घर की सारी घड़ियों के बंद पड़े होने की समस्या के साथ पति-पत्नी में बातों का जो सिलसिला शुरू होता है, वह इस विवाद में अपने क्लाइमेक्स पर पहुँचता है कि यह साल 2014 है या 2024? निहायत अ-राजनीतिक प्रतीत होती यह कहानी बहुत आहिस्ता एक राजनीतिक कहानी में तब्दील हो जाती है जब लेखक 2014 का साल चुनता है, ‘कुछ भी न जानने वाली निरीह जनता की तरह सो जाने’ की बात करता है, और इशारा करता है कि हो सकता है सोकर उठने पर साल तो 2014 ही हो और ये पात्र सेवानिवृत्त न हुए हों, पर इनकी नौकरियाँ कॉर्पोरेट की ग़ुलामी में तब्दील हो गयी हों! पढ़िए, तीन महीने पहले प्रकाशित बसंत त्रिपाठी की कहानी ‘समय’।

रात का ही कोई वक़्त था जब नींद अचानक टूट गई। न मालूम ऐसा क्यों होता है कि जब नींद टूटती है तो मैं सबसे पहले यह जान लेना चाहता हूँ कि समय कितना हुआ है। हालाँकि समय जान लेने के बाद न खुश होता हूँ, न उदास। बस, सुबह उठने के बाद कभी-कभी याद रह जाता है कि नींद रात के दो बजकर तिरालिस मिनट पर टूटी थी, या चार बजकर सत्रह मिनट पर, या तीन बजकर इक्कीस मिनट पर। जितनी बार सुबह उठने के बाद नींद टूटने का समय याद रह पाया, उससे बहुत कम बार, बहुत ही कम बार, मैंने किसी को बताया कि नींद रात के ठीक इतने बजे टूट गयी थी और फिर आयी ही नहीं।
वैसे टूटी नींद का वक़्त किसी को बताने की कोई ख़ास वजह भी नहीं थी। हालाँकि एकाध बार मैंने कोशिश ज़रूर की थी। लेकिन सामने वाले ने मेरी बात अनसुनी कर अपने कब्ज़ के बारे में बताना ज्यादा ज़रूरी समझा। उसने कब्ज़ के बारे में विस्तार से बताने के बाद अपने बैंक बैलेंस के बारे में भी संक्षेप में बताया था और फिर बाद उसके कि वह अगले महीने केदारनाथ की यात्रा पर सपत्नीक जा रहा है। उस वक़्त हालाँकि मेरा मन यह कहने का ज़रूर हुआ था कि केदारनाथ या किसी भी तीर्थ-हज की यात्रा नींद में चलने, चलते रहने की बीमारी का एक लक्षण है, लेकिन कहा नहीं। आजकल इतनी से बात के लिए भी लोग केस कर देते हैं या पीट देते हैं।
अभी जब नींद टूटी तो आदतन हाथ मोबाइल की ओर चला गया। मोबाइल की स्क्रीन पर कोई हरकत नहीं हुई। वह भी गहरी नींद सो रहा था। दो-चार बटन दबाकर मैंने उसे झिंझोड़ा। लेकिन वह जागा नहीं। अपना स्विच ऑफ़ करके सो रहा था। देर तक एक बटन को कोंचे रखा, तब जाकर जागा वह कमबख्त। लेकिन टाइम की जगह ख़ाली थी। आप यक़ीन नहीं करेंगे लेकिन टाइम की जगह सचमुच ख़ाली थी! वह शायद अपना प्रतिशोध ले रहा था।
समय, कि कितना बजा है, यदि न मालूम हो तो उसे जान की लेने इच्छा दिल में हूक की तरह उठती है। आख़िरकार कमरे की मद्धिम लाइट जलाकर दीवार घड़ी पर नज़र डाली। वह भी कमबख्त बंद थी। शायद उसका सेल दम तोड़ चुका था। अब कलाई घड़ी का ही आसरा था। मेरे पास चार-चार कलाई घड़ियाँ हैं और मैं उन्हें बदल-बदलकर पहनता हूँ। यानी चारों ही नियमित उपयोग में हैं। लेकिन…चौंका मैं….चारों ही इकट्ठे बंद..! मुझे ठीक-ठीक याद है कि चारों के सेल मैंने इकट्ठे नहीं बदले थे। फिर भी चारों एक साथ बंद!
पत्नी सोयी हुई थी। हालाँकि रात-बिरात की मेरी हरकत से वह नींद में कुनमुना रही थी। लेकिन मैं क्या कर सकता था। मैं दुनिया में अपनों को थोड़ा-बहुत परेशान कर समय को जान ही लेना चाहता था। अपनों को थोड़ा बहुत परेशान कर अपना काम साध लेना इतना भी बुरा नहीं है, जब आप खुद थोड़ा-बहुत परेशान होकर अपनों को भी काम साधने की छूट देते हैं। ज़ाहिर है कि मैं भी इसे बहुत बुरा नहीं मानता।
मैंने चुपके से उसका मोबाइल टटोला। चुपके से इसलिए कि चोरी से किसी का मोबाइल छूना मुझे ठीक चोरी करने जैसा ही लगता है। मोबाइल का बटन दबाते ही स्क्रीन पर एक भयंकर खोपड़ी उभरी। भयंकर तरीके से हँसती हुई। ह: ह: ह: ह:…
मारे घबराहट के मेरे मुँह से चीख निकल गयी और मैंने मोबाइल फेंक दी, हालाँकि बिस्तर पर ही। रात-बिरात की इतनी हरकत पत्नी को जगाने के लिए काफ़ी थी।
क्या हुआ?— घबराहट में उसने पूछा। मारे डर के मैं काँप रहा था। पसीना-पसीना हो गया था। नवंबर के उतार की ठंड, जबकि रात में बिना पंखों के सोने की शुरुआत हो चुकी थी, के बावजूद।
मेरा दिल तेज़ी से धड़क रहा था। दरअसल एक बार मेरा ब्लडप्रेशर बहुत बढ़ गया था। ईसीजी में भी थोड़ी दिक़्क़त थी। ‘एंजियोग्राफी में कुछ ब्लॉकेज़ दिखे हैं। हालाँकि एंजियोप्लास्टी अभी तुरंत की ज़रूरत नहीं है। लेकिन समय रहते करा लेना ठीक रहेगा,’ तब डॉक्टर ने यही कहा था।
‘क्या हुआ?’ पत्नी ने फिर पूछा।
‘तुम्हारे फोन में भूत है।’
टूटी नींद से कुनमुनाकर उठी पत्नी हँसी। ठहाके लगाकर हँसी। जैसे वह सोयी ही न हो। ‘तुमने मेरा फोन क्यों छुआ?’ हँसी और निष्क्रिय नाराज़गी के साथ उसने पूछा था, ‘वो मेरे फोन का प्रोफ़ाइल पिक्चर है।’
‘तुम फूल या चिड़िया या किसी सुंदर प्राकृतिक चित्र वाला प्रोफ़ाइल पिक्चर क्यों नहीं रखती हो? कभी घिनौना कॉकरोच, कभी साँप की लपलपाती जीभ, कभी खून से भीगा हुआ चाकू और अब यह भयंकर खोपड़ी?’
‘इसलिए कि सुंदर चीज़ें अपनी अहमियत खो चुकी हैं। अब भय ही सत्य है। और इस भय को जन्म देने वाला आतंक अंतिम सत्य। मेरा मोबाइल इस सत्य की गवाही देता है,’ पत्नी ने मनोविज्ञान के पहुँचे हुए आलिम की तरह अपना ज्ञान फेंका था। थी भी वह मनोविज्ञान की ही तो प्रोफेसर!
‘हम लोग रात के कितने बजे यह बहस कर रहे हैं?’ मैंने पूछा।
‘मतलब?’
‘मतलब अभी समय कितना हुआ है? समय जानने के लिए ही मैंने तुम्हारा मोबाइल छुआ था। मेरे मोबाइल में समय ग़ायब है और घर की सारी घड़ियाँ बंद हैं।’
‘बंद है?’ पत्नी आश्चर्य में थी और मैं प्रसन्न, कि चलो अब दो लोग मिलकर परेशान होंगे। अकेला परेशान आदमी दुनिया का सबसे ज़्यादा दुखी आदमी होता है।
पत्नी ने अपना मोबाइल फिंगर पासवर्ड से खोला। समय वहाँ भी नहीं था।
‘टी.वी. चलाकर देखते हैं। वहाँ समय ज़रूर होगा,’ पत्नी तत्परता से उठी। टी.वी. चलाकर देख लिया गया। ख़बरें, फ़िल्म, विज्ञापन, संगीत, भक्ति सब उसमें था। बस समय नहीं था। कम्प्यूटर, लैपटॉप, टैबलेट सब खँगाले गये। सब चालू हालत में थे। केवल समय गायब था।
फोन करना सही नहीं लग रहा था। न मालूम रात के इस अनजाने वक़्त में किसी को फोन करना ठीक रहेगा या नहीं। फिर भी, समय को जान लेना अब हम दोनों की ज़िद बनती जा रही थी। हालाँकि न हमें ट्रेन पकड़नी थी और न ही ऑफ़िस जाना था।

‘सुबह पड़ोसी से पूछ लेंगे,’ पत्नी ने दिलासा दी। वह मेरी अनावश्यक परेशान हो जाने की आदत जानती थी। ‘या कहो तो बच्चों से फोन कर पूछ लें?’
‘हाँ, अभी पूछो। फोन पर पूछो। अजीब तो लगेगा, लेकिन पूछो। समय की जानकारी से बाहर कर दिये गये माता-पिता का इतना हक़ तो अपने बच्चों पर बनता ही है,’ मैंने यह हक़ वाली बात चुपचाप अपने आप से कही।
‘आउट गोइंग बंद है। दोनों सिम की आउट गोइंग बन्द है,’ पत्नी हताश थी।
मैंने अपना फोन चेक किया। वही इधर का भी हाल था।
‘छोड़ो, सो जाते हैं। सबेरे आराम से उठेंगे और पड़ोसी से टाइम पूछ लेंगे,’ अब जबकि मैं पत्नी की नींद पूरी तरह उड़ा चुका था, किसी शांत-चित्त, धीर-गंभीर-प्रशांत अभिनेता की तरह समझाते हुए कहा।
‘क्यों, तुम्हें ऑफ़िस नहीं जाना है? तुम नहीं जाना चाहते हो तो मत जाओ। लेकिन मुझे तो जाना ही है।’
‘ऑफ़िस….? मुझे ऑफ़िस जाना है? और तुम्हें भी? भूल गयी कि हम लोग रिटायर हो चुके हैं!’
‘रिटायर…? वो कब हुए? तुम कब हो गये रिटायर? और मैं भी ? पागल हो गये हो क्या? कैसी बहकी-बहकी बातें कर रहे हो? तबीयत तो ठीक है?’ ये सारे सवाल पत्नी ने मशीनगन की तरह दाग दिये थे मुझ पर… तड़-तड़-तड़-तड़…
मैं आश्चर्य से देखता रहा। थोड़ा भय भी मेरे चेहरे पर उतर आया था। इस तरह बहकी-बहकी बातें तो वह कभी नहीं करती। फिर आज अचानक ऐसा!
‘देखो मालती,’ मैंने कहा, और कहते हुए उसके माथे को छूकर देखा कि कहीं बुखार में बौरायी हुई तो नहीं है, ‘मनुष्य अपने जीवन में कभी रिटायर्ड नहीं होता। जब तक साँस चलती रहती है तब तक काम भी चलता रहता है। हम लोग केवल सरकारी काम से रिटायर हुए हैं। जिसने ज्वाइन किया है उसे एक न एक दिन तो रिटायर होना ही होता है न। मैं पैंसठ का हूँ और तुम छियासठ की। क्या रिटायर होने का यह वाजिब कारण नहीं है?’
‘बकवास बंद करो, अशोक। ये काम और जीवन का फलसफ़ा मुझे मत बताओ। अभी हम रिटायर नहीं हुए हैं। कल मुझे काम पर जाना है, और तुम्हें भी जाना है क्योंकि कल छुट्टी का दिन नहीं है। और हम छियासठ और पैंसठ के कब हो गये? हम छप्पन और पचपन के हैं, छियासठ और पैंसठ के नहीं।’
‘पागल हो गयी हो क्या?’ मैंने खीझ का कहा। मैं पाँच साल पहले रिटायर हो चुका हूँ और तुम एक साल पहले। कारण भी बताऊँ? क्योंकि मैं राज्य के प्रशासनिक पद पर था और तुम सेंट्रल युनिवर्सिटी में प्रोफेसर। मुझे लगता है जैसे मुझे किसी अच्छे कार्डियोलॉजिस्ट की ज़रूरत है, वैसे ही तुम्हें भी किसी अच्छे सायकेट्रिस्ट की ज़रूरत है।
‘अच्छा, मुझे! बल्कि तुम्हें दोनों की एक साथ ज़रूरत है। वो फाइल निकालो, जिसमें तुम्हारे और मेरे जन्म-प्रमाणपत्र रखे हुए हैं।’
फाइल निकाली गयी। पत्नी मुझसे एक साल बड़ी थी। यह तो वह पहले भी मान चुकी थी। लेकिन समस्या अभी हल कहाँ हुई थी। बल्कि वह तो और भी उलझ गयी थी। पत्नी का कहना था कि यह 2014 का वर्ष है और मैं कह रहा था कि यह 2024 है।
व्हाट्सएप्प, फेसबुक, गूगल, ई-मेल, इंस्टाग्राम, मैसेजेस, मैसेंजर, टेलीग्राम सबमें पोस्ट थे, संदेश थे, बस डिलीवरी का समय, दिन, महीना, साल ग़ायब था। कैलेण्डर रखना हम कब का छोड़ चुके थे। पत्रिकाओं और पुस्तकों के लिए घर में कोई जगह ही नहीं थी। अगर होती तो पुस्तकें और पत्रिकाएँ भी होतीं। और हम उनके संस्करण या अंक देखकर महीने और साल का अंदाज़ा लगा लेते! कम-से-कम इसका अंदाज़ा तो लग ही जाता कि हम 2014 से आगे निकल आये हैं या नहीं। पहली बार हम दोनों ने समवेत दुःख में इस बात को स्वीकारा कि किताबें हमारी दुनिया से चुपचाप चली गयीं। मुझे इसका थोड़ा कम दुःख था। क्योंकि मैं तो प्रशासनिक अधिकारी था। पत्नी को ज़्यादा। क्योंकि अध्यापन से संबंध रखने के बावजूद बरसों से उसने घर में रखने के लिए कोई किताब नहीं ख़रीदी। उसने ज़रूर सोचा होगा कि उसे तो बहुत पहले रिटायर हो जाना चाहिए था। बल्कि बर्ख़ास्त कर दिया जाना चाहिए था। लेकिन फिर खुद को दिलासा भी दिया होगा कि पूरी लगन से काम न करने के कारण बर्ख़ास्त कर देना बेहतर है तो पहले सरकार को बर्ख़ास्त कर देना चाहिए। कहा कुछ नहीं। ऐसे मौक़े पर उसके चेहरे की रेखाओं से मैं समझ जाता कि वह क्या सोच रही है।
अब समय को जानने का कोई तरीक़ा हमारे पास नहीं बचा था। ऑनलाइन बिल से भी अंदाज़ा लगाया जा सकता था। सारे बिल हम ऑनलाइन ही भरते हैं। लेकिन मोबाइल किस कदर विद्रोह पर उतारू था, यह तो आप जान ही गये होंगे। उसने हर जगह से समय को गायब कर दिया था।
पड़ोसियों का दरवाज़ा खटखटाने का कोई अर्थ नहीं था। क्योंकि इतना तो अनुभव से जानते ही थे कि रात का कोई ऐसा वक़्त है जब उनका दरवाज़ा खटखटाना ठीक नहीं होगा। तबीयत बिगड़ जाती तो बात दूसरी थी। लेकिन केवल समय पूछने के लिए पड़ोस में जाने का चलन अब हमारे समय में नहीं है। हम दोनों ने एक साथ अपने बचपन के उन दिनों को याद किया जब कभी भी पड़ोसी का दरवाज़ा खटखटाकर टाइम पूछ लिया जाता। तब दीवाल घड़ियाँ तरह-तरह की घंटियों और सीटियों या पंछी के चहचाहने की आवाज़ के साथ समय बताती रहतीं। हम दोनों ने नारखेड़े और खान अंकल की दीवाल घड़ियों को याद किया जिनकी हर घण्टी बाक़ायदा पास-पड़ोस में गिनी जाती थी। दरअसल हम दोनों बचपन में पड़ोसी ही थे और अब पति पत्नी।
लेकिन फिलहाल तो हम दोनों समृद्ध बचपन का उपेक्षित बुढ़ापा थे। उम्र के उस पायदान पर खड़े जहाँ परेशानी में बीता बचपन भी कई बार सुखद और अप्रतिम लगता है।
हमारे पास समय जानने का कोई विकल्प नहीं है— हताशा में एक दूसरे का कंधा थपथापाते हुए हमने कहा। आख़िर हमने कुछ भी न जानने वाली निरीह जनता की तरह सो जाना ही मुनासिब समझा और सो गये। सोते हुए हम दोनों ने एक दूसरे से कहा – सुबह यदि 2014 में उठेंगे तो काम पर निकल पड़ेंगे और यदि 2024 का साल हुआ तो काम पर जाने की ज़रूरत ही नहीं होगी, क्योंकि हम रिटायर हो चुके होंगे।
‘वैसे एक संभावना,’ मैंने पत्नी से कहा, ‘और भी हो सकती है कि हम 2014 में ही जागें। हम पचपन और छप्पन के ही हों और हमारे पास कोई काम न हो। हम पूरी तरह से बेकाम हो चुके हों। तुम्हारी युनिवर्सिटी प्राइवेट हो चुकी हो और मेरी प्रशासनिक सेवा किसी कॉर्पोरेट के हाथों बेची जा चुकी हो।
पत्नी न सहमत, न असहमत।
हमने बची-खुची रात को नींद के हवाले कर देना ही ठीक समझा।
मो. 9850313062
basantgtripathi@gmail.com







Story bohot achhhi h sir . Ham sabhi ko aadat joti h raat me need khulne par time dekhane ki😊
समय का रूक जाना या खो जाना यह कितनी बड़ी त्रासदी है ,समय जो चौदह के बाद से एक ख़ास ज़ोन में चला गया है ,एक खास किस्म के लोग ही इसे जी रहे बाकी तो उजबक की तरह बस देख रहे ।
वर्तमान को दर्ज करती बहुत अच्छी कहानी ।बसंत जी को बधाई ।