सीमा सिंह की शानदार कविताएँ लगभग सवा साल बाद दुबारा ‘नया पथ’ में आयी हैं। उनका कविता संग्रह ‘कितनी कम जगहें हैं’ सेतु प्रकाशन से है।
यह कोई प्रेम कविता नहीं
घटनाएँ कितने असंगत और
अनिश्चित तरीक़े से घट रही थीं
कि अपने होने पर संशय होने लगा
वास्तविकता भ्रम लगने लगी
और सपने में रहना जीवन के क़रीब
हवा बसंत की थी फिर भी मन उदास
जी में है कि लिखूँ तुम्हें पत्र
पर मेरी आँखों में तुमसे दूरी के आँसू नहीं
हवा में बढ़ते ए क्यू आई की जलन थी
तुम नहीं थे यहाँ ,यह सच था
पर बसंत भी नहीं था यह बात थोड़ी झूठ थी
ऋतुएँ अब भी थीं जैसे तुम्हारी याद थी
विरह प्रेम की कसौटी नहीं था अब
दरकते पहाड़ जैसे विचार थे हमारे बीच
सपनों में साथ की गयी यात्राएँ थीं
फूल भी थे पर साथ में थी थोड़ी तपिश भी
एक बार बहस के दरमियान
तुमने कहा था कि ‘ग्लोबल वॉरमिंग जैसा कुछ नहीं होता’
और सुनाया था प्रधानमंत्री का भाषण
मैं तुमसे कैसे कहती कि पृथ्वी की नमी के साथ
कम हो रही मेरी आँखों की नमी भी
और कैलिफोर्निया के जंगलों में लगी आग
कभी भी लग सकती है हमारे बीच
तुमने झुँझलाते हुए कहा
‘यार, प्यार में पॉलिटिक्स मत लाया करो’
अब तुम्हें कैसे बताऊँ कि
दो हज़ार चौदह के बाद से पॉलिटिक्स
प्यार के बीच में ही है !
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प्रचलित मुहावरों से ऊब कर
“इन्हें कूड़ा मत दिया कीजिए”
कूड़ा देते वक़्त कहा मुझसे
मेरे पड़ोसी ने
इतने पर ही शांत नहीं हुई
उनके भीतर की आग
मसाला भरे मुँह से बोले
“सब के सब बांग्लादेशी हैं साले !
घुसपैठिये !
और भच्च से थूक दिया मसाला
मेरे सामने सड़क पर
जैसे देश उनके पॉकेट में रखा
गुटखे का कोई पैकेट
जिसके हर मसले पर थूकना अनिवार्य हो
तथाकथित राष्ट्रवादी पार्टी के अलमबरदार वे
जिनके लिए सड़क की उपयोगिता
उनके थूकने पर निर्भर थी
ऐसे में उनकी बात को
कूड़े बराबर भी नहीं समझती ,
जब तक हवा चल रही है
धूप निकल रही है
पानी बरस रहा है ,तब तक
उनके प्रायोजकों द्वारा बनायी गई धारणाओं
गढ़े गए दृश्यों से ऊब कर
देखूँगी नीला निर्द्वंद्व निस्सीम आकाश !
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नींद पलायन नहीं संभावना है
दुख भी एक भारी ऊब की तरह आया
उसके बार बार यूँ चले आने से
कम हुई जाती है उसकी प्रासंगिकता
दुख यह नहीं समझता
एक लम्बी जम्हाई के बाद
उसका सो जाना निश्चित था
उसे ढोने वाले थक रहे थे बेतहाशा
उन्हें एक झूठी हँसी की तलाश थी
और एक तवील रात की
दुख में नहीं बोले गये शब्दों,वाक्यों और
बनते-बनते रह गयी कहानियों के ज़ख़ीरे थे
पर सुनने वाला नहीं था कोई
त्रासदी और क्या है भला
किसी को कह देने से ख़त्म नहीं होता कुछ
वह भी ख़त्म नहीं होने वाला ,
थक कर सो जाना कितना मौलिक है
नींद पलायन नहीं ऊब और दुख से छिपने का
एक ज़रिया भर है !
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कान
वे कह कर अपनी बात
फिर आ जाते कहने
वे लगातार कुछ कहते रहते
वे कहते हुए ज़रा नहीं थकते
हम सुनते हैं उनकी बात
वे फिर कहते हम फिर सुनते
हम लगातार उन्हें सुनते
हम सुनते हुए ज़रा नहीं थकते
हमारे कान उनकी गिरफ़्त में हैं
कमाल है ! कानों को ज़रा यक़ीन नहीं !
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कितना गिरना शेष है
कोई रंग पास नहीं मेरे
कितनी क़मीज़ों के रंग उतर गये
वे सफ़ेद से मटमैली होती हुई बदन से चिपकी रहीं
चलते चलते जब थक गये पाँव
मुझे उन नीली चप्पलों की याद आयी
जो पिछली बरसात नाली में बह गयी
अब ना वो पाँव रहे ना उसकी स्मृति
कितना अकेलापन था आसपास
एक पत्ते के गिरने की आवाज़ भी
कानों को बहुत तेज़ लगती
गिरना कितना असहज करता, ऐसे में
नींद से अचकचा कर गिर गयी बिस्तर से
आँखों से लड़खड़ा गिर गये स्वप्न
टेबल पर रखी ऐनक गिरी
हथेलियों से गिरीं रेखाएँ सभी
आकाश से गिरे नक्षत्र ,बादलों से पानी
बारिश में गिर गया एक नया पुल
गिरी एक पुरानी इमारत भी
कितना गिरना शेष था अभी ?
कि चुनाव के बाद गिर गया निफ़्टी
उसके साथ गिरे अनगिनत सपने
उनके चेहरों से गिर गयी हँसी
वे उसे खोजते देखते रहे स्टॉक मार्केट
बजट की प्रतीक्षा में गिरता रहा हीमोग्लोबिन
हम रक्त की कमी से जूझते ढूँढते रहे
स्टैन्डअप कॉमेडी में गिर गयी हँसी
सतत गिर रहा था सब
ऐसे में संसद में गिरी भाषा
एक महादेश के गिरने की वृहद् कथा थी
जिसका रुकना लगभग असंभव था !
bisenseemasingh@gmail.com








सीमाजी की कविताएँ पढता रहा हूँ.इस बार भी उनकी शानदार,सुगठित कविताओं ने प्रभावित किया. समय की नब्ज पर उन्होंने अंगुली राखी है. एतदर्थ उन्हें बधाई देना चाहूँगा. नया पथ का आभार.
सीमा के पास समय को देखने की सजग दृष्टि है । वह स्त्री कविता के ऊपर लगाए जा रहे इस आरोप से भी ख़ुद को बरी करती हैं कि जहाँ यह बहस चलती है कि स्त्रियों के लेखन में स्त्री विमर्श , प्रेम और नायकों की बाट जोहने के अलावा कोई और विषय बमुश्किल से मिलते हैं । मैं ये क़तई नहीं कहना चाहती कि स्त्रियों को ऐसी कविताएँ लिखनी नहीं चाहिए बल्कि इसी पीढ़ी की लेखिकाओं को तो सबसे अधिक अवसर मिला है अपनी बात कहने का और उन्हें अपने मन की कहने का पूरा अधिकार भी है । बस मैं पूरी विनम्रता के साथ केवल ये कहना चाहती हूँ कि जब स्त्रियाँ इन विषयों पर कलम चला सकती हैं तो फिर समाज या राजनीति में जो कुछ भी असंगत घट रहा होता है । उस समय को भी अपनी कविताओं में दर्ज़ करना चाहिए ।
प्रिय सीमा को इन कविताओं के लिए बहुत बधाई ।