत्यु देने वाला मनुष्य अकेले में अपनी ही साधारणता से डरता है। उसकी शक्ति शायद उसकी अपनी नहीं, उस पूरे तंत्र की थी जो उसके चारों ओर खड़ा था।
स्टालिन का एकांत दूसरी तरह से खुलता है। इतिहास उसके हाथ में है, लेकिन उस क्षण उसे सत्ता नहीं, अपने बच्चे याद आते हैं- “He wished he had his children beside him.” एक क्षण के लिए राज्य का सर्वशक्तिमान मुखौटा हट जाता है और उसके पीछे एक बूढ़ा, अकेला पिता दिखाई देता है।
ग्रॉसमैन का गहरा व्यंग्य यहीं है: तानाशाह इतिहास में असाधारण हो सकते हैं, लेकिन एकांत में वे मनुष्य की उसी साधारण नियति में लौट आते हैं- भय, स्मृति, अकेलापन और किसी अपने की अनुपस्थिति।
मनुष्य सत्ता को नियंत्रित करता है या अंततः सत्ता मनुष्य को बदल देती है? यह प्रश्न उपन्यास के भीतर लगातार उपस्थित रहता है।
होलोकास्ट: संख्या से फिर मनुष्य तक
ग्रॉसमैन के लिए होलोकास्ट कोई अमूर्त ऐतिहासिक घटना नहीं थी। उन्होंने उसके प्रमाण देखे थे। ट्रेबलिंका के बारे में लिखा था। उन्होंने उस संसार को देखा था जिसमें मनुष्यों को व्यवस्थित ढंग से मारने की व्यवस्था बनाई गई थी। लाइफ़ एंड फ़ेट में कंसंट्रेशन कैम्प्स के विवरण विशेष रूप से भयावह हैं। खासकर डेविड की हत्या के समय… आपकी नसें सुन्न हो जाती हैं और आप अन्दर से रो पड़ते हैं।
होलोकास्ट के बारे में हम लाखों की संख्या सुनते हैं। लेकिन संख्या एक अजीब ढंग से हमारी संवेदना को कुंद कर देती है। ग्रॉसमैन साहित्य के माध्यम से उस संख्या को फिर से इन्सान में बदल देते हैं।
एक बच्चा।
एक माँ।
एक बूढ़ा व्यक्ति।
एक ऐसा आदमी जिसके पास स्मृतियाँ हैं, जो किसी से प्रेम करता है, जो किसी के इंतज़ार में बेचैन है या बेचैन होना चाहता है। और तब यह संख्या पीड़ा बन जाती है, दर्द बन जाती है और असहनीय हो जाती है।
ग्रॉसमैन का सबसे बड़ा आग्रह शायद यही है कि किसी भी विचारधारा को मनुष्य को संख्या में बदलने का अधिकार नहीं है।
मनुष्य और फासीवाद एक साथ नहीं रह सकते
ग्रॉसमैन लिखते हैं:
“Man and fascism cannot co-exist. If fascism conquers, man will cease to exist and there will remain only man-like creatures that have undergone an internal transformation. But if man, man who is endowed with reason and kindness, should conquer, then Fascism must perish, and those who have submitted to it will once again become people.”
‘मनुष्य और फासीवाद एक साथ नहीं रह सकते’– ‘मनुष्य’ केवल जैविक अर्थ में मनुष्य नहीं है। मनुष्य होने का अर्थ है- सोचने की क्षमता, दया, व्यक्तित्व, स्वतंत्रता और दूसरे मनुष्य को मनुष्य की तरह देखने की क्षमता।
फासीवाद इन सबके विरुद्ध है।
उसे व्यक्तियों की आवश्यकता नहीं होती। उसे एकरूप मनुष्य चाहिए- एक जैसे विचार, एक जैसी भाषा, एक जैसा भय और एक जैसे शत्रु।
इसलिए यदि फासीवाद विजयी होता है तो, ग्रॉसमैन के अनुसार, मनुष्य समाप्त हो जाएगा और केवल मनुष्य जैसे जीव रह जाएँगे जिनके भीतर कुछ बदल दिया गया होगा, उनका जीवद्रव्य बदल गया होगा, उनका तंत्रिका-तंत्र बदल गया होगा।
उपन्यास इस विचार को इतने ठोस ढंग से निरूपित करता है कि यह विचार केवल नाज़ी जर्मनी तक सीमित नहीं रह जाता। यह शायद हर उस व्यवस्था के बारे में बताने लगता है कि जो व्यवस्था मनुष्य से उसकी विशिष्टता छीनना चाहती है, वह मनुष्य-विरोधी है।
व्यक्ति की विशिष्टता ही उसकी स्वतंत्रता है
यह औपन्यासिक कृति व्यक्ति की सत्ता और महत्ता को, उसके सत्त्व को पकड़ने की बेहतरीन कोशिश है। एक जगह ग्रॉसमैन लिखते हैं:
“What constitutes the freedom, the soul of an individual life, is its uniqueness.”
व्यक्ति के विशिष्ट होने का अधिकार।
अलग ढंग से सोचने का।
अलग तरीक़े से महसूस करने का।
अलग तरह से जीने का।
ग्रॉसमैन लिखते हैं:
“मनुष्य जब समूह बनाता है, तो उसका मूल प्रयोजन एक ही होता है – अपनी भिन्नता को, अपनी विशिष्टता को प्रतिष्ठित करना, अपने ढंग से सोचने, अनुभव करने और जीने के अधिकार की रक्षा करना। इसी अधिकार को पाने या सहेजने के निमित्त मनुष्य संगठित होता है, एकजुट होता है। किंतु यहीं एक विडंबनापूर्ण, नियतिगत भूल जन्म ले लेती है – यह भ्रम कि नस्ल के नाम पर, ईश्वर के नाम पर, दल या राष्ट्र के नाम पर बना समूह ही मानो जीवन का चरम प्रयोजन बन गया हो, जबकि यथार्थतः वह केवल एक साधन भर था, साध्य नहीं। नहीं – जीवन-संघर्ष का सच्चा और चिरस्थायी अर्थ किसी समूह में नहीं, अपितु व्यक्ति में ही निहित है — उसकी उन सूक्ष्म, विनम्र विलक्षणताओं में, और उन्हें जी सकने के अधिकार में।”
व्यक्ति की सामूहिकता में कुछ अनिवार्य बुराइयाँ जन्म लेती हैं और मनुष्य का अब तक का इतिहास इस बात का गवाह है।
राज्य साधन है।
पार्टी साधन है।
नस्ल, ईश्वर और समूह भी साधन हैं।
लेकिन जब वे स्वयं जीवन का उद्देश्य बन जाते हैं, तब शायद एक भयानक भूल जन्म लेती है।
ग्रॉसमैन का आग्रह है कि जीवन का वास्तविक और स्थायी अर्थ व्यक्ति में है- उसकी अपनी विलक्षणताओं में और उन विलक्षणताओं के साथ जीने के उसके अधिकार में।
लघु दयालुता की असीम शक्ति
लेकिन लाइफ़ एंड फ़ेट को केवल सत्ता और भय का उपन्यास कहना ग़लत होगा। ग्रॉसमैन के उपन्यास की सबसे बड़ी विशेषता है- कंपैशन… दयालुता। लेकिन यह महान, संगठित, ऐतिहासिक, संस्थागत दयालुता नहीं है। वे लघु दयालुता की बात करते हैं।
किसी अनजान व्यक्ति के लिए।
बिना किसी लाभ के।
बिना किसी विचारधारा के।
बिना किसी पुरस्कार की आशा के।
ग्रॉसमैन इसे कहते हैं- senseless kindness.
वे लिखते हैं:
“I have seen that it is not man who is impotent in the struggle against evil, but the power of evil that is impotent in the struggle against man. The powerlessness of kindness, of senseless kindness, is the secret of its immortality. It can never be conquered. The more stupid, the more senseless, the more helpless it may seem, the vaster it is. Evil is impotent before it. The prophets, religious teachers, reformers, social and political leaders are impotent before it. This dumb, blind love is man’s meaning. Human history is not the battle of good struggling to overcome evil. It is a battle fought by a great evil, struggling to crush a small kernel of human kindness. But if what is human in human beings has not been destroyed even now, then evil will never conquer.”
अर्थात बड़ी से बड़ी बुराई और सत्ता की ताकत, और विभिन्न प्रकार के ‘उद्धारक’, कभी भी उतने ताकतवर नहीं हो पाते हैं जितनी शक्ति एक अकेले मनुष्य की लगभग बेवकूफी भरी दयालुता में होती है।
ऐसे एक से अधिक विश्वसनीय उदाहरण इस उपन्यास में हैं।
दयालुता की शक्ति उसकी कमजोरी में है।
इसके पास सेना नहीं है।
इसके पास राज्य नहीं है।
इसके पास जेल नहीं है।
इसके पास प्रचार नहीं है।
फिर भी इसे नष्ट करना कठिन है।
कोई किसी अजनबी की सहायता कर देता है। कोई किसी के लिए रुक जाता है। कोई किसी ऐसे व्यक्ति के प्रति दयालु हो जाता है जिससे उसे कोई लाभ नहीं मिलने वाला।
इन कार्यों का कोई राजनीतिक उद्देश्य नहीं होता।
और शायद इसी कारण वे इतने महत्त्वपूर्ण हैं.
ग्रॉसमैन एक चरित्र के बारे में कहते हैं:
“Her capacity for kindness seems to be independent of understanding; it may even depend on a lack of understanding.”
शायद सभ्यता इन्हीं कार्यों के कारण अब तक बची हुई है।
इतने विशाल उपन्यास में प्रेम भी अपनी विशिष्ट कोमलता से आया है। लेकिन यह किसी सरल रोमांटिक संसार का प्रेम नहीं है। यह बिछोह और भय के बीच मौजूद प्रेम है।

एक लघु-मनुष्य का औदात्य
इस उपन्यास का एक वाक्य बार-बार लौटकर आता है:
“Everything in the world is insignificant compared to the truth and purity of one small man—even the empires… even science itself.”
एक अन्य जगह ग्रॉसमैन लिखते हैं:
“I don’t want you to be young and beautiful. I only want one thing. I want you to be kind-hearted—and not just towards cats and dogs.”
ये दोनों वाक्य शायद लाइफ एंड फेट की पूरी नैतिक दृष्टि का निचोड़ हैं।
साम्राज्य बड़े हैं।
राज्य बड़े हैं।
विज्ञान महान है।
इतिहास विशाल है।
लेकिन एक छोटे मनुष्य की सत्यता और नैतिकता के सामने इन सबका क्या मूल्य है?
यदि उस व्यक्ति का कोई मूल्य नहीं है- तो साम्राज्य का मूल्य क्या है?
विज्ञान का मूल्य क्या है?
राज्य का मूल्य क्या है?
इतिहास का मूल्य क्या है?
मेरी समझ में लाइफ एंड फेट की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि यह सत्ता की ताकत के सामने व्यक्ति के टिक पाने की संभावनाओं और असंभावनाओं का शायद सबसे सटीकतम चित्रण करती है।
लेकिन यह इसलिए भी विशिष्ट है कि मनुष्य की दयालुता की कोई सीमा नहीं है और उसे भीषण-से-भीषण परिस्थितियों में भी कोई शक्ति पूरी तरह समाप्त नहीं कर सकती।
मनुष्य डरता है।
वह समझौता करता है।
वह कमजोर पड़ता है।
वह चुप रहता है।
कई बार वह गलत लोगों के साथ खड़ा हो जाता है।
लेकिन उसके भीतर कुछ ऐसा भी है जो बार-बार लौट आता है- पश्चात्ताप, प्रेम, स्मृति, लज्जा और करुणा।
और वह छोटी-सी, लगभग मूर्खतापूर्ण दयालुता।
ग्रॉसमैन का विश्वास अच्छाई की सर्वशक्तिमत्ता में नहीं है। उन्होंने बहुत अधिक बुराई देखी थी। वे जानते थे कि बुराई शक्तिशाली होती है।
उसके पास सेना होती है।
राज्य होता है।
जेल होती है।
भय होता है।
प्रचार होता है।
और लाखों लोगों की आज्ञाकारिता होती है।
लेकिन उसके पास एक चीज़ नहीं होती- वह उस छोटी-सी मानवीय पहल को पूरी तरह नियंत्रित नहीं कर सकती, जो किसी व्यक्ति के भीतर से बिना किसी आदेश के उत्पन्न हो जाती है।
कोई किसी अजनबी की सहायता कर देता है।
कोई किसी के लिए रो पड़ता है।
कोई अपने अपराध को वर्षों तक भूल नहीं पाता।
कोई भय के बावजूद किसी क्षण सत्य का साथ दे देता है।
और शायद मनुष्य की सारी आशा इन्हीं छोटी घटनाओं में है।
लाइफ एंड फेट एक उदात्त कृति है जिसकी तुलना किसी और उपन्यास करने की ज़रूरत नहीं है, लेकिन यह सच है कि ग्रॉसमैन स्वयं चाहते थे कि उसकी तुलना वॉर एंड पीस से की जाए।
मानवता और मानव-आत्मा के सतत संघर्ष की यह ऐसी महागाथा है जो लिखे जाने से पहले के इतिहास को भी समझती है, वर्तमान को भी समझती है और शायद हमेशा प्रासंगिक बनी रहेगी।
इसमें युद्ध है।
लेकिन युद्ध से अधिक जीवन है।
इसमें मृत्यु है।
लेकिन मृत्यु से अधिक मनुष्य है।
इसमें सत्ता है।
लेकिन सत्ता से अधिक स्वतंत्रता की इच्छा है।
इसमें भय है।
लेकिन भय से अधिक वह छोटी-सी चीज़ है जिसे कोई सत्ता पूरी तरह नष्ट नहीं कर सकती- मनुष्य की दूसरे मनुष्य के प्रति करुणा।
और शायद यही कारण है कि अंत में हम फिर उसी छोटे-से मनुष्य के पास लौट आते हैं।
उसकी अपनी स्मृतियाँ हैं।
उसका अपना भय है।
उसका अपना प्रेम है।
उसकी अपनी कमजोरियाँ हैं।
और उसकी अपनी एक ऐसी विशिष्टता है जो उससे पहले कभी नहीं थी और उसके बाद फिर कभी नहीं होगी।
यदि उसके भीतर थोड़ी-सी भी स्वतंत्रता, थोड़ी-सी भी शर्म, थोड़ा-सा भी प्रेम और किसी अजनबी के लिए थोड़ी-सी भी दयालुता बची हुई है- तो जान लो कि इतिहास की सबसे बड़ी बुराई भी अभी पूरी तरह जीती नहीं है।







