‘जब मैं कहूँ कि शेक्सपीयर एक कहानी है जो भुला दी गयी है, कि अब वह किसी को याद नहीं है, तो यूँ नाक-भँव मत सिकोड़िये। शेक्सपीयर की किताब शेक्सपीयर नहीं है। वह शेक्सपीयर की किताब है, जो कि एक अलग कहानी है। किताब का ज़िंदा होना आदमी का ज़िंदा होना नहीं है।’
विचारों के मुक्ताकाश में निर्बंध भटकने वाला और भटकने में सक्षम गद्य अब दुर्लभ हो चला है। रायपुर में रहनेवाले आनंद बहादुर के यहाँ उसकी वापसी का स्वागत कीजिए!

एक लम्बी प्रतीक्षा है! उस पर से यह भी पता नहीं कि किसकी? अक्सर ऐसा लगता है सभी तरफ से ठगे गये। न इधर के रहे न उधर के। चारों तरफ नज़र दौड़ाइये, तो सभी संतुष्ट नज़र आते हैं, सिर्फ़ हम को यह दुख साल रहा है। हम अपने आप से कहते हैं। यह हम, हमारे अंदर कोई बैठा हुआ है, जो सर पीटता रहता है। प्रतीक्षा की लम्बी घड़ियाँ याद आती हैं। कुछ कहती हुईं। मगर क्या? यह समझ में नहीं आता। बाप रे, मैं तो सोचता ही नहीं हूँ! सोचने में ही सब गड़बड़ है। आज अचानक मन दुखी हो गया, आज अचानक बिना कारण राहत जैसी महसूस हुई। जो कुछ मैं महसूस कर रहा हूँ, वो मगर पकड़ से छूटता ही जा रहा है, छूटता ही जा रहा है। चाहे जितनी सरपट दौड़ लगाऊँ। दौड़ना तो बहुत तेज़ चाहता हूँ, मगर समय साथ नहीं दे रहा है। वह और जल्दी से आगे आगे भाग गया है। समय! असल खुराफ़ात उसी की है! वही दुश्मन नम्बर वन है। ठीक जिस जगह उसे होना था, वहाँ कभी नहीं दिखा। हरदम्म या तो आगे, या पीछे, या इस साइड, या उस साइड खिसका हुआ।
हम बचपन में जिस मकान में रहते थे, वह भी ऐसा ही था। हमेशा हमारे अस्तित्व से ज़रा-सा रूठा हुआ रहने वाला। एक तो वो किराये का मकान था। किराये का मकान कभी पूरी तरह आपसे खुश नहीं हो सकता! वह हमेशा आपसे शिकायत करेगा, चाहे उसे खुश करने के लिये कुछ भी करते रहिये। हमारा मकान भी एक शिकायती मकान था, मगर आरामदेह! यहाँ तक कि उसकी शिकायतें तक आरामदेह हुआ करतीं। यानी, आप उनके साथ अपनी मर्ज़ी से बरत सकते थे। मगर वे आपको ज़रा-सा शर्मिंदा करतीं। बस्स, इतने भर से उनका काम चल जाता। वे सोचतीं, चलो, इसे काफ़ी टॉर्चर दे दिया, अपना काम पूरा हुआ। अब आगे की ये जाने और इसकी याददाश्त! और आगे का काम याददाश्त बखूबी करती। याददाश्त आपको जीने नहीं देती। वह आपको हमेशा समय-यात्रा कराती रहती है। लोग कहते हैं, समय-यात्रा असंभव है, मगर खुद हमेशा समय-यात्राओं में रहते हैं। वो भी एक नहीं, कई-कई समय-यात्राओं में एक साथ! मैं भी ऐसी ही अनेक समय-यात्राओं में लगातार रहता हूँ। सोच के अलग-अलग पहलू, जो समय-यात्राओं के छोटे-छोटे पड़ाव हैं। अभी मैं एक पड़ाव पर हूँ, कुछ देर बाद चल दूँगा। जहाँ मैं चलना शुरू करूँगा, मेरे बचपन का कोई प्रतिद्वंद्वी चिल्लायेगा- ’एक था राजा एक थी रानी, दोनों मर गये खतम कहानी!’ चलो क़िस्सा खतम पैसा हजम! मगर यहाँ से कोई कुछ भी हजम करके कहीं नहीं जाता है।
मुझे मगर बचपन के सब क़िस्से याद हैं। उनमें से एक को भी नहीं भूला हूँ। यह सही है कि नामों को भूल गया, और किसके साथ क्या-क्या ख़ासकर हुआ। और किसने किसके साथ ख़ासकर क्या-क्या किया। और शुरू में क्या हुआ और बीच में क्या हुआ, ये सब गड्ड मड्ड हैं। मगर क़िस्सा समूचा हूबहू याद है। इसलिये किसी भी क़िस्से में मेरी कतई कोई दिलचस्पी कब्भी नहीं रही। मगर क़िस्से अपनी गति से जीवन में लुंघड़ते चले आते हैं। जैसे उन्हें हड़बड़ी हो कि उनको जल्द बरता नहीं गया तो विस्मृति के लायक भी नहीं रह जायेंगे। जब हम कोई कहानी कहते हैं, तो उसे कोई जानता है। जानता है, तभी जाकर वह उसे भूलता है। जानने से पहले भूलना संभव नहीं है। भुला दिया जाना देखा जाय तो एक कहानी की चरम परिणति है। उसके अस्तित्व की चरम अवस्था है। जिसके बाद कुछ भी बाकी नहीं रहता है। जब तक कोई न कोई उसे याद रखे हुए है, तब तक वह चक्कर में है, एक बार उसे किसी ने जान लिया, तो समझ लीजिये, उसका जीवन चक्र फिर से चालू हो गया। भुला दिया जाना, पूरी तरह विस्मृत कर दिया जाना, मोक्ष पाने के समान है। बुद्ध के अनुसार निर्वाण की अवस्था है। बुद्ध तो कहते हैं, निर्वाण बहुत अच्छी चीज़ है, वही वह श्रेष्ठतम जिसके लिये सारा कुछ है! तो क्या एक कहानी होती ही इसीलिये है कि अंततः उसे पूरी तरह भूल जाया जा सके? कहानी और मानव जीवन में मतलब कोई अंतर नहीं है?
यानी यह तो बड़ा ही डरावना सच है कि मानव महज़ एक कहानी है, जिसे किसी ने किसी से कहा है। या कह रहा है, और जैसे ही कहानी पूरी कह ली जायेगी, तो पूरी तरह भुला दी जायेगी। यानी उसका किसी के लिये कोई उद्देश्य नहीं है, यह सब जो हमारे चारों ओर सोद्देश्यता का जंजाल फैला हुआ देख रहे हैं, कुछ नहीं, बस दिखावा है। असलियत तो कुछ और है। इसीलिये मृत लोग इतनी जल्द भुला दिये जाते हैं। हक़ीक़त में उन्हें कोई याद नहीं करता। कोई मिस नहीं करता। जिस चीज़ को मिस किया जाता है, वह तो कुछ और होती है। उस व्यक्ति से हासिल हो रही छोटी-मोटी सहूलियतें! जिन्हें हम कई भ्रामक नाम दे देते हैं। जब वह आदमी चला जाता है, तो उन सहूलियतों की कमी हमें छटपटाने को मजबूर कर देती है। और हम मान लेते हैं, हम उस व्यक्ति को याद कर रहे हैं! उसे मिस कर रहे हैं। जबकि हम तो बिना सहूलियत के खुदा को भी याद नहीं करते, बुद्धि हमें इस दर्जे का कृतघ्न बना कर रख देती है। इस मामले में हमसे अच्छे तो कीट पतंगे, और जानवर होते हैं। सबसे अच्छी तो मछलियाँ होती हैं, जो एक क्षण के बाद प्रतिबिम्ब के रूप में देखी गयी अपनी शक्ल तक को नहीं पहचानती हैं। वे खुदा, अगर वह होता है, उसके सबसे क़रीब होती होंगी, और इस लिहाज से सृष्टि की सबसे उत्कृष्ट रचना होती होंगी।
इस लिहाज से तो मनुष्य सृष्टि का सबसे हेय नमूना साबित होता है। यह बात तो सचमुच बहुत परेशानी में डालने वाली है। मनुष्य मतलब अच्छी कहानी नहीं है। उसकी कोई उपयोगिता नहीं है, और वह अपनी कृत्रिम उपयोगिता बनाये हुए है। ये तस्वीरें, ये संस्मरण, ये पोर्ट्रेट, ये जन्मदिवस, ये एनिवर्सरियाँ, ये जयंतियाँ, ये पुण्यतिथियाँ- ये सब क्या हैं? बेकार की आतिशबाज़ियाँ! एक मिनट की चकाचौंध, फिर सब कुछ फुस्स। क्या है जो लगातार प्रजज्वलित है? कुछ नहीं, एब्सॉल्यूट्ली नथिंग!
अब शेक्सपीयर को ही ले लीजिये- उसका क्या है? हाँ, माना कि उसकी किताबें अभी भी बहुत पढ़ी जा रही हैं। मगर इससे उसके जीवन को क्या मिल रहा है? कौन-सा वह नायाब तोहफ़ा? उस महत्व को जब महसूस करने की ताक़त ही उसमें नहीं है। जब वह इस बात पर इतरा भी नहीं सकता। और कोई और इतरा ले, तो उससे क्या होता है? अंग्रेज इतरा लें कि वह बरतानवी सभ्यता का नायाब नमूना है। कि वह संसार में सर्वश्रेष्ठ है। मगर वह तो अपने समय में इस बात पर उदास होकर मर गया कि उसकी प्रेमिका को एक धनी व्यक्ति ने चुरा लिया! उस अफ़सोस से तो उसे कोई राहत नहीं है। इसीलिये तो, जब मैं कहूँ कि शेक्सपीयर एक कहानी है जो भुला दी गयी है, कि अब वह किसी को याद नहीं है, तो यूँ नाक-भँव मत सिकोड़िये। शेक्सपीयर की किताब शेक्सपीयर नहीं है। वह शेक्सपीयर की किताब है, जो कि एक अलग कहानी है। किताब का ज़िंदा होना आदमी का ज़िंदा होना नहीं है। यदि कोई शेक्सपीयर नामक कहानी को याद करना चाहेगा, तो उसके लिये उसे यह जानना पड़ेगा कि शेक्सपीयर नामक जीवन कैसा था, अपनी पूर्णता में। अर्ल के द्वारा प्रेमिका लूट लिये जाने पर उसने अपने सानेट्स में जो खूबसूरती से झूठ बोला है, उसके इतर सच क्या है? और वही सच तो हमेशा के लिये खो गया है। यह कि सचमुच कैसा लगता है जब कोई आपकी प्रेमिका को चुरा लेता है, और आप कुछ नहीं कर पाते, हालाँकि आप शेक्सपीयर हैं, सभ्यता के सबसे बेहतरीन, नायाब नमूने!
मैं तो जानता हूँ कि प्रेमिका का खो जाना कैसा होता है, क्योंकि मैंने खो कर देखा है। खो कर, किसी के द्वारा चुराया जा कर नहीं। वह एक एकदम से अलग अनुभूति होती होगी। जो शेक्सपीयर जानता होगा, या फिर वे लोग जो इस हादसे से गुज़रे होंगे। मगर वे इतने पर भी शेक्सपीयर नहीं हो सकते, क्योंकि ऐसी बहुत-सी चीज़ें हैं। मैं सोचता हूँ कि मैं यदि शेक्सपीयर की जगह होता, तो क्या करता? क्या मैं अर्ल का अनुगृहीत बने रह कर मान-सम्मान, ऐश्वर्य, आदि संचित करता हुआ नाटक लिखता रहता, कि डार्क लेडी से कहता, भाड़ में जाय नाटक लिखना, भाड़ में जाय मान-सम्मान, यश, पैसा, मकान, दुकान (ग्लोब थियेटर! और क्या?), चलो, सबको धोखा देकर हम तुम यहाँ से भाग चलें, किसी अनाम नियति की ओर। चलो अपने जीवन को सार्थक बनाएँ। बाकी सब बेकार की चीज़ है। नहीं, मुझे तुम्हें छोड़ कर महान साहित्य रचने की महानता नहीं चाहिये। पहले तुम जीवन में आओ, फिर कुछ हो सके, तो होवे। और तब मैं (जो अभी शेक्सपीयर के विकल्प में हूँ, कोई नाटक-वाटक नहीं लिखता, और तब अंग्रेज कहते कि मार्लाे सभ्यता की महानतम उपलब्धि है। वे जब महानतम सभ्यता हैं तो महानता का रायता फैलाये बगैर कैसे रह सकते हैं?) इस तरह से मैं, एक अदना सा शख़्स, जीवन के मामले में शेक्सपीयर से अधिक बुद्धिमान हो सकता हूँ, चाहे रचनाकर्म के मामले में वह मुझसे असंख्य गुना ज़्यादा बुद्धिमान हो।
फिर इस प्रश्न का जवाब भी कहीं न कहीें से आना चाहिये कि रचना बड़ी होती है या जिंदगी। किसकी बलिवेदी पर किसको चढ़ाया जाना चाहिये? यदि आपके पास किसी एक को चुनना हो तो? शेक्सपीयर ने तो रचनाकर्म को चुना, आपकी च्वायस क्या है? यहाँ ‘यही है राइट च्वायस बेबी’ कहने से काम नहीं चलने वाला, कहीं न कही आपको हारना ही पड़ेगा, चाहे रचना में, चाहे जीवन में। दोनों जगह आप नहीं जीत सकते! खुदाई व्यापार में इसको सरासर बेईमानी माना जाता है। जी, जी हाँ! खुदा भी एक व्यापारी ही है। उसका भी एक व्यापार ही है। वो भी नफ़ा-घाटा पर आँख काढ़े बैठा रहता है। इधर से दो, उधर से लो- उसका मंत्र है। इसीलिये सबसे हास्यास्पद वे होते हैं जो दोनों जगत को साधने की बाज़ीगरी करते दिखायी देते हैं। वे एक तनी हुई रस्सी पर चलने का नाटक करते हैं। रस्सी किसी भी समय टूट कर उनको खाई में ढकेल देती है। या तो आप आसमान पर रहिये या पाताल में- खुदा कहता है। मैं आपको दोनों ओर इतना फैलने नहीं दूँगा कि तने आकाश में फैलें और जड़ें ज़मीन की गहराई में पाताल तक जायें। क्योंकि वह तो खुद मैं हूँ! ओमेगा! अनलहक! इसीलिये अनलहक वाले सभी जलाई-गलाई, काट-कूट, जहर-फहर, सलीब-फलीब, जोर-जबर, से गुज़रते रहते हैं। अगर आप विलियम बटलर यीट्स बनने की कोशिश करते हैं, तो खुदा मॉड गॉन बनकर आता है जो आपका प्यार ठुकरा कर एक रिवाल्यूश्नरी कुत्ते के साथ ब्याह रचा लेती है।
कुल मिलाकर ख़ुदा को खूब खूब ऐतराज है प्यार, इश्क, मोहब्बत, लभ, एमॉर, भालो बासा पर। जबकि पूरा समूचा प्रोक्रियेशन का व्यापार चलाने का ठीका भी लभ के होने से ही है। मगर सब कुछ बर्बाद करने का ठीकरा भी उसी के सर फूटा है। इश्क ने ग़ालिब निकम्मा कर दिया! ख़ुदा ने ग़ालिब की महबूबा की जान ले ली, क्योंकि ग़ालिब बहुत चालाकी कर रहा था, उधर निहायत शानदार ग़ज़लें कहना, इधर डोमिनिया के साथ जबरदस्त प्रेम का नाटक भी चलाये रखना। बस, ख़ुदा को लग गयी। ठीक यही बात दांते के साथ भी घटी। ख़ुदा ने वेरा को बुला लिया। कैसा दांते का कलेजा जलता था! और ग़ालिब? नब्बे साल की उमर तक हाय हाय करता रहा, यीट्स कविता लिखता रहा कि मेरी बेटी कैसी भी होगी, मॉड गॉन जैसी नहीं होगी। कवियो, लिख लिख कर मर जाओगे, लेकिन हसीना आशिक़ के हाथ नहीं आएगी।
जॉन डन को ये पता था कि सच्चा प्यार होना (दोनों तरफ़ से) अमर हो जाना है। और शायद उसने यह राज़ ख़ुदा को बता दिया होगा। नतीजा है कि अगर आशिक़ सच्चा है, तो महबूबा झूठी निकलती है और अगर प्रेमिका सच्ची है तो चाहने वाला झूठा निकलता है। ये ख़ुदाई इंतज़ाम है, और हर ख़ुदाई इंतज़ाम की तरह यह भी पुख़्ता इंतज़ाम है। अगर दोनों सच्चे हुए तो ख़ुदा एक को साफ़ कर डालता है। साफ़ नहीं कर पाया (कई बार ख़ुदा भी ऐसे मामले में मजबूर हो जाता है), तो पागल, ख़ब्ती, सनकी, दीवाना- इस तरह का हश्र कर डालता है। अगर ये सब भी नहीं हो पाया तो कोशिश करता है कि उस हसीना पर कोई राजा-महाराजा, बादशाह-तानाशाह वगैरह की नज़र पड़ जाय।
फिर आता है विरह! सृष्टि की शुरुआत से, या कहें मानव सभ्यता की शुरुआत से इसी का सब कुछ पर राज रहा है। यही प्रेम का गूगल मैप है। उन्नीस सौ नब्बे के बाद यह ग़ायब हो गया है। इसे ग़ायब किया है मोबाइल फोन ने। इसके साथ ही सृष्टि बदल गयी है। मोबाइल फोन के रहते विरह का हो पाना इम्पासिबल है। यह तुरंत मिलन करवाता है। जब गूगल मैप ही ग़ायब हो तो प्रेम के रोड-वे को कैसे खोजेंगे? लिव इन रिलेशनशिप में? समलैंगिक डांस में? एक हूक-सी उठती है, एक प्रश्न मूं फाड़ता है। हममें से हरेक ने एक न एक प्रेम गँवाया है, क्योंकि कोई माध्यम ही नहीं था जो मिलन करवाता। चिट्ठी-पत्री, खत-खुतूत- सब बेकार की चीज़ें थीं। कहीं कोई कोर्टशिप नहीं था। अंग्रेजों ने अच्छा तरीक़ा निकाल रक्खा था। कोर्टशिप के बाद प्रोपोज़ करने के बाद ही शादी! आहा! आहा! घुटनों के बल बैठ कर युवक युवती से जीवन संगिनी बनने की मानो भीख माँग रहा है! उसका हृदय धड़क रहा है। हाँ कहेगी कि ना? और स्त्री के लिये कितना अद्भुत गौरव का क्षण! वह खड़ी होकर देख रही है, मानो भगवान भक्त को ताक रहे हैं, और फिर जब वह हाँ कहती है, तो जैसे वह खुद भगवान के श्रीमुख से निकला वरदान का शब्द ही है- तथास्तु! और प्रेमी के लिये वह अमर हो जाने का समय होता था। जब एलिज़ाबेथ डार्सी को तथास्तु कहती है- ’सर्व स्त्रीयानां परित्यजं मामेकं शरणं ब्रज!’ जेन तुमने कमाल ही कर दिया है- कितने कष्टों के बाद, किन घुमावदार राहों से गुज़र कर लिज़्ज़ी और डार्सी उस बिंदु पर पहुँचते हैं, जो अमृत-सदृश है। लिज़्ज़ी की माँ रात-दिन जुगत में रहती है, संभावित प्रेमियों को घर में बुलाने और उन्हें प्रोत्साहित करने। खजुराहो, अजंता, एलोरा- स्त्री सौंदर्य को खुलकर गौरवान्वित करते फिर रहे हैं। जाने कब, कहाँ, कैसे भटक गये, किसने या किनने भटकाया? विरह का लासा जो चारों तरफ लसलसा रहा है, किसका है?
कैसे अंधे समयों के कैसे पखेरू, कहाँ उड़ते? कैसे एक-एक शब्द के लिये तरसे। न दिन होवे न रात। बस एक धूसर समय चहुँ ओर, राधे-कृष्ण की आरती की तरह पसरा हुआ, प्रेम को पूजते पूजते अपना सब कुछ हेराय जाना, जो कहीं स्वीकृत नहीं है! सिनेमा की नकली दुनिया जहाँ पेड़ों के इर्द गिर्द नकली प्रेमी प्रेमिकाएँ नाच गा रहे हैं, नकली मूँ चिढ़ाता कारोबार! अंतरात्मा चीख चीख कर पूछती- कहाँ की यह दुनिया है, फिल्मइया लोगो? उपन्यासों में भी किसी न किसी परिणिति पर पहुँचता, त्याग, बलिदान, आत्म-उत्सर्ग को गौरवान्वित कर हिसाब किताब बराबर करता। माफ़ कीजियेगा, लेकिन कहाँ है प्रेम? वह तड़प कहाँ है? कहाँ है वह विरह? दुहराव से अर्थ भरने की कोशिश, पर क्या वह वहाँ है भी? एक अंतहीन प्रतीक्षा है। वह अंतहीन प्रतीक्षा दृश्यमान होकर आँख में झाँकती है, मैं ख़ुद को एक मिथ्या अभिमान से संचालित और उपहासित तुच्छ प्राणी के रूप में देखता हूँ, और मेरी आँखें यातना और रोष से सुलगने लगती हैं…
चारों तरफ़ घूर कर देखता हूँ, चल रहा है व्यापार, चाक अनवरत घूम रहा है। बिसात बिछी है, बाजी लगी हुई है। पासे फेंके जा रहे हैं। इस बिसात से लेकिन परिचित नहीं हूँ मैं, यह हमारे वक़्तों की बिसात नहीं हैं। अरे, अभी हम खेल पूरा कर उठे भी नहीं, और बीच खेल में बाज़ी भी बदल गयी! बाज़ी ही नहीं, समूचा खेल ही बदल गया। यहाँ खेल के सारे, पासे, गोटियाँ, सब बदले हुए हैं। इनके बीच अब हम अपने आपको पहचानने से भी महरूम हैं। यह महरूमियत सर्वव्यापी सर्वभक्षी है। हमसे पहले जो खेलने के लिये आये, उनके लिए कम से कम एक निश्चिंती का आलम था, वे हारे या जीते, मगर उसी चौपड़ से उठे जिस पर वे बैठे थे। वे जानते थे कि वे क्या खेल खेल रहे थे, कि उसमें जीत और हार का क्या मतलब था। जीत में एक आह्लाद था तो हार में एक संतुष्टि का बोध, मेरा क्या है?
मेरे अंदर अब कोई विरह नहीं है। बहुत लम्बे समय तक चला उसका खेल, मगर वह अब वह हार गया है। आख़िर कितना सब्र होता है आपके पास? एक जनम भर का सब्र? अनेक जन्मों भर का सब्र? जब सब्र का पैमाना पूरी तरह चुक जाये तब? और मौत तब भी नहीं आये, तब? जब आप खुद से कहें कि जीवन हर मायने में एक खुशनसीबी है। आपको प्रेम प्रिय है, कि जीवन? आख़िर प्रेम भी तो इसी काया से ही पैदा हुआ था ना! कि वह कहीं और रक्खा हुआ था, और जैसे ही मौक़ा मिला, आकर के काया से सट गया? इसलिये क्या ज़रूरी नहीं विरह को मारना? क्योंकि वह है, तो प्रेम है।
मुझे याद हैं उफनते समुन्दरों के, सुलगते जंगलों के, गर्म तूफ़ानों के दिन। जब हम एक दुनिया रचना चाहते थे। यह बात मगर ख़ुदा को कैसे पसंद आती? जबकि उसने ख़ुद एक इतनी अच्छी दुनिया रच कर दी है, फिर क्या ज़रूरत कि कोई उससे भी अच्छी दूसरी दुनिया रचे? इसीलिये वह बीच में लंघी मार देता है। आप एक प्रयोग कर के देख लीजिये, आपको ख़ुद ख़ुदा की लंघी का पता चल जायेगा। दो सघन प्रेमी-प्रेमिका को खोजिये, और उनका मिलन करवा कर देखिये कि क्या होता है। असफलता के विरुद्ध उनकी सारी गारंटी आप खुद बन जाइये। और दोनों को मिला दीजिये। एकदम से लैला-मजनू, शींरी फरहाद, रोमियो जुलियेट, की दास्तान को मिटा डालिये धरती पर से! और फिर तमाशा देखिये। देखिये कि सर्वशक्तिमान किस तरह इस खेल को बिगााड़ता है। मैंने अनेक बार इसे घटते देखा है। इस पर सोचा है। मुझे बस एक ही जवाब मिला है, प्रेम एक ऐसी दुनिया को गढ़ता है, जो ईश्वर की बनाई दुनिया से ज्यादा सुन्दर है, इसलिये। वह सोचता है प्रेम की बनाई दुनिया को छिन्न भिन्न कर दे। इसको नेस्तनाबूद करके रख दे। इसका नामोनिशान नहीं बचना चाहिये। नहीं तो ये लोग स्वर्ग में सशरीर घुसने की कोशिश करने लगेंगे। वाह! ऐसा कैसे हो सकता है! बिना मरे स्वर्ग!
इसलिये वह प्रेम को मार डालता है। मगर वह स्वामी है, दाता है, सृजनकर्ता है, इसलिये उसे देखना है कि उसके बदले में कुछ दे। इसलिये वह देता है। उसका वरदान है- विरह। वह एहसास जिसके बिना न जीवन पूर्ण है न मरण। वह कहता है, स्वर्ग में नर्क में क्या रक्खा है? दोनों ख़ाली डिब्बे हैं। असली चीज़ है जीवन में किसी को पाने का एहसास! और एक बार वह एहसास हासिल हो जाये तो फिर उससे भी बड़ी चीज़ है, उसको खोने का एहसास! किसी को खो कर देखो, क्या मज़ा है उसमें! दुनिया में जितनी भी अच्छाई है, इसी नेमत की डोर थाम कर पहुँची है। वर्ना वह भले ही सुन्दर थी, मगर उसमें कोई अर्थ नहीं था। तब उसमें केवल जन्म लेना, बढ़ना, जन्म देना, वृद्ध होना और मृत्यु था। जीवन भर अपने आपको महसूस करना केवल उसी को हासिल हो सका है जिसने खोया है। उस चीज़ को जो उसने ख़ुद कमायी है, ख़ुद बनायी है, ख़ुद गढ़ी है। और किसी की चाह को छोड़ कर ऐसी दूसरी कौन-सी चीज़ हो सकती है? बाक़ी सब कुछ तो मैंने ख़ुद बंदों को दे दी है।
और इससे आसान कौन-सी चीज़ हो सकती है पाने के लिए! इसके लिए कोई कुशलता नहीं, कोई योग्यता नहीं, कोई कलाकारी नहीं, कोई बुद्धिमत्ता नहीं चाहिये। बस किसी दूसरे के दूसरापन पर मोहित होकर मर मिटना होता है। सादादिल ऐसा कर सकते हैं। इसके लिये कोई गुरू नहीं चाहिये, किसी धर्मग्रंथ की ज़रूरत नहीं पड़ती। बस आओ, और जान लुटाओ! फिर यह एक साधारण आदमी को एक शेक्सपीयर, एक कीट्स, एक वर्डसवर्थ, एक ग़ालिब, एक लारेंस, एक नेरूदा, एक टैगोर में बदल देता है। इसके बिना तन तन नहीं मसान है।
फरीदा जो तन विरह न उपजै, सो तन जान मसान!
anand.bahadur.anand@gmail.com







बहुत सुंदर आलेख,इस अकेले लेख में इतने आयाम हैं कि पढ़ते हुए लगता है कि यह भी एक नजरिया है जिन्दगी को इस तरह भी देखा जा सकता है ।
आनंद जी को बधाई 💐
अद्भुत गद्य!
अंतर्दृष्टि पूरित।