ग्राउंड ज़ीरो / समीना ख़ान


“अब क्लॉड की हिम्मत जवाब दे चुकी है। उसने तो सिर्फ़ चंद देशों की जंगों का जायज़ा लिया है। अभी सारी दुनिया की ग़रीबी, बेरोज़गारी, बीमारी, क्राइम और माइग्रेशन जैसे मामलों पर होने वाली मौतों का वह गुमान नहीं कर सकता। वह सोच रहा है कि जितना हमें इंसान होकर इंसानियत की तरफ़ बढ़ना चाहिए था, उतना ही हम हैवान होकर हैवानियत की तरफ कैसे बढ़ते गए। उसने खुद से सवाल किया- ‘यूनाइटेड नेशन बनने के बावजूद ये पूरी धरती ग्राउंड ज़ीरो में कैसे बदल गई?’ “—यह महज़ संयोग है कि लंबे समय से जिस कहानी का प्रकाशन लंबित था, वह आज आपके सामने पहुँची है जब पूरी दुनिया वेनेजुएला पर अमरीकी साम्राज्यवाद के हमले से स्तब्ध और क्षुब्ध है। समीना ख़ान का यह कथा-प्रयोग क्लाड ईथरली के बहाने जंग, भुखमरी, कुपोषण और तमामतर ना-इंसाफ़ियों की पिछले अस्सी सालों में हुई बढ़त पर एक तीखी टिप्पणी है।

 

देवताओं के राजा ज़्युस की अदालत ने प्रोमेथियस को गुनहगार ठहराया और उसके लिए ख़तरनाक सज़ा का चुनाव किया। प्रोमेथियस ग्रीक पौराणिक कथाओं का एक किरदार है, इससे जुड़ी कई कहानियों में से एक यह है कि उसने देवताओं से आग चुराई और इसे मनुष्यों को दिया।

कहते हैं कि एक बार पौराणिक ग्रीक देवताओं ने इंसानों से नाराज़ होकर उन्हें सज़ा देने का फ़ैसला किया। इंसानों को सज़ा देने के लिए उन्होंने जिस हथियार को चुना, वह ठंड थी। प्रोमेथियस ने जब यह जाना तो उसे मानवता से हमदर्दी हुई। हमदर्दी के इस जज़्बे ने उसे इंसानों की मदद के लिए राज़ी कर लिया और उसने आग चुराकर मानवता के हवाले कर दी। इस उम्मीद से कि जब ग्रीक देवता उन्हें ठंड का अज़ाब दें तो वह अपनी हिफाज़त आग से कर सकें।

प्रोमेथियस का गुनाह यह था कि उसने मानवता को बचाने की कोशिश की थी। इस कोशिश में उसने आग की चोरी की। वही आग जो ग्रीक मिथक में पवित्र मानी जाती थी, इतनी कि उसकी पूजा की जाती।

प्रोमेथियस का राज़ फ़ाश हो चुका था। देवता उससे सख्त नाराज़ हुए। प्रोमेथियस की यह चोरी ज़्युस की अदालत में न माफ़ किया जाने वाला गुनाह थी। यह सजा उसे एक ऐसी ज़िंदगी की शक्ल में दी गई जिसमें उसे हर पल मरना था। ज़्युस ने उसे एक पहाड़ी पर ज़ंजीरों से बंधवा दिया और यहां एक चील हर दिन उसका कलेजा नोचती थी। 

ज़्युस का मानना था कि इंसान इस आग से तकनीकी कामयाबियां हासिल करने की राह पर दौड़ पड़ेगा। एक ऐसी राह जिसमें मौत, तबाही और ज़ुल्म के कारनामे नित नए कीर्तिमान रचेंगे। शायद इसीलिए ज़्युस ने प्रोमेथियस के लिए भी एक कभी न ख़त्म होने वाले दर्द की सजा चुनी थी।

क्या मानवता को बचाने के लिए प्रोमेथियस के पास और कोई रास्ता नहीं था? क्या उस ग्रीक काल में संवाद की कोई गुंजाइश थी और क्या वह ज़्युस को संवाद के लिए राज़ी कर सकता था? इस बात की भी कितनी ही उम्मीद थी कि अगर ज़्युस बातचीत के लिए राज़ी हो जाता तो प्रोमेथियस उसे मानवता को बचाने की दलील के लिए क़ायल कर सकता था?

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क्लॉड ईथरली की रूह मौत के बाद भी छटपटा रही थी। ‘वार हीरो’ के तमग़े का दाग़ वह अपनी रूह पर महसूस करता था और उसकी बेचैनी इसे हटाए बिना ख़त्म नहीं होने वाली थी। क्लॉड को उसके ज़मीर की अदालत ने गुनहगार ठहराया था। बेदाग़ होने के लिए जीते जी किया गया क्लॉड का हर जतन नाकाम हो चुका था। जिस्म से छुटकारा मिलने के बाद भी उसकी रूह एक गुनाह के शिकंजे में थी। बरसों पहले किए गए गुनाह के बोझ से अभी भी क्लॉड का दम घुट रहा था।

क्लॉड ईथरली को तलाश थी एक ऐसे ही ग्राउंड ज़ीरो की जो उसे गुनाह की माफ़ी का मौक़ा दे सके। 06 अगस्त 1945 से शायद ही कोई ऐसा दिन गुज़रा होगा जब क्लॉड ने खुद को धिक्कारा न हो। क्लॉड की उनसठ बरस की ज़िंदगी का वह एक मनहूस दिन जो मौत के बाद भी उसे सुकून का एक पल न दे सका। यह वही तारीख़  थी जब एक जीता हुआ फ़ौजी, इंसानियत हार गया था। अनजाने में ही सही मगर उसके हाथों गुनाह तो हुआ था। वही गुनाह जिसे उसके बाक़ी नवासी साथियों ने अनजाने में हुई ग़लती मान लिया था। एक उसके अलावा उन सभी को सुकून भी आ गया था। उन सभी के पास अपने सुकून के बचाव के लिए दलीलें भी थीं। ‘…अगर हम न करते तो कोई और इस काम को अंजाम देता।’ या फिर ‘…हमसे जो काम लिया गया उसकी तो हमें ख़बर ही नहीं थी।’ और सबसे ठोस दलील- ‘…हम तो ड्यूटी पर थे, अपना फ़र्ज़ अदा कर रहे थे।’

आज भी क्लॉड को उस जगह की तलाश है जहां हैवानियत को नेस्तनाबूद करके इंसानियत की मिसाल देता ग्राउंड ज़ीरो बना सके। इस बार भी वह एक बम गिराना चाहता है। इंसानियत को बचाने की ख़ातिर। यही एक ख़्वाहिश उसकी झुलसती रूह में आज भी हरी-भरी मौजूद है। वह ऐसे ही हैवानों की आबादी को नेस्तनाबूद करने के लिए बरसों से भटक रहा था। यह जानते हुए भी कि उसकी रूह शायद अब कोई बम न फेंक सकेगी मगर उसकी चाहत थी कि अब हिरोशिमा जैसी इंसानियत की ख़ातिर कोई और ग्राउंड ज़ीरो न बने।

जीते जी तिल-तिल कर मरना और मर जाने के बाद रूह की छटपटाहट। इस तकलीफ से निजात पाने के लिए उसने खुद को एक कफ़्फ़ारे की तलाश में भटकाया। उसे नहीं मालूम था कि कफ़्फ़ारे की यह चाहत उससे धरती के बेशुमार चक्कर लगवा देगी। इन चक्करों को गिने जाने का कोई मतलब नहीं था। मतलब तो चक्कर लगाने की रफ़्तार का भी नहीं था। मतलब था तो सिर्फ़ इतना कि दिमाग़ की आंधियों की रफ़्तार को कुचल सके और इसी झोंक में ईथरली दुनिया के अंधाधुंध चक्कर लगाता गया, लगाता गया, तब तक जब तक दिमाग़ की आंधी और रूह की रफ़्तार ने उसे बुरी तरह पस्त नहीं कर दिया। इस थकान के बाद उसने खुद को उसी ग्राउंड ज़ीरो के पास लाकर पटक दिया। जानता था कि उसका कफ़्फ़ारा अभी पूरा नहीं हुआ है। उसे तो यह भी नहीं पता था कि अभी उसे कितना और भटकना है?

क्लॉड उस दिन को कैसे भूल सकता था? वह उन नब्बे लोगों की टीम का एक मेंबर था जिसने 6 अगस्त 1945 को हिरोशिमा को भस्म कर दिया था। उसने हिरोशिमा के ऊपर जहाज़ से मौसम का जायज़ा लेने के बाद रिपोर्ट भेजी थी कि मौसम साफ़ है। बम गिराया जा सकता है। पायलट ने अपने फ़र्ज़ को अंजाम देते हुए कई बम गिराए थे, मगर यह एटम बम था, जिसकी जानकारी इनमें से किसी को भी नहीं थी।

बी-29 बम गिर चुका था। धमाके के असर से बचता हुआ जहाज़ एक तेज़ रौशनी की चपेट में आया। जहाज़ के अंदरूनी हिस्से में एक ज़ोरदार चमक भर गई। यह रौशनी इतनी तेज़ थी कि कुछ हवाबाजों को लम्हा भर के लिए लगा कि वे अंधे हो गए हैं। इस टीम ने अपने मुंह में एक अजीब धातु जैसा स्वाद महसूस किया। जहाज़ ने तीन शॉक वेव झेली थीं। ये लहरें इतनी ताक़त समेटे थीं कि जहाज़ की एल्युमिनियम बॉडी भी अपना काबू खोकर हिलने को मजबूर हो गई थी। नीचे देखने पर उन्हें शहर की जगह एक आग का गोला फूटता नज़र आया था। पायलट जनरल पॉल डब्ल्यू टिब्बेट्स जूनियर ने ‘एनोला गे’ नाम के बी-29 विमान से हिरोशिमा पर जो बम गिराया था, उसे “लिटिल बॉय” कहते थे।

इथरली भूला नहीं था कि हिरोशिमा पर बम गिराने वाला जहाज़ करीब साढ़े नौ हज़ार मीटर की ऊंचाई पर था। बम हिरोशिमा से महज़ छह सौ मीटर की ऊंचाई पर फटा था। बॉम्बर मेजर थॉमस फेरेबी ने एक मिनट से भी कम वक़्त में बम गिराने का काम अंजाम दिया था। बम की टकराहट से पैदा होने वाली शॉक वेव पर पायलट ने भी मुड़कर देखा था। धमाके और चमक के बाद अब यहां मशरूम जैसे धुंए ने शहर को घेर लिया था। इस एवेंजर टीम ने शहर के इस हिस्से को ग्राउंड ज़ीरो बना दिया था। कुछ ही मिनटों के अंदर इस ग्राउंड ज़ीरो के एक मील अंदर की हर तामीर नेस्तनाबूद हो गई थी। ग्राउंड ज़ीरो से बारह मील दूर तक कांच चकनाचूर हो गए थे। ग्राउंड ज़ीरो से आधा मील की दूरी पर मौजूद दस में से नौ लोग मर गए थे। इस जगह का टेम्प्रेचर चार हज़ार डिग्री सेंटीग्रेट पार कर चुका था। खंडहर बन चुके हिरोशिमा के बीच ‘ए-बम-डोम’ की विरासत इस टीम की कारगुज़ारी थी।

हिरोशिमा पर एटम बम गिराने के मिशन पर उड़ान भरने वाले अमरीकी हवाबाज़, मानव युद्ध के इतिहास की सबसे बड़ी तबाही के गवाह बने इस मंज़र को देख रहे थे। मशरूम की शक्ल का आग का गोला जहां ऊपर बढ़ता नज़र आ रहा था, वहीं जमीन पर यह पूरे एक शहर को निगल रहा था। कई रंगों की रोशनियां लिए चमकीली मौत शहरियों की ज़िंदगी स्वाहा करती जा रही थी और जिन्हें बचना था, उनकी ज़िंदगी को मौत से बदतर बनाती जा रही थी। सिर्फ़ उनकी ही ज़िंदगी नहीं, उनकी आने वाली नस्लें भी इस आग के अज़ाब में झुलसने को श्रापित थीं।

उस दिन आठ बजकर सोलह मिनट पर रेडियो और टेलीग्राफ की सर्विस बंद हो गई थी। ख़ुद जापानियों को भी ख़बर नहीं थी कि क्या हुआ है। जानकारी के लिए जापानी आलाकमान ने अपने एक अफ़सर को भेजा था। इस पायलट ने जायज़ा लेने के लिए परवाज़ की और जब वह इस शहर से क़रीब सौ मील दूर था, उसने शहर के ऊपर धुंए का एक शहर देखा।

धमाके के एक महीने बाद रेडिएशन से होने वाली मौतें उरूज पर थीं और अगले एक महीने तक ऐसे ही हालात बने रहे। उस वक़्त हमले में मरने वालों की सही गिनती नहीं पता चल सकी थी मगर एक अंदाज़ा था कि हमले के वक़्त करीब सत्तर हज़ार लोगों की जाने गईं थी। साल ख़त्म होते-होते ये गिनती एक लाख पहुंचने की ख़बरें आ रही थीं। रेडिएशन ने जो तबाही मचाई थी, उसने अगले पांच बरसों में इस आंकड़े को दो लाख पहुंचा दिया था। बची हुई ज़्यादातर ज़िंदगियां, मौत से बदतर थीं। हमले के वक़्त हिरोशिमा की आबादी लगभग तीन लाख थी। इसी शहर में एक ख़ास फौजी सेंटर बना था जिसमे हादसे के वक़्त तक़रीबन 43 हज़ार फौजी मौजूद थे।

क्लॉड अपनी इस करतूत के बारे में सोचता जाता और खुद से उसकी नफ़रत बढ़ती जाती। इस ग़म को हल्का करने का क्लॉड ने हर जतन कर डाला था। इन कोशिशों ने हिरोशिमा पायलट को ‘एंटी न्यूक्लियर प्रोटेस्ट’ का प्रतीक बना दिया। क्लॉड ईथरली ने इस पहले एटम बम धमाके में अपने किरदार का जायज़ा लिया। अपने ज़मीर की अदालत में अपनी कारगुज़ारी के लिए उसने खुद को गुनहगार ठहराया। इस गुनाह की कोई भी सज़ा वह चुन नहीं पा रहा था। मगर पश्चाताप की सनक बढ़ती जा रही थी। ख़ुद को सज़ा देने की कोशिशों में उसके दिन बीतने लगे। लेकिन दुनिया के लिए वह वार हीरो था। कई बरस तक छोटे-मोटे गुनाहों के लिए गिरफ़्तार होने के बाद वह एक हाई-प्रोफ़ाइल एंटी न्यूक्लियर एक्टिविस्ट बन गया।

क्लॉड ईथरली जब तक ज़िंदा रहा, किसी न किसी गुनाह को अंजाम देता रहा। इस ख्वाहिश के साथ कि कोई उसे गिरफ़्तार करे। मगर वॉर हीरो होना उसके लिए अज़ाब बन चुका था।

उसने अपनी कमाई जख्मियों के मुआवज़े पर लगानी शुरू कर दी थी। लेकिन उसकी मौत के बाद ये सिलसिला भी बंद हो गया। ज़िंदा रहकर वह जो भलाई कर सकता था, अब उसकी भी गुंजाइश नहीं बची थी। मौत ने उसके गुनाह करते हुए पकड़े जाने और सज़ा दिए जाने की उम्मीद भी ख़त्म कर दी थी। इस मौत ने उसकी दलिद्दरी का चोला भी उतार दिया था। क्लॉड की बेचैन रूह ख़ुद को थका देने की हद तक भटक रही थी। भटकने और ठहरने का यह सिलसिला कभी उससे अनगिनत चक्कर लगवाता और कभी उसे हिरोशिमा के इर्द गिर्द भटकने को मजबूर करता। इस घनचक्करी से उकता जाने के बाद वह बेहरकत-सा किसी वीराने में पड़ जाता। इन्हीं हालात में कभी दिन, कभी महीने, कभी साल और अब तो दशक बीतने  लगे थे।

क्लॉड की रूह ने कुछ बरसों से झिलमिलाते हिरोशिमा के क़रीब एक वीराने में खुद को समेट लिया था। शहर की इन रोशनियों में उसने धमाके की चमक को धुंधलाने की बहुत कोशिश की मगर नाकाम रहा। वह गर्दन झुकाए बैठा था। उसकी दोहरी ठुड्डी के बीच का गड्ढा और जड़ीला हो गया था। हजामत किए चेहरे पर दोनों भवों के बीच बनी लकीरें उस जगह पर हमेशा के लिए जम गई थीं।

बम फेंके जाने के वक़्त उसकी उम्र 26 बरस थी और तभी तक उसके चेहरे पर मुस्कराहट और जुस्तजू के साथ कुछ खिलंदड़ा अंदाज़ हुआ करता था, जिसे उसकी चंचल आंखें और भी घना कर देतीं। मगर इस हादसे ने उसके चेहरे के नक़्शे को बदल दिया था। मज़ाकिया होंठ तनाव की हालत में सध गए थे। चंचल आंखें ग़मगीन होकर पथरा गई थीं। हिरोशिमा का वॉर हीरो क्लॉड ईथरली, हिरोशिमा के पास एक वीराने में बनी मुंडेर पर ऐसे बैठा था कि जांघों ने कोहनियों को सहारा दे दिया था मगर उसका सिर ज़मीन की तरफ झुका हुआ था। किसी को न नज़र आने वाला क्लॉड सबको देख सकता था। कोई उसे सुन नहीं पाता मगर वह सबकुछ सुन रहा था।

कई बरस हुए क्लॉड ने दुनिया के चक्कर लगाना छोड़ दिया था। हिरोशिमा को झिलमिलाते देखता तो हर दिन उसका यक़ीन बढ़ता जाता कि अब दुनिया बहुत खुशहाल और तहज़ीब वाली हो चुकी है। दुनिया की इस खुशहाली के ख़याल के पीछे एक और वजह थी। इतिहास के पन्ने उसके दिमाग़ में पलटने लगे थे। उसे याद आया कि दूसरे विश्व युद्ध के बाद 1949 में जर्मनी का बंटवारा हो गया था। हार के बाद मित्र देशों ने जर्मनी का क़ब्ज़ा- सोवियत, अमरीका, ब्रिटेन और फ्रांस के हवाले कर दिया था। शीत युद्ध के दौरान हुआ ये बंटवारा क़रीब चार दशक बाद नहीं रहा। इस दिन पूर्वी जर्मनी के साथ पश्चिमी जर्मनी फिर से एक हो गए थे। उसे याद आया, तमाम सियासी उठापटक के बीच 9 नवंबर, 1989 को बर्लिन की दीवार गिर गई, जिसने दोनों जर्मन स्टेट के एक होने का रास्ता मज़बूत कर दिया था। 3 अक्टूबर, 1990 को, पूर्वी जर्मनी के पश्चिमी जर्मनी में औपचारिक रूप से विलय ने बंटे हुए जर्मनी को फिर एक कर दिया था।

जर्मनी का बिखरकर फिर से एक हो जाना और जापान की झिलमिलाहट, ये दो ऐसी घटनाएं थीं जो उसे यक़ीन दिलाने लगी थी कि दुनिया इंसानियत की राह पर चल निकली है। उसे लगने लगा था कि सल्तनतों ने शान्ति का रास्ता चुन लिया है। उसने यक़ीन कर लिया था कि शांति का दौर शुरू हो चुका है। सभी मज़े में हैं। किसी को कोई ग़म नहीं। बस एक उसका ही ग़म ऐसा है जो उसका पीछा ही नहीं छोड़ रहा।

इन दोनों घटनाओं और खुशहाली के ख़याल ने उसे जर्मन-यहूदी फिलॉस्फर और एंटी न्यूक्लियर एक्टिविस्ट गुंथर एंडर्स की याद दिला दी। एंडर्स वह हस्ती था जिसने ईथरली के जुर्म के एहसास को समझा था। जुर्म के इस एहसास में उसे इंसानियत को बचाने वाली उम्मीद की किरण नज़र आई थी। यह उन्नीस सौ साठ की दहाई का आख़िरी बरस था जब एंडर्स ने उसे चिट्ठी लिखी थी।

क्लॉड ने मान लिया था कि एंडर्स की ‘प्रोमेथियन गैप’ थ्योरी महज़ एक बोगस पड़ताल नहीं थी। एंडर्स ने संवाद को चुना था। एंडर्स अटॉमिक हथियारों के ख़ात्मे की बात कर रहे थे। इसके लिए वह उस राजनीतिक हौसले को पैदा करने की कोशिश में जुटे थे जहां ईथरली का सन्देश दुनिया को सुलह और शांति की राह दिखाएगा।

ईथरली ने इस ख़याल के साथ मुस्कुराना चाहा तो पाया कि उसके चेहरे का नक्शा उसके दुखों वाले खांचे में इतना जम चुका है कि अब मुस्कुरा पाना मुमकिन नहीं। उसे न मुस्कुरा पाने का क़तई दुख नहीं हुआ। उसने सोचा कि क्या यह कम बड़ी बात थी कि उसकी दिमाग़ी हालत को जब पागलपन करार दिया गया था और उसे पागलख़ाने भेजकर उसका इलाज कराया जा रहा था, उस समय में एक फिलॉस्फर गुंथर एंडर्स ने उसकी कैफ़ियत को जाना और उसके जज़्बे से दुनिया को शांति का संदेश देना चाहा था।

‘आह!’ पागलख़ाने की याद उसकी टीस को बढ़ा गई। क्लॉड को एहसास था कि जिस्म बीमार हो सकता है मगर रूह नहीं। क्लॉड का जिस्म बीमार नहीं था। उसका दिमाग़ बिलकुल ठीक था। जिस बीमारी के लिए उसे पागलख़ाने में डाला गया था, वह मरने के बाद भी उसके साथ थी। उसकी यह बेचैनी उसकी रूह का हिस्सा थी। मगर अब वह ये बात टेक्सास रियासत के उन डाक्टरों को नहीं बता सकता था जिन्होंने उसे चार साल तक पागलख़ाने में रखा था और फिर भी उसकी दिमाग़ी हालत को दुरुस्त नहीं कर सके थे।

क्लॉड को टेक्सास के उस अस्पताल की याद आई तो उसने एक बार फिर से अमरीका जाने का फ़ैसला किया। हमेशा की तरह भटकने की खवाहिश भी सिर उठाए खड़ी नज़र आई। उसे याद नहीं कि कब, मगर बहुत बरस पहले उसने तय किया था कि खुद को भटकने से बचा लेगा। रूह के थकने का सवाल ही नहीं था मगर बेतहाशा भटकना उसे बोझिल कर जाता था। सुकून की तलाश फिर भी अधूरी रह जाती। हिरोशिमा में डेरा डाले उसे ज़माना गुज़र गया था। वह उन घटनों को याद नहीं करना चाहता था जिन दिनों उसने सफ़र पर विराम लगाया था। इस बार उसने तय किया था कि यह सफ़र धरती का जायज़ा लेते हुए करना है। एक मंसूबे के तहत नक्शा बनाकर। जिसमें कई शहरों के ऊपर से गुज़रा जा सके और उनके हालात को महसूस किया जा सके। ईथरली ने अपने दिमाग़ में इस सफ़र के लिए बड़े से बड़ा नक्शा बनाना शुरू कर दिया।

उसकी रूटिंग कभी उसे हिरोशिमा से ऑस्ट्रेलिया के रुख पर ले जाती तो कभी उसे लगता कि इस सफ़र के लिए वाया रूस गुज़रा जाए। अचानक उसे ख़याल आया कि रूस जाते हुए वह भारत को नहीं देख पाएगा। इसका हल निकालने के लिए क्लॉड ने ज़िग-ज़ैग नक़्शे की तिकड़म पर गौर किया। उसका दिमाग़ एक अवेंजर की तरह काम करने लगा था। हिरोशिमा से शुरू होने वाले इस सफ़र को अगर वह नार्थ और साउथ पोल के रास्ते तय करेगा तो इस बहाने धरती का बहुत बड़ा हिस्सा देखने के साथ अच्छा ख़ासा वक़्त भी खपा सकेगा। इस ख़याल ने ईथरली को हरकत में ला दिया। ख़याली वर्ड मैप पर उसकी रूटिंग रेंगने लगी थी। जापान से आस्ट्रेलिया होते हुए साउथ पोल और और अगली सुबह भारत और रूस होते हुए नार्थ पोल। यहां से वापसी के लिए उसने स्कैंडिनेवियन कंट्रीज़ के ऊपर से गुज़रने का इरादा किया। क्लॉड नॉर्वे के सागर देखने से महरूम नहीं रहना चाहता था, इसलिए उसने तय किया कि नार्थ पोल पर अगर दिल चाहेगा तो कुछ रुक लेने में बुराई नहीं। वह मन ही मन ग्रीनलैंड तक जाने के बारे में सोचता रहा। नार्थ पोल की बर्फीली वादियों को कुछ समय ठहरकर निहारने का वक़्त उसने शेड्यूल में रखा और साऊथ अफ्रीका आने के लिए अफ़्रीकी मुल्कों के नाम याद करने लगा। ईथरली सोच रहा था कि ज़रूरी नहीं है कि वह ज़िग-ज़ैग नियम पर ही डटा रहे। उसे लगा कि सफ़र में अपनी मुनासिबत को अहमियत देगा। जहां चाहेगा वहां ठहरेगा, जहां चाहेगा वहां से कूच कर जाएगा और अगर किसी जगह उसे रुकने में दिलचस्पी महसूस हुई तो ज़रूर रुकेगा। अपने इस नक़्शे को उसने खुद ही मंज़ूरी दी और फिर धरती के अलग-अलग हिस्सों का गुमान करना शुरू कर दिया। इन सोचों के बीच उसे यह ख़याल भी आया कि पता नहीं अब नक्शा वैसा ही है जैसा उसे याद था। कभी वह सोचता कि मुमकिन है कि कुछ सरहदें मिट गई हों और कभी उसे लगता कि शायद सारी सरहदें मिट गई हों। क्लॉड को अच्छा लगा कि इस सफ़र के लिए उसे एक टास्क मिल गया है।

ख़यालात की नई खेप उसके दिमाग़ में दस्तक देने लगी। अंटार्टिका के सुदूर तक तैरता क्लॉड अथाह सागर को देख रहा था और सोच रहा था कि इस सागर ने अपना एक तिहाई हिस्सा खुश्की को दे दिया है। उसे लगा कि ज़मीन पर रहने वालों ने शायद मान लिया है कि उन्हें मिली ज़मीन पानी की खैरात भर है। हर इंसान को अपनी गिनती की सांसें इस धरती पर गुज़ारनी है। धूल का एक ज़र्रा भी उसकी मिलकियत नहीं हो सकता।

फिर नए ख़याल का हमला हुआ। ज़ेहन में मौजूद पुराने नक़्शे के हवाले से वह अपने रिहायशी इलाक़े की तरफ बढ़ने लगा। ईथरली सोचने लगा कि वह कनाडा होते हुए अमरीका पहुंचे या अर्जेंटाइना होते हुए वेनेज़ुएला के रास्ते मैक्सिको में दाख़िल हो और फिर अमरीका के टेक्सास का रुख करे? अचानक उसे ख़याल आया कि अमरीका के इस रास्ते में पेंटागन पड़ेगा। वही पेंटागन जो अमरिकी डिफेन्स का हेडक़्वार्टर है। हालांकि ये दूसरी आलमी जंग के बाद बना था मगर क्लॉड इसे देखना भी पसंद नहीं करता था। क्लॉड ने तय कर लिया था कि पेंटागन से गुज़रने के बजाए वह अपना रास्ता बदल देगा।

एक सैलानी के रूप में क्लॉड ने खुद को तैयार कर लिया था। यह बात भी उसको राहत दे रही थी कि इस सफ़र में जुनून की जगह जुस्तजू उसके साथ होगी। अरसे बाद दुनिया और दुनियादारी देखने की चाहत उसे भली लगी। उसे अच्छा लग रहा था कि इस बार वह किसी रॉकेट की परिक्रमा जैसा सफ़र नहीं करेगा। दिन-रात और मौसमों से बेअसर क्लॉड इस सफ़र को लेकर पूरे जोश में था। इस बार वह इस बात पर क़ायम था कि दिन में उसे सफ़र करना है और रात को उसने ठहरने का इरादा किया। हमेशा की तरह इस बार भी क्लॉड ने इस घनचक्करी से वापसी का कोई वक़्त मुक़र्रर नहीं किया था।

ईथरली को इंतजार था जापान में उगने वाले सूरज की उस पहली किरण का जिसके साथ वह अपने वर्ल्ड टूर का आग़ाज़ करेगा। इस टूर में वह इस धरती का चक्कर लगाने के लिए एक पोल से दूसरे तक सफ़र करेगा। मुक़र्रर वक़्त पर ईथरली ने अपना सफ़र शुरू कर दिया। वाया आस्ट्रेलिया वह साऊथ पोल पर आकर ठहर चुका था। रास्ते के ख़ूबसूरत नज़ारे हमेशा की तरह आज भी थे मगर क्लॉड को उनकी दिलकशी से कोई मतलब नहीं था। नदी, पहाड़, झरने, सागर, सेहरा, हरी-भरी वादियां और बर्फीली घाटियां उसे अपनी ख़ूबसूरती में उलझाने में नाकामयाब रहीं। इन नज़ारों से वह निगाहें नहीं फेर सकता था मगर इनपर मोहित भी नहीं हो पा रहा था, जैसा कभी हो जाया करता होगा। अगर कभी हुआ भी था तो वह इसे याद नहीं करना चाहता था। उसे तो बस इतना याद रह गया था कि उसकी पूरी सत्तर साल की ज़िंदगी पर ‘वह’ एक दिन ऐसा हावी हुआ कि मरकर भी इससे छुटकारा न पा सका।

अब अगले दिन उसे हिन्दुस्तान से गुज़रते हुए नार्थ पोल तक का सफ़र करना है। ईथरली के दिमाग़ में हिन्दुस्तान से जुड़ी यादें घुमड़ने लगीं। हिरोशिमा धमाके के दो बरस बाद इस मुल्क ने भी अंग्रेज़ों की ग़ुलामी से आज़ादी हासिल कर ली थी। क्लॉड इस आज़ादी की चुकाई गई क़ीमतों से बख़ूबी वाक़िफ़ था। उसे याद था कि इस सोने की चिड़िया को कैसे अंग्रेज़ों ने लूटा था। उसे पकिस्तान का बंटवारा और बंगलादेश का अलग किया जाना भी याद था। इन बंटवारों में बेगुनाह मरनेवालों की ख़बरों को भी उसने पढ़ा था। क्लॉड के ज़ेहन में बंटवारा और बंटवारे को ख़त्म करने वाले जर्मनी का ख़याल आया। उसने सोचा, मुमकिन है कि इस अरसे में हिंदुस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश फिर से एक हो गए हों। उसे यक़ीन होने लगा था कि इन तीनों मुल्कों को ज़रूर इस बात का एहसास हुआ होगा कि उनके पुरखों ने जो ग़लती की थी, उसका कफ़्फ़ारा यही होना चाहिए कि यह मुल्क एक बार फिर से एक हो जाएं। अब क्लॉड की जुस्तुजू ने नए सवालों को जन्म देना शुरू कर दिया। वह जानना चाहता था कि इन तीनों में से किसने इस बात की पहल की होगी कि तीनों मुल्कों के एक हो जाने का सौदा ही सबसे किफ़ायती हल है। उसे अच्छा लगा कि सुबह के सफ़र के लिए उसके पास एक और असाइनमेंट है। इन सवालों के जवाब में उसने महसूस किया कि जंगों और बंटवारों से ऊब चुकी दुनिया ने धरती की मरम्मत का हल निकाल लिया होगा। एक बार फिर वह उस सफ़र की जुस्तुजू में गुम हो गया जिसमें वह मानवता के असल उजाले के दर्शन कर सके।

दूसरे दिन का सफ़र मुकम्मल हुआ और ईथरली आर्कटिक ओशन के नॉर्थ पोल पर पहुंच गया। यहां तक के सफ़र ने उसे दुख से निढाल कर दिया था। वह बहुत उदास था। रातभर के सारे ख़याल ग़लत साबित हुए। इस सफ़र में उसने रूस और यूक्रेन के ऐसे नज़ारे देखे जिनको देखकर उसने अपनी रूह को किसी कांटों भरे सफ़र से गुज़रता महसूस किया। ईथरली की लहूलुहान रूह इस बात को मान ही नहीं कर पा रही थी कि दुनिया अभी भी जंगों में यक़ीन करती है। उसे तो हिन्दुस्तान, पकिस्तान और बांग्लादेश के अभी तक एक न हो पाने का ग़म ही बहुत बड़ा लग रहा था, मगर रूस और यूक्रेन की जंग से होने वाली इंसानियत की दुर्गति ने उसे हिला दिया।

इस सफ़र के मंज़र उसके दिमाग़ में कौंध रहे हैं। आज़ादी मिले इतना अरसा गुज़रा मगर सोने की चिड़िया की बदहाल तरक़्क़ी से वह मुतमइन नहीं हो पा रहा है। पिछली रात के उसके सवाल बदल गए। नए सवालों में सबसे बड़ा जो सवाल उसके आगे है, वह यह कि जब हिरोशिमा एटम बम झेल कर इतना पनप चुका है तो उसके मुक़ाबले में हिन्दुस्तान कुछ ज़्यादा पीछे क्यों रह गया। इस पड़ताल वाली गश्त में धरती के लोगों के हाथ में मौजूद मोबाइल को पहचानने में उसे ज़्यादा वक़्त नहीं लगा। उसकी ज़िंदगी में ही अमरीका ने इसे ईजाद कर लिया था। क्लॉड देखता हुआ आ रहा था कि पूरा का पूरा देश इस स्मार्ट फ़ोन नाम के आले में ग़र्क़ था। वह बहुत सारे लोगों के पास से गुज़रा था। बड़े शहरों के साथ छोटे क़स्बों पर से उसने उड़ान भरी थी। ज़्यादातर को या शायद सभी को उसने अपने पसंदीदा स्क्रीन के साथ मदहोश पाया था।

आज के पड़ाव में उसके साथ जुस्तजू नहीं, भारीपन है। एक बार फिर उसने महसूस किया जैसे मानवता का कोई सिरा उसके हाथ से फिसलता हुआ दुनिया के इस छोर पर गुम होता जा रहा है। ईथरली दिल ही दिल में दुआ करने लगा। वह अपने वंशजों की एक ऐसी दुनिया देखने को क़तई तैयार नहीं था जैसी वह और उसके पुरखे बनाने में लगे थे। ख़ुद को दिलासा देने वाला ईथरली ख़ुद को कुछ अच्छी उम्मीदों से जोड़ने की कोशिश में जुटा रहा। उम्मीदों की इस जुटान को एक और ख़याल चूर करने लगा। इस ख़याल में वह अपनी रूह की जगह प्रोमेथियस का जिस्म देख रहा था।

ईथरली को अगले दिन के सफ़र का नक़्शा धुंधला होता महसूस हुआ। उसने सोचा कि क्या वह इस सफ़र को यहीं पर ख़त्म कर दे। मगर यह हल उसे अधूरे सफ़र की खलिश से जोड़ता लगा। बाक़ी दुनिया किन हालात में है, न चाहते हुए भी उसे यह जवाब हासिल करना ज़रूरी लगा। अगले सफ़र की इस बेज़ारी ने उसे पिछले दिनों जैसी प्रार्थनाओं से भी महरूम कर दिया था। फिर भी ईथरली ने तय किया कि वह इस सफ़र को जारी रखेगा। चाहे उसे अपने बनाए नक़्शे से भटकना ही पड़े मगर उसने दुनिया का चक्कर लगाने का अपना इरादा मज़बूत कर लिया।

यूरोप के ऊपर से गुज़रते हुए उसने अपना ध्यान मोबाईल पर लगाया तो पता चला कि पढ़ाई से लेकर कारोबार तक और दुनियादारी से लेकर घरदारी तक, सब इस आले की बदौलत चल रहा है। ईथरली सोचने लगा कि क्या उसके सवालों का जवाब भी इस आले से मिल सकेगा? अब वह इस आले को बारीकी से समझने के लिए इसके आस-पास मंडराने लगा। कुछ ही देर में ईथरली ग्रोक, एआई और जेमिनी जैसी उन ताक़तों से वाक़िफ़ हो गया जिससे इस दुनिया के लोग लगातार संवाद कर रहे हैं। उसके लिए यह बड़ी ख़बर थी कि इस छोटी-सी डिवाइस ने सारी दुनिया को आपस में जोड़ दिया है। अब कोई भी कहीं भी किसी से संपर्क कर सकता है और शायद हर जानकारी इस तिलिस्म वाली डिब्बी से हासिल की जा सकती है। उसने सोचा कि जब इस तरह से लोग एक दूसरे के संपर्क में हैं तो यक़ीनन धरती के बहुत सारे मसले भी हल हो गए होंगे। धरतीवासियों के संवाद का ये ज़रिया उसे बड़ा भला लगा।

तकनीक और इंसान के बीच के इस संवाद ने उसे हैरान नहीं किया मगर एक सवाल अब भी उसके ज़ेहन में चल रहा था। संवाद के इस रिश्ते में वह बस इतना जानना चाहता था कि तकनीक और इंसान के इस रिश्ते में बराबरी वाला इंसाफ़ है क्या? और अगर नहीं तो इनमें कौन मदारी है और कौन नाचने वाला जानवर?

अब क्लॉड इस यंत्र को पाना चाहता था। उसे अंदाज़ा हुआ कि शोरूम से लिया मोबाइल चलाना आसान नहीं होगा और चोरी का वह क़ायल नहीं। उसने तय किया कि वह पहले इसके बेसिक समझेगा और इसे हासिल करने के लिए न्यूनतम अनैतिक तरीक़ा अपनाएगा। थोड़ी देर में उसने एक स्मार्ट फ़ोन हासिल कर लिया। क्लॉड ने इसे इटली के शहर ट्यूरिन की एक पुलिस चौकी से चुराया था। यह किसी छोटे-मोटे जुर्म में लाए गए क़ैदी का फ़ोन है। इसका पासवर्ड भी क्लॉड को मालूम है और वह यह भी जानता है कि इसे कैसे चलाना है। मरने के बाद यह पहला मौक़ा होगा जब क्लॉड किसी से बात करेगा। उसे यही बहुत तसल्ली भरा लगा कि उसके सवालों का जवाब इंसान न सही, इंसान की बनाई मशीन देगी।

फ़ोन के साथ ईथरली इटली के एक कब्रिस्तान में मौजूद है। बीती रात का सवाल उसके दिमाग़ में कौंधा- ‘बाक़ी दुनिया किन हालात में है?’ ग्रोक पर ईथरली ने अपना सवाल लिखा- ‘क्या आज भी दुनिया के देशों के बीच युद्ध होता है?’

उसे महसूस हुआ कि स्क्रीन उससे मुख़ातिब है। स्क्रीन पर टाइप होता जवाब बताने लगा-

‘हां, आज भी दुनिया के कई हिस्सों में देशों के बीच युद्ध और संघर्ष चल रहे हैं। हालांकि, ये संघर्ष पारंपरिक विश्व युद्धों की तरह बड़े पैमाने पर नहीं हैं, लेकिन क्षेत्रीय स्तर पर कई सशस्त्र संघर्ष, गृहयुद्ध और सीमा विवाद मौजूद हैं। कुछ उदाहरण…’ इस जवाब को अधूरा छोड़ क्लॉड अगला सवाल लिखने लगा।

‘क्या अभी भी एटॉमिक और न्युक्लियर युद्ध लड़े जा रहे हैं?’

जवाब- ‘नहीं, वर्तमान में कोई सक्रिय न्यूक्लियर युद्ध नहीं लड़ा जा रहा है। परमाणु हथियारों का उपयोग द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से, जब 1945 में संयुक्त राज्य अमेरिका ने जापान के हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बम गिराए थे, युद्ध में नहीं किया गया है।’

टाइप होते जवाब की शुरुआती पंक्तिया उसे राहत-भरी लगीं। इस जवाब ने उसे युनाइटेड नेशन की याद दिला दी। यूनाइटेड नेशन के बारे में जानने से पहले क्लॉड ने ग्रोक से अगला सवाल किया-

‘धरती पर इस समय कौन से देश युद्ध लड़ रहे हैं और क्यों?’

टाइप होते जवाब में पहला नाम रूस-यूक्रेन का था जहां का मंज़र वह देखता हुआ आ रहा था। वजह को अनदेखा करके उसने अगले देश का नाम पढ़ा। ये इज़रायल-हमास (गाज़ा) युद्ध की जानकारी दे रहा था। आगे भारत-पाक के अलावा म्यांमार और सूडान के गृहयुद्ध का ज़िक्र था।

क्लॉड नए सवाल करता जाता और उसके हाथ में मौजूद डिवाइस जवाब देती जाती। इन लड़ाइयों में होने वाली मौतों पर ग्रोक का जो जवाब था, वह स्क्रीन पर इस तरह लिखता गया-

‘रूस के 2,50,000 और यूक्रेन के 60,000 से 1,00,000 सैनिकों की मौत के अनुमान के साथ, कुल सैन्य मौतें 3,10,000 से 3,50,000 तक हो सकती हैं। नागरिक मौतों (12,000+) को जोड़ने पर कुल मौतें 3,22,000 से 3,62,000 के बीच हो सकती हैं।’

इज़रायल और गाज़ा में जानों के नुक़सान पर ग्रोक का जवाब मिला-

‘ग़ाज़ा में 57,000+ और इज़रायल में 1,500-2,000, यानी कुल मिलाकर लगभग 58,500 से 59,000 मौतें। कुल मिलाकर 1,35,000 से अधिक घायल। गाज़ा में 2.3 मिलियन जबकि इज़रायल में दक्षिणी और उत्तरी क्षेत्रों से हज़ारों लोग विस्थापित हुए हैं।’

क्लॉड को लगा कि शायद ये जंगें इसलिए हो रही हैं कि धरतीवासियों के पेट भरे हुए हों। मगर उसका टाइप किया जाने वाला अगला सवाल उसकी सोच से बिलकुल निकला।

सवाल- ‘भूख हर दिन कितनी मौतों के लिए ज़िम्मेदार हैं?’

ग्रोक की हाज़िरजवाबी ने बताया-

‘भूख और कुपोषण से होने वाली मौतों का सटीक दैनिक आंकड़ा देना चुनौतीपूर्ण है, क्योंकि यह क्षेत्र, समय, और डेटा स्रोतों पर निर्भर करता है। फिर भी, विश्वसनीय स्रोतों जैसे संयुक्त राष्ट्र, विश्व खाद्य कार्यक्रम और ऑक्सफैम के आधार पर, 2025 तक के अनुमानों के अनुसार निम्नलिखित जानकारी दी जा सकती है:

भूख से होने वाली दैनिक मौतें: वैश्विक अनुमान: संयुक्त राष्ट्र और वर्ल्ड फ़ूड प्रोग्राम के 2021 के आंकड़ों के अनुसार, भूख और कुपोषण से हर दिन लगभग 25,000 लोग मर रहे थे, जिनमें 10,000 से अधिक बच्चे शामिल थे।

2024 में, वैश्विक भूख संकट गहराने के कारण (विशेष रूप से रूस-यूक्रेन युद्ध, गाज़ा युद्ध, और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के कारण), यह संख्या स्थिर या बढ़ी हुई मानी जाती है।‘

ग्रोक बिना रुके अपना जवाब देने में मसरूफ़ रहा।

‘संघर्ष प्रभावित क्षेत्रों में: ऑक्सफैम (2024) के अनुसार, गाज़ा, सूडान, और अन्य संघर्ष प्रभावित क्षेत्रों में भूख से हर दिन 7,000 से 21,000 मौतें हो रही हैं। गाज़ा में 90% आबादी (2.3 मिलियन लोग) विस्थापित है, और अकाल का ख़तरा बना हुआ है। सूडान में ज़मज़म कैंप जैसे क्षेत्रों में अकाल की स्थिति दर्ज की गई है।’

क्लॉड की हैरानी से बेपरवाह ग्रोक रुका नहीं। अपनी मशीनी भाषा वाले अंदाज़ में उसने बताना जारी रखा।

‘2025 की स्थिति: 2024 में, 733 मिलियन लोग वैश्विक स्तर पर भूख का सामना कर रहे थे। यह संख्या 2025 में और बढ़ी हो सकती है, क्योंकि गाज़ा में नाकाबंदी, सूडान में गृहयुद्ध, और जलवायु परिवर्तन (सूखा, बाढ़) ने खाद्य असुरक्षा को बढ़ाया है।

अनुमानित दैनिक मौतें: वैश्विक स्तर पर 20,000 से 30,000 के बीच, जिसमें संघर्ष क्षेत्रों (7,000-21,000) और गैर-संघर्ष क्षेत्रों में कुपोषण से होने वाली मौतें शामिल हैं।’

बदहवास हुआ क्लॉड अब यह जानना चाहता है कि हिरोशिमा शहर की जो झिलमिलाहटें उसने देखी थीं, क्या वह कोई वहम था? इंफ्रास्ट्रक्चर से लेकर मशीनों की तरक्क़ी उसे एक तिलिस्मी दुनिया दिखा रही थी और ये आंकड़े सैकड़ों हज़ारों बरसों का सफ़र तय करने के बाद भी चीख-चीख कर इंसान के बंजारे रह जाने की दास्तान बयान कर रहे हैं। क्लॉड को लगता था कि बहुत पहले ही, बहुत क्रूर बन चुका इंसान हिरोशिमा मिशन में अपनी क्रूरता दिखा चुका। उसके ज़ुल्म की हदें तो उसके दौर में ही ज़मीन से बेकाबू होती हुई आसमान तक पहुंच चुकी थीं। वह तय ही नहीं कर पा रहा है कि अपने आस-पास की दुनिया को वह किस खाते में डाले।

अब क्लॉड की हिम्मत जवाब दे चुकी है। उसने तो सिर्फ़ चंद देशों की जंगों का जायज़ा लिया है। अभी सारी दुनिया की ग़रीबी, बेरोज़गारी, बीमारी, क्राइम और माइग्रेशन जैसे मामलों पर होने वाली मौतों का वह गुमान नहीं कर सकता। वह सोच रहा है कि जितना हमें इंसान होकर इंसानियत की तरफ़ बढ़ना चाहिए था, उतना ही हम हैवान होकर हैवानियत की तरफ कैसे बढ़ते गए। उसने खुद से सवाल किया- ‘यूनाइटेड नेशन बनने के बावजूद ये पूरी धरती ग्राउंड ज़ीरो में कैसे बदल गई?’

कुछ देर पहले सोच से दरकिनार किया गया यूनाइटेड नेशन क्लॉड के सामने आ-आकर घूमने लगा। अब उसने इन संकटों से हज़ारों मील दूर मौजूद न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र के आलीशान ऑफिस को स्क्रीन पर देखा। सत्तर बरस बाद भी क्लॉड उस यूनाइटेड नेशन की कारगुज़ारियों पर यक़ीन नहीं कर पा रहा था जिसका काम दुनिया में अमन को यक़ीनी बनाना था।

स्क्रीन से बटोरी जानकारियां क्लॉड को पागल करने लगीं। यूनाइटेड नेशन का नक्शा उसे पेंटागन के नक़्शे में घुलता महसूस हुआ। वही पेंटागन जिसे वह देखना भी पसंद नहीं करता। आगे के सफ़र का इरादा अपना दम तोड़ता नज़र आया। उसने फ़ोन को देखा, उसमें मौजूद जानकारी का सोचा और उससे चिपके लोग उसके ख़याल में आ गए। उसी लम्हे क्लॉड के अंदर फोन के लिए नफ़रत का एक ऐसा लावा फूटा जिसकी शिद्दत में उसने इस आले को अपने वजूद से दूर करना चाहा। अगले ही पल क्लॉड की असीमित ताक़त ने फोन को अंतरिक्ष में उछाल दिया।

उसे लगा कि इस एक फ़ोन के साथ उसने सारे संसार के फ़ोन धरती से दूर फ़ेंक दिए हैं। अंतरिक्ष में बिखरे हज़ारों-लाखों फ़ोन उसकी आंखों से ओझल होने लगे और जो मंज़र नज़र आने लगा उसमें क्लॉड प्रोमेथियस को देख रहा था। उसे साफ़ नज़र आ रहा था कि पहाड़ी पर ज़ंजीरों से बंधे प्रोमेथियस के कलेजे को एक चील नोच रही है। उसने अंतरिक्ष से नज़रें फेर लीं। सफ़र पर निकले क्लॉड ने अपने ज़ेहन में बनाए तमाम नक़्शे मिटा दिए। उसके दिमाग़ के नक़्शे पर बस एक ही नाम चमक रहा था- ‘यूनाइटेड नेशन’। चमकती आंखों के साथ उसके मुंह से निकला ‘ग्राउंड ज़ीरो’।

saminasayeed@gmail.com


4 thoughts on “ग्राउंड ज़ीरो / समीना ख़ान”

  1. बहुत सटीक लिखा आपने ।अब युद्ध रुक जाना चाहिए

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  2. सारे झगड़े की जड़ अहंकार है ये सोचने समझने की शान्ति खत्म कर देता है।इसके दुष्परिणाम समीना जी ने अपनी कलम से उकेरे हैं।
    युद्ध खत्म होने ही चाहिए वर्ना इसका पश्चाताप रुह को कभी सुकून नहीं देगा।और गुनहगार नहीं होते हुए भी युद्ध का हिस्सा बने व्यक्ति को था उम्र नोच नोच कर खाता रहेगा।
    समीना जी बहुत ही बढ़िया लिखती हैं जो हमारे जेहन को झकझोर कर रख देता है।

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