पहला छापा / इब्बार रब्बी
इब्बार रब्बी की यह कविता एक रची जा रही शृंखला की पहली कड़ी है, इसलिए ‘पहला छापा’। दूसरे, तीसरे और
इब्बार रब्बी की यह कविता एक रची जा रही शृंखला की पहली कड़ी है, इसलिए ‘पहला छापा’। दूसरे, तीसरे और
विडंबनाओं की पहचान और उनकी सहज संप्रेषणीय अभिव्यक्ति राघवेंद्र प्रपन्न की कविताओं को विशिष्ट बनाती है। वे बिना अधिक शब्द
ये उस दौर के दुःख में शामिल कवि की कविताएँ हैं जिस दौर में कथावाचक हर कथा की समाप्ति के
अपने देशकाल को कहने से लेकर अपने-आप को कहने तक, संजय कुंदन की कविताओं में सादगी के साथ व्यक्त होने
हमारे समय के एक सजग युवा की चिंताएं, अवसाद और खुशियां माधव महेश की कविताओं में गहरी संवेदना के साथ
सीमा सिंह की कविताएं ‘इस हिंदू होते समय’ का प्रति-आख्यान हैं। यहां स्त्रियों के मंगलसूत्र की चिंता करते प्रधानमंत्री के
एक ऐसे समय में जब ‘विलाप को हत्या से भी संगीन अपराध बता दिया’ गया हो, विशाल श्रीवास्तव की ये
तानाशाह अपनी मुस्कान बिखेर रहा था मूंछें होतीं तो तन गयी होतीं पेंट कमीज़ पहन रहा होता तो उसकी मसकें
नियंत्रण जो समझता है आपकी भाषा वही आपके नियंत्रण में आता है चींटी नहीं समझती मनुष्य की भाषा इसलिए वह