छह कविताएँ / रवि यादव


‘आदिम पुरखा कब गाँव के लोगों के रास्ते का अड़ंगा बन गया, उसे भी नहीं मालूम’… रवि यादव की कविता स्मृति, पर्यावरण और पर्यवेक्षण में गहरे उतरी हुई कविता है। वे लखनऊ विश्वविद्यालय में शोधार्थी हैं। उनकी कविताएँ कृति बहुमत, हिंदवी, सदानीरा, इंद्रधनुष, पोयम्स इण्डिया आदि जगहों पर प्रकाशित हैं।

 

1. गाँव के आदिम पुरखे

कभी कोई सुग्गा-चिरई नदी किनारे बसे
अहीरों और मल्लाहों की टोली से
लेकर आया था आम
और बिजूके पर बैठा खा रहा था

सालों बाद वहाँ दिखा एक घना पेड़

जब हमारे पुरखे नदी छोड़
एक अलग दुनिया बसाने की राह पर चल रहे थे
उन्हें दिखी इसी आम के पेड़ की उर्वर भूमि
गाँव बसने से पहले बसा हुआ था वहाँ आम का पेड़

वो आदिम पुरखा कब गाँव के लोगों के
रास्ते का अड़ंगा बन गया, उसे भी नहीं मालूम
केवल छः फिट की जमीन और
खुला-खुला पूरा आसमान था उसका
पुरखों का घर था, चिड़ियों का आँगन
और पथिकों के लिए भींगा आँचल

उस पेड़ पर बैठ गाँव की रक्षा करने वाले
बाघा बाबा की आत्मा भी उड़ गई
पेड़ कट गया
नहीं! नहीं!
काट दिया गया

गाँव का सबसे आदिम पुरखा था वो पेड़

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2. अकेले मेड़ की टिटहरी

रात कुछ काली नहीं थी
बल्कि कुछ बादल घेरे हुए थे चाँद को
जिसमें वो खेलता हुआ भयावह लग रहा था

खाली खेत के सन्नाटे में सुनाई दे रही थी झींगुर
और उस मौसम में अचानक निकल आने वाले मेंढकों की आवाज़

जुलाई की रात का कोई भरोसा सा नहीं लगता कब वो बरसने लग जाये
ऐसे में टिटहरी लगाती रहती है चक्कर गाँव के
उसकी आवाज़ को किसी ने नहीं समझा-
कब वो रो रही और कब हँस रही

केवल एक कहतूत में उसकी आवाज़ समझते रहे लोग
कुछ अपसकुन होने का

बारिश की रात बढ़ रहा था पानी
कुछ कुछ उपरौछा सा बहना हो रहा था शुरू मेड़ के
टिटहरी गस्त लगा के चिल्ला रही थी
अपने अंडों के बचाव के लिए

उस रात बारिश में
अकेले मेड़ की अकेली टिटहरी का परिवार ख़त्म हो गया
नहीं बच सका कुछ

अब उस मेड़ पर उगी हुई है हरी घास
जाने कितनी वारदातों को छिपा लिया है घास ने
टिटहरी अब भी नहीं भूल सकी है उस दिन की बात
इसलिए चिल्लाती रहती है गाँव के आस पास
हर रोज रात को

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3. नानी

जीवन के सबसे कमतर समय में
सबसे अधिक जीने की इच्छा सुगबुगाती रहती है भीतर
सालों पहले देखे गए दीवार के रंग कुछ फीके हो चुके होते हैं
या रंगों का उतार चढ़ा देता है उन पर कोई अन्य रंग
आंखों के नीचे की झुर्रियां गिन रही होती हैं –
उम्र

वो स्त्री अब कुछ चुप-चुप रहती है
खिलखिला उठती है किसी को देख
उसकी मुस्कान
और छलछला उठती हैं उसकी आँखें

अब कोई इच्छा नहीं रहती
सिवाय बहुत सी इच्छाओं के
जिनको पूरा करते करते अपूर्ण सा रह जाता है कुछ-कुछ जीवन

मैं उससे कहता तुम्हारे गोदने बहुत सुंदर हैं!
और वो अपना हाथ फैला दिखा देती पति के नाम के गोदने की जगह

अपने ही घर एक उम्र के बाद अकेले लगने लगते हैं!
घर के साँकल की तरह बजता रहता है हृदय अचानक से।

हम सबको अकेला छोड़ के जाते हैं
अकेले आते-आते धीरे से वो
पकड़ा देती हाथों में अपने अँचरा के कोने से निकाल
कुछ रुपए

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4. बुश्शर्ट

काठ की खूँ टियों में लटकता रहता शरीर का एक हिस्सा
जिसके हिस्से में नहीं रहता सर्वथा शरीर का सुख
सबसे महीन बातों का जानकार सबसे अधिक चुप रहता
दरवाज़े के पीछे या कि आलमारी में बंद

कभी अलगनी पर सूखता तो कभी भींगता
कितने जीवन जिए इस शरीर में
वो हुबहू सब कुछ जानता
कभी बाजुओं पर रगड़ कर पोछता गीले आँख तो कभी नाक
उसे मालूम होती जगहें चुपचाप पसर जाता शांत होकर

जब कभी अपनी बुश्शर्ट झाड़ता हूँ
तो दुनिया के कितने स्पर्श उभर आते हैं इसके रंगीन शरीर पर
कितनी हवाएँ झीने रेशों से बह जाती हैं बाहर
जिनकी साँसों में घुली होती हैं कितनी स्मृतियाँ

इसकी सतह पर छुए हाथों के थाप
और कितने आलिंगन
सबके बीच की कड़ी रहा यह

हमारे लिए कभी जूठन नहीं बने बुश्शर्ट
अपने सबसे प्रिय व्यक्तियों के चले जाने पर
उनके गंध की स्मृति लिये
चिपका रहा बुश्शर्ट

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5. मृत्यु के बाद

एक मृत देह की जीवित परछाई पर लेटे हुए
जब शरीर शिथिल हो चुका होगा
जिसमें हवा की सबसे नरम कँपकँपाहट की सी भी कोई कंपन नहीं होगी तब-
गोइंठे का तीक्ष्ण धुआँ भी नहीं उठा सकेगा जीव को

उस स्त्री को याद करते जिसने उस धुएँ की तीक्ष्णता में काट दिए हो अपने जीवन के आधे से अधिक दिन
और
उसके आँसुओं की धार कभी नहीं सूखी

उसकी याद में-

मृत्यु पर सबसे अंत में जलेंगे मेरे कंधे
उस स्त्री के दु:खों के सारे आँसू
इन्हीं कंधों ने सोख लिया है जो अंत तक आग में तपते भी गीले रहेंगे

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6. सिंदुरिया नदी

सुख के सबसे क्षणिक समय में
दुःख गाहे बगाहे साथ आया
नदी के सबसे विपरीत दिशा में खड़ा
मैं देर तक निहारता रहा उसका अकेलापन

वह चुपचाप आया था और चुपचाप ही चला गया

उस नीली नदी को सिंदुरिया होते मैंने पहली बार देखा था
उसके माथे पर एक नदी थी जो अब सूख चुकी थी उसका रंग इस नदी में घुल चुका था

गुलर के नीचे कितने आँसू बहाए पर कमबख़्त एक भी बूंद नदी में नहीं समा सका

सबसे अंतिम दिनों में सबसे अधिक साथ एक नदी ने दिया
जिसने बचा के रखी थी हमारे लिए हमारे शरीर के लंबाई जितनी जगह
जब नदी से पिछौड़ा हुए अंततः मैं लौट रहा था
तब एक नदी चुपचाप निहारे जा रही थी मुझे

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6392984156 ; [email protected]


5 thoughts on “छह कविताएँ / रवि यादव”

  1. जीवन की सच्चाई को सादगी से चित्रित करती सार्थक कविताएं हैं। बधाई हो।

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  2. जीवन के सूक्ष्म तंतुओं को चित्रित करती कविताएं,
    बधाई हो भैया

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  3. ग्रामीण पृष्ठभूमि की सुंदर कविताएँ।बधाई रवि भाई💐

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