सात कविताएँ / श्री कृष्ण नीरज


इस बार ‘ऊंचाई की नोक से आसमान में ख़त लिखते पहाड़ों को’ निहारनेवाले श्री कृष्ण नीरज की कविताएँ :

1. चाय

एक ही रात की तो दूरी है
इलाहाबाद से मेरठ की
रेल पकड़ो और चली आओ

आओ कि तुम्हारे आने से देहरियाँ सांस लेंगी
दीवारें पूछेंगी कैफियत
और बताएंगी अपनी रिक्तता
मेरा क्या, मेरी आंखों में तुम पढ़ लेती हो मेरी तबियत

आओ कि चाय मैं ही बनाऊंगा
अदरक मैं ही कूटूंगा
पत्ती तेज ही रखूंगा जैसा कि तुम्हे पसंद है
उतनी देर तक पकाउंगा चाय
अक्सर जितनी देर तक हम नजरें मिलाते हैं
रंग भी तो तुम्हें कत्थई ही पसंद है
जहां कहोगी वहीं एक कोना तलाश लेंगे
आओ हमारे बीच चाय के भाफ़ जितनी दूरी होगी

चाय का नाम सुनकर
मुझे मत समझ लेना झूठा
मैं प्रधानमंत्री नहीं हूं
और न ही लड़ने जा रहा हूं चुनाव
मुझे इंटरनेट पर भी मत ढूंढना
मैं चाय से करतब नहीं दिखाता

प्रोफेसर व चिंतक भी नहीं हूं
कि पत्नी से बनाने को कहूं चाय
और दोस्तो संग चाय पर चर्चा करूं

इतने सारे काम हैं दुनिया में
मिलना नहीं है कोई काम
सारे काम छोड़कर
पल भर के लिए तुम आ जाओ
आओ कि भाफ़ के पर्दे से निहार लूंगा
आओ कि संजो लूंगा सूरज की रौशनी भर यादें

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2. सहचर

शहर की सड़कों से आसान है
इन पहाड़ों पर चलना
कोस दो कोस ही होगा सामने का वह पहाड़
हिम्मत बनाओ वहां तक थोड़ा और चलो

जब मैं लड़खड़ाऊं तो मेरा हाथ पकड़ना
तुम लड़खड़ाओगी तो मैं भी थामूंगा तुम्हारा हाथ

तुम अपने कदम थोड़ा आगे ही रखना
तुम आगे आगे चलती हो तो
साथ चलती हैं बचपन की पगडंडियां भी

चलते-चलते जब साँसें भर जाएंगी
हम बैठेंगे किसी ढलान पर
निहारेगें ऊंचाई की नोक से
आसमान में ख़त लिखते पहाड़ों को
और देखेंगे
पत्थर की सिलवटों पर सूरज बिखरना
मेघ का बनना
और पहाड़ के कंधे पर उनींदी चादर सा फैल जाना

इस सन्नाटे में सुनेंगे आवाजें
पहाड़ों की, घास से गुजरती हवाओं की
जलधाराओं की और तुम्हारी
और तो और सुनेगे
हमारे भीतर के सत्य की अंतिम अभिव्यक्ति भी

जब दूर पहाड़ी घर से धुएँ की लकीर उठने लगे
जब शाम थके पहाड़ियों को घर बुलाने लगे
और रोटी की सौंधी ख़ुशबू वादियों में घुलने लगे
मैं चाहता हूं
आज तब तलक और चलना।

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3. आरक्षण

एक निबंध में मैने लिखा आरक्षण
उन्होंने काट कर लिख दिया अयोग्यता
मैंने लिखा सामाजिक न्याय
उन्होंने फिर काटा और लिख दिया अयोग्यता
वह मेरे गुरु थे
जैसे होते हैं भारतीय संस्कृति के पवित्र गुरु

मैं विश्वविद्यालय में गुरुओं के पास गया
उनमें पाया ऐसा चुंबक
जिसमें उनकी ही जाति के छात्र आकर्षित हुए
मैं भी ठीक वैसा ही चुंबक था
जैसा उनके जाति के छात्रों का है
वही गुण, रंग और रूप भी
लेकिन अक्सर मेरा दाहिना ध्रुव
गुरुओं के दाहिने ध्रुव से टकरा जाता

मैं ढूंढता रहा कोई अपना
पेड़ का पत्ता हिला अचानक एक कबूतर गिरा
उसके गले में फंदा था
“मैं नहीं मिलूंगा यहां
कायर नहीं हूं मैं
शिक्षा पर था उनका पूरा आरक्षण”
यह कहकर कबूतर कहीं उड़ा गया।

मैं पुस्तकालय गया
किताबें पलटता रहा
अचानक किताबों से वही कबूतर आ निकला
इसका एक पंख टूटा हुआ था
बोलकर गायब हो गया
कि यहां भी नहीं पाओगे कोई अपना

चौराहे पर गया
मूर्ति को देख रहा था
कि सामने खून गिरा
खून से बन गई उसी कबूतर की आकृति
कबूतर बोलने लगा
“हमने भी लड़ी हैं आजादी की जंग,
लेकिन इतिहास में नहीं पाओगे हमारा नाम
हमें अगर ढूंढना है तो उनके खेतों
और खलिहानों में ढूंढो
उनके लाठी में मेरे ही खून के निशान होंगे”
अचानक एक बाज आया
झपट लिया उस कबूतर को
कबूतर का खून आसमान में बिखरा है
सोचा यह हमला है या चाल है
मैं देख रहा हूं भूत नहीं वर्तमान काल है

एक दिन ईडब्ल्यूएस आरक्षण घोषित हुआ
मेरे सांस्कृतिक गुरुओं ने
आर्थिक समानता पर सांस्कृतिक भाषण दिए
निबंध लिखकर गिनाए इसके फायदे

आज लोकतंत्र है
तब भी उनके पास ऐसा मंत्र है
उन्हीं की जाति के लोगों का बड़े पदों पर बड़ा तंत्र है
आरक्षण के मायने को उलट दिए
हमें आधे में सिमट दिए।

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4. छीनना

रेल मंत्री से छीनकर जिस रंग की झंडी दिखाता है प्रधानमंत्री
वह उसी रंग से करता है घृणा
जिन फूलों को दिखाकर फूल बनाता है
उन्ही फूलों के बीच रखता है तलवार

जिस विश्वविद्यालय से छीनी है डिग्री
उस विश्वविद्यालय को भी अब छीन लेना चाहता है

वह स्त्रियों से डरता है
उसके पूर्वज स्त्रियों से आगाह करके गए हैं

उसने पेड़ और जंगल छीन लिया
और जानवरों को अपने घर पाल रखा है

वह विश्व गुरु है
रोजगार छीन कर पकौड़ी तलने का उसके पास है विजन
उसके पास समय बहुत है
वह सड़कों के गड्ढे भरता है
और फुर्सत में करता है उसका उद्घाटन
जबकि उसको सोचना चाहिए
गड्ढे सड़कों पर ही नहीं गड्ढे हमारे सीने पर भी हैं

उसे रोजगार छीनने में खुशी मिलती है
संस्थाएं छीनने में उसे मौलिकता नज़र आती है
विदेशों से खरीदता जहाज
और हवा में हिलाता है हाथ

जब मुल्क में युवा बेरोजगार घूम रहें हों
तब वह दुनिया की सैर करता है
ऐसे विश्व गुरु से उम्मीद मत करना मेरे दोस्त

अक्सर छीनने वाला प्रधानमंत्री
राशन के सिवाय देगा भी तो क्या
दो कौड़ी की भाषा?
जिसमें गलियां हैं, कायरताएं
और तो और नफरत का पूरा का पूरा व्याकरण।

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5. फलदार वृक्ष

किसी ने आम लगाया
किसी ने अमरूद
पीपल और बरगद उन्होंने दुआरे से उखाड़ फेंका
कहा बड़ा होगा तो इसमें आ जाएगा प्रेत

कोई बच्चों को पढ़ने प्राइमरी भेजा
कोई कॉन्वेंट
कोई तो कोई विदेश ही भेज दिया
वो बाग लगाए तो फलदार वृक्ष के ही
वो बच्चों को पढ़ाए तो फलदार वृक्ष ही समझकर
उनको मेरे अर्जित ज्ञान से कोई वास्ता नहीं था

आज तीस वर्ष का होकर मैं बेरोजगार हूँ
उनकी नज़र में मैं नहर पार वाला
पीपल का पेड़ हूं
जिसमें रहता है प्रेत
मेरा नाम गांव के सबसे नालायक व्यक्तियों की सूची में दर्ज है
असफलताओं का उदाहरण बन गया हूं
जबकि मैं पीएचडीधारी हूं

वे कहते हैं प्रतिभावान छात्र छीन कर ले लेते हैं नौकरी
मेरा तो मानना है कि
बस सरकार के पास है छीनने की कला

आज मैं शपथ लेता हूं
कि मैं भी लगाऊंगा बाग
फ़रदार वृक्षों की नहीं
उन पेड़ों की जो धरती की रक्षा के लिए खड़े रहेंगे
एक दिन आयेगा
जब धरती के सारे सरकारी विद्यालय बंद कर दिए जाएंगे
तब उसी बाग में पढ़ाऊंगा बच्चों को
इसलिए नहीं कि वो फलदार वृक्ष कहलाए
इसलिए कि बचें रहें वे और बचाए रखें विद्यालय।

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6. समय बदल गया -1

वे लउगही में बेहन उखाड़ते हुए
पानी छपछपाते हैं
और दलितों को गरियाते जाते हैं
पानी में चलते कीड़ों को
दलित समझकर मसल देते हैं
बेहन का बोझा उठाते हैं सिर पर
तो पानी ठीक वैसे झरता है
जैसे उनके अकड़ से
दलित मजदूरों की आँखों से टपकते थे आंसू

अब वे लाउग खुद ही लगाते हैं
या फिर दंभ में परती छोड़ देते हैं खेत
और मसोसकर कहते हैं
अब समय बदल गया है

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7. रेल

गांव से शहर आए छात्र
करते हैं गांव की बातें
टहलते हैं स्मृतियों में
हर रोज़ कोस दो कोस

किताबों के छांव तले
एक छोटे से कमरे में उनका होना
एक उपलब्धि थी
लेकिन बेरोजगारी के चलते
उनके भीतर चलने लगी
दुखों की रेल

हर निजीकरण की सूचना के बाद
इस रेल में डिब्बे बढ़ते ही जाते
जैसे प्राकृतिक और सरकारी आपदाओं से
बढ़ते जाते हैं किसानों और मजदूरों की
भीतरी रेल के डिब्बे

छात्रों, मजदूरों और किसानों
के भीतर एक ही रेल चलती
पटरियों पर चलने वाली रेल में
उनका एक ही डिब्बा था द्वितीय श्रेणी
दिनों दिन इनके अन्दर की रेल
बढ़ती गई
और घटता गया
रेलगाड़ियों में इनके हिस्से का डिब्बा।

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shrikrishnahin1935@gmail.com


5 thoughts on “सात कविताएँ / श्री कृष्ण नीरज”

  1. बहुत अच्छी ताज़ादम कविताएं।नीरज भाई को बधाई

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  2. कवि को बहुत बधाई इन अच्छी कविताओं के लिए और नया पथ को धन्यवाद कि उन्होंने इन अच्छी कविताओं से हमारा परिचय करवाया

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