विभिन्न माध्यमों में लगातार प्रकाशित होनेवाले कवि प्रदीप मिश्र परमाणु ऊर्जा विभाग के राजा रामान्ना प्रगत प्रौद्योगिकी केंद्र, इंदौर में वैज्ञानिक अधिकारी के पद पर कार्यरत हैं। कविता संग्रह फिर कभी एवं उम्मीद, वैज्ञानिक उपन्यास अंतरिक्ष नगर, बाल उपन्यास मुट्ठी में किस्मत प्रकाशित। कविता संग्रह धूप की अलगनी तथा तर्क में सुबह प्रकाशन प्रक्रिया में।

अपनी अकर्मण्य दुनिया में
हफ़्ता देने के लिए पैसे नहीं हैं
पिट रहा है ठेलेवाला
अंदर तक तमतमा गया मैं
पुलिसवाले का कॉलर पकड़कर
उसी के डंडे से पीटते हुए
उसे मन ही मन वर्दी की जिम्मेदारी समझाई
इस कल्पना से बाहर आते ही
पुलिसवाले से नज़र चुराते हुए
निकल गया चुपचाप
फिर कोसता रहा अपने आपको
क्यों नहीं बदल पाया
अपनी कल्पना को यथार्थ में
बस में खड़ी लड़की को बार-बार धकियाते और
उसके अंगों पर हाथ फेरनेवाले गुंडे को
लगाना चाहता था एक झन्नाटेदार झापड़
कसमसाता रहा मन ही मन
बहुत हिम्मत जुटाकर सिर्फ इतना कह पाया
भाई साहब ठीक से खड़े रहिए
आग बरसाती आँखें गड़ाकर मुझ पर
गालियों की झड़ी लगा दी उसने
लड़की और भी सहम गयी
अपनी इस कमजोरी पर तरस खाते हुए
करवटें बदलता रहा
रात भर
कानफाड़ू शोर की तरह गाना बजाते हुए
लहराती हुई गाड़ियों पर सवार बदमाशों का झुंड
गुज़र रहा है पास से
रोककर उनसे कहना चाहता हूँ
जिन पैसों पर ऐश कर रहे हो तुम
उनमें तुम्हारे पसीने की गंध नहीं है
तुम्हारी आँखों में उतरा हुआ लाल नशा
मौत का नशा है
हाथ उठाता हूँ उनको रोकने के लिए
और टाटा कर देता हूँ
उनका शोर गूँजता रहता है कानों में
बेचैन होकर टहलता हूँ कुछ देर तक
और घर आकर सो जाता हूँ
दोनों कानों पर हाथ रखकर
अच्छे दिनों की घोषणा करनेवालों के माइक को पकड़ कर
जोर से चिल्लाना चाहता हूँ
देशवासियों यह हमारे समय का सबसे बड़ा झूठ है
स्वांग की तरह लगती है
मेरी यह उत्तेजना
मन ही मन स्वीकार कर लेता हूँ
इस माइक को पकड़ने का अधिकार
मुझे नहीं
चैनल बदलकर देखने लग जाता हूँ
कमेडी शो
एक भयानक अट्टहास
मेरा मजाक उड़ाता रहता है निरंतर
जिसको टाल कर
शुतुरमुर्ग की तरह दौड़ता रहता हूँ
अपनी अकर्मण्य दुनिया में
जहाँ खून का लोहा पानी में बदल रहा है।
गाँव, पगडंडी और सड़क
(एक)
यहाँ एक पगडंडी थी
जो किसी गाँव में जाती
या फिर खेत पर
पगडंडी की मखमली सतह पर
हम घूमते-फिरते थे बिना चप्पल
नहीं छिलते थे तलुए
साइकिलें – बैलगाड़ियाँ
फर्राटे भरती रहतीं थीं
कभी-कभार कोई कार आ जाती
तो फंस जाती थी पगडंडी के
किसी न किसी गड्ढे में
ग़ज़ब का तालमेल था
हमारे जीवन और
पगडंडी की गति में
एक दिन पगडंडी को लील गयी सड़क
गाँव के लोग हुए बहुत खुश
सड़क ने दिया उनके सपनों को नया आकाश
गाँव के सपनों में बसा हुआ था नगर
इस सड़क पर चलता हुआ गाँव
नगर में पहुँच गया
लोगों को याद ही नहीं
यह जो विदुर नगर है
वह कभी सुखनिवास गाँव था।
(दो)
पगडंडी जो खेत पर जाती थी
उसपर चलते किसान
अन्नदाता कहलाते
उनके पसीने से न केवल खेत लहलहाते
बल्कि पगडंडी भी बनी रहती थी
मुलायम और लहरदार
एक दिन पगडंडी को लील गई सड़क
सड़क भी पहुँच गयी खेतों में
खेत और सड़क की गति में
ज़मीन-आसमान का फर्क
खेत पिछड़ते चले गए
सड़क मकड़-जाल की तरह
पसरती गयी खेतों में
देश के विकास में
सबसे महत्वपूर्ण है
गति का तालमेल
राजा और उसके मंत्रियों ने किया मशविरा
पिछड़ते हुए खेतों की गति
बढ़ाने का हुआ उपाय
गति बढ़ते ही
खेत उद्योगों में बदल गए
अब वे ज़्यादा उत्पादन करते हैं
सड़क भी खुश
राजा भी खुश
मंत्रियों की तो चाँदी
इस पीथमपुर औद्योगिक क्षेत्र में
हो रहा है करोड़ों-अरबों का उत्पादन
आप अभी भी अटके हैं
कुछ कुंतल अन्न उपजानेवाले खेतों औऱ
अनपढ़ अन्नदाताओं के फेर में
इनके चक्कर में कहीं आपका
चंद्रयान न छूट जाए ।
(तीन)
सड़क जिसने लील लिया था
पगडंडी और गाँव को
जिसने खेतों को बदल दिया था
उद्योगों में
जिसपर अब फर्राटे से दौड़ रहीं हैं गाड़ियाँ
वह देश के तीसरे नम्बर का हाईवे है
अब ये नगर से नहीं जुड़ती
सीधा महानगर से है इसका रिश्ता
गति इतनी ज्यादा
साइकिल तो छोड़िए
मोटर साइकिल भी
दौड़ नहीं सकती इस पर
सिर्फ गति के फर्राटे हैं और
मृत्यु का आतंक
ऐसी सड़क पर
साइकिल चला रहा हूँ
और रट रहा हूँ
इमरजेंसी एम्बुलेंस का नम्बर
एक सौ आठ….एक सौ आठ ।
धर्म की गुफा
कवि ज्योतिषी होते हैं
खंगालते रहते हैं भूत-भविष्य-वर्तमान
अभिनेता चमत्कार करते हैं
हर बार बदल जाता है उनका चरित्र
कथाकार जादूगर होते हैं
क्षणभर में बदल देते हैं दुनिया का आस्वाद
बुद्धीजीवी समय होते
टिक्-टिकाते रहते हैं घड़ियों के साथ
भूत,भविष्य,वर्तमान को खंगालते हुए
कवि बन जाते हैं आमजन के आदर्श
अभिनेताओं के चमत्कारों के आगे तो
सब नतमस्तक् होते हैं
कथाकारों के जादू में बिकते हैं
आमजन के स्वप्न
बुद्दिजीवियों के काँख में दबा
समय देखकर अचकचा जाते हैं, आमजन
याद आता वेद वाक्य – मैं समय हूँ
आरती करने लगते हैं उनका
कला के सफ़ेद समुद्र में ढूंढ़ते हुए अपने जीवन के रंग
रंगहीन हो जाते हैं आमजन
इन रंगहीन लोगों के प्रेम का व्यापार होता है
इनका आत्मसम्मान
संभ्रांत लोगों के घरों में सजावट के काम आता है
ठेकेदारों की चाकरी से चलता उनका जीवन
आमजन
घूमती हुई पृथ्वी पर चकराते रहते हैं
और एकदिन लापता हो जाते
धर्म की गुफा में ।
गुटखा
गुटखा खाकर थूकता रहता हूँ इधर-उधर
और अपमानित होता हूँ
गुटखा खाना या
थूकना या
थूकने से पड़नेवाला निशान
क्या है जो पसंद नहीं है सभ्य समाज को
कभी समझ में नहीं आया
अपमान और दबाव से आजीज़ आकर
मैंने गुटखा खाना छोड़ दिया
गुटखा छोड़ने के बाद
बिगड़ गया है मेरा हाजमा
कुछ भी पचा नहीं पाता
सबकुछ थूक की शक्ल में निकल आता है बाहर
टीवी पर देश के जनसेवकों को
सेल्समैन की तरह भाषण देते हुए देखता हूँ
मुँह भर जाता है थूक से
सड़क पर पिटती हुई स्त्री के तमाशबीनों को देखकर
थूक देता हूँ उन पर
अख़बार में छपे दुष्कर्मों की ख़बर से
इतनी थूक पैदा होती है कि
देश के सारे वाशबेसिन छोटे पड़ जाएं
मजदूर नशे में चूर गालियाँ बक रहा था सेठ को
जिसने उसकी दिहाड़ी मार ली थी
फिर थूक ने उत्पात मचा दी
उसे पड़ना है उस सेठ पर
घोटालों का अतिक्रमण
बाज़ार की सुंदरता
किसान की विवशता
न जाने कितनी चीजों को देखते-सुनते हुए
दिनभर भरा रहता है मेरा मुँह थूक से
थूकता फिरता हूँ इधर-उधर
हर बार मेरी थूक से असुविधा होती है
सभ्य समाज को
और अपमानित करते रहते हैं मुझे
गुटखा और थूक में कोई सम्बन्ध नहीं
जिस कड़वाहट से जनमता है थूक
वह तम्बाकू का नहीं
हमारे समय की कड़वाहट है ।
थूकना
यहाँ-वहाँ
थूकना मना है
सभ्य समाज में
अगर थूकना ही है
तो आपको तलाशनी होगी वाशबेसिन
जिसमें चुपके से थूककर बहा दें उसे नाली में
थूक से संक्रमण होने की संभावना होती है
संक्रमण से सरकार और सभ्य समाज भयभीत रहते हैं।
लड़की प्रेम और कम्प्यूटर
(एक)
कम्प्यूटर की स्क्रीन पर उदास बैठी
उस लड़की के बदसूरत चेहरे को
माउस और कीबोर्ड ने
सुंदर और मासूम बना दिया
लड़की पूरे आत्मविश्वास से उठी और
मॉडल की तरह कैटवॉक करती हुई
वास्तविक दुनिया में चली गई
जहाँ प्रेम की नदी उफन रही थी
उसने नहीं सीखे थे तैरने के दाँव-पेंच
नदी में डूबकर मर गई
नदी की सतह पर एक चिट्ठी तैर रही थी
जिस पर लिखा था
नींद खुलते ही
सपने मर जाते हैं
सपनों में रची गयी दुनिया
सिर्फ कम्प्यूटर के स्क्रीन पर दिखाई देती है
(दो)
कम्प्यूटर की स्क्रीन पर प्रेम का बाज़ार लगा था
जिसमें बोली लग रही थी
कोई अपनी आँखों की एवज़ में
कोई चेहरे के एवज़ में
कोई शरीर की एवज़ में
कोई विदेशी गाड़ी और बंगले की एवज़ में
प्रेम की बोली लगा रहा था
लड़की को समझ में नहीं आई
बाज़ार की तासीर
वह दिल के एवज़ में लगा बैठी बोली
उसके दिल में एक भयानक विस्फोट हुआ
चिंदी-चिंदी हो गया उसका जीवन
कम्प्यूटर कुछ देर हैंग रहा
फिर रीबूट हुआ
इस बार उसकी स्क्रीन पर नई लड़की का चेहरा है ।
क्लिक
एक क्लिक होता है
सूखा पड़ जाता है
महामारी फैल जाती है
सत्ता बदल जाती है
ऊसर हो जाते हैं हरे-भरे खेत
धरती और चपटी हो जाती है
सूर्य बर्फ का गोला बन जाता है
मुर्दे बाज़ार में निकल पड़ते हैं खरीददारी करने
श्मशान स्मार्ट सीटी में बदल जाता है
जीवन बेतहाशा भागता फिरता है
आत्महत्या की तलाश में
एक क्लिक होता है
अच्छा-भला खेल का मैदान
युद्ध के रुदन से भर जाता है
एक क्लिक होता है
बाज़ार मुँह के बल गिर जाता है
रुपए का खून हो जाता है
एक क्लिक होता है
चारों तरफ़ कैमरे चमकने लगते हैं
पूरी धरती कम्प्यूटरों से भर जाती है
मनुष्य लुप्त हो जाते हैं
पेड़ प्लास्टिक में बदल जाते हैं
और सचमुच का शेर
बैठक में सजावट की वस्तु बन जाता है।
लोहा, मशीन और मनुष्य
लोहे से बनती है मशीन
और मनुष्य भी
नसों का जटिल तंत्र
जुड़ता है दिल से
जिसके धड़कने से बहता है
नसों में लोहा
रक्तकर्णिकाओं पर सवार लोहा
मनुष्य के पूरे शरीर में दौड़ता रहता है
जब तक दौड़ता रहता है लोहा
चलता रहता है मनुष्य मशीन की तरह
मनुष्य मशीन की तरह
ठोस और कठोर नहीं होता कभी भी
मशीन की तरह चलते हुए मनुष्य में
प्रेम की भट्टी जलती रहती है
जो लोहे को बदलती रहती द्रव्य में
जिस दिन बुझ जाती यह भट्टी
मनुष्य मशीन में बदल जाता है
ठोस और कठोर ।
दूसरे ग्रहों पर जीवन
(एक)
सड़क की गति में बाधक था
जरूरी था
पेड़ का कटना
माल से लदे ट्रक
चढ़ नहीं पाते थे घाट
पहाड़ को तो कटना ही था
मनुष्य जंगल से बाहर निकलकर
सभ्य हो चुका था
फिर जंगल का क्या काम
अन्न की जगह ले चुका था रुपया
खेतों को कॉलोनियों में बदल दिया गया था
तकनीक के पटाखे
लोगों के पीछे बाँधकर
उसमें आग लगा दी गई थी
लोग भाग रहे थे बेतहाशा
और विकास आकाश में खड़ा मुस्करा रहा था
मनुष्यों की जगह
आभासी मनुष्यों ने जन्म ले लिया था
धातु युग में लौटते हुए समाज में
खड़खड़ाती ध्वनियाँ अट्टहास कर रहीं थीं और
हम दूसरे ग्रहों पर जीवन तलाश रहे थे
विकासशील अब विकसित हो चुके थे।
(दो)
एक दिन हम तलाश लेंगे दूसरे ग्रहों पर जीवन
हमारे जीवन में बहुत सारी धरती होगी
हर ग्रह पर अलग-अलग
प्रकृति-जीव-जंतु
हम अलग-अलग ग्रहों के लोग
साझा करेंगे अपने जीवनानुभवों को
बहुत चमकदार और स्वप्निल हो जाएगा
हमारा जीवन
जीवन के इस चमकदार और स्वप्निल भविष्य में
चौंधिया गया है वर्तमान
भूत दुबक गया है चमक के पार्श्व में
सिर्फ भविष्य है हमारे स्वप्न में
चमचमाता हुआ
भूत और वर्तमान मुक्त
इस भविष्य में कहीं गुम जाएंगे हम सब
फिर कैसे कोई ढूँढ़ेगा हमें
देश-समाज-संस्कृति-भाषा तो
दुबक कर बैठे होंगे भूत की गोद में
चौंधियाए वर्तमान के दर्पण में
नहीं पहचान पाएंगे हम
अपना ही चेहरा ।
संपर्क – प्रदीप मिश्र, दिव्याँश 72 ए, सुदर्शन नगर, अन्नपूर्णा रोड, डाक : सुदामा नगर, इंदौर-452009, म.प्र. मो.न. : +919425314126, ईमेल – mishra508@gmail.com.







अच्छी कविताएं।
“अपनी अकर्मण्य दुनिया में”
कवि इस कविता में अपनी ही आत्मा के भीतर उठते संघर्ष को “अपनी अकर्मण्य दुनिया” के रूप में प्रस्तुत करता है; कविता के हर दृश्य में कवि किसी अन्याय को देखकर भीतर-ही-भीतर भड़क उठता है, उसका मन प्रतिरोध करना चाहता है, व्यवस्था को हिलाना चाहता है, लेकिन शरीर उस इच्छा को वास्तविकता में बदल नहीं पाता; इस प्रकार कविता बार-बार एक ही पीड़ा दोहराती है कि — “मैं बस सोचता हूँ… पर कर नहीं पाता।”
कवि कहता है कि “हफ़्ता देने के लिए पैसे नहीं हैं… अंदर तक तमतमा गया मैं”, यहाँ वह अपनी कल्पना में पुलिस वाले को सबक सिखा चुका होता है, पर असल दुनिया में वह नज़र बचाकर चुपचाप निकल जाता है; उसकी चेतना उसे धिक्कारती है कि क्यों उसकी कल्पना कभी उसके कर्म में नहीं बदल पाती। इसके बाद बस की भीड़ में लड़की को धकियाते गुंडे का दृश्य आता है, जहाँ कवि के भीतर पूरा तूफ़ान उठता है — वह थप्पड़ मारना चाहता है, अन्याय रोकना चाहता है — लेकिन वास्तविकता में सिर्फ इतना कह पाता है, “भाई साहब ठीक से खड़े रहिए”, और बदले में अपमान झेलता है; यह क्षण उसे भीतर तक तोड़ देता है और सारी रात करवटें बदलने को मजबूर कर देता है।
फिर कवि देखता है कि “लहराती हुई गाड़ियों पर सवार बदमाशों का झुंड” ऐयाशी और हिंसा की महक लिए गुजरता है; यहाँ भी हाथ उठता है पर रुक जाता है, और वह बस दूर से उन्हें टाटा कर देता है; यह दृश्य उसकी आत्मग्लानि को और गहरा करता है कि उसकी हिम्मत केवल शब्दों में है, कर्मों में नहीं।
इसके बाद कवि की पीड़ा और व्यापक हो जाती है— “अच्छे दिनों की घोषणा करनेवालों के माइक को पकड़ कर चिल्लाना चाहता हूँ… यह हमारे समय का सबसे बड़ा झूठ है”— यहाँ वह सीधे राजनीति और झूठे वादों की तरफ इशारा करता है; उसका मन विद्रोह करना चाहता है, जनता को सच बताना चाहता है, पर फिर स्वीकार कर लेता है कि “इस माइक को पकड़ने का अधिकार मुझे नहीं”, और टीवी पर कॉमेडी शो देखने लगता है; यह क्षण समाज की हताशा और व्यक्तिगत पलायन दोनों का प्रतीक बन जाता है।
अंत में “एक भयानक अट्टहास” कवि पर हँसता रहता है— यह अट्टहास उसकी कायरता, उसकी निष्क्रियता, उसकी टूटती नागरिकता का प्रतीक है; और कवि स्वयं स्वीकार करता है कि वह “शुतुरमुर्ग की तरह दौड़ता रहता हूँ अपनी अकर्मण्य दुनिया में”, जहाँ खून का लोहा पानी बनता जा रहा है— अर्थात साहस, प्रतिरोध, मानवीय गरिमा सब धीरे-धीरे खत्म हो रही है।
पूरी कविता निरंतर प्रवाह में एक ऐसे मनुष्य का आत्मस्वीकार है जो अन्याय देखता है, उससे आक्रोशित होता है, प्रतिरोध की कल्पना करता है, पर उसके भीतर इतना भय, असुरक्षा और सामाजिक जड़ता है कि वह कुछ कर नहीं पाता; यह कविता सामाजिक विफलता नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर की नैतिक पराजय का चित्रण है— एक ऐसी पराजय जिसे कवि भली-भांति जानता है, पर उससे मुक्त नहीं हो पा रहा।
“गाँव, पगडंडी और सड़क”
कवि इस लंबी कवितात्मक रचना में “पगडंडी” और “सड़क” को सिर्फ भौतिक संरचनाओं के रूप में नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन, विकास, विस्थापन और समय की गति के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत करता है; कविता तीन खंडों में unfold होती है और हर खंड में एक अलग यथार्थ पकड़ में आता है, जो मिलकर भारतीय गाँवों की बदलती आत्मा का चित्र बनाते हैं।
पहला खंड:
कवि कहता है कि पहले एक पगडंडी हुआ करती थी, जो गाँव, खेत और जीवन को जोड़ती थी; उस पगडंडी की “मखमली सतह”— एक रूपक है गाँव की सौम्यता, सादगी और मनुष्यों के आपसी तालमेल का; बच्चे, किसान, जानवर और बैलगाड़ियाँ इस पगडंडी पर ऐसे चलते थे जैसे वे प्रकृति की धड़कन के साथ तालमेल में हों।
जब सड़क बनती है, गाँव खुश होता है— क्योंकि सड़क “सपनों का आकाश” देती है; सड़क नगर की ओर ले जाती है और धीरे-धीरे गाँव नगर के आकर्षण में विलीन हो जाता है; इतने बड़े बदलाव के बाद लोग भूल जाते हैं कि यह “विदुर नगर” कभी “सुखनिवास गाँव” था— यह विस्मृति ही कविता की करुणा है; विकास की दौड़ में गाँव की स्मृति मिट जाती है।
दूसरा खंड:
यहाँ कवि खेत और किसान की पगडंडी का चित्र खींचता है; किसान चलते थे तो खेत भी जीवित रहते थे और पगडंडी भी; किसान इस कविता में सिर्फ अन्नदाता ही नहीं, बल्कि धरती से जुड़ी संजीवनी शक्ति का प्रतीक हैं।
जब सड़क खेतों तक पहुँचती है, तो गति बदल जाती है; सड़क “मकड़जाल की तरह” फैलती है— यह अत्यंत महत्वपूर्ण रूपक है जो सड़क को विकास के नाम पर फैलते विनाशकारी तंत्र में बदल देता है।
राजा और मंत्री निर्णय लेते हैं कि खेतों की गति बढ़ाई जाए— और यह वृद्धि खेतों को उद्योगों में बदल देती है; यहाँ विकास का विडंबना-बोध स्पष्ट है— उत्पादन बढ़ तो गया, पर खेत खो गए; किसान खो गए; अन्नदाता का अस्तित्व खो गया; परिणाम यह है कि औद्योगिक क्षेत्रों में करोड़ों-अरबों का उत्पादन तो होता है, पर खेती और किसान की दुनिया मजाक बनकर रह जाती है।
कवि तीखा व्यंग्य करता है— “इनके चक्कर में कहीं आपका चंद्रयान न छूट जाए” — यह पंक्ति उस मानसिकता पर टिप्पणी है जो तकनीक और अंतरिक्ष-विजय पर गर्व करती है, पर अपने अन्न और किसानों के बारे में सोचने को पिछड़ापन मानती है।
तीसरा खंड:
अब सड़क हाईवे बन चुकी है— देश का “तीसरे नंबर का हाईवे”; वह गाँव या नगर को नहीं, बल्कि सीधे महानगर को जोड़ती है— यह रूपक बताता है कि अब छोटे स्थान और मध्यम नगर अप्रासंगिक हो चुके हैं; विकास की सीढ़ी सीधे महानगरों में जाकर टिकती है।
पर गति बढ़ने के साथ जीवन की सुरक्षा घट जाती है; इतनी तेज़ सड़क पर साइकिल या मोटरसाइकिल चलाना आत्मघात जैसा हो जाता है; “गति के फर्राटे और मृत्यु का आतंक”— यह आज की सड़क-सभ्यता का नग्न चित्र है।
अंतिम पंक्तियाँ अत्यंत मार्मिक हैं—
कवि इस हाईवे पर साइकिल चला रहा है और लगातार “108…108” दोहरा रहा है— यह भय, विवशता और उस विडंबना का संकेत है कि जिस सड़क को विकास का प्रतीक बताया गया था, वही सड़क अब मृत्यु और असुरक्षा का पर्याय बन गई।
समग्र भाव:
कविता गाँव से महानगर तक फैली “गति-सभ्यता” के परिणामों पर एक गहरी सामाजिक आलोचना है; पगडंडी का लुप्त होना केवल मिट्टी का लुप्त होना नहीं, बल्कि रिश्तों, स्मृतियों, खेतों, किसानों और सुरक्षित जीवन का लुप्त होना है; सड़क का आना विकास की घोषणा तो है, पर इसके भीतर छिपा विस्थापन, स्मृति-हत्या, भय और असंतुलित गति कवि को भीतर से बेचैन करती है; पूरी कविता एक जीवित प्रश्न बन जाती है— क्या हमने विकास के नाम पर अपने जीवन की जड़ें खो दीं?
“धर्म की गुफा”
इस कविता “धर्म की गुफा” में कवि एक व्यापक सामाजिक परिदृश्य को रचते हुए दिखाता है कि कैसे कला, बुद्धि, प्रदर्शन और समय— ये सब मिलकर आमजन के जीवन को प्रभावित करते हैं, और अंततः आमजन अपनी ही पहचान खोकर धर्म की अंधेरी गुफा में लुप्त हो जाते हैं।
कवि कहता है कि “कवि ज्योतिषी होते हैं, खंगालते रहते हैं भूत-भविष्य-वर्तमान”— यहाँ कवि स्वयं को समय का पारखी बताता है; उसके लिए अतीत, वर्तमान और भविष्य सब एक खुले ग्रंथ की तरह हैं। दूसरी ओर “अभिनेता चमत्कार करते हैं”— उनका हर चरित्र बदलना एक जादू जैसा है। और “कथाकार जादूगर होते हैं”— वे शब्दों से दुनिया का स्वाद बदल देते हैं।
इन तीनों के बाद आता है बुद्धिजीवी— “बुद्धिजीवी समय होते, टिक-टिकाते रहते हैं घड़ियों के साथ”— यह पंक्ति बहुत गहरी है; बुद्धिजीवी सिर्फ समय को समझता नहीं, स्वयं समय बन जाता है। उनके विचार, उनकी चेतना, उनकी घड़ियाँ— सब आमजन पर प्रभाव डालती हैं।
अब कवि दिखाता है कि इन चारों की चमक में आमजन कैसे अपना अस्तित्व खो देते हैं। कवि कहते हैं—
“कवियों को आदर्श मानते हैं, अभिनेताओं के आगे नतमस्तक होते हैं, कथाकारों के सपनों में बिक जाते हैं, और बुद्धिजीवियों की आरती उतारते हैं।”
यहाँ आमजन की वह मानसिकता उजागर होती है जो स्वयं के जीवन को अवमूल्यित कर देती है और दूसरों को देवता बना देती है।
जब लोग कला के “सफ़ेद समुद्र” में अपने जीवन के रंग ढूँढते हैं, तो वे और अधिक रंगहीन होते जाते हैं— यह संकेत है उस विडंबना का जहाँ कला समाज को सजाने के लिए है, पर लोग कला में डूबकर अपने वास्तविक जीवन से कट जाते हैं।
अगली पंक्तियाँ आमजन की त्रासदी की रीढ़ हैं—
उनके प्रेम बिक जाते हैं,
उनका आत्मसम्मान संभ्रांत लोगों के घरों की “सजावट” बन जाता है,
और उनका जीवन “ठेकेदारों की चाकरी” पर चलता है।
यहाँ कवि वर्ग-विभाजन, शोषण और सामाजिक असमानता को अत्यंत तीखे रूप में उभारता है।
अंतिम पंक्तियाँ कविता का सबसे मार्मिक और दार्शनिक निष्कर्ष हैं—
आमजन घूमती पृथ्वी पर चकराते रहते हैं;
वे अपनी पहचान, दिशा और उद्देश्य खो देते हैं;
और एक दिन “धर्म की गुफा” में लापता हो जाते हैं।
यह “धर्म की गुफा” अंधविश्वास, भय, भीड़-मानस, आत्मसमर्पण और पहचान-विलुप्ति का प्रतीक है।
कवि कहता है कि जब मनुष्य कला, राजनीति, रंगीन दुनिया और समय के दबाव में अपनी व्यक्तिगत चेतना खो देता है, तो अंततः वह धर्म की उस अंधेरी गुफा में गिर जाता है जहाँ से लौटना कठिन होता है।
कुल मिलाकर— कविता यह दिखाती है कि कैसे समाज के विभिन्न चमकते स्तंभ— कला, साहित्य, प्रदर्शन, ज्ञान— आमजन को प्रेरित करने के बजाय कभी-कभी उन्हें रंगहीन, दिशाहीन और अंततः अदृश्य बना देते हैं; और जब वे अपने संघर्षों से थककर सत्य की खोज छोड़ देते हैं, तो सबसे आसान रास्ता— धर्म की गुफा— उन्हें निगल लेता है।
“गुटखा”
कवि इस कविता में “गुटखा” और “थूक” को केवल एक व्यक्तिगत आदत या असभ्य व्यवहार की तरह नहीं देखता, बल्कि उन्हें सामाजिक कड़वाहट, व्यवस्था के भ्रष्टाचार और समय की नैतिक विफलता का प्रतीक बनाकर प्रस्तुत करता है।
कविता की शुरुआत साधारण-सी बात से होती है—
कवि गुटखा खाकर थूकता है और इसके कारण “सभ्य समाज” उसे अपमानित करता है;
यह वह दृश्य है जहाँ समाज किसी व्यक्ति की आदत पर तो तिरस्कार करता है,
लेकिन समाज की गहरी बीमारियों पर मौन रहता है।
कवि कहता है— “गुटखा खाना या थूकना या थूक का निशान— क्या है जो सभ्य समाज को पसंद नहीं?”
यह प्रश्न असल में व्यंग्य है।
कवि को समझ नहीं आता कि उसकी थूक से समाज को धिक्कार महसूस होता है,
लेकिन उसी समाज को भ्रष्टाचार, हिंसा, स्त्री उत्पीड़न, सत्ता की दगलबाजियाँ—
इनसे कोई तकलीफ़ नहीं होती।
जब कवि गुटखा छोड़ देता है,
तो उसकी “थूक” आदत नहीं, प्रतिरोध बनकर उभरती है।
अब “थूक” किसी पान-मसाले का अवशेष नहीं,
बल्कि नैतिक घृणा है—
उस हर चीज़ पर जो समाज को भीतर से सड़ाती है।
टीवी पर नेता जब सेल्समैन की तरह झूठ बेचते हैं—
कवि का मुँह थूक से भर जाता है।
सड़क पर एक स्त्री पिट रही है और तमाशबीनों की भीड़ खड़ी है—
कवि उन पर थूक देता है।
अख़बार में बलात्कार की खबरें—
कवि को लगता है देश के सारे वॉशबेसिन भी कम पड़ जाएँ।
दिहाड़ी मारने वाला सेठ,
घोटाले, बाजार की झूठी सुंदरता, किसान की विवशता—
इन सबकी कड़वाहट कवि के भीतर थूक बनकर जमा होती है।
यहाँ थूक = समय की अश्लीलता पर कवि का नैतिक प्रतिकार है।
लेकिन विडंबना यह कि—
हर बार समाज को कवि की थूक से असुविधा होती है,
उन कारणों से नहीं जिनसे यह थूक जन्म लेती है।
अंतिम पंक्ति कविता का मुकुट है—
“गुटखा और थूक में कोई सम्बन्ध नहीं;
जिस कड़वाहट से जन्मता है थूक,
वह तम्बाकू का नहीं— हमारे समय की कड़वाहट है।”
यह पंक्ति पूरी कविता का अर्थ-बिंदु है।
यह बताती है कि कवि की थूक असभ्यता नहीं,
बल्कि एक नैतिक प्रतिक्रिया,
एक सामाजिक असहमति,
एक अंतर्निहित विद्रोह है।
कुल मिलाकर—
कविता “थूक” के बहाने हमारे समय की राजनीति, सामाजिक हिंसा, भीरुता, और पाखंड को कटघरे में खड़ा करती है;
और यह कहती है कि समस्या थूक नहीं है—
समस्या वह कड़वाहट है जो इस समय ने हमें मजबूर होकर थूकने पर ला खड़ा किया है।
“थूकना”
कवि कहता है कि “यहाँ-वहाँ थूकना मना है सभ्य समाज में” और इस सरल-सी पंक्ति से वह उस पूरे ढाँचे को उजागर करता है जहाँ सभ्यता का मापदंड केवल बाहरी आचरण पर टिकाकर देखा जाता है; कवि आगे “अगर थूकना ही है तो आपको तलाशनी होगी वाशबेसिन” कहकर यह दिखाता है कि समाज को समस्या थूक से कम और उसकी दृश्य उपस्थिति से अधिक है, यानी बीमारी का भय अपने स्थान पर सही है पर उससे भी बड़ा भय है व्यवस्था की सतह पर उभरती असुविधा का; “जिसमें चुपके से थूककर बहा दें उसे नाली में” इस कथन में छिपी हुई व्यंग्यात्मक ध्वनि यह प्रकट करती है कि समाज सच को छुपाकर साफ-सुथरा दिखना चाहता है, सच चाहे जितना कड़वा क्यों न हो; कवि यह भी इंगित करता है कि “थूक से संक्रमण होने की संभावना होती है” पर वास्तविक संक्रमण केवल शारीरिक नहीं बल्कि मानसिक, सामाजिक और नैतिक स्तर पर भी है जहाँ लोग दिखावे की सभ्यता में जीते हैं पर भीतर की सड़न पर कोई ध्यान नहीं देते; और अंत में, “संक्रमण से सरकार और सभ्य समाज भयभीत रहते हैं” पंक्ति में कवि एक गहरे कटाक्ष के साथ बताता है कि जिन समस्याओं से डर दिखाया जाता है, वे केवल बाहरी डर हैं—वास्तविक संक्रमण तो उनके भीतर है जो नियम तो बनाते हैं, पर मनुष्य को, उसकी पीड़ा को, और समय की सच्चाइयों को नहीं समझते; इस प्रकार पूरी कविता थूक को एक प्रतीक बनाकर सभ्यता के कृत्रिम ढांचे और सामाजिक भय की विडंबना को उजागर करती है।
लड़की प्रेम और कम्प्यूटर
कवि कहता है कि “कम्प्यूटर की स्क्रीन पर उदास बैठी उस लड़की के बदसूरत चेहरे को माउस और कीबोर्ड ने सुंदर और मासूम बना दिया” और इस आरंभिक चित्र में वह दिखाता है कि तकनीक किस तरह वास्तविकता के क्षत-विक्षत आत्मविश्वास पर एक चमकदार आवरण चढ़ा देती है; फिर “लड़की पूरे आत्मविश्वास से उठी और मॉडल की तरह कैटवॉक करती हुई वास्तविक दुनिया में चली गई” इस वाक्य में कवि यह संकेत देता है कि आभासी सुंदरता से जन्मा आत्मविश्वास वास्तविक दुनिया की कठोरता को नहीं पहचान पाता, जहाँ “प्रेम की नदी उफन रही थी” पर लड़की “तैरने के दाँव-पेंच” नहीं जानती थी, और उसी अज्ञान में डूबकर खत्म हो जाती है; नदी पर तैरती चिट्ठी में जब लिखा मिलता है कि “नींद खुलते ही सपने मर जाते हैं”, कवि यह स्पष्ट करता है कि आभासी संसार में उकेरे गए सपने जागृत जगत की सच्चाइयों के सामने टिक नहीं पाते और कम्प्यूटर की स्क्रीन पर खड़ी दुनिया केवल भ्रम भर है।
कवि आगे दूसरे चित्र में कहता है कि “कम्प्यूटर की स्क्रीन पर प्रेम का बाज़ार लगा था” जहाँ प्रेम वस्तुओं की तरह बिक रहा है, कोई आँखों के बदले प्रेम खरीद रहा है, कोई चेहरे के बदले, कोई शरीर, कोई धन-दौलत के बदले—और इस व्यापारिकता में प्रेम की आत्मा खो चुकी है; लड़की इस बाज़ार की असलियत नहीं समझती और “दिल के एवज़ में” बोली लगा बैठती है, ठीक उसी क्षण उसके भीतर “एक भयानक विस्फोट” होता है, यानी उसकी भावनाएँ सभ्यता की लालची स्क्रीन पर टिक नहीं पातीं और उसका जीवन “चिंदी-चिंदी” होकर बिखर जाता है; कवि कहता है कि कम्प्यूटर कुछ देर “हैंग” रहने के बाद “रीबूट” होता है, और नई स्क्रीन पर एक “नई लड़की का चेहरा” उभर आता है, जो बताता है कि बाज़ार को न लड़की से कोई मतलब है, न उसके दिल से—यह चक्र चलता रहता है, चेहरे बदलते रहते हैं और प्रेम की जगह केवल उपभोग और छल का खेल चलता रहता है; इस पूरे ताने-बाने में कविता आभासी दुनिया की चमक, वास्तविक दुनिया की क्रूरता और प्रेम के बाज़ारीकरण पर एक गहरी करुण टिप्पणी बन जाती है।
“क्लिक”
कवि कहता है कि “एक क्लिक होता है” और इसी छोटे-से क्रिया-चिह्न के भीतर वह आधुनिक समय की भयावह शक्ति को समेट देता है; जैसे ही क्लिक होता है “सूखा पड़ जाता है, महामारी फैल जाती है, सत्ता बदल जाती है” — इन पंक्तियों में कवि यह दिखाता है कि डिजिटल युग में एक छोटी-सी तकनीकी क्रिया अब प्राकृतिक आपदाओं, सामाजिक उथल-पुथल और राजनीतिक उलटफेरों के समान प्रभाव डालने लगी है, क्लिक मात्र से “ऊसर हो जाते हैं हरे-भरे खेत” और “धरती चपटी हो जाती है”, यह अतिशयोक्ति नहीं बल्कि उस झूठ, मिथ्या ज्ञान और डिजिटल प्रोपेगैंडा का संकेत है जो वास्तविकता को तोड़मरोड़कर नए रूप में प्रस्तुत कर देता है; कवि कहता है कि “सूर्य बर्फ का गोला बन जाता है” और “मुर्दे बाज़ार में निकल पड़ते हैं” — ये चित्र प्रतीक हैं उस उलटबाँसी की जिसमें सत्य–असत्य, वास्तविक–काल्पनिक, जीवन–मृत्यु की सीमाएँ तकनीक के बटन-भर से धुँधली हो जाती हैं।
फिर कवि कहता है कि “श्मशान स्मार्ट सिटी में बदल जाता है” और इसी एक पंक्ति में वह आधुनिक विकास-नारे की खोखली चमक को बेनकाब करता है, जहाँ मृत्यु और पीड़ा को भी तकनीक की रोशनी में सजाकर दिखाया जाता है; इसके बाद वह कहता है कि “जीवन बेतहाशा भागता फिरता है आत्महत्या की तलाश में”, यह आधुनिक मनुष्य की बेचैनी और डिजिटल दबावों से जन्मी मानसिक विकृति का मार्मिक संकेत बन जाता है। कवि दोहराता है “एक क्लिक होता है” और दिखाता है कि कैसे “अच्छा-भला खेल का मैदान युद्ध के रुदन से भर जाता है”, यह वैश्विक राजनीति और डिजिटल उन्माद का परिणाम है, जहाँ खेल का मैदान—यानी मासूमियत—एक बटन भर से युद्धभूमि में बदल जाती है; फिर “बाज़ार मुँह के बल गिर जाता है, रुपए का खून हो जाता है”, यह अर्थव्यवस्था की नाज़ुकता और क्लिक-आधारित सट्टेबाज़ी का व्यंग्य है।
कवि आगे कहता है कि “चारों तरफ़ कैमरे चमकने लगते हैं, पूरी धरती कम्प्यूटरों से भर जाती है, मनुष्य लुप्त हो जाते हैं” — यह आधुनिक निगरानी संस्कृति, डिजिटल सर्वव्यापकता और मनुष्य की आत्मा के धीरे-धीरे मिट जाने का गहरा प्रतीक है; अंत में वह कहता है कि “पेड़ प्लास्टिक में बदल जाते हैं और सचमुच का शेर बैठक में सजावट की वस्तु बन जाता है”, इस चित्र में कवि प्रकृति के विनाश और जीवित प्राणियों के वस्तुकरण की ओर इशारा करता है, जहाँ सचमुच का जीवन केवल एक साज-सज्जा बनकर रह जाता है; पूरी कविता में कवि प्रवाहमान शैली में यह चेतावनी देता है कि एक क्लिक—सिर्फ एक क्लिक—आज दुनिया को बदलने, बिगाड़ने और मिटाने का सबसे बड़ा हथियार बन चुका है, और यही हमारे समय का सबसे खतरनाक सत्य है।
लोहा, मशीन और मनुष्य
कवि कहता है कि “लोहे से बनती है मशीन और मनुष्य भी” — यह प्रारंभिक पंक्ति ही मनुष्य और मशीन के बीच एक सूक्ष्म, किंतु गहरा सेतु बना देती है; कवि मानो यह संकेत देता है कि मनुष्य के भीतर भी “लोहे” की उपस्थिति है — उसके रक्त में घुला वह लौह तत्व — परंतु यह समानता केवल सतही है; आगे कवि कहता है कि “नसों का जटिल तंत्र जुड़ता है दिल से, जिसके धड़कने से बहता है नसों में लोहारक्त” — ये पंक्तियाँ दिखाती हैं कि मनुष्य का जीवन उस लौह-समृद्ध रक्त पर टिका है, जो उसके अस्तित्व को गति देता है, जैसे बिजली मशीन को चलाती है, वैसे ही रक्त की गति मनुष्य को चलाती है।
पर कवि कहता है कि “मनुष्य मशीन की तरह ठोस और कठोर नहीं होता कभी भी”, यहाँ वह दोनों के बीच मूलभूत अंतर खोल देता है—मशीन लोहे के ठोसपन से बनती है, जबकि मनुष्य प्रेम, संवेदना और ताप से; फिर वह कहता है कि “मशीन की तरह चलते हुए मनुष्य में प्रेम की भट्टी जलती रहती है”, यह अत्यंत सुंदर रूपक है—कवि दिखाता है कि मनुष्य का हृदय वह ‘भट्टी’ है जिसमें प्रेम की ऊष्मा लगातार जलती रहती है, और यही ऊष्मा “लोहे को द्रव्य में बदलती रहती” है—अर्थात मनुष्य की कठोरता को पिघलाकर उसे मुलायम, कोमल और मानवीय बनाती है।
कवि आगे कहता है कि “जिस दिन बुझ जाती यह भट्टी, मनुष्य मशीन में बदल जाता है”, यह सबसे मार्मिक चेतावनी है—यदि प्रेम, करुणा और संवेदना की आंच बुझ जाए, तो मनुष्य केवल एक ठोस, कठोर, यांत्रिक इकाई बनकर रह जाता है; कविता के अंत में कवि कहता है कि मशीन की तरह चलने वाला मनुष्य जब प्रेम विहीन हो जाता है, तब उसका मानवत्व समाप्त हो जाता है, वह केवल एक लोहे की चाल—ठंडी और असंवेदनशील—का प्रतिरूप बनकर रह जाता है।
इस प्रकार पूरी कविता प्रवाहमान भाव से यह कहती है कि मनुष्य और मशीन में यदि कोई भेद है, तो वह केवल प्रेम की भट्टी का है; उसी की ऊष्मा मनुष्य को मनुष्य बनाए रखती है।
दूसरे ग्रहों पर जीवन
कवि कहता है कि “सड़क की गति में बाधक था पेड़ का कटना” — यह आरंभ ही एक तीखी विडंबना खोल देता है; जिस पेड़ ने मनुष्य को हवा, छाया और जीवन दिया, वही आज विकास की गति में बाधा माना जा रहा है; आगे कवि कहता है कि “पहाड़ को तो कटना ही था”, और यह पंक्ति मनुष्य की अधीरता और लालच का रूपक बन जाती है—जहाँ प्राकृतिक सौंदर्य और संतुलन को विकास के नाम पर निर्ममता से तोड़ा जा रहा है; फिर कवि कहता है कि “मनुष्य जंगल से बाहर निकलकर सभ्य हो चुका था, फिर जंगल का क्या काम”—यह पंक्ति पूरी सभ्यता के अहंकार पर व्यंग्य है, जैसे मनुष्य ने प्रकृति से संबंध तोड़ देना ही अपनी प्रगति मान लिया हो।
कवि कहता है कि “अन्न की जगह ले चुका था रुपया”, यह जीवन के मूल्यों में पलट को दर्शाती है; खेत अब कॉलोनियों में बदल गए, और विकास का पटाखा मनुष्य के पीछे बाँधकर आग लगा दी गई, इस तीव्र रूपक में कवि दिखाता है कि कैसे विकास की अंधी दौड़ में लोग बेतहाशा भाग रहे हैं, और विकास स्वयं आकाश में खड़ा होकर मुस्करा रहा है; धीरे-धीरे “आभासी मनुष्य” जन्म ले लेते हैं—ये मानव नहीं, बल्कि तकनीक से बने हुए, भावहीन, चमकदार छाया-प्राण हैं; और कवि कहता है कि समाज धातु युग में लौट आया है, जहाँ खड़खड़ाती ध्वनियाँ—मशीनों की आवाजें—अट्टहास कर रही हैं, और इसी बीच मनुष्य दूसरे ग्रहों पर जीवन ढूँढ़ रहा है, जबकि पृथ्वी का जीवन ढह रहा है।
दूसरे भाग में कवि कहता है कि एक दिन शायद हम दूसरे ग्रहों पर जीवन खोज भी लें; तब हर ग्रह पर अपनी-अपनी प्रकृति, जीव-जंतु होंगे और हम अलग-अलग ग्रहों के लोग अपने अनुभव साझा करेंगे, और जीवन बहुत चमकदार और स्वप्निल दिखाई देगा; पर कवि कहता है कि “इसी चमकदार और स्वप्निल भविष्य में चौंधिया गया है वर्तमान”—अर्थात भविष्य की कल्पना इतनी तीव्र है कि वर्तमान उसके तेज में धुँधला गया है, और भूत भी उस चमक के पीछे दुबक गया है।
कवि फिर एक गहरी चेतावनी देता है—कि यदि केवल भविष्य ही हमारे स्वप्नों में रहेगा, तो भूत और वर्तमान दोनों से मुक्त एक ऐसा समय आएगा जहाँ हम खुद ही गुम हो जाएंगे; हमारी पहचान, हमारा समाज, हमारी संस्कृति, हमारी भाषा सब भूत की गोद में छिप जाएँगे, और वर्तमान का दर्पण इतना चकाचौंध होगा कि हम अपना ही चेहरा नहीं पहचान पाएंगे।
इस प्रकार पूरी कविता यह कहती है कि दूसरे ग्रहों पर जीवन खोजने से पहले मनुष्य को अपने खोते हुए जीवन, अपनी मिटती हुई पृथ्वी और अपने धुँधले होते मानवीय मूल्यों को बचाना होगा—वरना भविष्य की चमक में हमारी पहचान विलुप्त हो जाएगी।
डॉ. आर डी आनंद
L-1316, आवास विकास कॉलोनी,
बेनीगंज फैजाबाद,
अयोध्या 224001
मो.9451203713
परिवर्तन का चेहरा,
मेरा ही आचरन है!
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