शुद्धिकरण में निर्वस्त्र न्याय / ज्ञानचन्द बागड़ी


नया पथ में ज्ञानचन्द बागड़ी की कहानी ‘एक खाली दुपहर’ बहुत पसंद की गई थी। ‘शुद्धिकरण में निर्वस्त्र न्याय’ उससे बिल्कुल अलग तरह के विषय पर है। पंचायती फ़ैसलों की क्रूरता को उभारती कहानी… ज्ञानचन्द  बागड़ी उपन्यास, कहानी, यात्रा वृत्तांत, संस्मरण और कथेतर लेखन के साथ-साथ पत्र-पत्रिकाओं में स्तंभ लेखन करते रहे हैं। वाणी प्रकाशन, दिल्ली से आख़िरी गाँव (उपन्यास), संभावना प्रकाशन से  ये जो दिल्ली है (उपन्यास), रे माधव आर्ट से  बातन के ठाठ (कहानी संग्रह), आधार प्रकाशन से  सफ़र में धूप तो होगी (यात्रा वृतांत) और जो सम्भव हुआ (संस्मरण) प्रकाशित।

 

मोबाइल स्क्रीन काँप रही थी।
न, किसी डर से नहीं—
हँसी से।

हँसी, जो कैमरा पकड़ने वाले के गले से फिसलकर बाहर आ रही थी।
हल्की नहीं—
वह हँसी जिसमें तमाशे का मज़ा था,
जिसमें भीड़ का उन्माद था,
जिसमें यह भरोसा छिपा था कि जो हो रहा है, उस पर कोई सवाल नहीं उठेगा।

स्क्रीन के भीतर दो जोड़ी आँखें थीं।
झुकी हुई।

न आँसू साफ़ दिखते थे,
न चेहरा पूरा।
बस पलकों के नीचे सिमटी हुई वह निगाह—
जैसे धरती में धँस जाना चाहती हो।

कैमरा बार-बार हिलता,
फिर रुकता।
जैसे कोई दृश्य खोज रहा हो,
जिस पर हँसा जा सके।

पानी की धार अचानक फ्रेम में आती—
सफ़ेद, तेज़, निर्दयी।
वह किसी नल से नहीं गिर रही थी,
वह किसी हाथ से नियंत्रित नहीं थी—
वह भीड़ की इच्छा से बह रही थी।

नंगी देह का कंपन साफ़ दिखता था—
ठंड से नहीं,
शर्म से नहीं,
डर से।

उस डर से,
जो तब पैदा होता है जब चार सौ आँखें
एक साथ किसी एक देह को देख रही हों—
और उनमें से कोई भी
इंसान की आँख न रह जाए।

पीछे से आवाज़ें आती थीं—
अस्पष्ट,
टूटी-फूटी,
लेकिन लहजे से साफ़—

“और डालो पानी…”
“वीडियो बन रहा है ना?”
“अब सुधरेगी…”

कैमरे के एक कोने में किसी की चप्पल दिख जाती थी,
दूसरे में किसी का घुटना,
कहीं कोई हँसता हुआ मुँह आधा कट जाता था।

पूरा दृश्य कभी सामने नहीं आता—
जैसे खुद वीडियो भी
कुछ दिखाने से डर रहा हो।

बस वही आँखें—
झुकी हुई।

पानी की धार—
बिना रुके।

और हँसी—
जो रुक-रुक कर
और ज़ोर से फूट पड़ती थी।

वीडियो अचानक कट हो जाता।

स्क्रीन काली हो जाती।

लेकिन कालेपन के भीतर
वह आँखें रह जाती थीं—
जैसे बंद मोबाइल के शीशे पर
अब भी टँगी हों।

सात दिन तक वह वीडियो
एक मोबाइल से दूसरे मोबाइल में घूमता रहा।

किसी ने देखा—
और आगे बढ़ा दिया।

किसी ने देखा—
और चुप रहा।

किसी ने देखा—
और कहा,
“गलत तो हुआ है… पर पंचायत का फैसला था।”

और किसी ने
सिर्फ़ हँसी के हिस्से को
दोबारा देखा।

आठ दिन बाद
वह वीडियो
एस.पी. के टेबल पर पड़ा था।

प्रोफेसर देर तक मेज़ के सामने बैठे रहे।
खिड़की के बाहर गाँव की आवाज़ें थीं—
धीमी, पर बेचैन।
वे जानते थे,
यह बेचैनी देर तक चुप नहीं रहेगी;
यह नैतिक उत्तेजना में बदलेगी।

उन्होंने काग़ज़ उठाया,
फिर रख दिया।
ऐसी चुप्पियाँ वे पहले भी देख चुके थे—
कक्षाओं में, बहसों में,
जहाँ सवाल पूछने से ज़्यादा
चुप रहना सिखाया जाता है।

प्रोफेसर ने काग़ज़ मोड़ा।
वह सालों तक छात्रों को संविधान पढ़ाते रहे थे—
अधिकार, प्रक्रिया और गरिमा।
आज वही शब्द
उन्हें अपनी ही ज़मीन पर
बचाने पड़ रहे थे।

यह कोई औपचारिक शिकायत नहीं थी।
यह उस समाज से पहला टकराव था
जो क़ानून से नहीं,
रिवाज़ से चलता है।

उन्हें मालूम था—
पत्र लिखना आसान है,
पर पत्र का असर
भीड़ के शोर में
अक्सर दबा दिया जाता है।
फिर भी उन्होंने लिखा।
क्योंकि अगर इस वक़्त
क़लम भी चुप हो जाती,
तो कल सवाल पूछने का
कोई नैतिक अधिकार नहीं बचता।

एस.पी. के कमरे में पंखा चल रहा था,
पर हवा ठहरी हुई थी।

टेबल पर पड़ा मोबाइल
अब भी बंद था—
लेकिन उसकी मौजूदगी
कमरे को भारी बनाए हुए थी।

प्रोफेसर शीशराम कुर्सी पर सीधे बैठे थे।
सफ़ेद धोती–कमीज़,
नपे-तुले हावभाव,
आँखों में वह संयम
जो वर्षों के अध्यापन से आता है—
पर आज उसमें
असहाय क्रोध घुला था।

उन्होंने जेब से
एक तह किया हुआ पत्र निकाला
और बिना भूमिका के
टेबल पर रख दिया।

एस.पी. ने पत्र उठाया।
पहली पंक्ति पढ़ते ही
उनकी भौंहें सिकुड़ गईं।
वे चुपचाप पढ़ते रहे।

काग़ज़ पर शब्द
सीधे थे—
सजावटी नहीं,
गोल नहीं—

“यह घटना क़ानून नहीं,
सभ्यता के विरुद्ध अपराध है।”

एस.पी. ने नज़र ऊपर उठाई,
प्रोफेसर की ओर देखा—
फिर पत्र पर झुक गए।

“जहाँ पंचायत
स्त्री की देह को
सार्वजनिक दंड का माध्यम बना दे,
वहाँ समाज
स्वयं कटघरे में खड़ा होता है।”

एस.पी. ने पेन उठाया।
एक–दो वाक्यों के नीचे
रेखाएँ खींचीं।

“यह कोई ‘आंतरिक मामला’ नहीं है।
यह संविधान के अनुच्छेदों पर
सीधा प्रहार है।”

पढ़ते-पढ़ते
उनकी उँगलियाँ रुक गईं।
उन्होंने गहरी साँस ली।

“प्रोफेसर साहब,”
आवाज़ धीमी थी,
पर स्थिर—
“आप जानते हैं,
पंचायतें अक्सर
क़ानून की आड़ में
भावनाओं का सहारा लेती हैं।”

प्रोफेसर ने सिर हिलाया।
“इसीलिए तो यह पत्र है, कप्तान साहब।
भावनाएँ समाज चलाती हैं—
राज्य नहीं।
राज्य को विवेक से चलना पड़ता है।”

एस.पी. ने बिना मुस्कराए कहा,
“और विवेक
अक्सर टकराव माँगता है।”

उन्होंने पेन से
पत्र के किनारे
कुछ बिंदु लिखे—

नाम।
धाराएँ।
कार्रवाई का क्रम।

फिर बोले—
“आप इसे दुबारा तैयार कीजिए।
तेज़ रखिए।
भावनात्मक नहीं—
तथ्यात्मक।”

प्रोफेसर ने शांत स्वर में कहा,
“मैं चाहता हूँ
कि यह मामला
सिर्फ़ एक पंचायत तक
सीमित न रहे।”

एस.पी. की आँखें
एक पल के लिए
कठोर हो गईं।

“नहीं रहेगा,”
उन्होंने कहा—
अब आवाज़ में
कोई औपचारिकता नहीं थी।

“यह मामला
पंचायत से बड़ा बनेगा।”

उन्होंने फ़ाइल बंद की।
मोबाइल को
दराज़ में रखा।

“क़ानून को
अब समाज से
पीछे नहीं चलना चाहिए,
प्रोफेसर साहब।”

प्रोफेसर उठे।
उनके चेहरे पर
संतोष नहीं था—
बस इतना भरोसा था
कि बात अब
सुनी जा चुकी है।

बाहर निकलते समय
उन्होंने पलटकर देखा।

एस.पी.
खिड़की के पास खड़े थे—
जैसे बाहर
किसी और अदालत की
तैयारी देख रहे हों।

 

हरीराम ने मोबाइल की स्क्रीन
उलटी कर दी।

जैसे किसी बीमार चीज़ को
देखते-देखते
आँखें थक गई हों।

वीडियो उसने पूरा नहीं देखा था—
न देख पाया।
पानी की पहली धार तक ही
उसका गला सूख गया था।
उसके बाद
आवाज़ें थीं—
हँसी, आदेश, शोर—
और फिर कुछ ऐसा
जिसे देखने के लिए
आँखों से ज़्यादा
हिम्मत चाहिए थी।

वह चारपाई पर बैठा रहा।
हुक्का सामने रखा था,
पर नय उसके हाथ तक
नहीं पहुँची।

आँगन में भैंस की घंटी बजी।
पत्नी दूध की बाल्टी लेकर
अंदर जा रही थी।
घर वैसा ही था—
रोज़मर्रा,
सामान्य।

जैसे किसी और दुनिया में
कुछ हुआ ही न हो।

लेकिन उसके भीतर
कुछ दरक चुका था।

घटना अब निजी नहीं रही थी।
मोबाइल से निकलकर
वह गलियों में फैल चुकी थी।
किसी ने कहा—
“अनहोनी हुई है।”
किसी ने जोड़ा—
“इज़्ज़त का सवाल है।”
और किसी ने चुपचाप
यह तय कर लिया
कि अब कुछ होना चाहिए।

हरीराम यह सब
देख नहीं रहा था—
समझ रहा था।

बीस साल तक वर्दी पहनने के बाद
वह जान चुका था
कि भीड़ कैसे बनती है।
किस लहजे में “समाज” कहा जाता है,
और किस पल
वह शब्द
सज़ा में बदल जाता है।

बी.एस.एफ़ की नौकरी ने
उसे दो तरह की दुनिया दिखाई थी—
एक, जहाँ कानून
आदेश बनकर उतरता है,
और दूसरी,
जहाँ पंचायत
फ़ैसला बनकर बैठ जाती है।

वह जानता था—
पंचायतें कैसे काम करती हैं।
कैसे पहले बातें फैलती हैं,
फिर नैतिकता हथियार बनती है,
और अंत में
सबसे कमज़ोर देह
सबसे पहले निशाने पर आती है।

पंचायतें सबसे पहले
उन्हीं पर टूटती हैं
जिन्हें सदियों पहले
गाँव से अलग,
मिट्टी के उस टीले पर बसाया गया था
जहाँ न स्कूल पहुँचे थे,
न न्याय।

वर्दी ने उसे
देश की एक पहचान दी थी,
पर वह टीला
अब भी उसके भीतर था—
जहाँ हर फ़ैसले से पहले
आदमी नहीं,
उसकी जात देखी जाती है।

उसने खुद देखा था—
हुक्का-पानी बंद होते हुए,
बहिष्कार की घोषणाएँ,
और फिर
धीरे-धीरे
सब सामान्य हो जाना।

“समाज ने फ़ैसला कर लिया है”—
यह वाक्य
उसे हमेशा
क़ानून से भारी लगता था।

फिर भी…
आज कुछ अलग था।

वीडियो में दिखती वह औरत—
उसकी झुकी आँखें—
उसे बार-बार
अपनी ओर खींच रही थीं।

“गलत किया होगा,”
उसने मन को समझाने की कोशिश की।
“पंचायत ने कुछ सोचकर ही…”

लेकिन अगला ही विचार
उसे चुप करा गया—

अगर मेरी बेटी होती तो?

उसने आँगन की ओर देखा।
छोटी बेटी
अभी स्कूल से लौटने वाली थी।
उसकी चोटी,
उसका हँसता चेहरा—
सब आँखों के सामने
आ खड़ा हुआ।

मोबाइल की स्क्रीन पर
अब भी वही फ्रेम रुका था,
लेकिन उसके भीतर
दृश्य बदल चुका था।

वह जानता था—
यह उबाल किसी समाधान पर नहीं रुकेगा।
यह किसी शुद्धिकरण की माँग करेगा।
और शुद्धिकरण
हमेशा उन्हीं का होता है
जो पहले से ही
गंदे मान लिए गए हों।

वह पंचायत में नहीं था।
पर इससे क्या फर्क पड़ता है?

वह जानता था—
समाज के बीच खड़े रहकर
कुछ न कहना भी
एक तरह की गवाही है।

और इस गवाही में
आज वह खुद
कटघरे में खड़ा था।

प्रधान का रास्ता उस दिन यूँ ही नहीं मुड़ा था।

एस.पी. कार्यालय से लौटते हुए बोलेरो झुंझुनू रोड पर बढ़ रही थी। दिमाग में अभी भी वही वीडियो अटका था—झुकी आँखें, पानी की धार, भीड़ की हँसी। शहर के बाहर निकलते ही प्रधान ने गाड़ी धीमी कर दी। सामने खेतों के पार हरीराम का घर दिख रहा था—वही सूबेदार, जिससे वह बरसों से परिचित था, जो पंचायतों को भी जानता था और वर्दी की भाषा भी।

प्रधान ने ड्राइवर से कहा, “यहीं रोक दो।”

यह कोई तय मुलाक़ात नहीं थी।
बस ऐसा लगा—
आज अगर किसी से बात करनी है,
तो इसी आदमी से।

हरीराम आँगन में चारपाई डाल रहा था। बोलेरो देखकर उसने तुरंत पहचान लिया।

“राम-राम प्रधान जी!”

“राम-राम सूबेदार साहब,”
प्रधान बोले, जैसे आवाज़ में भी रास्ते की थकान उतर आई हो।
“सोचा… यूँ ही मिल लूँ। शहर से लौट रहा था।”

हरीराम ने हुक्का बढ़ाया।
प्रधान ने नय हाथ में ली—
फिर बिना कश लिए
उसे वापस रख दिया।

कुछ बातें
धुएँ में नहीं उड़ाई जातीं।

“एक बात बताऊँ सूबेदार जी,”
प्रधान ने कहा।
आवाज़ में न कथा का उत्साह था,
न उपदेश का लहजा—
बस किसी ऐसे आदमी की थकान,
जो बहुत कुछ देख चुका हो।

“यह कोई लोककथा नहीं है।
मैंने यह देखा है।”

हरीराम चौंका नहीं।
बस थोड़ा सीधा हो बैठा—
जैसे भीतर से तैयार हो गया हो।

“नीम का थाना से आगे,
बालेश्वर महादेव के जंगल में,”
प्रधान बोले,
“मैं उस दिन
वहाँ किसी के काम से गया था।
दोपहर चढ़ चुकी थी।”

उन्होंने हाथ से
दूरी और ढलान का इशारा किया—
“एक खुला मैदान है।
नीचे पत्थर,
ऊपर साल और गूलर के पेड़।
श्रद्धालु आते हैं,
बंदर रोज़ दिखते हैं—
पर उस दिन कुछ अलग था।”

प्रधान कुछ पल रुके।
जैसे यादें
शब्द ढूँढ रही हों।

“दो वानर समूह आमने-सामने बैठे थे।
बीच में एक मादा।
न शोर,
न कूद-फाँद।
बस… बैठना।
तीन दिन तक।”

“तीन दिन?”
हरीराम के मुँह से
अनायास निकल गया।

प्रधान ने सिर हिलाया।
“तीन दिन।
न फल उठाया गया,
न पानी छुआ गया।”

उनके होंठों पर
सूखी-सी हँसी आई।
“लोगों ने अनुमान लगाए।
किसी ने कहा—बीमार है।
किसी ने कहा—झुंड में झगड़ा हुआ होगा।
केले डाले,
चना डाला…
पर किसी ने हाथ नहीं बढ़ाया।”

“धीरे-धीरे,”
प्रधान बोले,
“सबका एक ही अनुमान बन गया—
कि उस मादा ने
ऐसा कुछ किया होगा
जो सिर्फ़ उसका नहीं,
पूरे झुंड का अपराध माना जा रहा था।
कुछ ऐसा,
जो उनकी पूरी प्रजाति के लिए
खतरा बन सकता था।”

हरीराम चुप था।
उसकी आँखें
प्रधान के चेहरे पर जमी थीं।

“तीसरे दिन,”
प्रधान ने कहा,
“मैं तीनों दिन वहीं था।”

आवाज़ और धीमी हो गई।

“दो बंदर उठे।
सबसे ताकतवर।
चाल ऐसी—
जैसे हिटलर और मुसोलिनी
किसी परेड में बढ़ रहे हों।
न हड़बड़ी,
न संकोच।”

उस दृश्य की कल्पना मात्र से हरीराम असहज हो उठा।

“वे उस मादा के पास पहुँचे,”
प्रधान बोले।
“उसने भागने की कोशिश नहीं की।
बस चीखी—
ऐसी चीख,
जो जंगल में भी
कम सुनाई देती है।”

वे अचानक चुप हो गए।
आँखें
अपने आप झुक गईं।

“उन्होंने उसे उठाया,”
प्रधान ने कहा।
“एक-एक टांग से।
और फिर—”

वाक्य
हवा में ही टूट गया।

“मैंने मुड़कर
दूसरी ओर देखा,”
प्रधान ने धीरे से जोड़ा।
“पर आवाज़…
वह आवाज़
कान बंद करने पर भी
साथ चलती है।”

कुछ देर
सिर्फ़ हवा की सरसराहट थी।

“फिर,”
प्रधान बोले,
“वे दोनों लौट गए।
और पूरा झुंड
फलों पर टूट पड़ा।”

हरीराम ने
अपने हाथ देखे—
भींचे हुए,
जैसे कुछ पकड़ना चाहते हों।

“मैंने वहाँ
न कोई बहस देखी,”
प्रधान ने कहा,
“न कोई सवाल।
सिर्फ़ एक निर्णय।”

उन्होंने सिर उठाया।

“निर्णय—
जिसे पूरे समूह ने
स्वीकार किया।”

थोड़ी देर बाद
प्रधान ने जोड़ा—
“और उसके बाद
जंगल फिर से
सामान्य हो गया।
जैसे कुछ हुआ ही न हो।”

हरीराम ने
धीरे से पूछा,
“आप यह कहानी
आज मुझे क्यों बता रहे हैं,
प्रधान जी?”

प्रधान ने
सीधे उसकी ओर देखा।

“क्योंकि जब मैंने
सोला गाँव की वीडियो देखी,”
उन्होंने कहा,
“तो मुझे
उसी जंगल की याद आई।”

आवाज़ में
कठोरता नहीं थी—
बस थकान थी।

“फर्क बस इतना था,”
प्रधान बोले,
“वहाँ बंदर थे।
यहाँ इंसान।”

हरीराम चुप रहा।
पर भीतर
एक सवाल
अब साफ़ आकार ले चुका था—

अगर जंगल का वह निर्णय
निर्दय था…
तो हमारी पंचायतें
किस नाम पर
इससे बेहतर होने का दावा करती हैं?

“जंगल में निर्णय हुआ था,
यहाँ प्रदर्शन।”

उस जंगल की कहानी के बाद,
चौपाल में जो हुआ,
अब किसी रूपक की माँग नहीं करता था।

भीड़ धीरे–धीरे छँट गई थी।

चौपाल फिर से ख़ाली हो गई थी।

हँसी, फुसफुसाहट, मोबाइल की लाल बत्तियाँ—
सब जैसे किसी और आँगन की ओर खिसक गई थीं।
पंचायत का फ़ैसला
अपनी क्रूरता पूरी कर चुका था।

अब कोई नहीं देख रहा था।

यही सबसे डरावना था।

जब वे देख रहे थे—
वह एक देह थी,
एक उदाहरण,
एक चेतावनी।

अब जब सब चले गए थे,
तो वह फिर से खुद थी—
और यही असह्य था।

पानी ठंडा था।
इतना ठंडा कि त्वचा जलने लगी।
लेकिन उससे ज़्यादा ठंडा
उन आँखों में उतरता भरोसा था—
कि वे सही कर रहे हैं।

वह चीख सकती थी।
पर किस भाषा में?

जिस बोली में वह रोती है,
उसी में यहाँ फ़ैसले सुनाए जाते हैं।

कपड़े उतारते समय
क्या उसने अपनी चाची–होने की हैसियत उतारी थी,
या औरत–होने की—
वह तय नहीं कर पाई।

भतीजा सामने खड़ा था।
उसकी आँखें ज़मीन में थीं।
वह डर रहा था—
उससे नहीं,
खुद से।

उसने उसे एक बार देखा।
सिर्फ़ एक बार।
वह पल भी शायद
अपराध मान लिया गया।

वे कहते हैं—
दोनों ने समाज को गंदा किया।

पर समाज की यह सफ़ाई
इतनी भीड़ क्यों माँगती है?
इतने मोबाइल क्यों?
इतनी हँसी क्यों?

अगर यह न्याय है,
तो इसे छुपाकर क्यों नहीं किया गया?
और अगर यह शर्म है,
तो सिर्फ़ उसी की क्यों?

देह सूख रही थी।
पर भीतर कुछ था
जो सूख नहीं रहा था।

शायद डर।
शायद क्रोध।
शायद वह सवाल
जो अब जन्म ले चुका था।

अगर आज उन्होंने उसे नंगा किया है,
तो कल किसे करेंगे?

वह जान गई—
वह अकेली नहीं है।

और यह पहली बार था
जब यह जानना
कमज़ोरी नहीं,
ताक़त लग रहा था।

वे सोचते थे
वह टूट गई है।

पर सच यह था—
अब वह चुप नहीं रहेगी।
क्योंकि उसकी चुप्पी
वे पहले ही इस्तेमाल कर चुके हैं।

अब जो बचेगा,
वह उसकी आवाज़ होगी—
काँपती हुई सही,
पर नंगी नहीं।

सोला गाँव की चौपाल
उस दिन असामान्य रूप से साफ़ थी।

जैसे किसी पर्व से पहले
ज़मीन बुहारी जाती है—
मिट्टी से नहीं,
किसी और चीज़ से।

चारपाइयाँ नहीं थीं।
उनकी जगह
बीच चौपाल में
लाल किनारी वाली
जाजम बिछी थी।

पंच उसी पर बैठे थे—
घुटने मोड़े,
पगड़ियाँ सलीके से,
आवाज़ों में वह ठहराव
जो पहले से तय
निर्णय में होता है।

बीच में
खुली जगह छोड़ी गई थी—
इतनी कि
कोई भी नज़र
अटक न सके।

चाची और भतीजा
दोनों को
वहीं लाया गया।

कोई नाम नहीं लिया गया।
सब जानते थे
किस बात की सज़ा है।

किसी ने कहा,
“खून का रिश्ता था।”

किसी ने जोड़ा,
“ऐसा संबंध
पूरे समाज को
गंदा करता है।”

किसी ने यह नहीं पूछा—
किससे?
कब?
किस हाल में?

यह जाँच नहीं थी—
यह उदाहरण था।

पहले
कपड़े उतरवाए गए।

न गुस्से में,
न जल्दबाज़ी में—
जैसे कोई
रस्म पूरी की जा रही हो।

चाची की आँखें
ज़मीन में धँसी थीं।

भतीजा
सीधा खड़ा था,
पर गर्दन
कटी हुई-सी लग रही थी—
जैसे देह
उसकी हो ही नहीं।

उन्हें
साथ बिठाया गया।

पास-पास।
इतना पास
कि लज्जा भी
एक-दूसरे से
टकरा जाए।

“शुद्धिकरण
दोनों का होगा,”
किसी पंच ने कहा।

पानी लाया गया।

घड़ा झुका।
धार गिरी—
ठंडी,
निर्दय।

पानी
दोनों देहों पर
एक साथ बहने लगा।

न अलग,
न विशेष—
जैसे अपराध भी
साझा हो।

चाची के हाथ
अनायास
सीने की ओर बढ़े,
फिर वहीं रुक गए—
जैसे याद आ गया हो
कि यहाँ
ढँकना
अपराध से बड़ा अपराध है।

भतीजे की उँगलियाँ
ज़मीन में
गड़ गईं।

भीड़ की आँखें
एक पल के लिए भी
झुकी नहीं।

वे देख रही थीं—
ध्यान से,
रस लेकर,
जैसे किसी दृश्य में
नैतिकता नहीं,
सिर्फ़ रोमांच हो।

किसी ने मोबाइल निकाला।
किसी ने कहा—
“सीधा रखना।”

पानी से ज़्यादा
नज़रें
उन पर गिर रही थीं।

पानी
देह को भिगो रहा था—
नज़रें
मन को।

पंचायत
खामोश नहीं थी—
वह आश्वस्त थी।

जैसे
कुछ बहुत ज़रूरी
कर दिया गया हो।

“अब समाज साफ़ होगा,”
किसी ने कहा।

किसी ने
हल्की हँसी के साथ
जोड़ दिया—
“याद रखेंगे लोग।”

चाची ने
कुछ नहीं कहा।

भतीजे ने भी नहीं।

शायद
शब्दों की ज़रूरत
यहाँ थी ही नहीं।

जब पानी रुका,
तो भी
नज़रें नहीं रुकीं।

जैसे
शुद्धिकरण
अभी अधूरा हो—
जैसे
देखना
और बाक़ी हो।

फिर
लोग उठने लगे।

किसी ने कहा—
“फैसला सही था।”

किसी ने कहा—
“अब ऐसी हिम्मत
कोई नहीं करेगा।”

और किसी ने
वीडियो
आगे बढ़ा दिया।

चाची और भतीजे ने
कपड़े पहने।

धीरे।
बहुत धीरे।

जैसे
हर हरकत
दिमाग़ में दर्ज कर रहे हों—
ताकि भूल न जाएँ
कि उनके साथ
क्या किया गया था।

उस दिन
सोला गाँव में
किसी की जान नहीं गई।

किसी का खून नहीं बहा।

लेकिन
दो देहें
न्याय के नाम पर
निर्वस्त्र की गईं।

और यही था
उस पंचायत का
सबसे बड़ा अपराध—

कि उसने
अपने डर को
शुद्धिकरण कहा,
अपनी वासना को
परंपरा,
और अपने तमाशे को
न्याय।

चौपाल के एक कोने में वह अकेला खड़ा था।
अब वहाँ कोई आवाज़ नहीं थी—
न आदेश,
न हँसी,
न फुसफुसाहट।

अब वह किससे डरे?

जब वे थे,
तो सब साफ़ था—
आँखें नीचे,
मुँह बंद,
खड़े रहो।

अब कोई आदेश नहीं था।
बस एक खालीपन था
जो सीने के भीतर
फैल रहा था।

वह खुद से कह सकता था—
“मैंने कुछ नहीं किया।”

और वही सब कहेंगे।

पर सच यह था—
उसने कुछ रोका भी नहीं।

उसके हाथ बँधे नहीं थे।
ज़ुबान कटी नहीं थी।
फिर भी वह वहीं खड़ा रहा—
पत्थर की तरह।

क्या पत्थर होना
मर्दानगी है?

जब उसके कपड़े उतर रहे थे,
उसने आँखें बंद कर ली थीं।
लोग कहेंगे—
“शर्म थी।”

पर भीतर
एक और वजह थी—
डर।

डर कि अगर उसने देखा,
तो सच दिख जाएगा।
और सच देखने के बाद
वह खुद को
क्या कहेगा?

वे कहते हैं—
उससे गलती हुई।

पर गलती एक पल में होती है।
यह तो
बहुत लंबा मौन था।

वे कहते हैं—
वह भी अपवित्र हो गया।

पर वह जानता था—
अपवित्र
उसका चुप रहना था।

वह उसे “चाची” कहता आया था।
इस शब्द में
संबंध भी था,
मर्यादा भी।

आज
उसी शब्द से
उसकी ज़ुबान खाली कर दी गई थी।

अब वह किस शब्द से
माफ़ी माँगे?

अगर वह बोले,
तो वे पूछेंगे—
अब क्यों?

अगर वह चुप रहे,
तो वह जानता था—
वह मर जाएगा
ज़िंदा रहते हुए।

वह मर्द था—
और यही बात
आज उसके ख़िलाफ़
सबूत बन गई थी।

उन्होंने कहा था—
“तू खड़ा रह,
बाक़ी हम देख लेंगे।”

आज वह देख रहा था—
और कुछ भी नहीं बचा था
जिसे वह न देख सके।

शायद सज़ा यह नहीं थी
कि उसे नंगा किया गया।

सज़ा यह थी—
कि अब वह जान गया था
कि वह कौन है।

और यह जानना
सबसे भारी था।

आँगन के बाहर—

थके क़दमों से
जब वह गली में घुसा,
किसी ने कहा—
“थाने तक बात पहुँचेगी।”

उसने पहली बार
उस दिशा में
देखा।

 

प्रधान देर तक कुछ नहीं बोले।

हुक्के में चिलम की आँच बुझने लगी थी,
धुआँ ठंडा होकर
जैसे हवा में लटक गया हो।

उनके सामने
न सूबेदार था,
न चौपाल—
बस वही दृश्य
जो उन्होंने देखा नहीं,
पर समझ लिया था।

“मैंने सोचा था…”
प्रधान ने कहना शुरू किया,
फिर रुक गए।

आवाज़ में
पहली बार
डगमगाहट थी।

“मैंने सोचा था
कि परंपरा
समाज को बाँधकर रखती है।”

उन्होंने अपनी हथेलियाँ देखीं—
जैसे पहली बार
उन्हें पहचान रहे हों।

“हम कहते रहे—
रीति है,
मर्यादा है,
नियम है।
और हमें लगा
कि हम समाज को
बिखरने से बचा रहे हैं।”

हरीराम ने देखा—
प्रधान की आँखें
अब स्थिर नहीं थीं।

“लेकिन उस दिन,”
प्रधान बोले,
“मैंने समझा—
हम बाँध नहीं रहे थे…
हम दबा रहे थे।”

उनकी आवाज़
भारी हो गई।

“परंपरा के नाम पर
हमने हिंसा को
वैध कर दिया,
सूबेदार जी।”

यह वाक्य
हवा में नहीं गिरा—
वह
ज़मीन पर
टकराया।

“हमने कहा—
यह दंड है।
हमने कहा—
यह शुद्धि है।
पर सच यह है…”

प्रधान की साँस
अटक गई।

“यह हमारी
सामूहिक क्रूरता थी।”

उन्होंने सिर झुका लिया।

“मैं प्रधान हूँ।
मेरे हस्ताक्षर
कई फैसलों के नीचे हैं।
मैंने हमेशा
यह माना
कि हम सही और गलत
का संतुलन बना रहे हैं।”

उन्होंने हँसने की कोशिश की—
पर हँसी
टूट गई।

“पर उस वीडियो के बाद
मैं खुद से
नज़र नहीं मिला पा रहा।”

हरीराम ने
धीरे से कहा,
“आप अकेले नहीं हैं,
प्रधान जी।”

प्रधान ने
तेज़ी से सिर उठाया।

“नहीं,”
उन्होंने कहा,
“यही तो डर है।
मैं अकेला नहीं हूँ।
हम सब
इसमें शामिल हैं।”

कुछ पल
सन्नाटा रहा।

“अगर मैं यह कह दूँ
कि पंचायत गलत थी,”
प्रधान बोले,
“तो मैं सिर्फ़
एक घटना को
गलत नहीं ठहराऊँगा—
मैं उस पूरी व्यवस्था पर
उँगली उठाऊँगा
जिसका मैं खुद
हिस्सा रहा हूँ।”

उनकी आवाज़
अब और धीमी थी—
पर दृढ़।

“और यह स्वीकार करना
आसान नहीं है
कि जिस मंच पर
आप सालों खड़े रहे,
वह मंच
खून से सना है।”

हरीराम के भीतर
कुछ कस गया।

प्रधान बोले—
“उस औरत को
नंगा नहीं किया गया था
सिर्फ़ उसके अपराध के लिए।
उसे नंगा किया गया
ताकि समाज
खुद को
शुद्ध महसूस कर सके।”

उन्होंने आँखें बंद कीं।

“और यही सबसे बड़ा पाप है।”

उन्होंने गहरी साँस ली।

“अगर आज
मैं चुप रह गया,
तो कल
मेरी चुप्पी
एक और देह
उतार देगी।”

प्रधान की आवाज़
अब काँप नहीं रही थी।

“समाज से टकराना पड़े
तो पड़े,
सूबेदार जी।”

उन्होंने सीधा देखा—

“लेकिन अब
मैं परंपरा के पीछे
छुप नहीं सकता।”

वह खड़े हुए।

उस क्षण
वे न प्रधान थे,
न प्रोफेसर—

बस
एक आदमी
जो यह समझ चुका था
कि सबसे कठिन लड़ाई
समाज से नहीं,
खुद से होती है।

और वही
इस कहानी का
सबसे ऊँचा शिखर था।

प्रधान देर तक चुप रहे।

जैसे भीतर कुछ और भी था
जो अभी कहा नहीं गया था।

हरीराम को लगा—
यह वही चुप्पी है
जो बोलने से पहले
अपने शब्द ढूँढती है।

प्रधान ने आहिस्ता
लंबी साँस ली।

“सूबेदार जी…”
उन्होंने कहा,
और पहली बार
उनकी आवाज़ में
थकान साफ़ झलक रही थी।

“कभी-कभी लगता है
हम जानवर बनते जा रहे हैं।”

हरीराम ने
नज़र उठाकर देखा।

“बच्ची के साथ
इतना बड़ा अपराध होता है,”
प्रधान बोले,
“और सबसे पहले
हम पूछते हैं—
किस जाति की है?”

वे रुके।

“क्या लड़की होना
उसकी पीड़ा समझने के लिए
काफी नहीं है?”

हवा में
हल्की ठंड उतर आई थी।

“हाथरस की घटना
याद है न?”
प्रधान ने कहा।
“दलित बच्ची…
और समाज
तुरंत जातियों में
बँट गया।”

हरीराम ने
कुछ नहीं कहा।

“दोषियों को बचाने के लिए
पंचायतें बैठीं,”
प्रधान बोलते रहे।
“बयान बदलवाए गए।
डराया गया।
केस वापस लेने का दबाव।”

उनकी आवाज़
अब कठोर नहीं थी—
बस भारी थी।

“कई बार,”
उन्होंने कहा,
“तो पीड़िता का परिवार ही
गाँव से गायब कर दिया जाता है।”

हरीराम के भीतर
कुछ कस गया।

प्रधान ने
उसकी ओर देखा।

“बताइए सूबेदार जी,”
उन्होंने धीरे से पूछा,
“इन पंचायतों में
और उन बंदरों की पंचायत में
क्या फर्क है?”

सवाल
हवा में टँगा रहा।

हरीराम के पास
कोई जवाब नहीं था।

प्रधान ने
खुद ही कहा—

“जंगल में
निर्णय त्वरित होता है।
न सही, न गलत—
बस समूह का फैसला।”

उन्होंने सिर हिलाया।

“लेकिन मनुष्य समाज
अगर वही करे,
तो वह जंगल नहीं—
अपराध होता है।”

थोड़ी देर बाद
उन्होंने जोड़ा—

“इसलिए हमें
कानून चाहिए,
विधि चाहिए…”

उनकी आँखें
अब स्थिर थीं।

“न्याय चाहिए।”

हरीराम ने
महसूस किया—
यह सिर्फ़
एक प्रधान की चिंता नहीं थी।

यह उस आदमी का डर था
जो समझ चुका था
कि अगर समाज
अब भी मौन रहा,
तो अगली चीख
और भी अकेली होगी।

कुछ दूर
थाने की बत्ती
टिमटिमा रही थी।

वहीं से
न्याय की लिखाई
शुरू होनी थी।

पर उसे
कौन पढ़ेगा—
यह सवाल
अब भी
अधूरा था।

थाने की बत्ती
उस रात देर तक जली रही।

मेज़ पर रजिस्टर खुला था।
नीली स्याही
अब भी गीली थी—
जैसे शब्द
अभी तय कर रहे हों
कि वे कितनी दूर तक जाएँगे।

क़लम चल रही थी—
रुक-रुक कर।
हर धारा
अपने नीचे
एक और जिम्मेदारी
जोड़ती जाती थी—

वीडियो,
भीड़,
पंचायत का आदेश,
चाची-भतीजे का नाम,
नंगा करने की सार्वजनिक क्रिया।

एफ़आईआर लिखी जा रही थी।

नाम दर्ज हो रहे थे—
कुछ पूरे,
कुछ आधे,
कुछ ऐसे
जिनके आगे
“अन्य” लिख दिया गया था—
ताकि भीड़
काग़ज़ में भी
भीड़ बनी रहे।

थाने के बाहर
धीमी आवाज़ें थीं।

“अब मामला बड़ा हो गया है।”
“पुलिस बीच में क्यों पड़ रही है?”

कोई भीतर झाँकने की कोशिश करता,
कोई मोबाइल
साइलेंट पर रखे
डर गिनता रहता।

सोला गाँव में
खामोशी फैल चुकी थी।

पंचों के घरों में
दरवाज़े जल्दी बंद हो गए थे।
हुक्के नहीं गुड़गुड़ाये।
जाजम लपेट दी गई थी।

कल तक
जो निर्णय सुनाते थे,
आज
अपने नाम सुनने से
कतराने लगे थे।

डर था—
पर पश्चाताप नहीं।

गाँव का जीवन
वैसा ही चलता रहा।

दुकानें खुलीं।
भैंसें दुही गईं।
बच्चे स्कूल गए।

चौपाल पर लोग बैठे—
पर अब
उस औरत का नाम
कोई नहीं लेता था।

कहा जाता था—
“बात बढ़ा दी गई।”
“समाज की बदनामी हो रही है।”

चुप्पी
अब भी
सबसे सुरक्षित पक्ष थी।

वह औरत
अपने घर के भीतर
चुप बैठी थी।

शरीर से
पानी सूख चुका था,
पर आँखों में
अब भी
वही झुकाव था—
जैसे दुनिया
ऊपर देखने लायक
अब बची ही न हो।

सूबेदार
दरवाज़े के पास खड़ा था।

उसे पहली बार
अपनी चुप्पी
किसी बोझ की तरह
कंधों पर
उतरती महसूस हुई।

प्रधान
काग़ज़ों के बीच खड़े थे—
न पूरी तरह
कानून के साथ,
न समाज के साथ।

बस
संकल्प के साथ।

वे जानते थे—
एक एफ़आईआर
सब कुछ नहीं बदलती।

पंचायतें
फिर बैठेंगी।
भीड़
फिर देखेगी।
कई आँखें
अब भी झुकी रहेंगी—
और कई
बिना शर्म के
उठी रहेंगी।

लेकिन
इस बार
चुप्पी के बीच
एक बात दर्ज हो चुकी थी।

थाने के भीतर
क़लम चल रही थी।

न्याय लिखा जा रहा था,
लेकिन क्या पढ़ा जाएगा—

यह समाज पर छोड़ा गया था।

संपर्क : 9351159540

 


3 thoughts on “शुद्धिकरण में निर्वस्त्र न्याय / ज्ञानचन्द बागड़ी”

  1. खाप पंचायतों के जुल्म को बेपर्दा करती कथ्य तथ्य परक और मर्मस्पर्शी है।

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