इस वकील की अभी सख्त़ ज़रूरत है / संजय जोशी
2007 की ‘एडवोकेट’ पर, दस्तावेज़ी फ़िल्मों के बारे में अपनी जानकारी को अद्यतन रखनेवाले संजय जोशी की टिप्पणी: —————————————————————- दक्षिण
2007 की ‘एडवोकेट’ पर, दस्तावेज़ी फ़िल्मों के बारे में अपनी जानकारी को अद्यतन रखनेवाले संजय जोशी की टिप्पणी: —————————————————————- दक्षिण
भाजपा सरकार ने 2017 में तमाम विपक्षी दलों के विरोध और चुनाव आयोग तथा रिज़र्व बैंक की मनाही के बावजूद
“चोरों के भी उसूल होते हैं।” “नहीं, बर्खुरदार! चोरों के ही उसूल होते हैं।”–किसी फ़िल्म का यह सलीम-जावेदीय संवाद प्रवीण
तानाशाह अपनी मुस्कान बिखेर रहा था मूंछें होतीं तो तन गयी होतीं पेंट कमीज़ पहन रहा होता तो उसकी मसकें
जवरीमल्ल पारख की किताब ‘साहित्य कला और सिनेमा’ पर हरियश राय की संक्षिप्त टीप ——————————————————————– साहित्य, कला और सिनेमा जवरीमल्ल
अंग्रेजी के ख्यात कवि, कला-समीक्षक, कला-सिद्धांतकार, और लल द्यद का अंग्रेजी में अनुवाद करनेवाले रणजीत होसकोटे ने इंटरनेशनल सेंटर गोवा
जवरीमल्ल पारख की किताब जीवन की पाठशाला पर विष्णु नागर की टिप्पणी ——————————————————————- जवरीमल्ल पारख प्रतिष्ठित साहित्य आलोचक होने के
नवारुण ने विलक्षण कहानीकार योगेंद्र आहूजा के वैचारिक लेखन को टूटते तारों तले शीर्षक से पुस्तकाकार प्रकाशित किया है। उस
2022 में प्रकाशित राकेश बिहारी की कहानी ‘फांसी’ संभवतः मृत्युदंड से संबंधित बहस को संबोधित करती हिंदी की अकेली कहानी