बारह कविताएँ / अजय दुर्ज्ञेय


दलित कविता प्रश्नवाची तेवर के कारण विशेष रूप से पहचानी गई। जैसे-जैसे उसका विकास होता गया, प्रश्नों की रंगत बदलती गई। उन प्रश्नों की निर्मिति में बदलाव आता गया। प्रश्नों के संबोध्य भी बढ़ते गए। अंतर्वस्तु में विस्तार आता गया। इन प्रश्नों से डरकर उन्हें अनदेखा करने वालों को माकूल जवाब मिलता गया।
अजय दुर्ज्ञेय नई पीढ़ी के कवि हैं। वे अधीत रचनाकार प्रतीत होते हैं। उनकी कविताओं की प्रश्नाकुलता के कई वैचारिक स्रोत हैं। यह प्रश्नाकुलता कविताओं के शिल्प में इस तरह घुली-मिली है कि उसे अलग से चिह्नित कर पाना कठिन है। प्रश्नों की तासीर कविताओं से गुज़रने के बाद महसूस होती है। अपनी बनावट में प्रश्नहीन लगती कविताऍं अपने पाठकों को सवालों के सम्मुख ला खड़ा करती हैं। ऐसे प्रश्नों से दो-चार होने के लिए आप भी इन्हें पढ़िए!–बजरंग बिहारी तिवारी

 

1) घुसपैठिया

और एक दिन
जब उन्होंने कहा कि
वे ब्रह्मा के मुख से पैदा हुए हैं
इसलिए सबसे ऊँचे हैं, श्रेष्ठ हैं और
हम ब्रह्मा के पैरों से जने – इसलिए उनसे छोटे हैं, निकृष्ट हैं
तो कहीं नहीं कड़की कोई बिजली,
नहीं डोला इंद्र का सिंहासन,
नहीं खुला शिव का त्रिनेत्र,
नहीं घूमा कृष्ण का चक्र। कहीं कुछ नहीं हुआ…

और तो और
वह ब्रह्मा भी नहीं काँपा-
जिसके अंगों को तराजू में तौला जा रहा था,
जिसके अंगों को बाँट बोला जा रहा था। और तब
उसकी चुप्पी से जन्मा भेद,
उसकी अकर्मण्यता से जन्मा अन्याय,
उसकी अवसरवादिता से जन्मी जाति-
कहो साथी!
तब कैसे मानूँ कि वह ईश्वर था,
कैसे मानूँ कि ईश्वर जैसा भी कुछ था?

और उसके बाद भी
हमें जब-जब ईश्वर की ज़रूरत पड़ी-
वह एकदम चुप रहा, निष्क्रिय रहा।
वह हमारी बस्ती कभी नहीं आया,
हमने उसे कभी नहीं देखा,
हमने बस उसका नाम सुना था, उसका भय देखा था।
हमें नहीं पता कि ईश्वर कौन था, किस मज़मे का था?
जानने वाले कहते हैं कि वह उनमें से था, उनके खेमे का था…
होगा! हमारा कौन सा सगा था।

2) बड़े घर की औरतें

वे ठीक मेरे सामने बैठी हुई हैं।

वे हर तीसरे मिनट बात-बेबात हँस पड़ती हैं,
हर दूसरे मिनट मुस्कुरा पड़ती हैं,
फिर एकदम चुप हो जाती हैं और
उनकी उँगलियों के पोर काम पर लग जाते हैं

वे ख़ुद को देखती हैं एक बार
मगर गहनों को देखती हैं बार-बार
और सिर्फ़ देखती ही नहीं हैं
उँगलियों के पोरों से छूती भी हैं बार-बार

ख़ैर! ऐसा करते हुए वे खोई हुई लगती हैं
मगर इस बात का पूरा ध्यान रखती हैं
कि झुमके, हार, अंगूठी सब अपनी जगह हैं कि नहीं
और इसीलिए बतियाते हुए, खाते हुए, पीते हुए
हँसते हुए, फ़ोटो खिंचाते हुए, सोचते हुए
वे उँगलियों के पोरों से हर गहने को छूती हैं बार-बार

मैं उन्हें देख-देख कर ऊब गया हूँ
ऐसा लगता है कि जैसे मैं एक ही मूवी, एक ही क्लिप
देख रहा हूँ बार-बार। वही ख़ुद को देखना,
फिर बेवज़ह हँसना, फिर मुस्कुराना और फिर वही-
उँगलियों के पोरो से गहनों को छूना बार-बार।

मैं खीझ उठता हूँ। चीख पड़ता हूँ-
निर्देशक कहाँ है? कहाँ है निर्देशक?

 

3) शिकायत

मैं पहली दफ़ा तब परेशान हुआ
जब मेरे रोने पर मेरा स्वर फूटा
मगर सोता नहीं। मैं उस दिन और परेशान हुआ
जब मेरे रोने पर न तो स्वर फूटा और न ही सोता…

मुझे लगा कि मेरे ही घर के
किसी चोर ने चुरा लिए हैं मेरे आँसू और
हृदय के किसी कीड़े ने मेरे गले में छेद कर दिया है।
मुझे उस समय बिल्कुल भी अंदाजा नहीं था कि
किसी ने घोंटा है मेरी आवाज़ का गला और
मेरे आँसुओं के ठीक ऊपर बना दिया है पत्थरों का पुल

यद्यपि मुझे लगातार महसूस होते थे
मुझ से होकर गुजरने वाले जूते- लेकिन,
मुझे कभी नहीं लगा कि मैं पुल हूँ। और आज जब जान गया हूँ तो मेरे आत्मीयो, मेरे दोस्तो!
मुझसे होकर गुजर जाने वाले शुभचिंतको!
सुनो! मेरी आवाज़ तुम तक इसलिए नहीं पहुँचती थी,
मेरे शुष्क आँसू तुम्हें इसलिए नहीं दिखाई देते थे
क्योंकि तुम नदी के पुल से गुजरते थे-
नदी से नहीं।

 

4) पहला मानुष

ओ पेड़!
मैंने तुम्हें जब-जब देखा
तो ऐसा लगा कि
जैसे तुम मेरे अपने हो, सगे हो
मैं तुमसे ही हूँ, मुझमें तुम ही पगे हो

मसलन जब मैंने तुम्हारी छाल को देखा
तो लगा कि जैसे
देख लिए हों पिता के गाँठ भरे हाथ
और मैं भर गया स्नेहिल जिम्मेदारियों से

जब मैंने तुम्हारे फलों को देखा
तो लगा कि जैसे
देख लिए हों माँ के स्तन
और मैं भर गया एक परिचित तृप्ति से

जब मैंने तुम्हारे नव-कलोलों को देखा
तो लगा कि जैसे
देख ली हों संतान की आँखें
और मैं भर गया एक गहन आश्वस्ति से

जब मैंने तुम्हारी पत्तियों को देखा
तो लगा कि जैसे
देख रहा हूँ नानी के हाथ
और मैं भर गया स्निग्ध दुआओं से

जब मैंने तुम्हारे फूलों को देखा
तो लगा कि जैसे
देख ली हों प्रेमिका की आँखें
और मैं भर गया अभूतपूर्व संतुष्टि से

जब मैंने तुम्हारी जड़ों को देखा
तो लगा कि जैसे
देख ली हो किसी पुरखे की पीठ
और मैं भर गया असीम कृतज्ञता से

सुनो मेरे आदिम पुरखे!
सुनो पेड़!
मैंने तुम्हें जब-जब देखा
तो ऐसा लगा कि जैसे
मैं अपना बाप, माई, बहन, भाई देख रहा हूँ-
कि जैसे मैं पहला मनुष्य देख रहा हूँ।

 

5) क़बूल-नामा

और अब समय हो गया है
कि आने वाले बच्चों को
इस दुनिया में आने से मना कर देना चाहिए

हाँ! इस दुनिया में अभी भी फूल हैं
लेकिन वे लाशों के ढेर पर उगे हैं,
हाँ! इस दुनिया में अभी भी नदियाँ हैं
लेकिन उनमें पानी के बजाए ख़ून अधिक है,
हाँ! इस दुनिया में अभी भी पहाड़ हैं
लेकिन उन पर मिसाइलें तनी हुई हैं,
हाँ! इस दुनिया में अभी भी पेड़ हैं
लेकिन उन पेड़ों के नीचे जनरल के टैंक खड़े हुए हैं
हाँ! इस दुनिया में अभी भी ज़मीन बची हुई है
लेकिन उस पर किसी नये भेड़िये की आँख लगी हुई है

तुम्हारे पास सिर्फ़ बंकर बचे हुए हैं, मनुष्यो!
और मुझे माफ़ करना! बच्चे बंकरों में नहीं पैदा होते।
बच्चों को पैदा होने के लिए चाहिए
एक निश्चिंत, मज़बूत कोख,
एक सुंदर, शांत दुनिया
और एक निश्छल मुस्कान।

बोलो! उन्हें दे पाओगे इतना भी?
कर पाओगे इतना एहसान?
और इसीलिए, अब समय हो गया है
कि आने वाले बच्चों को
इस दुनिया में आने से मना कर देना चाहिए।

 

6) कारण

एक साफ़, खुला आसमान,
बटुरी हुई धरती,
दो अंडे,
थोड़ा नमक,
एक गिलास पानी
और तुम्हारी यादें

इस सुबह
इतना बहुत है
मेरे ख़ुश होने के लिए,
ख़ुशी से जीने के लिए

मगर
पता नहीं
ये लड़ाकू-विमान लिए
कौन घूम रहा है?
क्यों घूम रहा है?

क्या मुझसे भी कम है उसके पास?

 

7) तुम्हारी आँखें

इस दुनिया में
मैं जहाँ भी गया/ नहीं गया
वहाँ मुझसे पहले या मुझसे बाद
पहुँच ही गए मेरे गोत्र, मेरे धर्म, मेरी जात

इतनी बड़ी दुनिया में
एक सिर्फ़ तुम्हारी आँखें ही रहीं
जहाँ सिर्फ़ मैं पहुँचा। मेरे इतर
और कुछ भी नहीं था तुम्हारी आँखों में,
मेरा बाकी सब लौटा दिया था
तुम्हारे द्वारपाल पलकों ने

और शायद इसीलिए
एक तुम्हारी आँखों के सिवा
मैं गया लगभग हर जगह-
मगर पहुँचा कहीं नहीं,
रुका कहीं नहीं।

 

8) शत्रुता

जो समझते रहे शत्रु
उन्हें दी बधाईयाँ, शुभकामनायें
गिनाई उपलब्धियाँ, बताये वृत्तांत
लगाया गले, बिठाया पास
दिया ख़ूब मान-सम्मान
बरसाया स्नेह, प्रेम

उन्हें सब कुछ दिया,
दिखाया, बताया, अपनाया
मगर अपने दुःखो से वंचित रखा।

 

8) एक भावी नागरिक

धीरे-धीरे अकेला होगा सत्य,
न्याय निकल जाएगा देश की सीमा के बाहर,
अहिंसा को दिया जाएगा धीमा ज़हर

धीरे-धीरे छीने जाएँगे सभी अधिकार,
जीभ को बाँधा जाएगा मालिक के खूँटे से,
कलम में भरी जाएगी सिर्फ़ राष्ट्रवाद की स्याही

धीरे-धीरे आँसू सूखेंगे,
गलियों के कुत्ते घर में भूकेंगे,
हमारे पुरखे – हम पर थूकेंगे

धीरे-धीरे सिर्फ़ घृणा बचेगी
प्रेम करने पर/लिखने पर सजा होगी
और प्रेम-विवाह करने पर मृत्यु

धीरे-धीरे हमारे पड़ोसी मर जायेंगे
मगर इससे निश्चिंत, हम अपने घर में रील देखेंगे
और सबका साथ-सबका विकास चीखेंगे

धीरे-धीरे कवि विलुप्त हो जाएँगे,
पत्रकार सड़क-दुर्घटना में मारे जाएँगे
और एक्टिविस्ट्स (वामपंथी) जीवाश्म हो जाएँगे

हाँ! धीरे-धीरे बदला जाएगा पाठ्यक्रम
बदली जायेगी हमारी आत्मा
और हमें बनाया जाएगा अखंड-भारत का नागरिक (?)

 

9) भाषा

उस प्यारे से फूल को
कोई फ़र्क नहीं पड़ता था कि
कोई उसे गुलाब कहता था,
या कोई उसे रोज़,
या कोई पाटलम्,
या कोई गोलॉप,
या कोई रोज़ा

वह सबको देखता था,
मुस्कुराता था और
चहकता था। वह फूल था-
वह हर भाषा में, एक जैसा ही महकता था।

 

10) पहचान

मुझे ऐसे लोगों से घृणा थी
जो फूल देखते ही
उसे निहारने,
उसे सूँघने,
उसकी सुंदरता महसूसने- के बजाए
सबसे पहले जानना चाहते थे उसका नाम।

 

11) मूल

जीता तो जी सकता था…

कहीं, किसी कुटिया में मिल ही जाता
एक दिन का आश्रय,
गेहूँ की चार रोटियाँ
और थोड़ा नून या
आम के अचार की एक कली

(और अगर नहीं हो पाता इतना भी
तो कहता इस दुनिया को
क्रूर, निर्मम और एक जीता हुआ नरक)

मगर मैंने जीना चाहा ही नहीं

इसके उलट मैंने चाहा
एक बड़ा सा महल,
गेहूँ के बोरों से भरा एक बड़ा सा गोदाम,
आम का एक बड़ा सा बगीचा
और….

(अफ़सोस! बिल्कुल ऐसा ही हुआ भी।
और इस प्रकार मैंने ही बनाया दुनिया को
क्रूर, निर्मम और एक जीता हुआ नरक)

 

12) उन्मादी

उसका एक बेटा अमेरिका में है
और दूसरा ऑस्ट्रेलिया में।
हाँ! उसकी एक बेटी भी है
जो दामाद के साथ चली गई है ब्रिटेन…

अब वह अपनी बड़ी सी कोठी में
एक नौकर के साथ
अकेला रहता है।

फिर भी बीमारी-हारी,
अपनों की उपेक्षा और घोर अकेलेपन से इतर
उसे केवल एक शिकायत है आज-

‘युद्ध रुक क्यों गया आज?’

सीहपुर, सतौरा, कन्नौज
(उत्तर-प्रदेश)
पिन-209731

[email protected]

9119845665

 


4 thoughts on “बारह कविताएँ / अजय दुर्ज्ञेय”

  1. घुसपैठिआ कविता
    कविता की शुरुआत ( वे ब्रह्मा के मुख से पैदा हुए हैं
    इसलिए सबसे ऊँचे हैं, श्रेष्ठ हैं और
    हम ब्रह्मा के पैरों से जने – इसलिए उनसे छोटे हैं, निकृष्ट हैं)
    यहां कवि उस पारंपरिक मिथक को चुनौती देता है, जिसमें वर्ण-व्यवस्था (मुख से ब्राह्मण और पैरों से शूद्र की उत्पत्ति) को दैवीय ठहराया गया है। यहाँ व्यंग्य किया गया है कि जब कथित श्रेष्ठता का दावा किया जा रहा था, तब किसी भी देवता या शक्ति (बिजली, इंद्र, शिव, कृष्ण) ने इसका विरोध नहीं किया ।
    आगे की पंक्तियों जैसे ( वह हमारी बस्ती कभी नहीं आया,
    हमने उसे कभी नहीं देखा,)
    इन पंक्तियों में शोषित वर्ग की पीड़ा को बताते हुए कहा गया है कि ईश्वर कभी दलित या वंचित समाज की बस्ती में नहीं आया। वह केवल शोषक वर्ग (उनके खेमे) का रक्षक बना रहा। शक्तिशाली व्यक्तियों ने धर्म को अपने हित में मोड़ लिया , अपनी सुविधा अनुसार नियम बनाए और शोषित वर्ग को सदैव वंचित ही रखा गया , कवि ने इस कविता में शोषितों की आवाज़ बुलंद करते हुए धर्म तथा ईश्वर के नाम पर होने वाले पाखंड को बेनकाब करने का प्रयास किया है ।।

    Reply
  2. सभी कविताएं अपने समय की सशक्त अभिव्यक्ति हैं।

    Reply
  3. सभी कविताएं वर्तमान जीवन और समाज के सूक्ष्मतम और कहीं न कहीं क्रूर सच्चाइयों को अपनी जीवट जिजीविषा के साथ बुने हुए विद्यमान हैं।

    Reply

Leave a Comment