पाँच ग़ज़लें / इल्तिफ़ात माहिर


फ़ैज़ाबाद के एक मशहूर क़स्बे रौनाही में जन्मे इल्तिफ़ात माहिर ने कानपुर यूनिवर्सिटी से स्नातक और वकालत की पढ़ाई के बाद वकालत को अपनी रोज़ी-रोटी का ज़रिया चुना, लेकिन इल्मो-अदब से वे मुसलसल तौर पर वाबस्ता रहे । उनकी ग़ज़लें उर्दू शायरी और ज़बान की ख़ास ताक़त का मुज़ाहिरा करते हुए भी उसकी रिवायत में अपने अंदाज़ की रोशनी को शामिल करती चलती हैं । वे अपने नरम लहजे में भी मौजूदा वक़्त और सियासत के सवालों से अनूठेपन के साथ टकराते हैं । पेश हैं उनकी कुछ ग़ज़लें :

(1)
जलो ऐसे कि यकसर नूर की तमसील हो जाओ,
वफ़ा और प्यार की जलती हुई क़न्दील हो जाओ।

ये दुनिया राह के पत्थर को बस ठोकर पे रखती है,
अगर पत्थर ही होना है तो संगे मील हो जाओ।

समन्दर हो भी जाओगे तो किसको फ़ायदा होगा,
बुझाओ प्यास मीठे पानियों की झील हो जाओ।

गुज़र होगा जिधर भी लोग साँसो में बसा लेंगे,
बनो खुशबू हवाओं में अगर तहलील हो जाओ।

अगरचे फूल की मानिन्द होना सबसे बेहतर है,
ज़रूरत जब पड़े बारूद में तब्दील हो जाओ।

 

(2)
हाय क्या लिखना था मुझको और क्या लिखता रहा,
आज तक पत्थर सिफ़त को आईना लिखता रहा।

लोग सूरज के क़सीदे लिख के शोहरत पा गये,
और मै बुझते दिओं का मर्सिया लिखता रहा।

यार हम दोनों हुए है एक साज़िश के शिकार,
अब ये बेमानी है किसको कौन क्या लिखता रहा।

उम्र भर ढोते हुए बेजान रिश्तों की सलीब,
दिल के कागज पर मैं तफ़्सीरे वफ़ा लिखता रहा।

सबके हाथों में कलम थे सबके अपने नज़रियात,
एक ‘माहिर’ या बअन्दाज़े जुदा लिखता रहा।

 

(3)
जगती आँखें देख रही हैं कितने प्यारे प्यारे ख़्वाब,
नीदों पर क़ब्ज़ा कर बैठे कमसिन और केंवारे ख़्वाब।

यह मलबूस पुराने हो गये लेकिन रंग नहीं उतरा,
तेरे इश्क में जो पहने थे अब तक नहीं उतारे ख़्वाब।

आते हैं ताबीर माँगने रोज़ कहाँ तक दूँ इनको,
जब भी देखो दर पे खड़े है अपने हाथ पसारे ख़्वाब।

लाख मना करता हूँ इनको लेकिन बाज़ नहीं आती,
फिर देखेंगी पागल आँखे फिर टूटेगे सारे ख़्वाब।

क़ातिल तो हम सब ठहरेंगे अपने अपने ख़्वाबों के,
बस इतना ही देखना होगा किसने कितने मारे ख़्वाब।

तुम आकर तरतीब से रख दो इतनी गुज़ारिश है तुमसे,
दिल के कमरे में रखे हैं बेतरतीब हमारे ख़्वाब।

दुनिया जिनकी मुट्ठी में है ऐसे भी हैं लोग यहाँ,
अपनी पहुँच से सब बाहर है रोटी, चाँद, सितारे, ख़्वाब।

इतना भरोसा क्यों करते हो ‘माहिर’ तुम इन ख़्वाबों पर,
हमको तो ऐसे लगते हैं जैसे हों गुब्बारे ख़्वाब।

 

(4)
कब कहा मैंने बड़े नाज़ से पाला जाऊँ,
हाँ मगर ये भी न हो घर से निकाला जाऊँ।

मैं कबूतर हूँ बता मेरा ठिकाना है कहाँ,
किसी मस्जिद में रहूँ या कि शिवाला जाऊँ।

मुझमें कुछ फिक्र के मोती भी निकल सकते हैं,
शर्त ये है कि सलीके से खंगाला जाऊँ।

वक़्त के चाक पे रक्खी हुई मिट्टी हूँ अभी,
जाने किसी शक्ल में किस रूप में ढाला जाऊँ।

डूबना तय है मेरा फिर भी ऐ दुनिया वालो,
मेरी कोशिश है तुम्हे दे के उजाला जाऊँ।

है दुआ कूबते परवाज़ हो अपनी माहिर,
किसी सिक्के की तरह मैं न उछाला जाऊँ।

 

(5)
फूल की बातें अलग खुशबू की बानी और है,
एक कहानी के पसे पर्दा कहानी और है।

थरथराते लब झुकी पलकें हया से सुर्ख गाल,
सिर्फ ख़ामोशी नहीं ये बेज़बानी और है।

यूँ तो अपने मुल्क में फिरते है कितने नवजवाँ,
सरहदों पर काम आये वो जवानी और है।

जन की बुनियाद पर भी हुक्म चलता है मगर,
जिस्मों जाँ पर और दिलपर हुक्मरानी और है।

ज़िन्दगी तो जैसी भी हो कट ही जाती है जनाब,
घुट के जीना और लुत्फे ज़िंदगानी और है।

एक इक कतरा है अपने आप में एक दास्ताँ,
चश्मेतर से जो छलकता है वो पानी और है।

संपर्क : 9005775632


2 thoughts on “पाँच ग़ज़लें / इल्तिफ़ात माहिर”

  1. पढ़ते हुए बहुत अच्छी लगी ये ग़ज़लें। ग़ज़लें कहने में इल्तिफ़ात माहिर को इल्म जैसे विरासत में मिली है। मैं इन्हें पहली बार पढ़ रहा हूं।
    नया पथ जब से आनॅलाइन आया है, तब से देख पा रहा हूं इसे। वरना इसकी एक प्रति कभी आपके हाथों से नहीं मिली। मुझे दिल्ली जनवादी लेखक संघ का महासचिव तो बना देते थे लेकिन यह नहीं कहते थे कि जनवादी लेखक संघ की यह पत्रिका भी पढ़ा करें। खैर।

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  2. शानदार गजलें.इनमें समय,समाज और रिश्तों के कटु यथार्थ की ईमानदार अभिव्यक्ति हुई है.

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